जनकनन्दिनी सीता मुख पर आँसुओं की धारा बहा रही थी। उन्होंने अपना मुख नीचे की ओर झुका लिया था। वे उपर्युक्त बातें कहती हुई ऐसी जान पड़ती थीं मानो उन्मत्त हो गयी हों। उन पर भूत सवार हो गया हो अथवा पित्त बढ़ जाने से पागलों का - सा प्रलाप कर रही हों अथवा दिग्भ्रम आदि के कारण, उनका चित्त भ्रान्त हो गया हो। वे शोकमग्न हो धरती पर लोटती हुई बछेड़ी के समान पड़ी पड़ी छटपटा रही थीं।
उसी अवस्था में सरलहृदया सीता ने इस प्रकार विलाप करना आरम्भ किया - हाय ! इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षस मारीच के द्वारा जब रघुनाथजी दूर हटा दिये गये और मेरी ओर से असावधान हो गये, उस अवस्था में रावण मुझ रोती, चिल्लाती हुई अबला को बलपूर्वक उठाकर यहाँ ले आया। अब मैं राक्षसियों के वश में पड़ी हूँ और इनकी कठोर धमकियाँ सुनती एवं सहती हूँ। ऐसी दशा में अत्यन्त दु:ख से आर्त एवं चिन्तित होकर मैं जीवित नहीं रह सकती।
‘महारथी श्रीरघुनाथजी के बिना राक्षसियों के बीच में रहकर मुझे न तो जीवन से कोई प्रयोजन है, न धन की आवश्यकता है और न आभूषणों से ही कोई काम है। अवश्य ही मेरा यह हृदय लोहे का बना हुआ है अथवा अजर-अमर है, जिससे इस महान् दुःख में पड़कर भी यह फटता नहीं है। मैं बड़ी ही अनार्य और असती हूँ, मुझे धिक्कार है, जो उनसे अलग होकर मैं एक मुहूर्त भी इस पापी जीवन को धारण किये हूँ। अब तो यह जीवन केवल दुःख देने के लिये ही है।'
‘उस लोकनिन्दित निशाचर रावण को तो मैं बायें पैर से भी नहीं छू सकती, फिर उसे चाहने की तो बात ही क्या है? यह राक्षस अपने क्रूर स्वभाव के कारण न तो मेरे इनकार पर ध्यान देता है, न अपने महत्त्व को समझता है और न अपने कुल की प्रतिष्ठा का ही विचार करता है। बारम्बार मुझे प्राप्त करने की ही इच्छा करता है।'
'राक्षसियो! तुम्हारे देर तक बकवाद करने से क्या लाभ? तुम मुझे छेदो, चीरो, टुकड़े-टुकड़े कर डालो, आग में सेंक दो अथवा सर्वथा जलाकर भस्म कर डालो तो भी मैं रावण के पास नहीं फटक सकती। श्रीरघुनाथजी विश्वविख्यात ज्ञानी, कृतज्ञ, सदाचारी और परम दयालु हैं तथापि मुझे संदेह हो रहा है कि कहीं वे मेरे भाग्य के नष्ट हो जाने से मेरे प्रति निर्दय तो नहीं हो गये ? अन्यथा जिन्होंने जनस्थान में अकेले ही चौदह हजार राक्षसों को काल के गाल में डाल दिया, वे मेरे पास क्यों नहीं आ रहे हैं?'
‘इस अल्प बल वाले राक्षस रावण ने मुझे कैद कर रखा है। निश्चय ही मेरे पतिदेव समरांगण में इस रावण का वध करने में समर्थ हैं। जिन श्रीरघुनाथजी ने दण्डकारण्य के भीतर राक्षसशिरोमणि विराध को युद्ध में मार डाला था, वे मेरी रक्षा करने के लिये यहाँ क्यों नहीं आ रहे हैं ? यह लङ्का समुद्र के बीच में बसी है, अतः किसी दूसरे के लिये यहाँ आक्रमण करना भले ही कठिन हो; किंतु श्रीरघुनाथजी के बाणों की गति यहाँ भी कुण्ठित नहीं हो सकती। वह कौन-सा कारण है, जिससे बाधित होकर सुदृढ़ पराक्रमी श्रीरघुनाथजी राक्षस द्वारा अपहृत हुई अपनी प्राणपत्नी सीता को छुड़ाने के लिये नहीं आ रहे हैं।
'मुझे तो संदेह होता है कि लक्ष्मणजी के ज्येष्ठ भ्राता श्रीरघुनाथजी को मेरे इस लङ्का में होने का पता ही नहीं है। मेरे यहाँ होने की बात यदि वे जानते होते तो उनके जैसा तेजस्वी पुरुष अपनी पत्नी का यह तिरस्कार कैसे सह सकता था? जो श्रीरघुनाथजी को मेरे हरे जाने की सूचना दे सकते थे, उन गृधराज जटायु को भी रावण ने युद्ध में मार गिराया था। जटायु यद्यपि बूढ़े थे तो भी मुझ पर अनुग्रह करके रावण का वध करने के लिये उद्यत हो उन्होंने बहुत बड़ा पुरुषार्थ किया था।'
‘यदि श्रीरघुनाथजी को मेरे यहाँ रहने का पता लग जाता तो वे आज ही कुपित होकर सारे संसार को राक्षसों से शून्य कर डालते। लङ्कापुरी को भी जला देते, महासागर को भी भस्म कर डालते तथा इस नीच निशाचर रावण के नाम और यश का भी नाश कर देते। फिर तो नि:संदेह अपने पतियों का संहार हो जाने से घर-घर में राक्षसियों का इसी प्रकार क्रन्दन होता, जैसे आज मैं रो रही हूँ। श्रीरघुनाथजी और लक्ष्मण लङ्का का पता लगाकर निश्चय ही राक्षसों का संहार करेंगे। जिस शत्रु को उन दोनों भाइयों ने एक बार देख लिया, वह दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता।'
‘अब थोड़े ही समय में यह लङ्कापुरी श्मशान भूमि के समान हो जायगी। यहाँ की सड़कों पर चिता का धुआँ फैल रहा होगा और गीधों की जमातें इस भूमि की शोभा बढ़ाती होंगी। वह समय शीघ्र आने वाला है जब कि मेरा यह मनोरथ पूर्ण होगा। तुम सब लोगों का यह दुराचार तुम्हारे लिये शीघ्र ही विपरीत परिणाम उपस्थित करेगा, ऐसा स्पष्ट जान पड़ता है। लङ्का में जैसे-जैसे अशुभ लक्षण दिखायी दे रहे हैं, उनसे जान पड़ता है कि अब शीघ्र ही इसकी चमक-दमक नष्ट हो जायगी।'
‘पापाचारी राक्षसराज रावण के मारे जाने पर यह दुर्धर्ष लङ्कापुरी भी निश्चय ही विधवा युवती की भाँति सूख जायगी, नष्ट हो जायगी। आज जिस लङ्का में पुण्यमय उत्सव होते हैं, वह राक्षसों के सहित अपने स्वामी के नष्ट हो जाने पर विधवा स्त्री के समान श्रीहीन हो जायगी। निश्चय ही मैं बहुत शीघ्र लङ्का के घर-घर में दु:ख से आतुर होकर रोती हुई राक्षस कन्याओं की क्रन्दनध्वनि सुनूँगी। श्रीरघुनाथजी के सायकों से दग्ध हो जाने के कारण लङ्कापुरी की प्रभा नष्ट हो जायगी। इसमें अन्धकार छा जायगा और यहाँ सभी प्रमुख राक्षस काल के गाल में चले जायँगे।'
‘यह सब तभी सम्भव होगा, जब कि लाल नेत्र प्रान्त वाले शूरवीर भगवान् श्रीरघुनाथजी को यह पता लग जाय कि मैं राक्षस के अन्तःपुर में बंदी बनाकर रखी गयी हूँ। इस नीच और नृशंस रावण ने मेरे लिये जो समय नियत किया है, उसकी पूर्ति भी निकट भविष्य में ही हो जायगी। उसी समय दुष्ट रावण ने मेरे वध का निश्चय किया है। ये पापाचारी राक्षस इतना भी नहीं जानते हैं कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं। इस समय अधर्म से ही महान् उत्पात होने वाला है। ये मांसभक्षी राक्षस धर्म को बिलकुल नहीं जानते हैं।'
‘वह राक्षस अवश्य ही अपने कलेवे के लिये मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े करा डालेगा। उस समय अपने प्रियदर्शन पति के बिना मैं असहाय अबला क्या करूंगी? जिनके नेत्रप्रान्त अरुण वर्ण के हैं, उन श्रीरघुनाथजी का दर्शन न पाकर अत्यन्त दुःख में पड़ी हुई मुझ असहायअबला को पति का चरणस्पर्श किये बिना ही शीघ्र यमदेवता का दर्शन करना पड़ेगा। भरत के बड़े भाई भगवान् श्रीरघुनाथजी यह नहीं जानते हैं कि मैं जीवित हूँ। यदि उन्हें इस बात का पता होता तो ऐसा सम्भव नहीं था कि वे पृथ्वी पर मेरी खोज नहीं करते।'
'मुझे तो यह निश्चित जान पड़ता है कि मेरे ही शोक से लक्ष्मण के बड़े भाई वीरवर श्रीरघुनाथजी भूतल पर अपने शरीर का त्याग करके यहाँ से देवलोक को चले गये हैं। वे देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षिगण धन्य हैं, जो मेरे पतिदेव वीर शिरोमणि कमलनयन श्रीरघुनाथजी का दर्शन पा रहे हैं। अथवा केवल धर्म की कामना रखने वाले परमात्मस्वरूप बुद्धिमान् राजर्षि श्रीरघुनाथजी को भार्या से कोई प्रयोजन नहीं है (इसलिये वे मेरी सुध नहीं ले रहे हैं)।'
'जो स्वजन अपनी दृष्टि के सामने होते हैं, उन्हीं पर प्रीति बनी रहती है। जो आँख से ओझल होते हैं, उन पर लोगों का स्नेह नहीं रहता है (शायद इसीलिये श्रीरघुनाथजी मुझे भूल गये हैं, परंतु यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि) कृतघ्न मनुष्य ही पीठ पीछे प्रेम को ठुकरा देते हैं। भगवान् श्रीरघुनाथजी ऐसा नहीं करेंगे। अथवा मुझमें कोई दुर्गुण हैं या मेरा भाग्य ही फूट गया है, जिससे इस समय मैं मानिनी सीता अपने परम पूजनीय पति श्रीरघुनाथजी से बिछुड़ गयी हूँ।'
‘मेरे पति भगवान् श्रीरघुनाथजी का सदाचार अक्षुण्ण है। वे शूरवीर होने के साथ ही शत्रुओं का संहार करने में समर्थ हैं। मैं उनसे संरक्षण पाने के योग्य हूँ, परंतु उन महात्मा से बिछुड़ गयी। ऐसी दशा में जीवित रहने की अपेक्षा मर जाना ही मेरे लिये श्रेयस्कर है। अथवा वन में फल-मूल खाकर विचरने वाले वे दोनों वनवासी बन्धु नरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजी और देवरजी लक्ष्मण अब अहिंसा का व्रत लेकर अपने अस्त्र-शस्त्रों का परित्याग कर चुके हैं। अथवा दुरात्मा राक्षसराज रावण ने उन दोनों शूरवीर बन्धु श्रीरघुनाथजी और लक्ष्मण को छल से मरवा डाला है। अत: ऐसे समय में मैं सब प्रकार से अपने जीवन का अन्त कर देने की इच्छा रखती हूँ; परंतु मालूम होता है इस महान् दुःख में होते हुए भी अभी मेरी मृत्यु नहीं लिखी है।'
‘सत्यस्वरूप परमात्मा को ही अपना आत्मा मानने वाले और अपने अन्तःकरण को वश में रखने वाले वे महाभाग महात्मा महर्षिगण धन्य हैं, जिनके कोई प्रिय और अप्रिय नहीं हैं। जिन्हें प्रिय के वियोग से दुःख नहीं होता और अप्रिय का संयोग प्राप्त होने पर उससे भी अधिक कष्ट का अनुभव नहीं होता - इस प्रकार जो प्रिय और अप्रिय दोनों से परे हैं, उन महात्माओं को मेरा नमस्कार है। मैं अपने प्रियतम आत्मज्ञानी भगवान् श्रीरघुनाथजी से बिछुड़ गयी हूँ और पापी रावण के चंगुल में आ फँसी हूँ; अत: अब इन प्राणों का परित्याग कर दूँगी।'
