शत्रुओं को रुलाने वाला राजा रावण सीताजी से पूर्वोक्त बातें कहकर तथा सब राक्षसियों को उन्हें वश में लाने के लिये आदेश दे वहाँ से निकल गया। अशोकवाटिका से निकलकर जब राक्षसराज रावण अन्तःपुर को चला गया, तब वहाँ जो भयानक रूप वाली राक्षसियाँ थीं, वे सब चारों ओर से दौड़ी हुई सीता के पास आयीं।
विदेहकुमारी सीता के समीप आकर क्रोध से व्याकुल हुई उन राक्षसियों ने अत्यन्त कठोर वाणी द्वारा उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया - सीते! तुम पुलस्त्यजी के कुल में उत्पन्न हुए सर्वश्रेष्ठ दशग्रीव महामना रावण की भार्या बनना भी कोई बहुत बड़ी बात नहीं समझती?
तत्पश्चात् एकजटा नाम वाली राक्षसी ने क्रोध से लाल आँखें करके कृशोदरी सीता को पुकारकर कहा - विदेहकुमारी! पुलस्त्यजी छ:- प्रजापतियों में चौथे हैं और ब्रह्माजी के मानस पुत्र हैं। इस रूप में उनकी सर्वत्र ख्याति है। पुलस्त्यजी के मानस पुत्र तेजस्वी महर्षि विश्रवा हैं। वे भी प्रजापति के समान ही प्रकाशित होते हैं। विशाललोचने! ये शत्रुओं के रुलाने वाले महाराज रावण उन्हीं के पुत्र हैं और समस्त राक्षसों के राजा हैं। तुम्हें इनकी भार्या हो जाना चाहिये। सर्वांगसुन्दरी ! मेरी इस कही हुई बात का तुम अनुमोदन क्यों नहीं करतीं?
इसके बाद बिल्ली के समान भूरे आँखों वाली हरिजटा नाम की राक्षसी ने क्रोध से आँखें फाड़कर कहना आरम्भ किया - अरी! जिन्होंने तैंतीसों - देवताओं तथा देवराज इन्द्र को भी परास्त कर दिया है, उन राक्षसराज रावण की रानी तो तुम्हें अवश्य बन जाना चाहिये। उन्हें अपने पराक्रम पर गर्व है। वे युद्ध से पीछे न हटने वाले शूरवीर हैं। ऐसे बल पराक्रम सम्पन्न पुरुष की भार्या बनना तुम क्यों नहीं चाहती हो? महाबली राजा रावण अपनी अधिक प्रिय और सम्मानित भार्या मन्दोदरी को भी, जो सबकी स्वामिनी हैं, छोड़कर तुम्हारे पास पधारेंगे। तुम्हारा कितना महान् सौभाग्य है। वे सहस्रों रमणियों से भरे हुए और अनेक प्रकार के रत्नों से सुशोभित उस अन्तःपुर को छोड़कर तुम्हारे पास पधारेंगे (अत: तुम्हें उनकी प्रार्थना मान लेनी चाहिये)।
तदनन्तर विकटा नाम वाली दूसरी राक्षसी ने कहा - जिन भयानक पराक्रमी राक्षसराज ने नागों, गन्धर्वों और दानवों को भी समरांगण में बारम्बार परास्त किया है, वे ही तुम्हारे पास पधारे थे। नीच नारी! उन्हीं सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से सम्पन्न महामना राक्षसराज रावण की भार्या बनने के लिये तुम्हें क्यों इच्छा नहीं होती है?
फिर उनसे दुर्मुखी नाम वाली राक्षसी ने कहा - विशाललोचने! जिनसे भय मानकर सूर्य तपना छोड़ देता है और वायु की गति रुक जाती है, उनके पास तुम क्यों नहीं रहती ? भामिनि! जिनके भय से वृक्ष फूल बरसाने लगते हैं और जो जब इच्छा करते हैं, तभी पर्वत तथा मेघ जल का स्रोत बहाने लगते हैं। उन्हीं राजाधिराज राक्षसराज रावण की भार्या बनने के लिये तुम्हारे मन में क्यों नहीं विचार होता है? देवी ! मैंने तुमसे उत्तम, यथार्थ और हित की बात कही है। सुन्दर मुसकान वाली सीते! तुम मेरी बात मान लो, नहीं तो तुम्हें प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा।
तदनन्तर विकराल मुख वाली उन समस्त राक्षसियों ने जो कटुवचन सुनने के योग्य नहीं थीं, उन सीता से अमंगल तथा कठोर वचन कहना आरम्भ किया - सीते! रावण का अन्त:पुर समस्त प्राणियों के लिये मनोरम है। वहाँ बहुमूल्य शय्याएँ बिछी रहती हैं। उस अन्तःपुर में तुम्हारा निवास हो, इसके लिये तुम क्यों नहीं अनुमति देतीं ?
'तुम मानुषी हो, इसलिये मनुष्य की भार्या का जो पद है, उसी को तुम अधिक महत्त्व देती हो; किंतु अब तुम राम की ओर से अपना मन हटा लो, अन्यथा कदापि जीवित नहीं रहोगी। तुम त्रिलोकी के ऐश्वर्य को भोगने वाले राक्षसराज रावण को पतिरूप में पाकर आनन्दपूर्वक विहार करो। अनिन्द्य सुन्दरि ! तुम मानवी हो, इसीलिये मनुष्य जातीय राम को ही चाहती हो; परंतु राम इस समय राज्य से भ्रष्ट हैं। उनका कोई मनोरथ सफल नहीं होता है तथा वे सदा व्याकुल रहते हैं।'
राक्षसियों की ये बातें सुनकर कमलनयनी सीता ने आँसूभरे नेत्रों से उनकी ओर देखकर इस प्रकार कहा – तुम सब मिलकर मुझसे जो यह लोक - विरुद्ध प्रस्ताव कर रही हो, तुम्हारा यह पापपूर्ण वचन मेरे हृदय में एक क्षण के लिये भी नहीं ठहर पाता है। एक मानव कन्या किसी राक्षस की भार्या नहीं हो सकती। तुम सब लोग भले ही मुझे खा जाओ; किंतु मैं तुम्हारी बात नहीं मान सकती। मेरे पति दीन हों अथवा राज्यहीन - वे ही मेरे स्वामी हैं, वे ही मेरे गुरु हैं, मैं सदा उन्हीं में अनुरक्त हूँ और रहूँगी। जैसे सुवर्चला सूर्य में अनुरक्त रहती हैं।
'जैसे महाभागा शची इन्द्र की सेवा में उपस्थित होती हैं, जैसे देवी अरुन्धती महर्षि वशिष्ठ में, रोहिणी चन्द्रमा में, लोपामुद्रा अगस्त्य में, सुकन्या च्यवन में, सावित्री सत्यवान् में, श्रीमती कपिल में, मदयन्ती सौदास में, केशिनी सगर में तथा भीमकुमारी दमयन्ती अपने पति निषध नरेश नल में अनुराग रखती हैं, उसी प्रकार मैं भी अपने पतिदेव इक्ष्वाकुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीराम में अनुरक्त हूँ।'
सीता की बात सुनकर राक्षसियों के क्रोध की सीमा न रही। वे रावण की आज्ञा के अनुसार कठोर वचनों द्वारा उन्हें धमकाने लगीं। अशोक वृक्ष में चुपचाप छिपे बैठे हुए वानर हनुमानजी सीता को फटकारती हुई राक्षसियों की बातें सुनते रहे। वे सब राक्षसियाँ कुपित हो वहाँ काँपती हुई सीता पर चारों ओर से टूट पड़ीं और अपने लम्बे एवं चमकीले ओठों को बारम्बार चाटने लगीं। उनका क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था।
वे सब की सब तुरंत हाथों में फरसे लेकर बोल उठीं - यह राक्षसराज रावण को पतिरूप में पाने योग्य है ही नहीं।
उस भयानक राक्षसियों के बारम्बार डाँटने और धमकाने पर सर्वांगसुन्दरी कल्याणी सीता अपने आँसू पोंछती हुई उसी अशोकवृक्ष के नीचे चली आयीं (जिसके ऊपर हनुमानजी छिपे बैठे थे)। विशाललोचना वैदेही शोक - सागर में डूबी हुई थीं। इसलिये वहाँ चुपचाप बैठ गयीं। किंतु उन राक्षसियों ने वहाँ भी आकर उन्हें चारों ओर से घेर लिया। वे बहुत ही दुर्बल हो गयी थीं। उनके मुख पर दीनता छा रही थी और उन्होंने मलिन वस्त्र पहन रखा था। उस अवस्था में उन जनकनन्दिनी को चारों ओर खड़ी हुई भयानक राक्षसियों ने फिर धमकाना आरम्भ किया।
तदनन्तर विनता नाम की राक्षसी आगे बढ़ी। वह देखने में बड़ी भयंकर थी। उसकी देह क्रोध की सजीव प्रतिमा पड़ती थी। उस विकराल राक्षसी के पेट भीतर की ओर धँसे हुए थे। वह बोली – सीते! तूने अपने पति के प्रति जितना स्नेह दिखाया है, इतना ही बहुत है। भद्रे ! अति करना तो सब जगह दुःख का ही कारण होता है। मिथिलेशकुमारी! तुम्हारा भला हो। मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ; क्योंकि तुमने मानवोचित शिष्टाचार का अच्छी तरह पालन किया है। अब मैं भी तुम्हारे हित के लिये जो बात कहती हूँ, उस पर ध्यान दो– उसका शीघ्र पालन करो। समस्त राक्षसों का भरण-पोषण करने वाले महाराज रावण को तुम अपना पति स्वीकार कर लो। वे देवराज इन्द्र के समान बड़े पराक्रमी तथा रूपवान् हैं। दीन-हीन मनुष्य राम का परित्याग करके सबसे प्रिय वचन बोलने वाले, उदार और त्यागी रावण का आश्रय लो।
‘विदेहराजकुमारी! तुम आज से समस्त लोकों की स्वामिनी बन जाओ और दिव्य अंगराग तथा दिव्य आभूषण धारण करो। शोभने! जैसे अग्नि की प्रिय पत्नी स्वाहा और इन्द्र की प्राणवल्लभा शची हैं, उसी प्रकार तुम रावण की प्रेयसी बन जाओ। विदेहकुमारी! श्रीराम तो दीन हैं। उनकी आयु भी अब समाप्त हो चली है। उनसे तुम्हें क्या मिलेगा! यदि तुम मेरी कही हुई इस बात को नहीं मानोगी तो हम सब मिलकर तुम्हें इसी मुहूर्त में अपना आहार बना लेंगी।'
तदनन्तर दूसरी राक्षसी सामने आयी। उसके लम्बे-लम्बे स्तन लटक रहे थे। उसका नाम विकटा था। वह कुपित हो मुक्का तानकर डाँटती हुई सीता से बोली - अत्यन्त खोटी बुद्धि वाली मिथिलेशकुमारी ! अब तक हम लोगों ने अपने कोमल स्वभाव वश तुम पर दया आ जाने के कारण तुम्हारी बहुत-सी अनुचित बातें सह ली हैं। इतने पर भी तुम हमारी बात नहीं मानती हो। हमने तुम्हारे हित के लिये ही समयोचित सलाह दी थी। देखो, तुम्हें समुद्र के इस पार ले आया गया है, जहाँ पहुँचना दूसरों के लिये अत्यन्त कठिन है। यहाँ भी रावण के भयानक अन्त:पुर में तुम लाकर रखी गयी हो।
'मिथिलेशकुमारी! याद रखो, रावण के घर में कैद हो और हम जैसी राक्षसियाँ तुम्हारी चौकसी कर रही हैं। मैथिलि ! साक्षात् इन्द्र भी यहाँ तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकते। अतः मेरा कहना मानो, मैं तुम्हारे हित की बात बता रही हूँ। आँसू बहाने से कुछ होने जाने वाला नहीं है। यह व्यर्थ का शोक त्याग दो। सदा छायी रहने वाली दीनता को दूर करके अपने हृदय में प्रसन्नता और उल्लास को स्थान दो। सीते! राक्षसराज रावण के साथ सुखपूर्वक क्रीडा विहार करो। भीरु ! हम सभी स्त्रियाँ जानती हैं कि नारियों का यौवन टिकने वाला नहीं होता।'
'जब तक तुम्हारा यौवन नहीं ढल जाता, तब तक सुख भोग लो। मदमत्त बना देने वाले नेत्रों से शोभा पाने वाली सुन्दरी ! तुम राक्षसराज रावण के साथ लङ्का के रमणीय उद्यानों और पर्वतीय उपवनों में विहार करो। देवी ! ऐसा करने से सहस्रों स्त्रियाँ सदा तुम्हारी आज्ञा के अधीन रहेंगी। महाराज रावण समस्त राक्षसों का भरण-पोषण करने वाले स्वामी हैं। तुम उन्हें अपना पति बना लो। मैथिलि! याद रखो, मैंने जो बात कही है, यदि उसका ठीक-ठीक पालन नहीं करोगी तो मैं अभी तुम्हारा कलेजा निकाल कर खा जाऊँगी।'
अब चण्डोदरी नाम वाली राक्षसी की बारी आयी। उसकी दृष्टि से ही क्रूरता टपकती थी। उसने विशाल त्रिशूल घुमाते हुए यह बात कही - महाराज रावण जब इसे हरकर ले आये थे, उस समय भय के मारे यह थर-थर काँप रही थी, जिससे इसके दोनों स्तन हिल रहे थे। उस दिन इस मृगशावक नयनी मानव कन्या को देखकर मेरे हृदय में यह बड़ी भारी इच्छा जाग्रत् हुई। इसके जिगर, तिल्ली, विशाल वक्षःस्थल, हृदय, उसके आधार स्थान, अन्यान्य अंग तथा सिर को मैं खा जाऊँ। इस समय भी मेरा ऐसा ही विचार है।
तदनन्तर प्रघसा नामक राक्षसी बोल उठी - फिर तो हम लोग इस क्रूर - हृदया सीता का गला घोंट दें; अब चुपचाप बैठे रहने की क्या आवश्यकता है? इसे मारकर महाराज को सूचना दे दी जाय कि वह मानव कन्या मर गयी। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस समाचार को सुनकर महाराज यह आज्ञा दे देंगे कि तुम सब लोग उसे खा जाओ।
तत्पश्चात् राक्षसी अजामुखी ने कहा - मुझे तो व्यर्थ का वाद-विवाद अच्छा नहीं लगता। आओ, पहले इसे काटकर इसके बहुत-से टुकड़े कर डालें। वे सभी टुकड़े बराबर माप-तौल के होने चाहिये। फिर उन टुकड़ों को हम लोग आपस में बाँट लेंगी। साथ ही नाना प्रकार की पेय-सामग्री तथा फूल-माला आदि भी शीघ्र ही प्रचुर मात्रा में मँगा ली जाय।
तदनन्तर राक्षसी शूर्पणखा ने कहा - अजामुखी ने जो बात कही है, वही मुझे भी अच्छी लगती है। समस्त शोकों को नष्ट कर देने वाली सुरा को भी शीघ्र मँगवा लो। उसके साथ मनुष्य के मांस का आस्वादन करके हम निकुम्भिला देवी के सामने नृत्य करेंगी।
उन विकराल रूप वाली राक्षसियों के द्वारा इस प्रकार धमकायी जाने पर देवकन्या के समान सुन्दरी सीता धैर्य छोड़कर फूट-फूटकर रोने लगीं।
