भाग-१७(17) सीताजी का रावण को समझाना और फटकारना, उसे श्रीराम के सामने नगण्य बताना तथा रावण का सीता को दो मास की अवधि देना

 


उस भयंकर राक्षस की वह बात सुनकर सीता को बड़ी पीड़ा हुई। उन्होंने दीन वाणी में बड़े दुःख के साथ धीरे-धीरे उत्तर देना आरम्भ किया। उस समय सुन्दर अंगों वाली पतिव्रता देवी तपस्विनी सीता दुःख से आतुर होकर रोती हुई काँप रही थीं और अपने पतिदेव का ही चिन्तन कर रही थीं। 

पवित्र मुसकान वाली विदेहनन्दिनी ने तिनके की ओट करके रावण को इस प्रकार उत्तर दिया - तुम मेरी ओर से अपना मन हटा लो और आत्मीय जनों (अपनी ही पत्नियों) पर प्रेम करो। जैसे पापाचारी पुरुष सिद्धि की इच्छा नहीं कर सकता, उसी प्रकार तुम मेरी इच्छा करने के योग्य नहीं हो। जो पतिव्रता के लिये निन्दित है, वह न करने योग्य कार्य मैं कदापि नहीं कर सकती। क्योंकि मैं एक महान् कुल में उत्पन्न हुई हूँ और ब्याह करके एक पवित्र कुल में आयी हूँ।' 

रावण से ऐसा कहकर यशस्विनी विदेहराजकुमारी ने उसकी ओर अपनी पीठ फेर ली और इस प्रकार कहा - रावण ! मैं सती और परायी स्त्री हूँ। तुम्हारी भार्या बनने योग्य नहीं हूँ। निशाचर! तुम श्रेष्ठ धर्म की और दृष्टिपात करो और सत्पुरुषों के व्रत का अच्छी तरह पालन करो। जैसे तुम्हारी स्त्रियाँ तुमसे संरक्षण पाती हैं, उसी प्रकार दूसरों की स्त्रियों की भी तुम्हें रक्षा करनी चाहिये। तुम अपने को आदर्श बनाकर अपनी ही स्त्रियों में अनुरक्त रहो। जो अपनी स्त्रियों से संतुष्ट नहीं रहता तथा जिसकी बुद्धि धिक्कार देने योग्य है, उस चपल इन्द्रियों वाले चञ्चल पुरुष को परायी स्त्रियाँ पराभव को पहुँचा देती हैं - उसे फजीहत में डाल देती हैं। 

‘क्या यहाँ सत्पुरुष नहीं रहते हैं अथवा रहने पर भी तुम उनका अनुसरण नहीं करते हो? जिससे तुम्हारी बुद्धि ऐसी विपरीत एवं सदाचार शून्य हो गयी है ? अथवा बुद्धिमान् पुरुष जो तुम्हारे हित की बात कहते हैं, उसे नि:सार मानकर राक्षसों के विनाश पर तुले रहने के कारण तुम ग्रहण ही नहीं करते हो? जिसका मन अपवित्र तथा सदुपदेश को नहीं ग्रहण करने वाला है, ऐसे अन्यायी राजा के हाथ में पड़कर बड़े-बड़े समृद्धिशाली राज्य और नगर नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार यह रत्नराशि से पूर्ण लंकापुरी तुम्हारे हाथ में आ जाने से अब अकेले तुम्हारे ही अपराध से बहुत जल्द नष्ट हो जायगी। 

'रावण! जब कोई अदूरदर्शी पापाचारी अपने कुकर्मों से मारा जाता है, उस समय उसका विनाश होने पर समस्त प्राणियों को प्रसन्नता होती है। इसी प्रकार तुमने जिन लोगों को कष्ट पहुँचाया है, वे तुम्हें पापी कहेंगे और 'बड़ा अच्छा हुआ, जो इस आततायी को यह कष्ट प्राप्त हुआ' ऐसा कहकर हर्ष मनायेंगे। जैसे प्रभा सूर्य से अलग नहीं होती, उसी प्रकार मैं श्रीरघुनाथजी से अभिन्न हूँ। ऐश्वर्य या धन के द्वारा तुम मुझे लुभा नहीं सकते। जगदीश्वर श्रीरघुनाथजी की सम्मानित भुजा पर सिर रखकर अब मैं किसी दूसरे की बाँह का तकिया कैसे लगा सकती हूँ? जिस प्रकार वेदविद्या आत्मज्ञानी स्नातक ब्राह्मण की ही सम्पत्ति होती है, उसी प्रकार मैं केवल उन पृथ्वीपति रघुनाथजी की ही भार्या होने योग्य हूँ।' 

‘रावण! तुम्हारे लिये यही अच्छा होगा कि जिस प्रकार वन में समागम की वासना से युक्त हथिनी को कोई गजराज से मिला दे, उसी प्रकार तुम मुझ दुःखिया को श्रीरघुनाथजी से मिला दो। यदि तुम्हें अपने नगर की रक्षा और दारुण बन्धन से बचने की इच्छा हो तो पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरघुनाथजी को अपना मित्र बना लेना चाहिये; क्योंकि वे ही इसके योग्य हैं। 

‘भगवान् श्रीरघुनाथजी समस्त धर्मो क ज्ञाता और सुप्रसिद्ध शरणागतवत्सल हैं। यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो उनके साथ तुम्हारी मित्रता हो जानी चाहिये। तुम शरणागतवत्सल श्रीरघुनाथजी की शरण लेकर उन्हें प्रसन्न करो और शुद्धहृदय होकर मुझे उनके पास लौटा दो। इस प्रकार मुझे श्रीरघुनाथजी को सौंप देने पर तुम्हारा भला होगा। इसके विपरीत आचरण करने पर तुम बड़ी भारी विपत्ति में पड़ जाओगे। तुम्हारे-जैसे निशाचर को कदाचित हाथ से छूटा हुआ वज्र बिना मारे छोड़ सकता है और काल भी बहुत दिनों तक तुम्हारी उपेक्षा कर सकता है; किंतु क्रोध में भरे हुए लोकनाथ रघुनाथजी कदापि नहीं छोड़ेंगे।' 

‘इन्द्र के छोड़े हुए वज्र की गड़गड़ाहट के समान तुम श्रीरघुनाथजी के धनुष की घोर टंकार सुनोगे। यहाँ श्रीरघुनाथजी और लक्ष्मण के नामों से अङ्कित और सुन्दर गाँठ वाले बाण प्रज्वलित मुख वाले सर्पों के समान शीघ्र ही गिरेंगे। वे कङ्कपत्र वाले बाण इस पुरी में राक्षसों का संहार करेंगे, इसमें संशय नहीं है। वे इस तरह बरसेंगे कि यहाँ तिल रखने की भी जगह नहीं रह जायगी। जैसे विनतानन्दन गरुड़ सर्पो का संहार करते हैं, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी रूपी महान् गरुड़ राक्षसराज रूपी बड़े-बड़े सर्पो को वेगपूर्वक उच्छिन्न कर डालेंगे। जैसे भगवान् विष्णु ने अपने तीन ही पगों द्वारा असुरों से उनकी उद्दीप्त राजलक्ष्मी छीन ली थी, उसी प्रकार मेरे स्वामी शत्रुसूदन श्रीरघुनाथजी मुझे शीघ्र ही तेरे यहाँ से निकाल ले जायेंगे।' 

‘राक्षस! जब राक्षसों की सेना का संहार हो जाने से जनस्थान का तुम्हारा आश्रय नष्ट हो गया और तुम युद्ध करने में असमर्थ हो गये, तब तुमने छल और चोरी से यह नीच कर्म किया है। नीच निशाचर! तुमने पुरुषसिंह श्रीरघुनाथजी और लक्ष्मण के सूने आश्रम में घुसकर मेरा हरण किया था। वे दोनों उस समय मायामृग को मारने के लिये वन में गये हुए थे नहीं तो तभी तुम्हें इसका फल मिल जाता।' 

'श्रीरघुनाथजी और लक्ष्मण की तो गन्ध पाकर भी तुम उनके सामने नहीं ठहर सकते। क्या कुत्ता कभी दो-दो बाघों के सामने टिक सकता है? जैसे इन्द्र की दो बाँहों के साथ युद्ध छिड़ने पर वृत्रासुर की एक बाँह के लिये संग्राम के बोझ को सँभालना असम्भव हो गया, उसी प्रकार समरांगण में उन दोनों भाइयों के साथ युद्ध का जुआ उठाये रखना या टिकना तुम्हारे लिये सर्वथा असम्भव है। वे मेरे प्राणनाथ श्रीरघुनाथजी सुमित्राकुमार लक्ष्मण के साथ आकर अपने बाणों द्वारा शीघ्र तुम्हारे प्राण हर लेंगे। ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य थोड़े से जल को अपनी किरणों द्वारा शीघ्र सुखा देते हैं।' 

‘तुम कुबेर के कैलाश पर्वत पर चले जाओ अथवा वरुण की सभा में जाकर छिप रहो, किंतु काल का मारा हुआ विशाल वृक्ष जैसे वज्र का आघात लगते ही नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तुम श्रीरघुनाथजी के बाण से मारे जाकर तत्काल प्राणों से हाथ धो बैठोगे, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि काल तुम्हें पहले से ही मार चुका है।' 

सीता के ये कठोर वचन सुनकर राक्षसराज रावण ने उन प्रियदर्शना सीता को यह अप्रिय उत्तर दिया –  लोक में पुरुष जैसे-जैसे स्त्रियों से अनुनय-विनय करता है, वैसे-वैसे वह उनका प्रिय होता जाता है; परंतु मैं तुमसे ज्यों-ज्यों मीठे वचन बोलता हूँ, त्यों-ही-त्यों तुम मेरा तिरस्कार करती जा रही हो। किंतु जैसे अच्छा सारथि कुमार्ग में दौड़ते हुए घोड़ों को रोकता है, वैसे ही तुम्हारे प्रति जो मेरा प्रेम उत्पन्न हो गया है, वही मेरे क्रोध को रोक रहा है। मनुष्यों में यह काम (प्रेम) बड़ा टेढ़ा है। वह जिसके प्रति बँध जाता है, उसी के प्रति करुणा और स्नेह उत्पन्न हो जाता है। सुमुखि! यही कारण है कि झूठे वैराग्य में तत्पर तथा वध और तिरस्कार के योग्य होने पर भी तुम्हारा मैं वध नहीं कर रहा हूँ। मिथिलेशकुमारी! तुम मुझसे जैसी जैसी कठोर बातें कह रही हो, उनके बदले तो तुम्हें कठोर प्राणदण्ड देना ही उचित है। 

विदेहराजकुमारी सीता से ऐसा कहकर क्रोध के आवेश में भरे हुए राक्षसराज रावण ने उन्हें फिर इस प्रकार उत्तर दिया - सुन्दरी! मैंने तुम्हारे लिये जो अवधि नियुक्त की है, उसके अनुसार मुझे दो महीने और प्रतीक्षा करनी है। तत्पश्चात् तुम्हें मेरी शय्या पर आना होगा। अत: याद रखो–यदि दो महीने के बाद तुम मुझे अपना पति बनाना स्वीकार नहीं करोगी तो रसोइये मेरे कलेवे के लिये तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे। 

राक्षसराज रावण के द्वारा जनकनन्दिनी सीता को इस प्रकार धमकायी जाती देख देवताओं और गन्धर्वों की कन्याओं को बड़ा विषाद हुआ। उनकी आँखें विकृत हो गयीं। तब उनमें से किसी ने ओठों से, किसी ने नेत्रों से तथा किसी ने मुँह के संकेत से उस राक्षस द्वारा डाँटी जाती हुई सीता को धैर्य बँधाया। 

उनके धैर्य बँधाने पर सीता ने राक्षसराज रावण से अपने सदाचार (पातिव्रत्य) और पति के शौर्य के अभिमान से पूर्ण हितकर वचन कहा - निश्चय ही इस नगर में कोई भी पुरुष तेरा भला चाहने वाला नहीं है, जो तुझे इस निन्दित कर्म से रोके। जैसे शची इन्द्र की धर्मपत्नी हैं, उसी प्रकार मैं धर्मात्मा भगवान् श्रीरघुनाथजी की पत्नी हूँ। त्रिलोकी में तेरे सिवा दूसरा कौन है, जो मन से भी मुझे प्राप्त करने की इच्छा करे। नीच राक्षस! तूने अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथजी की भार्या से जो पाप की बात कही है, उसके फलस्वरूप दण्ड से तू कहाँ जाकर छुटकारा पायेगा? 

'जिस प्रकार वन में कोई मतवाला हाथी और कोई खरगोश दैववश एक-दूसरे के साथ युद्ध के लिये तुल जायँ, वैसे ही भगवान् श्रीरघुनाथजी और तू है। नीच निशाचर! भगवान् श्रीरघुनाथजी तो गजराज के समान हैं और तू खरगोश के तुल्य है। अरे! इक्ष्वाकुनाथ श्रीरघुनाथजी का तिरस्कार करते तुझे लज्जा नहीं आती। तू जब तक उनकी आँखों के सामने नहीं जाता, तब तक जो चाहे कह ले। अनार्य! मेरी ओर दृष्टि डालते समय तेरी ये क्रूर और विकारयुक्त काली-पीली आँखें पृथ्वी पर क्यों नहीं गिर पड़ीं?' 

‘मैं धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी की धर्मपत्नी और महाराज दशरथ की पुत्रवधू हूँ। पापी! मुझसे पाप की बातें करते समय तेरी जीभ क्यों नहीं गल जाती है? दशमुख रावण ! मेरा तेज ही तुझे भस्म कर डालने के लिये पर्याप्त है। केवल श्रीरघुनाथजी की आज्ञा न होने से और अपनी तपस्या को सुरक्षित रखने के विचार से मैं तुझे भस्म नहीं कर रही हूँ। मैं मतिमान् श्रीरघुनाथजी की भार्या हूँ, मुझे हर ले आने की शक्ति तेरे अंदर नहीं थी। नि:संदेह तेरे वध के लिये ही विधाता ने यह विधान रच दिया है। तू तो बड़ा शूरवीर बनता है, कुबेर का भाई है और तेरे पास सेनाएँ भी बहुत हैं, फिर श्रीरघुनाथजी को छल से दूर हटाकर क्यों तूने उनकी स्त्री की चोरी की है?' 

सीता की ये बातें सुनकर राक्षसराज रावण ने उन जनकदुलारी की ओर आँखें तरेरकर देखा। उसकी दृष्टि से क्रूरता टपक रही थी। 

वह नीलमेघ के समान काला और विशालकाय था। उसकी भुजाएँ और ग्रीवा बड़ी थीं। वह गति और पराक्रम में सिंह के समान था और तेजस्वी दिखायी देता था। उसकी जीभ आग की लपट के समान लपलपा रही थी तथा नेत्र बड़े भयंकर प्रतीत होते थे। क्रोध के कारण उसके मुकुट का अग्रभाग हिल रहा था, जिससे वह बहुत ऊँचा जान पड़ता था। उसने तरह-तरह के हार और अनुलेपन धारण कर रखे थे तथा पक्के सोने के बने हुए बाजूबंद उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह लाल रंग के फूलों की माला और लाल वस्त्र पहने हुए था। उसकी कमर के चारों ओर काले रंग का लम्बा कटिसूत्र बँधा हुआ था, जिससे वह अमृत-मन्थन के समय वासुकि से लिपटे हुए मन्दराचल के समान जान पड़ता था। 

पर्वत के समान विशालकाय राक्षसराज रावण अपनी दोनों परिपुष्ट भुजाओं से उसी प्रकार शोभा पा रहा था, मानो दो शिखरों से मन्दराचल सुशोभित हो रहा हो। प्रात: काल के सूर्य की भाँति अरुण पीत कान्ति वाले दो कुण्डल उसके कानों की शोभा बढ़ा रहे थे, मानो लाल पल्लवों और फूलों से युक्त दो अशोक वृक्ष किसी पर्वत को सुशोभित कर रहे हों। वह अभिनव शोभा से सम्पन्न होकर कल्पवृक्ष एवं मूर्तिमान् वसन्त के समान जान पड़ता था। आभूषणों से विभूषित होने पर भी श्मशानचैत्य- (मरघट में बने हुए देवालय) - की भाँति भयंकर प्रतीत होता था। 

रावण ने क्रोध से लाल आँखें करके विदेहकुमारी सीता की ओर देखा और फुफकारते हुए सर्प के समान लम्बी साँसें खींचकर कहा - अन्यायी और निर्धन मनुष्य का अनुसरण करने वाली नारी ! जैसे सूर्यदेव अपने तेज से प्रात:कालिक संध्या के अन्धकार को नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार आज मैं तेरा विनाश किये देता हूँ। 

मिथिलेशकुमारी से ऐसा कहकर शत्रुओं को रुलाने वाले राजा रावण ने भयंकर दिखायी देने वाली समस्त राक्षसियों की ओर देखा तथा इन सब राक्षसियों से कहा - निशाचरियो ! तुम सब लोग मिलकर अथवा अलग- अलग शीघ्र ही ऐसा प्रयत्न करो, जिससे जनककिशोरी सीता बहुत जल्द मेरे वश में आ जाय। अनुकूल-प्रतिकूल उपायों से, साम, दान और भेदनीति से तथा दण्ड का भी भय दिखाकर विदेहकुमारी सीता को वश में लाने की चेष्टा करो। 

राक्षसियों को इस प्रकार बारम्बार आज्ञा देकर काम और क्रोध से व्याकुल हुआ राक्षसराज रावण जानकीजी की ओर देखकर गर्जना करने लगा। 

तदनन्तर राक्षसियों की स्वामिनी मन्दोदरी तथा धान्यमालिनी नाम वाली राक्षस कन्या शीघ्र रावण के पास आयीं और उसका आलिंगन करके बोलीं - महाराज राक्षसराज! आप मेरे साथ क्रीडा कीजिये। इस कान्तिहीन और दीन - मानव - कन्या सीता से आपको क्या प्रयोजन है? महाराज! निश्चय ही देवश्रेष्ठ ब्रह्माजी ने इसके भाग्य में आपके बाहुबल से उपार्जित दिव्य एवं उत्तम भोग नहीं लिखे हैं। प्राणनाथ! जो स्त्री अपने से प्रेम नहीं करती, उसकी कामना करने वाले पुरुष के शरीर में केवल ताप ही होता है। और अपने प्रति अनुराग रखने वाली स्त्री की कामना करने वाले को उत्तम प्रसन्नता प्राप्त होती है। 

जब मंदोदरी ने ऐसा कहा और उसे दूसरी ओर वह हटा ले गयी, तब मेघ के समान काला और बलवान् राक्षस रावण जोर-जोर से हँसता हुआ महल की ओर लौट पड़ा। अशोकवाटिका से प्रस्थित होकर पृथ्वी को कम्पित-सी करते हुए दशग्रीव ने उद्दीप्त सूर्य के सदृश प्रकाशित होने वाले अपने भवन में प्रवेश किया। तदनन्तर देवता, गन्धर्व और नागों की कन्याएँ भी रावण को सब ओर से घेरकर उसके साथ ही उस उत्तम राजभवन में चली गयीं। इस प्रकार अपने धर्म में तत्पर, स्थिरचित्त और भय से काँपती हुई मिथिलेशकुमारी सीता को धमकाकर काम मोहित रावण अपने ही महल में चला गया। 

* प्राचीनकाल में नगर की श्मशानभूमि के पास एक गोलाकार देवालय-सा बना रहता था, जहाँ राजा की आज्ञा से प्राणदण्ड के अपराधियों का जल्लादों के द्वारा वध कराया जाता था। जब वहाँ किसी को प्राणदण्ड देने का अवसर आता, तब उस देवालय को लीप-पोतकर फूलों की बन्दनवारों से सजाया जाता था। उस विभूषित श्मशानचैत्य को देखते ही लोग यह सोचकर भयभीत हो उठते थे कि आज यहाँ किसी के जीवन का अन्त होने वाला है। इस तरह जैसे वह श्मशानचैत्य विभूषित होने पर भी भयंकर लगता था, उसी प्रकार रावण सुन्दर श्रृङ्गार करके भी सीता को भयानक प्रतीत होता था; क्योंकि वह उनके सतीत्व को नष्ट करना चाहता था।

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-१७(17) समाप्त ! 

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