इस प्रकार फूले हुए वृक्षों से सुशोभित उस वन की शोभा देखते और विदेहनन्दिनी का अनुसंधान करते हुए हनुमानजी की वह सारी रात प्रायः बीत चली। केवल एक पहर रात बाकी रही। रात के उस पिछले पहर में छहों अंगों सहित सम्पूर्ण वेदों के विद्वान् तथा श्रेष्ठ यज्ञों द्वारा यजन करने वाले ब्रह्म- राक्षसों के घर में वेदपाठ की ध्वनि होने लगी, जिसे हनुमानजी ने सुना।
तदनन्तर मंगल वाद्यों तथा श्रवण सुखद शब्दों द्वारा महाबली महाबाहु दशमुख रावण को जगाया गया। जागने पर महान् भाग्यशाली एवं प्रतापी राक्षसराज रावण ने सबसे पहले विदेहनन्दिनी सीता का चिन्तन किया। उस समय नींद के कारण उसके पुष्पहार और वस्त्र अपने स्थान से खिसक गये थे। वह मदमत्त निशाचर काम से प्रेरित हो सीता के प्रति अत्यन्त आसक्त हो गया था। अत: उस कामभाव को अपने भीतर छिपाये रखने में असमर्थ हो गया। उसने सब प्रकार के आभूषण धारण किये और परम उत्तम शोभा से सम्पन्न हो उस अशोकवाटिका में ही प्रवेश किया, जो सब प्रकार के फूल और फल देने वाले भाँति-भाँति के वृक्षों से सुशोभित थी। नाना प्रकार के पुष्प उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। बहुत-से सरोवरों द्वारा वह वाटिका घिरी हुई थी। सदा मतवाले रहने वाले परम अद्भुत पक्षियों के कारण उसकी विचित्र शोभा होती थी।
कितने ही नयनाभिराम क्रीडामृगों से भरी हुई वह वाटिका भाँति-भाँति के मृगसमूहों से व्याप्त बहुत से गिरे हुए फलों के कारण वहाँ की भूमि ढक गयी थी। पुष्पवाटिका में मणि और सुवर्ण के फाटक लगे थे और उसके भीतर पंक्तिबद्ध वृक्ष बहुत दूर तक फैले हुए थे। वहाँ की गलियों को देखता हुआ रावण उस वाटिका में घुसा। जैसे देवताओं और गन्धर्वों की स्त्रियाँ देवराज इन्द्र के पीछे चलती हैं, उसी प्रकार अशोकवन में जाते हुए पुलस्त्यनन्दन रावण के पीछे-पीछे लगभग एक सौ सुन्दरियाँ गयीं।
उन युवतियों में से किन्हींने सुवर्णमय दीपक ले रखे थे। किन्हीं के हाथों में चँवर थे तो किन्हीं के हाथों में ताड़ के पंखे। कुछ सुन्दरियाँ सोने की झारियों में जल लिये आगे-आगे चल रही थीं और कई दूसरी स्त्रियाँ गोलाकार बृसी नामक आसन लिये पीछे-पीछे जा रही थीं। कोई चतुर-चालाक युवती दाहिने हाथ में पेयरस से भरी हुई रत्ननिर्मित चमचमाती कलशी लिये हुए थी। कोई दूसरी स्त्री सोने के डंडे से युक्त और पूर्ण चन्द्रमा तथा राजहंस के समान श्वेतछत्र लेकर रावण के पीछे-पीछे चल रही थी। जैसे बादल के साथ-साथ बिजलियाँ चलती हैं, उसी प्रकार रावण की सुन्दरी स्त्रियाँ अपने वीर पति के पीछे-पीछे जा रही थीं। उस समय नींद के नशे में उनकी आँखें झपी जाती थीं।
उनके हार और बाजूबंद अपने स्थान से खिसक गये थे। अंगराग मिट गये थे। चोटियाँ खुल गयी थीं और मुख पर पसीने की बूँदें छा रही थीं। वे सुमुखी स्त्रियाँ अवशेष मद और निद्रा से झूमती हुई-सी चल रही थीं। विभिन्न अंगों में धारण किये गये पुष्प पसीने से भींग गये थे और पुष्पमालाओं से अलंकृत केश कुछ-कुछ हिल रहे थे। जिनकी आँखें मदमत्त बना देने वाली थीं, वे राक्षसराज की प्यारी पत्नियाँ अशोकवन में जाते हुए पति के साथ बड़े आदर से और अनुरागपूर्वक जा रही थीं।
उन सबका पति महाबली मन्दबुद्धि रावण काम के अधीन हो रहा था। वह सीता में मन लगाये मन्दगति से आगे बढ़ता हुआ अद्भुत शोभा पा रहा था। उस समय वायुनन्दन कपिवर हनुमानजी ने उन परम सुन्दरी रावणपत्नियों की करधनी का कलनाद और नूपुरों की झनकार सुनी। साथ ही, अनुपम कर्म करने वाले तथा अचिन्त्य बल - पौरुष से सम्पन्न रावण को भी कपिवर हनुमान् ने देखा, जो अशोकवाटिका के द्वार तक आ पहुँचा था। उसके आगे-आगे सुगन्धित तेल से भीगी हुई और स्त्रियों द्वारा हाथों में धारण की हुई बहुत-सी मशालें जल रही थीं, जिनके द्वारा वह सब ओर से प्रकाशित हो रहा था।
वह काम, दर्प और मद से युक्त था। उसकी आँखें टेढ़ी, लाल और बड़ी-बड़ी थीं। वह धनुषरहित साक्षात् कामदेव के समान जान पड़ता था। उसका वस्त्र मथे हुए दूध के फेन की भाँति श्वेत, निर्मल और उत्तम था। उसमें मोती के दाने और फूल टँके हुए थे। वह वस्त्र उसके बाजूबंद में उलझ गया था और रावण उसे खींचकर सुलझा रहा था। अशोक-वृक्ष के पत्तों और डालियों में छिपे हुए हनुमानजी सैकड़ों पत्रों तथा पुष्पों से ढक गये थे। उसी अवस्था में उन्होंने निकट आये हुए रावण को पहचानने का प्रयत्न किया। उसकी ओर देखते समय कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने रावण की सुन्दरी स्त्रियों को भी लक्ष्य किया, जो रूप और यौवन से सम्पन्न थीं।
उन सुन्दर रूप वाली युवतियों से घिरे हुए महायशस्वी राजा रावण ने उस प्रमदावन में प्रवेश किया, जहाँ अनेक प्रकार के पशु-पक्षी अपनी-अपनी बोली बोल रहे थे। वह मतवाला दिखायी देता था। उसके आभूषण विचित्र थे। उसके कान ऐसे प्रतीत होते थे, मानो वहाँ खूँटे गाड़े गये हैं। इस प्रकार वह विश्रवा मुनि का पुत्र महाबली राक्षसराज रावण हनुमानजी के दृष्टिपथ में आया। ताराओं से घिरे हुए चन्द्रमा की भाँति वह परम सुन्दरी युवतियों से घिरा हुआ था। महातेजस्वी महाकपि हनुमान् ने उस तेजस्वी राक्षस को देखा और देखकर यह निश्चय किया कि यही महाबाहु रावण है। पहले यही नगर में उत्तम महल के भीतर सोया हुआ था। ऐसा सोचकर वे वानरवीर महातेजस्वी पवनकुमार हनुमानजी जिस डाली पर बैठे थे, वहाँ से कुछ नीचे उतर आये (क्योंकि वे निकट से रावण की सारी चेष्टाएँ देखना चाहते थे)।
यद्यपि मतिमान् हनुमानजी भी बड़े उग्र तेजस्वी थे, तथापि रावण के तेज से तिरस्कृत से होकर सघन पत्तों में घुसकर छिप गये। उधर रावण काले केश, कजरारे नेत्र, सुन्दर कटिभाग और परस्पर सटे हुए स्तन वाली सुन्दरी सीता को देखने के लिये उनके पास गया। उस समय अनिन्दिता सुन्दरी राजकुमारी सीता ने जब उत्तमोत्तम आभूषणों से विभूषित तथा रूप-यौवन से सम्पन्न राक्षसराज रावण को आते देखा, तब वे प्रचण्ड हवा में हिलने वाली कदली के समान भय के मारे थर-थर काँपने लगीं।
सुन्दर कान्तिवाली विशाललोचना जानकी ने अपने हाथ से एक तिनके को उठाकर उसकी ओट ली तथा वहाँ बैठी - बैठी वे रोने लगीं। राक्षसियों के पहरे में रहती हुई विदेहराजकुमारी सीता अत्यन्त दीन और दु:खी हो रही थीं। वे समुद्र में जीर्ण- शीर्ण होकर डूबी हुई नौका के समान दुःख के सागर में निमग्न थीं। उस अवस्था में दशमुख रावण ने उनकी ओर देखा। सीता बिना बिछौने खुली जमीन पर बैठी थीं और कटकर पृथ्वी पर गिरी हुई वृक्ष की शाखा के समान जान पड़ती थीं । उनके द्वारा बड़े कठोर व्रत का पालन किया जा रहा था।
उनके अंगों में अंगराग की जगह मैल जमी हुई थी। वे आभूषण धारण तथा श्रृंगार करने योग्य होने पर भी उन सबसे वञ्चित थीं और कीचड़ में सनी हुई कमलनाल की भाँति शोभा पाती थीं तथा नहीं भी पाती थीं (कमलनाल जैसे सुकुमारता के कारण शोभा पाती है और कीचड़ में सनी रहने के कारण शोभा नहीं पाती, वैसे ही वे अपने सहज सौन्दर्य से सुशोभित थीं, किंतु मलिनता के कारण शोभा नहीं देती थीं।)
संकल्पों के घोड़ों से जुते हुए मनोमय रथ पर चढ़कर आत्मज्ञानी राजसिंह भगवान् श्रीराम के पास जाती हुई-सी प्रतीत होती थीं। उनका शरीर सूखता जा रहा था। वे अकेली बैठकर रोती तथा श्रीरामचन्द्रजी के ध्यान एवं उनके वियोग के शोक में डूबी रहती थीं। उन्हें अपने दुःख का अन्त नहीं दिखायी देता था। वे श्रीरामचन्द्रजी में अनुराग रखने वाली तथा उनकी रमणीय भार्या थीं। जैसे नागराज की वधू (नागिन ) मणि - मन्त्रादि से अभिभूत हो छटपटाने लगती है, उसी तरह सीता भी पति के वियोग में तड़प रही थीं तथा धूम के समान वर्ण वाले केतुग्रह से ग्रस्त हुई रोहिणी के समान संतप्त हो रही थीं।
यद्यपि सदाचारी और सुशील कुल में उनका जन्म हुआ था। फिर धार्मिक तथा उत्तम आचार-विचार वाले कुल में वे ब्याही गयी थीं। विवाह-संस्कार से सम्पन्न हुई थीं, तथापि दूषित कुल में उत्पन्न हुई नारी के समान मलिन दिखायी देती थीं। वे क्षीण हुई विशाल कीर्ति, तिरस्कृत हुई श्रद्धा, सर्वथा ह्रास को प्राप्त हुई बुद्धि, टूटी हुई आशा, नष्ट हुए भविष्य, उल्लङ्घित हुई राजाज्ञा, उत्पातकाल में दहकती हुई दिशा, नष्ट हुई देवपूजा, चन्द्रग्रहण से मलिन हुई पूर्णमासी की रात, तुषारपात से जीर्ण-शीर्ण हुई कमलिनी, जिसका शूरवीर सेनापति मारा गया हो - ऐसी सेना, अन्धकार से नष्ट हुई प्रभा, सूखी हुई सरिता, अपवित्र प्राणियों के स्पर्श से अशुद्ध हुई वेदी और बुझी हुई अग्निशिखा के समान प्रतीत होती थीं।
जिसे हाथी ने अपनी सूँड़ से हुँडेर डाला हो; अतएव जिसके पत्ते और कमल उखड़ गये हों तथा जलपक्षी भय से थर्रा उठे हों, उस मथित एवं मलिन हुई पुष्करिणी के समान सीता श्रीहीन दिखायी देती थीं। पति के विरह-शोक से उनका हृदय बड़ा व्याकुल था। जिसका जल नहरों के द्वारा इधर-उधर निकाल दिया गया हो, ऐसी नदी के समान वे सूख गयी थीं तथा उत्तम उबटन आदि के न लगने से कृष्णपक्ष की रात्रि के समान मलिन हो रही थीं। उनके अंग बड़े सुकुमार और सुन्दर थे। वे रत्नजटित राजमहल में रहने के योग्य थीं; परंतु गर्मी से तपी और तुरंत तोड़कर फेंकी हुई कमलिनी के समान दयनीय दशा को पहुँच गयी थीं।
जिसे यूथपति से अलग करके पकड़कर खंभे में बाँध दिया गया हो, उस हथिनी के समान वे अत्यन्त दु:ख से आतुर होकर लम्बी साँस खींच रही थीं। बिना प्रयत्न के ही बँधी हुई एक ही लम्बी वेणी से सीता की वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे वर्षा ऋतु बीत जाने पर सुदूर तक फैली हुई हरी-भरी वनश्रेणी से पृथ्वी सुशोभित होती है। वे उपवास, शोक, चिन्ता और भय से अत्यन्त क्षीण, कृशकाय और दीन हो गयी थीं। उनका आहार बहुत कम हो गया था तथा एकमात्र तप ही उनका धन था। वे दु:ख से आतुर हो अपने कुलदेवता से हाथ जोड़कर मन ही मन यह प्रार्थना-सी कर रही थीं कि श्रीरामचन्द्रजी के हाथ से दशमुख रावण की पराजय हो।
सुन्दर बरौनियों से युक्त, लाल, श्वेत एवं विशाल नेत्रों वाली सती- साध्वी मिथिलेशकुमारी सीता श्रीरामचन्द्रजी में अत्यन्त अनुरक्त थीं और इधर-उधर देखती हुई रो रही थीं। इस अवस्था में उन्हें देखकर राक्षसराज रावण अपने ही वध के लिये उनको लुभाने की चेष्टा करने लगा।
राक्षसियों से घिरी हुई दीन और आनन्दशून्य तपस्विनी सीता को सम्बोधित करके रावण अभिप्राययुक्त मधुर वचनों द्वारा अपने मन का भाव प्रकट करने लगा - हाथी की सूँड़ के समान सुन्दर जाँघों वाली सीते! मुझे देखते ही तुम अपने स्तन और उदर को इस प्रकार छिपाने लगी हो, मानो डर के मारे अपने को अदृश्य कर देना चाहती हो। किंतु विशाललोचने! मैं तो तुम्हें चाहता हूँ तुमसे प्रेम करता हूँ। समस्त संसार का मन मोहने वाली सर्वांगसुन्दरी प्रिये! तुम भी मुझे विशेष आदर दो मेरी प्रार्थना स्वीकार करो।
‘यहाँ तुम्हारे लिये कोई भय नहीं है। इस स्थान में न तो मनुष्य आ सकते हैं, न इच्छानुसार रूप धारण करने वाले दूसरे राक्षस ही, केवल मैं आ सकता हूँ। परन्तु सीते! मुझसे जो तुम्हें भय हो रहा है, वह तो दूर हो ही जाना चाहिये। भीरु ! (तुम यह न समझो कि मैंने कोई अधर्म किया है) परायी स्त्रियों के पास जाना अथवा बलात् उन्हें हर लाना यह राक्षसों का सदा ही अपना धर्म रहा है - इसमें संदेह नहीं है। मिथिलेशनन्दिनि! ऐसी अवस्था में भी जब तक तुम मुझे न चाहोगी, तब तक मैं तुम्हारा स्पर्श नहीं करूँगा। भले ही कामदेव मेरे शरीर पर इच्छानुसार अत्याचार करे।
‘देवी! इस विषय में तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। प्रिये! मुझ पर विश्वास करो और यथार्थ रूप से प्रेमदान दो। इस तरह शोक से व्याकुल न हो जाओ। एक वेणी धारण करना, नीचे पृथ्वी पर सोना, चिन्तामग्र रहना, मैले वस्त्र पहनना और बिना अवसर के उपवास करना – ये सब बातें तुम्हारे योग्य नहीं हैं। मिथिलेशकुमारी! मुझे पाकर तुम विचित्र पुष्पमाला, चन्दन, अगुरु, नाना प्रकार के वस्त्र, दिव्य बहुमूल्य पेय, शय्या, आसन, आभूषण, नाच, गान और वाद्य का सुख भोगो।'
'तुम स्त्रियों में रत्न हो। इस तरह मलिन वेष में न रहो। अपने अंगों में आभूषण धारण करो। सुन्दरी ! मुझे पाकर भी तुम भूषण आदि से असम्मानित कैसे रहोगी ! यह तुम्हारा नवोदित सुन्दर यौवन बीता जा रहा है। जो बीत जाता है, वह नदियों के प्रवाह की भाँति फिर लौटकर नहीं आता। शुभदर्शने ! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि रूप की रचना करने वाला लोकस्रष्टा विधाता तुम्हें बनाकर फिर उस कार्य से विरत हो गया; क्योंकि तुम्हारे रूप की समता करने वाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है।'
‘विदेहनन्दिनि! रूप और यौवन से सुशोभित होने वाली तुमको पाकर कौन ऐसा पुरुष है, जो धैर्य से विचलित न होगा। भले ही वह साक्षात् ब्रह्मा क्यों न हो। चन्द्रमा के समान मुखवाली सुमध्यमे ! मैं तुम्हारे जिस-जिस अंग को देखता हूँ, उसी उसी में मेरे नेत्र उलझ जाते हैं। मिथिलेशकुमारी! तुम मेरी भार्या बन जाओ। पातिव्रत्य के इस मोह को छोड़ो। मेरे यहाँ बहुत-सी सुन्दरी रानियाँ हैं। तुम उन सबमें श्रेष्ठ पटरानी बनो। भीरु! मैं अनेक लोकों से उन्हें मथकर जो-जो रत्न लाया हूँ, वे सब तुम्हारे ही होंगे और यह राज्य भी मैं तुम्हीं को समर्पित कर दूंगा।
‘विलासिनि! तुम्हारी प्रसन्नता के लिये मैं विभिन्न नगरों की मालाओं से अलंकृत इस सारी पृथ्वी को जीतकर राजा जनक के हाथ में सौंप दूंगा। इस संसार में मैं किसी दूसरे ऐसे पुरुष को नहीं देखता, जो मेरा सामना कर सके। तुम युद्ध में मेरा वह महान् पराक्रम देखना, जिसके सामने कोई प्रतिद्वन्द्वी टिक नहीं पाता। मैंने युद्धस्थल में जिनकी ध्वजाएँ तोड़ डाली थीं, वे देवता और असुर मेरे सामने ठहरने में असमर्थ होने के कारण कई बार पीठ दिखा चुके हैं। तुम मुझे स्वीकार करो। आज तुम्हारा उत्तम श्रृंगार किया जाय और तुम्हारे अंगों में चमकीले आभूषण पहनाये जायँ।'
‘सुमुखि! आज मैं श्रृंगार से सुसज्जित हुए तुम्हारे सुन्दर रूप को देख रहा हूँ। तुम उदारतावश मुझ पर कृपा करके श्रृंगार से सम्पन्न हो जाओ। भीरु ! फिर इच्छानुसार भाँति-भाँति के भोग भोगो, दिव्य रस का पान करो, विहरो तथा पृथ्वी या धन का यथेष्ट रूप से दान करो। तुम मुझ पर विश्वास करके भोग भोगने की इच्छा करो और निर्भय होकर मुझे अपनी सेवा के लिये आज्ञा दो। मुझ पर कृपा करके इच्छानुसार भोग भोगती हुई तुम जैसी पटरानी के भाई-बन्धु भी मनमाने भोग भोग सकते हैं।'
‘भद्रे! यशस्विनि! तुम मेरी समृद्धि और धन-सम्पत्ति की ओर तो देखो। सुभगे ! चीर-वस्त्र धारण करने वाले राम को लेकर क्या करोगी? राम ने विजय की आशा त्याग दी है। वह श्रीहीन होकर वन वन में विचर रहा है, व्रत का पालन करता है और मिट्टी की वेदी पर सोता हैं। अब तो मुझे यह भी संदेह होने लगा है कि वह जीवित भी हैं या नहीं। विदेह्नन्दिनि! जिनके आगे बगुलों की पंक्तियाँ चलती हैं, उन काले बादलों से छिपी हुई चन्द्रिका के समान तुमको अब राम पाना तो दूर रहा, देख भी नहीं सकता है।'
‘जैसे हिरण्यकशिपु इन्द्र के हाथ में गयी हुई कीर्ति को न पा सका, उसी प्रकार राम भी मेरे हाथ से तुम्हें नहीं पा सकता। मनोहर मुसकान, सुन्दर दन्तावलि तथा रमणीय नेत्रों वाली विलासिनि ! भीरु! जैसे गरुड़ सर्प को उठा ले जाते हैं, उसी प्रकार तुम मेरे मन को हर लेती हो। तुम्हारा रेशमी पीताम्बर मैला हो गया है। तुम बहुत दुबली-पतली हो गयी हो और तुम्हारे अंगों में आभूषण भी नहीं हैं तो भी तुम्हें देखकर अपनी दूसरी स्त्रियों में मेरा मन नहीं लगता।'
'जनकनन्दिनि ! मेरे अन्त: पुर में निवास करने वाली जितनी भी सर्वगुणसम्पन्न रानियाँ हैं, उन सबकी तुम स्वामिनी बन जाओ। काले केशोंवाली सुन्दरी ! जैसे अप्सराएँ लक्ष्मी की सेवा करती हैं, उसी प्रकार त्रिभुवन की श्रेष्ठ सुन्दरियाँ यहाँ तुम्हारी परिचर्या करेंगी। सुभ्रु ! सुश्रोणि! कुबेर के यहाँ जितने भी अच्छे रत्न और धन हैं, उन सबका तथा सम्पूर्ण लोकों का तुम मेरे साथ सुखपूर्वक उपभोग करो। देवी ! राम तो न तप से, न बल से, न पराक्रम से, न धन से और न तेज अथवा यश के द्वारा ही मेरी समानता कर सकता है।'
'तुम दिव्य रस का पान, विहार एवं रमण करो तथा अभीष्ट भोग भोगो। मैं तुम्हें धन की राशि और सारी पृथ्वी भी समर्पित किये देता हूँ। ललने ! तुम मेरे पास रहकर मौज से मनचाही वस्तुएँ ग्रहण करो और तुम्हारे निकट आकर तुम्हारे भाई-बन्धु भी सुखपूर्वक इच्छानुसार भोग आदि प्राप्त करें। भीरु ! तुम सोने के निर्मल हारों से अपने अंग को विभूषित करके मेरे साथ समुद्र तटवर्ती उन काननों में विहार करो, जिनमें खिले हुए वृक्षों के समुदाय सब ओर फैले हुए हैं और उन पर भ्रमर मँडरा रहे हैं।'
