भाग-१५(15) हनुमानजी का मन-ही-मन सीताजी के शील और सौन्दर्य की सराहना करते हुए उन्हें कष्ट में पड़ी देख स्वयं भी उनके लिये शोक करना

 


परम प्रशंसनीया सीता और गुणाभिराम श्रीराम की प्रशंसा करके वानरश्रेष्ठ हनुमानजी फिर विचार करने लगे। लगभग दो घड़ी तक कुछ सोच विचार करने पर उनके नेत्रों में आँसू भर आये और वे तेजस्वी हनुमान् सीता के विषय में इस प्रकार विलाप करने लगे - अहो! जिन्होंने गुरुजनों से शिक्षा पायी है, उन लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीराम की प्रियतमा पत्नी सीता भी यदि इस प्रकार दु:ख से आतुर हो रही हैं तो यह कहना पड़ता है कि काल का उल्लङ्घन करना सभी के लिये अत्यन्त कठिन है। 

'जैसे वर्षा ऋतु आने पर भी देवी गंगा अधिक क्षुब्ध नहीं होती हैं, उसी प्रकार श्रीराम तथा बुद्धिमान् लक्ष्मण के अमोघ पराक्रम का निश्चित ज्ञान रखने वाली देवी सीता भी शोक से अधिक विचलित नहीं हो रही हैं। सीता माता के शील, स्वभाव, अवस्था और बर्ताव श्रीराम के ही समान हैं। उनका कुल भी उन्हीं के तुल्य महान् है, अत: श्रीरघुनाथजी विदेहकुमारी सीता के सर्वथा योग्य हैं तथा ये कजरारे नेत्रों वाली सीता भी उन्हीं के योग्य हैं।' 

नूतन सुवर्ण के समान दीप्तिमती और लोक कमनीया लक्ष्मीजी के समान शोभामयी श्रीसीता को देखकर हनुमानजी ने श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया और मन-ही-मन इस प्रकार कहा - इन्हीं विशाललोचना सीता के लिये भगवान् श्रीराम ने महाबली वाली का वध किया और रावण के समान पराक्रमी कबन्ध को भी मार गिराया।

'इन्हीं के लिये श्रीराम ने वन में पराक्रम करके भयानक पराक्रमी राक्षस विराध को भी उसी प्रकार युद्ध में मार डाला, जैसे देवराज इन्द्र ने शम्बरासुर का वध किया था। इन्हीं के कारण आत्मज्ञानी श्रीरामचन्द्रजी ने जनस्थान में अपने अग्निशिखा के सदृश तेजस्वी बाणों द्वारा भयानक कर्म करने वाले चौदह हजार राक्षसों को काल के गाल में भेज दिया और युद्ध में खर, त्रिशिरा तथा महातेजस्वी दूषण को भी मार गिराया।' 

‘वानरों का वह दुर्लभ ऐश्वर्य, जो वाली के द्वारा सुरक्षित था, इन्हीं के कारण विश्वविख्यात सुग्रीव को प्राप्त हुआ है। इन्हीं विशाललोचना सीता के लिये मैंने नदों और नदियों के स्वामी श्रीमान् समुद्र का उल्लङ्घन किया और इस लंकापुरी को छान डाला है। इनके लिये तो यदि भगवान् श्रीराम समुद्र पर्यन्त पृथ्वी तथा सारे संसार को भी उलट देते तो भी वह मेरे विचार से उचित ही होता। एक ओर तीनों लोकों का राज्य और दूसरी ओर जनककुमारी सीता को रखकर तुलना की जाय तो त्रिलोकी का सारा राज्य सीता माता की एक कला के बराबर भी नहीं हो सकता। ये धर्मशील मिथिलानरेश महात्मा राजा जनक की पुत्री सीता पतिव्रत धर्म में बहुत दृढ़ हैं।' 

'जब हल के मुख (फाल)-से खेत जोता जा रहा था, उस समय ये पृथ्वी को फाड़कर कमल के पराग की भाँति क्यारी की सुन्दर धूलों से लिपटी हुई प्रकट हुई थीं। जो परम पराक्रमी, श्रेष्ठ शील स्वभाव वाले और युद्ध से कभी पीछे न हटने वाले थे, उन्हीं महाराज दशरथ की ये यशस्विनी ज्येष्ठ पुत्रवधू हैं। धर्मज्ञ, कृतज्ञ एवं आत्मज्ञानी भगवान् श्रीराम की ये प्यारी पत्नी सीता इस समय राक्षसियों के वश में पड़ गयी हैं। ये केवल पति प्रेम के कारण सारे भोगों को लात मारकर विपत्तियों का कुछ भी विचार न करके श्रीरघुनाथजी के साथ निर्जन वन में चली आयी थीं।' 

‘यहाँ आकर फल-मूलों से ही संतुष्ट रहती हुई पतिदेव की सेवा में लगी रहीं और वन में भी उसी प्रकार परम प्रसन्न रहती थीं, जैसे राजमहलों में रहा करती थीं। वे ही ये सुवर्ण के समान सुन्दर अंगवाली और सदा मुसकराकर बात करने वाली सुन्दरी सीता, जो अनर्थ भोगने के योग्य नहीं थीं, इस यातना को सहन करती हैं। यद्यपि रावण ने इन्हें बहुत कष्ट दिये हैं तो भी ये अपने शील, सदाचार एवं सतीत्व से सम्पन्न हैं। (उसके वशीभूत नहीं हो सकी हैं।) अतएव जैसे प्यासा मनुष्य पौंसले पर जाना चाहता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी इन्हें देखना चाहते हैं।' 

‘जैसे राज्य से भ्रष्ट हुआ राजा पुनः पृथ्वी का राज्य पाकर बहुत प्रसन्न होता है, उसी प्रकार उनकी पुन: प्राप्ति होने से श्रीरघुनाथजी को निश्चय ही बड़ी प्रसन्नता होगी। ये अपने बन्धुजनों से बिछुड़कर विषयभोगों को तिलाञ्जलि दे केवल भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के समागम की आशा से ही अपना शरीर धारण किये हुए हैं। ये न तो राक्षसियों की ओर देखती हैं और न इन फल-फूल वाले वृक्षों पर ही दृष्टि डालती हैं, सर्वथा एकाग्रचित्त हो मन की आँखों से केवल श्रीराम का ही निरन्तर दर्शन (ध्यान) करती हैं - इसमें संदेह नहीं है। निश्चय ही पति नारी के लिये आभूषण की अपेक्षा भी अधिक शोभा का हेतु है। ये सीता उन्हीं पतिदेव से बिछुड़ गयी हैं, इसलिये शोभा के योग्य होने पर भी शोभा नहीं पा रही हैं।' 

‘भगवान् श्रीराम इनसे बिछुड़ जाने पर भी जो अपने शरीर को धारण कर रहे हैं, दु:ख से अत्यन्त शिथिल नहीं हो जाते हैं, यह उनका अत्यन्त दुष्कर कर्म है। काले केश और कमल-जैसे नेत्रवाली ये सीता वास्तव में सुख भोगने के योग्य हैं। इन्हें दु:खी जानकर मेरा मन भी व्यथित हो उठता है। अहो! जो पृथ्वी के समान क्षमाशील और प्रफुल्ल कमल के समान नेत्रों वाली हैं तथा श्रीराम और लक्ष्मण ने जिनकी सदा रक्षा की है, वे ही सीता माता आज इस वृक्ष के नीचे बैठी हैं और ये विकराल नेत्रों वाली राक्षसियाँ इनकी रखवाली करती हैं।' 

'हिम (बर्फ) की मारी हुई कमलिनी के समान इनकी शोभा नष्ट हो गयी है, दुःख - पर दुःख उठाने के कारण अत्यन्त पीड़ित हो रही हैं तथा अपने सहचर से बिछुड़ी हुई चकवी के समान पति वियोग का कष्ट सहन करती हुई ये जनककिशोरी सीता बड़ी दयनीय दशा को पहुँच गयी हैं। फूलों के भार से जिनकी डालियों के अग्रभाग झुक गये हैं, वे अशोकवृक्ष इस समय सीता माता के लिये अत्यन्त शोक उत्पन्न कर रहे हैं तथा शिशिर का अन्त हो जाने से वसन्त की रात में उदित हुए शीतल किरणों वाले चन्द्रदेव भी इनके लिये अनेक सहस्र किरणों से प्रकाशित होने वाले सूर्यदेव की भाँति संताप दे रहे हैं।' 

इस प्रकार विचार करते हुए बलवान् वानरश्रेष्ठ वेगशाली हनुमानजी यह निश्चय करके कि 'ये ही सीता हैं' उसी वृक्ष पर बैठे रहे। 

तदनन्तर वह दिन बीतने के पश्चात् कुमुदसमूह के समान श्वेत वर्ण वाले तथा निर्मल रूप से उदित हुए चन्द्रदेव स्वच्छ् आकाश में कुछ ऊपर को चढ़ आये। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई हंस किसी नील जलराशि में तैर रहा हो। निर्मल कान्ति वाले चन्द्रमा अपनी प्रभा से सीताजी के दर्शन आदि में पवनकुमार हनुमानजी की सहायता-सी करते हुए अपनी शीतल किरणों द्वारा उनकी सेवा करने लगे। उस समय उन्होंने पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुख वाली सीता को देखा, जो जल में अधिक बोझ के कारण दबी हुई नौका की भाँति शोक के भारी भार से मानो झुक गयी थीं। 

वायुपुत्र हनुमानजी ने जब विदेहकुमारी सीता को देखने के लिये अपनी दृष्टि दौड़ायी, तब उन्हें उनके पास ही बैठी हुई भयानक दृष्टि वाली बहुत-सी राक्षसियाँ दिखायी दीं। उनमें से किसी के एक आँख थी तो दूसरी के एक कान। किसी-किसी के कान इतने बड़े थे कि वह उन्हें चादर की भाँति ओढ़े हुए थीं। किसी के कान ही नहीं थे और किसी के कान ऐसे दिखायी देते थे मानो खूँटे गड़े हुए हों। किसी- किसी की साँस लेने वाली नाक उसके मस्तक पर थी। किसी का शरीर बहुत बड़ा था और किसी का बहुत उत्तम। किसी की गर्दन पतली और बड़ी थी। किसी के केश उड़ गये थे और किसी-किसी के माथे पर केश उगे ही नहीं थे। कोई-कोई राक्षसी अपने शरीर के केशों का ही कम्बल धारण किये हुए थी। 

किसी के कान और ललाट बड़े-बड़े थे तो किसी के पेट और स्तन लंबे थे। किसी के ओठ बड़े होने के कारण लटक रहे थे तो किसी के ठोड़ी में ही सटे हुए थे। किसी का मुँह बड़ा था और किसी के घुटने। कोई नाटी, कोई लंबी, कोई कुबड़ी, कोई टेढ़ी-मेढ़ी, कोई बबनी, कोई विकराल, कोई टेढ़े मुँह वाली, कोई पीली आँख वाली और कोई विकट मुँहवाली थीं। 

कितनी ही राक्षसियाँ बिगड़े शरीर वाली, काली, पीली, क्रोध करने वाली और कलह पसंद करने वाली थीं। उन सबने काले लोहे के बने हुए बड़े-बड़े शूल, कूट और मुद्गर धारण कर रखे थे। कितनी ही राक्षसियों के मुख सूअर, मृग, सिंह, भैंस, बकरी और सियारिनों के समान थे। किन्हीं के पैर हाथियों के समान, किन्हीं के ऊँटों के समान और किन्हीं के घोड़ों के समान थे। किन्हीं - किन्हीं के सिर कबन्ध की भाँति छाती में स्थित थे; अत: गड्ढे के समान दिखायी देते थे। (अथवा किन्हीं - किन्हीं के सिर में गड्ढे थे)। 

किन्हीं के एक हाथ थे तो किन्हीं के एक पैर। किन्हीं के कान गदहों के समान थे तो किन्हीं के घोड़ों के समान। किन्हीं- किन्हीं के कान गौओं, हाथियों और सिंहों के समान दृष्टिगोचर होते थे। किन्हीं की नासिकाएँ बहुत बड़ी थीं और किन्हीं की तिरछी। किन्हीं - किन्हीं के नाक ही नहीं थी। कोई-कोई हाथी की सूँड़ के समान नाक वाली थीं और किन्हीं - किन्हीं की नासिकाएँ ललाट में ही थीं, जिनसे वे साँस लिया करती थीं। 

किन्हीं के पैर हाथियों के समान थे और किन्हीं के गौओं के समान। कोई बड़े-बड़े पैर धारण करती थीं और कितनी ही ऐसी थीं जिनके पैरों में चोटी के समान केश उगे हुए थे। बहुत-सी राक्षसियाँ बेहद लंबे सिर और गर्दन वाली थीं और कितनों के पेट तथा स्तन बहुत बड़े-बड़े थे। 

किन्हीं के मुँह और नेत्र सीमा से अधिक बड़े थे, किन्हीं - किन्हीं के मुखों में बड़ी-बड़ी जिह्वाएँ थीं और कितनी ही ऐसी राक्षसियाँ थीं, जो बकरी, हाथी, गाय, सूअर, घोड़े, ऊँट और गदहों के समान मुँह धारण करती थीं। इसीलिये वे देखने में बड़ी भयंकर थीं। किन्हीं के हाथ में शूल थे तो किन्हीं के मुद्गर। कोई क्रोधी स्वभाव की थीं तो कोई कलह से प्रेम रखती थीं। 

धुएँ-जैसे केश और विकृत मुख वाली कितनी ही विकराल राक्षसियाँ सदा मद्यपान किया करती थीं। मदिरा और मांस उन्हें सदा प्रिय थे। कितनी ही अपने अंगों में रक्त और मांस का लेप लगाये रहती थीं। रक्त और मांस ही उनके भोजन थे। उन्हें देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। कपिश्रेष्ठ हनुमानजी ने उन सबको देखा। 

वे उत्तम शाखा वाले उस अशोक वृक्ष को चारों ओर से घेरकर उससे थोड़ी दूर पर बैठी थीं और सती साध्वी राजकुमारी सीता देवी उसी वृक्ष के नीचे उसकी जड़ से सटी हुई बैठी थीं। उस समय शोभाशाली हनुमानजी ने जनककिशोरी जानकीजी की ओर विशेष रूप से लक्ष्य किया। उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। वे शोक से संतप्त थीं और उनके केशों में मैल जम गयी थी। जैसे पुण्य क्षीण हो जाने पर कोई तारा स्वर्ग से टूटकर पृथ्वी पर गिर पड़ा हो, उसी तरह वे भी कान्तिहीन दिखायी देती थीं। वे आदर्श चरित्र ( पातिव्रत्य ) - से सम्पन्न तथा इसके लिये सुविख्यात थीं। उन्हें पति के दर्शन के लिये लाले पड़े थे। 

वे उत्तम भूषणों से रहित थीं तो भी पति के वात्सल्य से विभूषित थीं (पति का स्नेह ही उनके लिये श्रृंगार था )। राक्षसराज रावण ने उन्हें बंदिनी बना रखा था। वे स्वजनों से बिछुड़ गयी थीं। जैसे कोई हथिनी अपने यूथ से अलग हो गयी हो, यूथपति के स्नेह से बँधी हो और उसे किसी सिंह ने रोक लिया हो। रावण की कैद में पड़ी हुई सीता की भी वैसी ही दशा थी। वे वर्षाकाल बीत जाने पर शरद् ऋतु के श्वेत बादलों से घिरी हुई चन्द्ररेखा के समान प्रतीत होती थीं। 

जैसे वीणा अपने स्वामी की अंगुलियों के स्पर्श से वञ्चित हो वादन आदि की क्रिया से रहित अयोग्य अवस्था में मूक पड़ी रहती है, उसी प्रकार सीता पति के सम्पर्क से दूर होने के कारण महान् क्लेश में पड़कर ऐसी अवस्था को पहुँच गयी थीं, जो उनके योग्य नहीं थी। पति के हित में तत्पर रहने वाली सीता राक्षसों के अधीन रहने के योग्य नहीं थीं; फिर भी वैसी दशा में पड़ी थीं। अशोकवाटिका में रहकर भी वे शोक के सागर में डूबी हुई थीं। क्रूर ग्रह से आक्रान्त हुई रोहिणी की भाँति वे वहाँ उन राक्षसियों से घिरी हुई थीं। हनुमानजी ने उन्हें देखा। वे पुष्पहीन लता की भाँति श्रीहीन हो रही थीं। 

यद्यपि देवी सीता के मुख पर दीनता छा रही थी तथापि अपने पति के तेज का स्मरण हो आने से उनके हृदय से वह दैन्य दूर हो जाता था। कजरारे नेत्रों वाली सीता अपने शील से ही सुरक्षित थीं। उनके नेत्र मृगछौनों के समान चञ्चल थे। वे डरी हुई मृगकन्या की भाँति सब ओर सशंक दृष्टि से देख रही थीं। अपने उच्छवासों से पल्लवधारी वृक्षों को दग्ध-सी करती जान पड़ती थीं। शोकों की मूर्तिमती प्रतिमा- सी दिखायी देती थीं और दुःख की उठी हुई तरंग - सी प्रतीत होती थीं। 

उनके सभी अंगों का विभाग सुन्दर था। यद्यपि वे विरह-शोक से दुर्बल हो गयी थीं तथापि आभूषणों के बिना ही शोभा पाती थीं। इस अवस्था में मिथिलेशकुमारी सीता को देखकर पवनपुत्र हनुमान् को उनका पता लग जाने के कारण अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। मनोहर नेत्र वाली सीता को वहाँ देखकर हनुमानजी हर्ष के आँसू बहाने लगे। उन्होंने मन-ही-मन श्रीरघुनाथजी को नमस्कार किया। सीता के दर्शन से उल्लसित हो श्रीराम और लक्ष्मण को नमस्कार करके पराक्रमी हनुमान् वहीं छिपे रहे। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-१५(15) समाप्त ! 

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