भाग-१६(13) हनुमानजी की विभीषणजी से भेंट, अशोकवाटिका में प्रवेश करके उसकी शोभा देखना तथा एक अशोक वृक्ष पर छिपे रहकर वहीं से सीता का अनुसन्धान करना

 


महातेजस्वी हनुमानजी एक मुहूर्त तक इसी प्रकार विचार करते रहे। तत्पश्चात् मन-ही-मन सीताजी का ध्यान करके वे रावण के महल से कूद पड़े और फिर एक सुंदर महल दिखाई दिया। वहाँ भगवान्‌ का एक अलग मंदिर बना हुआ था। वह महल श्री रामजी के आयुध (धनुष-बाण) के चिह्नों से अंकित था, उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती। वहाँ नवीन-नवीन तुलसी के वृक्ष-समूहों को देखकर कपिराज श्री हनुमान्‌जी हर्षित हुए। लंका तो राक्षसों के समूह का निवास स्थान है। यहाँ सज्जन (साधु पुरुष) का निवास कहाँ? हनुमान्‌जी मन में इस प्रकार तर्क करने लगे। उसी समय विभीषणजी जागे। 

विभीषण ने राम नाम का स्मरण किया। हनमान्‌जी ने उन्हें सज्जन जाना और हृदय में हर्षित हुए। हनुमान्‌जी ने विचार किया कि इनसे हठ करके अपनी ओर से ही परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती। प्रत्युत लाभ ही होता है। ब्राह्मण का रूप धरकर हनुमान्‌जी ने उन्हें वचन सुनाए (पुकारा)। 

सुनते ही विभीषणजी उठकर वहाँ आए। प्रणाम करके कुशल पूछी और कहा कि हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा समझाकर कहिए। क्या आप हरिभक्तों में से कोई हैं? क्योंकि आपको देखकर मेरे हृदय में अत्यंत प्रेम उमड़ रहा है। अथवा क्या आप दीनों से प्रेम करने वाले स्वयं श्रीरामजी ही हैं जो मुझे बड़भागी बनाने घर-बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने आए हैं? 

तब हनुमान्‌जी ने श्री रामचंद्रजी की सारी कथा कहकर अपना नाम बताया। सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गए और श्री रामजी के गुण समूहों का स्मरण करके दोनों के मन (प्रेम और आनंद में) मग्न हो गए। 

विभीषणजी ने कहा - हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो। मैं यहाँ वैसे ही रहता हूँ जैसे दाँतों के बीच में बेचारी जीभ। हे तात! मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुल के नाथ श्री रामचंद्रजी क्या कभी मुझ पर कृपा करेंगे? मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होने से साधन तो कुछ बनता नहीं और न मन में श्री रामचंद्रजी के चरणकमलों में प्रेम ही है, परंतु हे हनुमान्‌! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजी की मुझ पर कृपा है, क्योंकि हरि की कृपा के बिना संत नहीं मिलते। 

'जिस समय मैंने अपने भाइयों के साथ तपस्या का फल प्राप्त किया तब मैंने ब्रह्माजी से भक्ति का ही वरदान माँगा था। क्योंकि दोनों भाइयों ने शक्ति मांगी थी इसलिए मैंने भक्ति का वर लेना उचित समझा। उसी समय वरदान देते समय ब्रह्माजी ने कहा था कि जब स्वयं श्रीनारायण, श्रीराम के रूप में धरती पर आएंगे तो तुम्हारी भेंट उनसे होगी। तभी से मैं केवल उन्ही के नाम का उच्चारण करता हूँ। जब श्रीरघुवीर ने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके (अपनी ओर से) दर्शन दिए हैं।' 

हनुमान्‌जी ने कहा - हे विभीषणजी! सुनिए, प्रभु की यही रीति है कि वे सेवक पर सदा ही प्रेम किया करते हैं। भला कहिए, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? जाति का चंचल वानर हूँ और सब प्रकार से नीच हूँ, प्रातःकाल जो हम लोगों (बंदरों) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले। हे सखा! सुनिए, मैं ऐसा अधम हूँ, पर श्री रामचंद्रजी ने तो मुझ पर भी कृपा ही की है। 

भगवान्‌ के गुणों का स्मरण करके हनुमान्‌जी के दोनों नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया। जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी श्रीरघुनाथजी को भुलाकर विषयों के पीछे भटकते फिरते हैं, वे दुःखी क्यों न हों? इस प्रकार श्री रामजी के गुण समूहों को कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शांति प्राप्त की। 

तब हनुमान्‌जी ने कहा- हे भाई सुनो, मैं जानकी माता को देखता चाहता हूँ। मैंने लंका का चप्पा-चप्पा देख डाला किन्तु सीता माता का अभी तक कोई पता नहीं चल सका। केवल आपके भवन से कुछ दूरी पर स्थित ये अशोकवाटिका नहीं देखी। मैं उसी और जा रहा था और मेरी आपसे भेंट हो गयी। जब आप उनके विषय में इतना जानते हैं तो कृपा कर मुझे वह स्थान बताएं जहाँ सीता माता को रखा गया है। 

फिर विभीषणजी ने, श्री जानकीजी जिस प्रकार वहाँ (लंका में) रहती थीं, वह सब कथा कही। 

विभीषणजी बोले - हे पवनपुत्र! आप सही दिशा में जा रहे हैं। किन्तु आपने यह कैसे सोच लिया कि वह सती-साध्वी देवी रावण के अंत:पुर में आपको किसी पलंग पर आराम से शयन करती हुई मिल जाएंगी। वह तो दिन-रात केवल इसी आश में अशोकवाटिका में एक वृक्ष के निचे बैठी रहती हैं कि एक दिन श्रीराम उसे यहाँ से मुक्त करके ले जाएंगे।  

विभीषणजी ने माता के दर्शन की सब युक्तियाँ (उपाय) कह सुनाईं। तब हनुमान्‌जी विदा लेकर चले। फिर वही पहले का मसक सरीखा रूप धरकर वहाँ गए, जहाँ अशोक वन में (वन के जिस भाग में) सीताजी रहती थीं।  

हनुमानजी अशोकवाटिका की चहारदीवारी पर चढ़ गये। उस चहारदीवारी पर बैठे हुए महाकपि हनुमानजी के सारे अंगों में हर्षजनित रोमाञ्च हो आया। उन्होंने वसन्त के आरम्भ में वहाँ नाना प्रकार के वृक्ष देखे, जिनकी डालियों के अग्रभाग फूलों के भार से लदे थे। वहाँ साल, अशोक, निम्ब और चम्पा के वृक्ष खूब खिले हुए थे। बहुवार, नागकेसर और बन्दर के मुँह की भाँति लाल फल देने वाले आम भी पुष्प एवं मञ्जरियों से सुशोभित हो रहे थे। अमराइयों से युक्त वे सभी वृक्ष शत-शत लताओं से आवेष्टित थे। हनुमानजी प्रत्यञ्चा से छूटे हुए बाण के समान उछले और उन वृक्षों की वाटिका में जा पहुँचे। 

वह विचित्र वाटिका सोने और चाँदी के समान वर्ण वाले वृक्षों द्वारा सब ओर से घिरी हुई थी। उसमें नाना प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे थे, जिससे वह सारी वाटिका गूँज रही थी। उसके भीतर प्रवेश करके बलवान् हनुमानजी ने उसका निरीक्षण किया। भाँति-भाँति के विहंगमों और मृगसमूहों से उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। वह विचित्र काननों से अलंकृत थी और नवोदित सूर्य के समान अरुण रंग की दिखायी देती थी। फूलों और फलों से लदे हुए नाना प्रकार के वृक्षों से व्याप्त हुई उस अशोकवाटिका का मत वाले कोकिल और भ्रमर सेवन करते थे। 

महान् वेगशाली हनुमानजी ने मन-ही-मन सोचा - दुरात्मा रावण की यह अशोकवाटिका बड़ी ही रमणीय है। चन्दन, चम्पा और मौलसिरी के वृक्ष इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं। इधर यह पक्षियों से सेवित कमलमण्डित सरोवर भी बड़ा सुन्दर है। राजरानी जानकी इसके तट पर निश्चय ही आती होंगी। 

'रघुनाथजी की प्रियतमा राजरानी रामा सती-साध्वी जानकी वन में घूमने-फिरने में बहुत कुशल हैं। वे अवश्य इधर आयेंगी। अथवा इस वन की विशेषताओं के ज्ञान में निपुण मृग - शावकनयनी सीता आज यहाँ इस तालाब के तटवर्ती वन में अवश्य पधारेंगी; क्योंकि वे श्रीरामचन्द्रजी के वियोग की चिन्ता से अत्यन्त दुबली हो गयी होंगी और इस सुन्दर स्थान में आने से उनकी चिन्ता कुछ कम हो सकेगी। सुन्दर नेत्रवाली देवी सीता भगवान् श्रीराम के विरह-शोक से बहुत ही संतप्त होंगी। वनवास में उनका सदा ही प्रेम रहा है, अत: वे वन में विचरती हुई इधर अवश्य आयेंगी।' 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-१६(13) समाप्त ! 

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