भाग-१२(12) सीताजी के नाश की आशंका से हनुमानजी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सूचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमानजी का न लौटने का निश्चय करके पुनः खोजने का विचार करना

 


उन्होंने फिर सोचा - यदि मैं सीताजी को देखे बिना ही यहाँ से वानरराज की पुरी किष्किन्धा को लौट जाऊँगा तो मेरा पुरुषार्थ ही क्या रह जायगा? फिर तो मेरा यह समुद्रलंघन, लंका में प्रवेश और राक्षसों को देखना सब व्यर्थ हो जायगा। किष्किन्धा में पहुँचने पर मुझसे मिलकर सुग्रीव, दूसरे दूसरे वानर तथा वे दोनों दशरथ राजकुमार भी क्या कहेंगे? यदि वहाँ जाकर मैं श्रीरामचन्द्रजी से यह कठोर बात कह दूँ कि मुझे सीता माता का दर्शन नहीं हुआ तो वे प्राणों का परित्याग कर देंगे। 

‘सीताजी के विषय में ऐसे रूखे, कठोर, तीखे और इन्द्रियों को संताप देने वाले दुर्वचन को सुनकर वे कदापि जीवित नहीं रहेंगे। उन्हें संकट में पड़कर प्राणों के परित्याग का संकल्प करते देख उनके प्रति अत्यन्त अनुराग रखने वाले बुद्धिमान् लक्ष्मण भी जीवित नहीं रहेंगे। अपने इन दो भाइयों के विनाश का समाचार सुनकर भरत भी प्राण त्याग देंगे और भरत की मृत्यु देखकर शत्रुघ्न भी जीवित नहीं रह सकेंगे। इस प्रकार चारों पुत्रों की मृत्यु हुई देख कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी – ये तीनों माताएँ भी निस्संदेह प्राण दे देंगी।' 

'कृतज्ञ और सत्यप्रतिज्ञ वानरराज सुग्रीव भी जब श्रीरामचन्द्रजी को ऐसी अवस्था में देखेंगे तो स्वयं भी प्राण विसर्जन कर देंगे। तत्पश्चात् पतिशोक से पीड़ित हो दुःखितचित्त, दीन, व्यथित और आनन्दशून्य हुई तपस्विनी रुमा भी जान दे देगी। फिर तो रानी तारा भी जीवित नहीं रहेंगी। वे वाली के विरहजनित दुःख से तो पीड़ित थीं ही, इस नूतन शोक से कातर हो शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो जायँगी। माता-पिता के विनाश और सुग्रीव के मरणजनित संकट से पीड़ित हो कुमार अंगद भी अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे।' 

‘तदनन्तर स्वामी के दु:ख से पीड़ित हुए सारे वानर अपने हाथों और मुक्कों से सिर पीटने लगेंगे। यशस्वी वानरराज ने सान्त्वनापूर्ण वचनों और दान - मान से जिनका लालन-पालन किया था, वे वानर अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे। ऐसी अवस्था में शेष वानर वनों, पर्वतों और गुफाओं में एकत्र होकर फिर कभी क्रीड़ा - विहार का आनन्द नहीं लेंगे। अपने राजा के शोक से पीड़ित हो सब वानर अपने पुत्र, स्त्री और मन्त्रियों सहित पर्वतों के शिखरों से नीचे सम अथवा विषम स्थानों में गिरकर प्राण दे देंगे। अथवा सारे विष पी लेंगे या फाँसी लगा लेंगे या जलती आग में प्रवेश कर जायेंगे। उपवास करने लगेंगे अथवा अपने ही शरीर में छुरा भोंक लेंगे।' 

‘मेरे वहाँ जाने पर मैं समझता हूँ बड़ा भयंकर आर्तनाद होने लगेगा। इक्ष्वाकु कुल का नाश और वानरों का भी विनाश हो जायगा। इसलिये मैं यहाँ से किष्किन्धापुरी को तो नहीं जाऊँगा। मिथिलेशकुमारी सीता को देखे बिना मैं सुग्रीव का भी दर्शन नहीं कर सकूँगा। यदि मैं यहीं रहूँ और वहाँ न जाऊँ तो मेरी आशा लगाये वे दोनों धर्मात्मा महारथी बन्धु प्राण धारण किये रहेंगे और वे वेगशाली वानर भी जीवित रहेंगे। जानकीजी का दर्शन न मिलने पर मैं यहाँ वानप्रस्थी हो जाऊँगा। मेरे हाथ पर अपने-आप जो फल आदि खाद्य वस्तु प्राप्त हो जायगी, उसी को खाकर रहूँगा या परेच्छा से मेरे मुँह में जो फल आदि खाद्य वस्तु पड़ जायगी, उसी से निर्वाह करूँगा तथा शौच, संतोष आदि नियमों के पालनपूर्वक वृक्ष के नीचे निवास करूँगा।' 

‘अथवा सागरतटवर्ती स्थान में, जहाँ फल- मूल और जल की अधिकता होती है, मैं चिता बनाकर जलती हुई आग में प्रवेश कर जाऊँगा। अथवा आमरण उपवास के लिये बैठकर लिंगशरीरधारी जीवात्मा का शरीर से वियोग कराने के प्रयत्न में लगे हुए मेरे शरीर को कौवे तथा हिंसक जन्तु अपना आहार बना लेंगे। यदि मुझे जानकीजी का दर्शन नहीं हुआ तो मैं खुशी-खुशी जल समाधि ले लूँगा। मेरे विचार से इस तरह जल-प्रवेश करके परलोकगमन करना ऋषियों की दृष्टि में भी उत्तम ही है।' 

‘जिसका प्रारम्भ शुभ है, ऐसी सुभगा, यशस्विनी और मेरी कीर्तिमाला रूपा यह दीर्घ रात्रि भी सीताजी को देखे बिना ही बीत चली। अथवा अब मैं नियमपूर्वक वृक्ष के नीचे निवास करने वाला तपस्वी हो जाऊँगा; किंतु उस असितलोचना सीता माता को देखे बिना यहाँ से कदापि नहीं लौटूंगा। यदि माता सीता का पता लगाये बिना ही मैं लौट जाऊँ तो समस्त वानरों सहित अंगद जीवित नहीं रहेंगे। इस जीवन का नाश कर देने में बहुत से दोष हैं। जो पुरुष जीवित रहता है, वह कभी-न-कभी अवश्य कल्याण का भागी होता है; अत: मैं इन प्राणों को धारण किये रहूँगा। जीवित रहने पर अभीष्ट वस्तु अथवा सुख की प्राप्ति अवश्यम्भावी है।' 

इस तरह मन में अनेक प्रकार के दुःख धारण किये कपिकुञ्जर हनुमानजी शोक का पार न पा सके। तदनन्तर धैर्यवान् कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने पराक्रम का सहारा लेकर सोचा - अथवा महाबली दशमुख रावण का ही वध क्यों न कर डालूँ। भले ही सीता माता का अपहरण हो गया हो, इस रावण को मार डालने से उस वैर का भरपूर बदला सध जायगा। अथवा इसे उठाकर समुद्र के ऊपर-ऊपर से ले जाऊँ और जैसे पशुपति (रुद्र या अग्नि) को पशु अर्पित किया जाय, उसी प्रकार श्रीराम के हाथ में इसको सौंप दूँ। 

इस प्रकार सीताजी को न पाकर वे चिन्ता में निमग्न हो गये। उनका मन सीता के ध्यान और शोक में डूब गया। फिर वे वानरवीर इस प्रकार विचार करने लगे – जब तक मैं यशस्विनी श्रीराम- पत्नी सीता का दर्शन न कर लूँगा, तब तक इस लंकापुरी में बारंबार उनकी खोज करता रहूँगा। यदि सम्पाति के कहने से भी मैं श्रीराम को यहाँ बुला ले आऊँ तो अपनी पत्नी को यहाँ न देखने पर श्रीरघुनाथजी समस्त वानरों को जलाकर भस्म कर देंगे। अत: यहीं नियमित आहार और इन्द्रियों के संयमपूर्वक निवास करूँगा। मेरे कारण वे समस्त नर और वानर नष्ट न हों। इधर यह बहुत बड़ी अशोकवाटिका है, इसके भीतर बड़े-बड़े वृक्ष हैं। इसमें मैंने अभी तक अनुसंधान नहीं किया है, अत: अब इसी में चलकर ढूँढूँगा। 

‘राक्षसों के शोक को बढ़ाने वाला मैं यहाँ से वसु, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार और मरुद्गुणों को नमस्कार करके अशोकवाटिका में चलूँगा। वहाँ समस्त राक्षसों को जीतकर जैसे तपस्वी को सिद्धि प्रदान की जाती है, इसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के हाथ में इक्ष्वाकु कुल को आनन्दित करने वाली देवी सीता को सौंप दूंगा।' 

इस प्रकार दो घड़ी तक सोच-विचारकर चिन्ता से शिथिल इन्द्रिय वाले महाबाहु पवनकुमार हनुमान् सहसा उठकर खड़े हो गये और देवताओं को नमस्कार करते हुए बोले - लक्ष्मण सहित श्रीराम को नमस्कार है। जनकनन्दिनी सीता देवी को भी नमस्कार है। रुद्र, इन्द्र, यम और वायु देवता को नमस्कार है तथा चन्द्रमा, अग्नि एवं मरुद्गणों को भी नमस्कार है। 

इस प्रकार उन सबको तथा सुग्रीव को भी नमस्कार करके पवनकुमार हनुमानजी सम्पूर्ण दिशाओं की ओर दृष्टिपात करके अशोकवाटिका में जाने को उद्यत हुए। 

उन वानरवीर पवनकुमार ने पहले मन के द्वारा ही उस सुन्दर अशोक वाटिका में जाकर भावी कर्तव्य का इस प्रकार चिन्तन किया - वह पुण्यमयी अशोकवाटिका सींचने कोड़ने आदि सब प्रकार के संस्कारों से सँवारी गयी है। वह दूसरे-दूसरे वनों से भी घिरी हुई है; अत: उसकी रक्षा के लिये वहाँ निश्चय ही बहुत-से राक्षस तैनात किये गये होंगे। राक्षसराज के नियुक्त किये हुए रक्षक अवश्य ही वहाँ के वृक्षों की रक्षा करते होंगे; इसलिये जगत के प्राणस्वरूप भगवान् वायुदेव भी वहाँ अधिक वेग से नहीं बहते होंगे। 

‘मैंने श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि तथा रावण से अदृश्य रहने के लिये अपने शरीर को संकुचित करके छोटा बना लिया है। मुझे इस कार्य में ऋषियों सहित समस्त देवता सिद्धि – सफलता प्रदान करें। स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा, अन्य देवगण, तपोनिष्ठ महर्षि, अग्निदेव, वायु तथा वज्रधारी इन्द्र भी मुझे सफलता प्रदान करें। पाशधारी वरुण, सोम, आदित्य, महात्मा अश्विनी कुमार, समस्त मरुद्गण, सम्पूर्ण भूत और भूतों के अधिपति तथा और भी जो मार्ग में दीखने वाले एवं न दीखने वाले देवता हैं, वे सब मुझे सिद्धि प्रदान करेंगे।' 

"जिसकी नाक ऊँची और दाँत सफेद हैं, जिसमें चेचक आदि के दाग नहीं हैं, जहाँ पवित्र मुसकान की छटा छायी रहती है, जिसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान सुशोभित होते हैं तथा जो निष्कलंक कलाधर के तुल्य कमनीय कान्ति से युक्त है, वह आर्या सीता का मुख मुझे कब दिखायी देगा ? इस क्षुद्र, नीच, नृशंसरूपधारी और अत्यन्त दारुण होने पर भी अलंकार युक्त विश्वसनीय वेष धारण करने वाले रावण ने उस तपस्विनी अबला को बलात् अपने अधीन कर लिया है। अब किस प्रकार वह मेरे दृष्टिपथ में आ सकती हैं?'

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-१२(12) समाप्त ! 

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