उस राजभवन के भीतर स्थित हुए हनुमानजी सीताजी के दर्शन के लिये उत्सुक हो क्रमशः लतामण्डपों में, चित्रशालाओं में तथा रात्रिकालिक विश्रामगृहों में गये; परंतु वहाँ भी उन्हें परम सुन्दरी सीता का दर्शन नहीं हुआ।
रघुनन्दन श्रीराम की प्रियतमा सीता जब वहाँ भी दिखायी न दीं, तब वे महाकपि हनुमान् इस प्रकार चिन्ता करने लगे - निश्चय ही अब मिथिलेशकुमारी सीता जीवित नहीं हैं; इसीलिये बहुत खोजने पर भी वे मेरे दृष्टिपथ में नहीं आ रही हैं। सती-साध्वी सीता उत्तम आर्यमार्ग पर स्थित रहने वाली थीं। वे अपने शील और सदाचार की रक्षा में तत्पर रही हैं; इसलिये निश्चय ही इस दुराचारी राक्षसराज ने उन्हें मार डाला होगा। राक्षसराज रावण के यहाँ जो दास्यकर्म करने वाली राक्षसियाँ हैं, उनके रूप बड़े बेडौल हैं। वे बड़ी विकट और विकराल हैं। उनकी कान्ति भी भयंकर है। उनके मुँह विशाल और आँखें भी बड़ी-बड़ी एवं भयानक हैं। उन सबको देखकर जनकराजनन्दिनी ने भय के मारे प्राण त्याग दिये होंगे।
‘सीता माता का दर्शन न होने से मुझे अपने पुरुषार्थ का फल नहीं प्राप्त हो सका। इधर वानरों के साथ सुदीर्घकाल तक इधर-उधर भ्रमण करके मैंने लौटने की अवधि भी बिता दी है; अत: अब मेरा सुग्रीव के पास जाने का भी मार्ग बंद हो गया; क्योंकि वह वानर बड़ा बलवान् और अत्यन्त कठोर दण्ड देने वाला है। मैंने रावण का सारा अन्तःपुर छान डाला, एक-एक करके रावण की समस्त स्त्रियों को भी देख लिया; किंतु अभी तक साध्वी सीता का दर्शन नहीं हुआ; अतः मेरा समुद्रलङ्घन का सारा परिश्रम व्यर्थ हो गया।'
‘जब मैं लौटकर जाऊँगा, तब सारे वानर मिलकर मुझसे क्या कहेंगे; वे पूछेंगे, वीर! वहाँ जाकर तुमने क्या किया है - यह मुझे बताओ। किंतु जनकनन्दिनी सीता को न देखकर मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा। सुग्रीव के निश्चित किये हुए समय का उल्लङ्घन कर देने पर अब मैं निश्चय ही आमरण उपवास करूँगा। बड़े-बूढ़े जाम्बवान् और युवराज अंगद मुझसे क्या कहेंगे? समुद्र के पार जाने पर अन्य वानर भी जब मुझसे मिलेंगे, तब वे क्या कहेंगे?'
इस प्रकार थोड़ी देर तक हताश से होकर वे फिर सोचने लगे - हताश न होकर उत्साह को बनाये रखना ही सम्पत्ति का मूल कारण है। उत्साह ही परम सुख का हेतु है; अतः मैं पुनः उन स्थानों में सीता माता की खोज करूँगा, जहाँ अब तक अनुसन्धान नहीं किया गया था। उत्साह ही प्राणियों को सर्वदा सब प्रकार के कर्मों में प्रवृत्त करता है और वही उन्हें वे जो कुछ करते हैं उस कार्य में सफलता प्रदान करता है। इसलिये अब मैं और भी उत्तम एवं उत्साह पूर्वक प्रयत्न के लिये चेष्टा करूँगा। रावण के द्वारा सुरक्षित जिन स्थानों को अब तक नहीं देखा था, उनमें भी पता लगाऊँगा। आपानशाला, पुष्पगृह, चित्रशाला, क्रीडागृह, गृहोद्यान की गलियाँ और पुष्पक आदि विमान - इन सबका तो मैंने चप्पा-चप्पा देख डाला अब अन्यत्र खोज करूंगा।
यह सोचकर उन्होंने पुनः खोजना आरम्भ किया। वे भूमि के भीतर बने हुए घरों (तहखानों) में, चौराहों पर बने हुए मण्डपों में तथा घरों को लाँघकर उनसे थोड़ी ही दूर पर बने हुए विलास भवनों में सीता की खोज करने लगे। वे किसी घर के ऊपर चढ़ जाते, किसी से नीचे कूद पड़ते, कहीं ठहर जाते और किसी को चलते-चलते ही देख लेते थे। घरों के दरवाजों को खोल देते, कहीं किंवाड़ बंदकर देते, किसी के भीतर घुसकर देखते और फिर निकल आते थे। वे नीचे कूदते और ऊपर उछलते हुए-से सर्वत्र खोज करने लगे। उन महाकपि ने वहाँ के सभी स्थानों में विचरण किया। रावण के अन्तःपुर में कोई चार अंगुल का भी ऐसा स्थान नहीं रह गया, जहाँ कपिवर हनुमानजी न पहुँचे हों।
उन्होंने परकोटे के भीतर की गलियाँ, चौराहे के वृक्षों के नीचे बनी हुई वेदियाँ, गड्ढे और पोखरियाँ - सबको छान डाला। हनुमानजी ने जगह-जगह नाना प्रकार के आकार वाली, कुरूप और विकट राक्षसियाँ देखीं; किंतु वहाँ उन्हें जानकीजी का दर्शन नहीं हुआ। संसार में जिनके रूप-सौन्दर्य की कहीं तुलना नहीं थी ऐसी बहुत सी विद्याधरियाँ भी हनुमानजी की दृष्टिमें आयीं; परंतु वहाँ उन्हें श्रीरघुनाथजी को आनन्द प्रदान करने वाली सीता नहीं दिखायी दीं। हनुमानजी ने सुन्दर और पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुख वाली बहुत-सी नागकन्याएँ भी वहाँ देखीं; किंतु जनककिशोरी का उन्हें दर्शन नहीं हुआ। राक्षसराज के द्वारा नागसेना को मथकर बलात् हरकर लायी हुई नागकन्याओं को तो पवनकुमार ने वहाँ देखा; किंतु जानकीजी उन्हें दृष्टिगोचर नहीं हुईं।
महाबाहु पवनकुमार हनुमान् को दूसरी बहुत-सी सुन्दरियाँ दिखायी दीं; परंतु सीताजी उनके देखने में नहीं आयीं। इसलिये वे बहुत दुःखी हो गये। उन वानरशिरोमणि वीरों के उद्योग और अपने द्वारा किये गये समुद्रलंघन को व्यर्थ हुआ देखकर पवनपुत्र हनुमान् वहाँ पुनः बड़ी भारी चिन्ता में पड़ गये। उस समय वायुनन्दन हनुमान् विमान से नीचे उतर आये और बड़ी चिन्ता करने लगे। शोक से उनकी चेतना शक्ति शिथिल हो गयी।
रावण के सभी घरों में एक बार पुन: चक्कर लगाकर जब कपिवर हनुमानजी ने जनकनन्दिनी सीता को नहीं देखा, तब वे मन-ही-मन इस प्रकार कहने लगे - मैंने श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय करने के लिये कई बार लंका को छान डाला; किंतु सर्वांगसुन्दरी विदेहनन्दिनी सीता मुझे कहीं नहीं दिखायी देती हैं। मैंने यहाँ के छोटे तालाब, पोखरे, सरोवर, सरिताएँ, नदियाँ, पानी के आस-पास के जंगल तथा दुर्गम पहाड़- सब देख डाले। इस नगर के आस-पास की सारी भूमि खोज डाली; किंतु कहीं भी मुझे जानकीजी का दर्शन नहीं हुआ। गृध्रराज सम्पाति ने तो सीताजी को यहाँ रावण के महल में ही बताया था। फिर भी न जाने क्यों वे यहाँ दिखायी नहीं देती हैं।
'क्या रावण के द्वारा बलपूर्वक हरकर लायी हुई विदेह - कुलनन्दिनी मिथिलेशकुमारी जनकदुलारी सीता कभी विवश होकर रावण की सेवा में उपस्थित हो सकती हैं, यह असम्भव है। मैं तो समझता हूँ कि श्रीरामचन्द्रजी के बाणों से भयभीत हो वह राक्षस जब सीता को लेकर शीघ्रतापूर्वक आकाश में उछला है, उस समय कहीं बीच में ही वे छूटकर गिर पड़ी हों अथवा यह भी सम्भव है कि जब आर्या सीता सिद्धसेवित आकाशमार्ग से ले जायी जाती रही हों, उस समय समुद्र को देखकर भय के मारे उनका हृदय ही फटकर नीचे गिर पड़ा हो।'
‘अथवा यह भी मालूम होता है कि रावण के प्रबल वेग और उसकी भुजाओं के दृढ़ बन्धन से पीड़ित होकर विशाललोचना आर्या सीता ने अपने प्राणों का परित्याग कर दिया है। ऐसा भी हो सकता है कि जिस समय रावण उन्हें समुद्र के ऊपर होकर ला रहा हो, उस समय जनककुमारी सीता छटपटाकर समुद्र में गिर पड़ी हों। अवश्य ऐसा ही हुआ होगा। अथवा ऐसा तो नहीं हुआ कि अपने शील की रक्षा में तत्पर हुई किसी सहायक बन्धु की सहायता से वञ्चित तपस्विनी माता सीता को इस नीच रावण ने ही खा लिया हो अथवा मन में दुष्ट भावना रखने वाली राक्षसराज रावण की पत्नियों ने ही कजरारे नेत्रों वाली साध्वी सीता को अपना आहार बना लिया होगा।'
'हाय! श्रीरामचन्द्रजी के पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर तथा प्रफुल्ल कमलदल के सदृश नेत्र वाले मुख का चिन्तन करती हुई दयनीया माता सीता इस संसार से चल बसीं। हा राम! हा लक्ष्मण! हा अयोध्यापुरी ! इस प्रकार पुकार - पुकारकर बहुत विलाप करके मिथिलेशकुमारी विदेहनन्दिनी सीता ने अपने शरीर को त्याग दिया होगा। अथवा मेरी समझ में यह आता है कि वे रावण के ही किसी गुप्त गृह में छिपाकर रखी गयी हैं। हाय! वहाँ वह बाला पींजरे में बन्द हुई मैना की तरह बारम्बार आर्तनाद करती होगी। जो जनक के कुल में उत्पन्न हुई हैं और श्रीरामचन्द्रजी की धर्मपत्नी हैं, वे नील कमल के से नेत्रों वाली सुमध्यमा माता सीता रावण के अधीन कैसे हो सकती हैं?'
‘जनककिशोरी सीता चाहे गुप्त गृह में अदृश्य करके रखी गयी हों, चाहे समुद्र में गिरकर प्राणों से हाथ धो बैठी हों अथवा श्रीरामचन्द्रजी के विरह का कष्ट न सह सकने के कारण उन्होंने मृत्यु की शरण ली हो, किसी भी दशा में श्रीरामचन्द्रजी को इस बात की सूचना देना उचित न होगा; क्योंकि वे अपनी पत्नी को बहुत प्रेम करते हैं। इस समाचार के बताने में भी दोष है और न बताने में भी दोष की सम्भावना है, ऐसी दशा में किस उपाय से काम लेना चाहिये ? मुझे तो बताना और न बताना - दोनों ही दुष्कर प्रतीत होते हैं। ऐसी दशा में जब कोई भी कार्य करना दुष्कर प्रतीत होता है, तब मेरे लिये इस समय के अनुसार क्या करना उचित होगा?'
इन्हीं बातों पर हनुमानजी बारम्बार विचार करने लगे।
