भाग-१०(10) हनुमानजी का मन्दोदरी को सीता समझकर प्रसन्न होना, वह सीता नहीं है - ऐसा निश्चय होने पर हनुमानजी का पुन: अन्त: पुर में और उसकी पान भूमि में सीता का पता लगाना, उनके मन में धर्मलोप की आशंका और स्वत: उसका निवारण होना

 


राक्षसराज रावण के सोते समय वह सुन्दर पलंग उसी प्रकार शोभा पा रहा था, जैसे गन्धहस्ती के शयन करने पर विशाल प्रस्रवणगिरि सुशोभित हो रहा हो। उन्होंने महाकाय राक्षसराज रावण की फैलायी हुई दो भुजाएँ देखीं, जो सोने के बाजूबंद से विभूषित हो इन्द्रध्वज के समान जान पड़ती थीं। युद्ध काल में उन भुजाओं पर ऐरावत हाथी के दाँतों के अग्रभाग से जो प्रहार किये गये थे, उनके आघात का चिह्न बन गया था। उन भुजाओं के मूल भाग या कंधे बहुत मोटे थे और उन पर वज्र द्वारा किये गये आघात के भी चिह्न दिखायी देते थे। भगवान् विष्णु के चक्र से भी किसी समय वे भुजाएँ क्षत-विक्षत हो चुकी थीं। 

(यहाँ शयनागार में सोये हुए रावण के एक ही मुख और दो ही बाँहों का वर्णन आया है। इससे जान पड़ता है कि वह साधारण स्थिति में इसी तरह रहता था। युद्ध आदि के विशेष अवसरों पर ही वह स्वेच्छा पूर्वक दस मुख और बीस भुजाओं से संयुक्त होता था।)

सुन्दरी युवतियाँ धीरे-धीरे उन बाँहों को दबाती थीं। उन पर उत्तम गन्ध-द्रव्य का लेप हुआ था। वे यक्ष, नाग, गन्धर्व, देवता और दानव सभी को युद्ध में रुलाने वाली थीं। कपिवर हनुमान् ने पलंग पर पड़ी हुई उन दोनों भुजाओं को देखा। वे मन्दराचल की गुफा में सोये हुए दो रोष भरे अजगरों के समान जान पड़ती थीं। उन बड़ी-बड़ी और गोलाकार दो भुजाओं से युक्त पर्वताकार राक्षसराज रावण दो शिखरों से संयुक्त मन्दराचल के समान शोभा पा रहा था। वहाँ सोये हुए राक्षसराज रावण के विशाल मुख से आम और नागकेसर की सुगन्ध से मिश्रित, मौलसिरी के सुवास से सुवासित और उत्तम अन्नरस से संयुक्त तथा मधुपान की गन्ध से मिली हुई जो सौरभयुक्त साँस निकल रही थी, वह उस सारे घर को सुगन्ध से परिपूर्ण-सा कर देती थी। 

उसका कुण्डल से प्रकाशमान मुखारविन्द अपने स्थान से हटे हुए तथा मुक्तामणि से जटित होने के कारण विचित्र आभा वाले सुवर्णमय मुकुट से और भी उद्भासित हो रहा था। उसकी छाती लाल चन्दन से चर्चित हार से सुशोभित, उभरी हुई तथा लंबी-चौड़ी थी। उसके द्वारा उस राक्षसराज के सम्पूर्ण शरीर की बड़ी शोभा हो रही थी। उसकी आँखें लाल थीं। उसकी कटि के नीचे का भाग ढीले-ढाले श्वेत रेशमी वस्त्र से ढका हुआ था तथा वह पीले रंग की बहुमूल्य रेशमी चादर ओढ़े हुए था। पत्नियों के प्रेमी उस महाकाय राक्षसराज के घर में हनुमानजी ने उसकी पत्नियों को भी देखा, जो उसके चरणों के आस-पास ही सो रही थीं। 

वानरयूथपति हनुमानजी ने देखा, उन रावणपत्नियों के मुख चन्द्रमा के समान प्रकाशमान थे। वे सुन्दर कुण्डलों से विभूषित थीं तथा ऐसे फूलों के हार पहने हुए थीं, जो कभी मुरझाते नहीं थे। वे नाचने और बाजे बजाने में निपुण थीं, राक्षसराज रावण की बाँहों और अंक में स्थान पाने वाली थीं तथा सुन्दर आभूषण धारण किये हुए थीं। कपिवर हनुमान् ने उन सबको वहाँ सोती देखा। उन्होंने उन सुन्दरियों के कानों के समीप हीरे तथा नीलम जड़े हुए सोने के कुण्डल और बाजूबंद देखे। ललित कुण्डलों से अलंकृत तथा चन्द्रमा के समान मनोहर उनके सुन्दर मुखों से वह विमानाकार पर्यङ्क तारिकाओं से मण्डित आकाश की भाँति सुशोभित हो रहा था। 

जैसे कामिनियाँ अपने चाहने वाले कामुकों को छाती से लगाकर सोती हैं, उसी प्रकार कितनी ही सुन्दरियाँ विचित्र-विचित्र वाद्यों का आलिंगन करके सो गयी थीं। उन सबकी शय्याओं से पृथक् एकान्त में बिछी हुई सुन्दर शय्या पर सोयी हुई एक रूपवती युवती को वहाँ हनुमानजी ने देखा। वह मोती और मणियों से जड़े हुए आभूषणों से भलीभाँति विभूषित थी और अपनी शोभा से उस उत्तम भवन को विभूषित-सा कर रही थी। 

वह गोरे रंग की थी। उसकी अंगकान्ति सुवर्ण के समान दमक रही थी। वह रावण की प्रियतमा और उसके अन्त:पुर की स्वामिनी थी। उसका नाम मन्दोदरी था। वह अपने मनोहर रूप से सुशोभित हो रही थी। 

वही वहाँ सो रही थी। हनुमानजी ने उसी को देखा। रूप और यौवन की सम्पत्ति से युक्त और वस्त्राभूषणों से विभूषित मन्दोदरी को देखकर महाबाहु पवनकुमार ने अनुमान किया कि ये ही सीताजी हैं। फिर तो ये वानरयूथपति हनुमान् महान् हर्ष से युक्त हो आनन्दमग्न हो गये। वे अपनी पूँछ को पटकने और चूमने लगे। अपनी वानरों- जैसी प्रकृति का प्रदर्शन करते हुए आनन्दित होने, खेलने और गाने लगे, इधर-उधर आने-जाने लगे। वे कभी खंभों पर चढ़ जाते और कभी पृथ्वी पर कूद पड़ते थे। फिर उस समय इस विचार को छोड़कर महाकपि हनुमानजी अपनी स्वाभाविक स्थिति में स्थित हुए और वे सीताजी के विषय में दूसरे प्रकार की चिन्ता करने लगे। 

उन्होंने सोचा - भामिनी सीता श्रीरामचन्द्रजी से बिछुड़ गयी हैं। इस दशा में वे न तो सो सकती हैं, न भोजन कर सकती हैं, न श्रृंगार एवं अलंकार धारण कर सकती हैं, फिर मदिरापान का सेवन तो किसी प्रकार भी नहीं कर सकतीं। वे किसी दूसरे पुरुष के पास, वह देवताओं का भी ईश्वर क्यों न हो, नहीं जा सकतीं। देवताओं में भी कोई ऐसा नहीं है जो श्रीरामचन्द्रजी की समानता कर सके। अतः अवश्य ही यह सीता माता नहीं, कोई दूसरी स्त्री है। 

ऐसा निश्चय करके वे कपिश्रेष्ठ सीताजी के दर्शन के लिये उत्सुक हो पुन: वहाँ की मधुशाला में विचरने लगे। वहाँ कोई स्त्रियाँ क्रीड़ा करने से थकी हुई थीं तो कोई गीत गाने से। दूसरी नृत्य करके थक गयी थीं और कितनी ही स्त्रियाँ अधिक मद्यपान करके अचेत हो रही थीं। बहुत-सी स्त्रियाँ ढोल, मृदंग और चेलिका नामक वाद्यों पर अपने अंगों को टेककर सो गयी थीं तथा दूसरी महिलाएँ अच्छे-अच्छे बिछौनों पर सोयी हुई थीं। वानरयूथपति हनुमानजी ने उस पानभूमि को ऐसी सहस्रों रमणियों से संयुक्त देखा, जो भाँति-भाँति के आभूषणों से विभूषित, रूप लावण्य की चर्चा करने वाली, गीत के समुचित अभिप्राय को अपनी वाणी द्वारा प्रकट करने वाली, देश और काल को समझने वाली, उचित बात बोलने वाली और रति-क्रीड़ा में अधिक भाग लेने वाली थीं। दूसरे स्थान पर भी उन्होंने ऐसी सहस्रों सुन्दरी युवतियों को सोते देखा, जो आपस में रूप-सौन्दर्य की चर्चा करती हुई लेट रही थीं। 

वानरयूथपति पवनकुमार ने ऐसी बहुत-सी स्त्रियों को देखा, जो देश-काल को जानने वाली, उचित बात कहने वाली तथा रतिक्रीड़ा के पश्चात् गाढ़ निद्रा में सोयी हुई थीं। उस महाकाय राक्षसराज के भवन में कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने वह पानभूमि देखी, जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगों से सम्पन्न थी। उस मधुशाला में अलग-अलग मृगों, भैंसों और सूअरों के मांस रखे गये थे, जिन्हें हनुमानजी ने देखा। वानरसिंह हनुमान् ने वहाँ सोने के बड़े-बड़े पात्रों में मोर, मुर्गे, सूअर, गेंडा, साही, हिरण, तथा मयूरों के मांस देखे, जो दही और नमक मिलाकर रखे गये थे। वे अभी खाये नहीं गये थे। कृकल नामक पक्षी, भाँति-भाँति के बकरे, खरगोश, आधे खाये हुए भैंसे, एकशल्य नामक मत्स्य और भेड़ें- ये सब-के-सब राँध-पकाकर रखे हुए थे। इनके साथ अनेक प्रकार की चटनियाँ भी थीं। भाँति-भाँति के पेय तथा भक्ष्य पदार्थ भी विद्यमान थे। जीभ की शिथिलता दूर करने के लिये खटाई और नमक के साथ भाँति-भाँति के राग और खाण्डव भी रखे गये थे। बहुमूल्य बड़े-बड़े नूपुर और बाजूबंद जहाँ-तहाँ पड़े हुए थे। मद्यपान के पात्र इधर-उधर लुढ़काये हुए थे। भाँति-भाँति के फल भी बिखरे पड़े थे। 

वहाँ अनेक स्थानों पर रखे हुए नाना प्रकार के फूलों, सुवर्णमय कलशों, स्फटिकमणि के पात्रों तथा जाम्बूनद के बने हुए अन्यान्य कमण्डलुओं से व्याप्त हुई वह पानभूमि बड़ी शोभा पा रही थी। चाँदी और सोने के घड़ों में, जहाँ श्रेष्ठ पेय पदार्थ रखे थे, उस पानभूमि को कपिवर हनुमानजी ने वहाँ अच्छी तरह घूम-घूमकर देखा। महाकपि पवनकुमार ने देखा, वहाँ मदिरा से भरे हुए सोने और मणियों के भिन्न-भिन्न पात्र रखे गये हैं। किसी घड़े में आधी मदिरा शेष थी तो किसी घड़े की सारी की सारी पी ली गयी थी तथा किन्हीं - किन्हीं घड़ों में रखे हुए मद्य सर्वथा पीये नहीं गये थे। हनुमानजी ने उन सबको देखा। इस प्रकार महातेजस्वी कपिवर हनुमान् ने रावण का सारा अन्त: पुर छान डाला तो भी वहाँ उन्हें जनकनन्दिनी सीता का दर्शन नहीं हुआ। 

उन सोती हुई स्त्रियों को देखते-देखते महाकपि हनुमान् धर्म के भय से शंकित हो उठे। उनके हृदय में बड़ा भारी संदेह उपस्थित हो गया। वे सोचने लगे कि ‘इस तरह गाढ़ निद्रा में सोयी हुई परायी स्त्रियों को देखना अच्छा नहीं है। यह तो मेरे धर्म का अत्यन्त विनाश कर डालेगा। मेरी दृष्टि अब तक कभी परायी स्त्रियों पर नहीं पड़ी थी। यहीं आने पर मुझे परायी स्त्रियों का अपहरण करने वाले इस पापी रावण का भी दर्शन हुआ है (ऐसे पापी को देखना भी धर्म का लोप करने वाला होता है)। 

तदनन्तर मनस्वी हनुमानजी के मन में एक दूसरी विचारधारा उत्पन्न हुई। उनका चित्त अपने लक्ष्य में सुस्थिर था; अत: यह नयी विचारधारा उन्हें अपने कर्तव्य का ही निश्चय कराने वाली थी। वे सोचने लगे - इसमें संदेह नहीं कि रावण की स्त्रियाँ निःशंक सो रही थीं और उसी अवस्था में मैंने उन सबको अच्छी तरह देखा है, तथापि मेरे मन में कोई विकार नहीं उत्पन्न हुआ है। सम्पूर्ण इन्द्रियों को शुभ और अशुभ अवस्थाओं में लगने की प्रेरणा देने में मन ही कारण है; किंतु मेरा वह मन पूर्णत: स्थिर है (उसका कहीं राग या द्वेष नहीं है; इसलिये मेरा यह परस्त्री-दर्शन धर्म का लोप करने वाला नहीं हो सकता)। 

'विदेहह्नन्दिनी सीता को दूसरी जगह मैं ढूँढ भी तो नहीं सकता था; क्योंकि स्त्रियों को ढूँढते समय उन्हें स्त्रियों के ही बीच में देखा जाता है। जिस जीव की जो जाति होती है, उसी में उसे खोजा जाता है। खोयी हुई युवती स्त्री को हिरणों के बीच में नहीं ढूंढा जा सकता है। अत: मैंने रावण के इस सारे अन्तःपुर में शुद्ध हृदय से ही अन्वेषण किया है; किंतु यहाँ जानकीजी नहीं दिखायी देती हैं।' 

अन्तःपुर का निरीक्षण करते हुए पराक्रमी हनुमान् ने देवताओं, गन्धर्वों और नागों की कन्याओं को वहाँ देखा, किंतु जनकनन्दिनी सीता को नहीं देखा। दूसरी सुन्दरियों को देखते हुए वीर वानर हनुमान् ने जब वहाँ सीता को नहीं देखा, तब वे वहाँ से हटकर अन्यत्र जाने को उद्यत हुए। फिर तो श्रीमान् पवनकुमार ने उस पानभूमि को छोड़कर अन्य सब स्थानों में उन्हें बड़े यत्न का आश्रय लेकर खोजना आरम्भ किया। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-१०(10) समाप्त ! 

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