भाग-९(9) सुग्रीव का श्रीराम को समझाना तथा श्रीराम का सुग्रीव को उनकी कार्य सिद्धि का विश्वास दिलाना

 


श्रीराम ने शोक से पीड़ित होकर जब ऐसी बातें कहीं, तब वानरराज सुग्रीव की आँखों में आँसू भर आये और वे हाथ जोड़कर अश्रुगद्गद कण्ठ से इस प्रकार बोले - प्रभो! नीच कुल में उत्पन्न हुए उस पापात्मा राक्षस का गुप्त निवासस्थान कहाँ है, उसमें कितनी शक्ति है, उसका पराक्रम कैसा है अथवा वह किस वंशका है - इन सब बातों को मैं सर्वथा नहीं जानता। परंतु आपके सामने सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि मैं ऐसा यत्न करूँगा कि जिससे मिथिलेशकुमारी सीता आपको मिल जायँ, इसलिये शत्रुदमन वीर! आप शोक का त्याग करें। 

‘मैं आपके संतोष के लिये सैनिकों सहित रावण का वध करके अपना ऐसा पुरुषार्थ प्रकट करूँगा, जिससे आप शीघ्र ही प्रसन्न हो जायँगे। इस तरह मन में व्याकुलता लाना व्यर्थ है। आपके हृदय में स्वाभाविक रूप से जो धैर्य है, उसका स्मरण कीजिये। इस तरह बुद्धि और विचार को हलका बना देना- उसकी सहज गम्भीरता को खो देना आप-जैसे महापुरुषों के लिये उचित नहीं है।' 

'मुझे भी पत्नी के विरह का महान् कष्ट प्राप्त हुआ है, परंतु मैं इस तरह शोक नहीं करता और न धैर्य को ही छोड़ता हूँ। यद्यपि मैं एक साधारण वानर हूँ तथापि अपनी पत्नी के लिये निरन्तर शोक नहीं करता हूँ। फिर आप जैसे महात्मा, सुशिक्षित और धैर्यवान् महापुरुष शोक न करें इसके लिये तो कहना ही क्या है। आपको चाहिये कि धैर्य धारण करके इन गिरते हुए आँसुओं को रोकें। सात्त्विक पुरुषों की मर्यादा और धैर्य का परित्याग न करें।' 

‘(आत्मीयजनों के वियोग आदि से होनेवाले) शोक में, आर्थिक संकट में अथवा प्राणान्तकारी भय उपस्थित होने पर जो अपनी बुद्धि से दु:ख निवारण के उपाय का विचार करते हुए धैर्य धारण करता है, वह कष्ट नहीं भोगता है। जो मूढ़ मानव सदा घबराहट में ही पड़ा रहता है, वह पानी में भार से दबी हुई नौका के समान शोक में विवश होकर डूब जाता है। मैं हाथ जोड़ता हूँ। प्रेमपूर्वक अनुरोध करता हूँ कि आप प्रसन्न हों और पुरुषार्थ का आश्रय लें। शोक को अपने ऊपर प्रभाव डालने का अवसर न दें।' 

‘जो शोकका अनुसरण करते हैं, उन्हें सुख नहीं मिलता है और उनका तेज भी क्षीण हो जाता है; अत: आप शोक न करें। राजेन्द्र! शोक से आक्रान्त हुए मनुष्य के जीवन में (उसके प्राणों की रक्षा में) भी संशय उपस्थित हो जाता है। इसलिये आप शोक को त्याग दें और केवल धैर्य का आश्रय लें। मैं मित्रता के नाते हित की सलाह देता हूँ। आपको उपदेश नहीं दे रहा हूँ। आप मेरी मैत्री का आदर करते हुए कदापि शोक न करें।' 

सुग्रीव ने जब मधुर वाणी में इस प्रकार सान्त्वना दी, तब श्रीरघुनाथजी ने आँसुओं से भीगे हुए अपने मुख को वस्त्र के छोर से पोंछ लिया। 

सुग्रीव के वचनसे शोक का परित्याग करके स्वस्थचित्त हो ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीराम ने मित्रवर सुग्रीव को हृदय से लगा लिया और इस प्रकार कहा - सुग्रीव! एक स्नेही और हितैषी मित्र को जो कुछ करना चाहिये, वही तुमने किया है। तुम्हारा कार्य सर्वथा उचित और तुम्हारे योग्य है। सखे! तुम्हारे आश्वासन से मेरी सारी चिन्ता जाती रही। अब मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ। तुम्हारे-जैसे 'बन्धु का -विशेषत: ऐसे संकट के समय मिलना कठिन होता है। परंतु तुम्हें मिथिलेशकुमारी सीता तथा रौद्ररूप धारी दुरात्मा राक्षस रावण का पता लगाने के लिये प्रयत्न करना चाहिये। साथ ही मुझे भी इस समय तुम्हारे लिये जो कुछ करना आवश्यक हो, उसे बिना किसी सङ्कोच के बताओ। जैसे वर्षाकाल में अच्छे खेत में बोया हुआ बीज अवश्य फल देता है, उसी प्रकार तुम्हारा सारा मनोरथ सफल होगा।  

‘वानरश्रेष्ठ! मैंने जो अभिमानपूर्वक यह वाली के वध आदि करने की बात कही है, इसे तुम ठीक ही समझो। मैंने पहले भी कभी झूठी बात नहीं कही है और भविष्य में भी कभी असत्य नहीं बोलूँगा । इस समय जो कुछ कहा है, उसे पूर्ण करने के लिये प्रतिज्ञा करता हूँ और तुम्हें विश्वास दिलाने के लिये सत्य की ही शपथ खाता हूँ।'  

श्रीरघुनाथजी की बात, विशेषत: उनकी प्रतिज्ञा सुनकर अपने वानर - मन्त्रियों सहित सुग्रीव को बड़ी प्रसन्नता हुई। इस प्रकार एकान्त में एक-दूसरे के निकट बैठे हुए वे दोनों नर और वानर (श्रीराम और सुग्रीव) ने परस्पर सुख और दुःख की बातें कहीं, जो एक-दूसरे के लिये अनुरूप थीं। राजाधिराज महाराज श्रीरघुनाथजी की बात सुनकर वानर वीरों के प्रधान विद्वान् सुग्रीव ने उस समय मन-ही- मन अपने कार्य को सिद्ध हुआ ही माना। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-९(9) समाप्त ! 

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