सुग्रीव ने पुनः प्रसन्नतापूर्वक रघुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी से कहा – श्रीराम ! मेरे मन्त्रियों में श्रेष्ठ सचिव ये हनुमानजी आपके विषय में वह सारा वृत्तान्त बता चुके हैं, जिसके कारण आपको इस निर्जन वन में आना पड़ा है। अपने भाई लक्ष्मण के साथ जब आप वन में निवास करते थे, उस समय राक्षस रावण ने आपकी पत्नी मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनी सीता को हर लिया। उस वेला में आप उनसे अलग थे और बुद्धिमान् लक्ष्मण भी उन्हें अकेली छोड़कर चले गये थे। राक्षस इसी अवसर की प्रतीक्षा में था। उसने गीध जटायु का वध करके रोती हुई सीता का अपहरण किया है। इस प्रकार उस राक्षस ने आपको पत्नी वियोग के कष्ट में डाल दिया है।परंतु इस पत्नी वियोग के दुःख से आप शीघ्र ही मुक्त हो जायँगे। मैं राक्षस द्वारा हरी गयी वेदवाणी के समान आप की पत्नी को वापस ला दूँगा। शत्रुदमन श्रीराम ! आपकी भार्या सीता पाताल में हों या आकाश में, मैं उन्हें ढूँढ़ लाकर आपकी सेवा में समर्पित कर दूँगा।
‘रघुनन्दन! आप मेरी इस बात को सत्य मानें। महाबाहो ! आपकी पत्नी विष मिलाये हुए भोजन की भाँति दूसरों के लिये अग्राह्य है। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी उन्हें पचा नहीं सकते। आप शोक त्याग दीजिये। मैं आपकी प्राणवल्लभा को अवश्य ला दूँगा। एक दिन मैंने देखा, भयंकर कर्म करने वाला कोई राक्षस किसी स्त्री को लिये जा रहा है। मैं अनुमान से समझता हूँ, वे मिथिलेशकुमारी सीता ही रही होंगी, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि वे टूटे हुए स्वर में 'हा राम ! हा राम ! हा लक्ष्मण!' पुकारती हुई रो रही थीं तथा रावण की कैद में नागराज की वधू (नागिन ) की भाँति छटपटाती हुई प्रकाशित हो रही थीं।
‘चार मन्त्रियों सहित पाँचवाँ मैं इस शैल शिखर पर बैठा हुआ था। मुझे देखकर देवी सीता ने अपनी चादर और कई सुन्दर आभूषण ऊपर से गिराये। रघुनन्दन! वे सब वस्तुएँ हमलोगों ने लेकर रख ली हैं। मैं अभी उन्हें लाता हूँ, आप उन्हें पहचान सकते हैं।'
तब श्रीराम ने यह प्रिय संवाद सुनाने वाले सुग्रीव से कहा - सखे! शीघ्र ले आओ, क्यों विलम्ब करते हो?
उनके ऐसा कहने पर सुग्रीव शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय करने की इच्छा से पर्वत की एक गहन गुफा में गये और चादर तथा वे आभूषण लेकर निकल आये। बाहर आकर वानरराज ने 'लीजिये, यह देखिये' ऐसा कहकर श्रीराम को वे सारे आभूषण दिखाये।
उन वस्त्र और सुन्दर आभूषणों को लेकर श्रीरामचन्द्रजी कुहासेसे ढके हुए चन्द्रमा की भाँति आँसुओं से अवरुद्ध हो गये। सीता स्नेहवश बहते हुए आँसुओं से उनका मुख और वक्ष:स्थल भीगने लगे। वे ' हा प्रिये!' ऐसा कहकर रोने लगे और धैर्य छोड़कर पृथ्वी पर गिर पड़े। उन उत्तम आभूषणों को बारम्बार हृदय से लगाकर वे बिल में बैठे हुए रोष में भरे सर्प की भाँति जोर-जोर से साँस लेने लगे। उनके आँसुओं का वेग रुकता ही नहीं था।
अपने पास खड़े हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मण की ओर देखकर श्रीराम दीनभाव से विलाप करते हुए बोले - लक्ष्मण! देखो, राक्षस के द्वारा हरी जाती हुई विदेहनन्दिनी सीता ने यह चादर और ये गहने अपने शरीर से उतारकर पृथ्वी पर डाल दिये थे। निशाचर के द्वारा अपहृत होती हुई सीता के द्वारा त्यागे गये ये आभूषण निश्चय ही घास वाली भूमि पर गिरे होंगे; क्योंकि इनका रूप ज्यों-का-त्यों दिखायी देता है - ये टूटे-फूटे नहीं हैं।
श्रीराम के ऐसा कहने पर लक्ष्मण बोले - भैया! मैं इन बाजूबंदों को तो नहीं जानता और न इन कुण्डलों को ही समझ पाता हूँ कि किसके हैं; परंतु प्रतिदिन भाभी के चरणों में प्रणाम करने के कारण मैं इन दोनों नूपुरों को अवश्य पहचानता हूँ।
तब श्रीरघुनाथजी सुग्रीव से इस प्रकार बोले - सुग्रीव! तुमने तो देखा है, वह भयंकर रूपधारी राक्षस मेरी प्राणप्यारी सीता को किस दिशा की ओर ले गया है, यह बताओ। मुझे महान् संकट देने वाला वह राक्षस कहाँ रहता है? मैं केवल उसी के अपराध के कारण समस्त राक्षसों का विनाश कर डालूँगा। उस राक्षस ने मैथिली का अपहरण करके मेरा रोष बढ़ाकर निश्चय ही अपने जीवन का अन्त करने के लिये मौत का दरवाजा खोल दिया है। वानरराज! जिस निशाचर ने मुझे धोखे में डालकर मेरा अपमान करके मेरी प्रियतमा का वन से अपहरण किया है, वह मेरा घोर शत्रु है। तुम उसका पता बताओ। मैं अभी उसे यमराज के पास पहुँचाता हूँ।
