श्रीराम और लक्ष्मण को ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव के वास स्थान में बिठाकर हनुमानजी वहाँ से मलयपर्वत पर गये (जो ऋष्यमूक का ही एक शिखर है) और वहाँ वानर राज सुग्रीव को उन दोनों रघुवंशी वीरों का परिचय देते हुए इस प्रकार बोले - महाप्राज्ञ! जिनका पराक्रम अत्यन्त दृढ़ और अमोघ है, वे श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण के साथ पधारे हैं। इन श्रीराम का आविर्भाव इक्ष्वाकुकुल में हुआ है। ये महाराज दशरथ के पुत्र हैं और स्वधर्म पालन के लिये संसार में विख्यात हैं। अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये इस वन में इनका आगमन हुआ है। जिन्होंने राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान करके अग्निदेव को तृप्त किया था, ब्राह्मणों को बहुत-सी दक्षिणाएँ बाँटी थीं और लाखों गौएँ दान में दी थीं। जिन्होंने सत्यभाषणपूर्वक तप के द्वारा वसुधा का पालन किया था, उन्हीं महाराज दशरथ के पुत्र ये श्रीराम पिता द्वारा अपनी पत्नी कैकेयी के लिये दिये हुए वर का पालन करने के निमित्त इस वन में आये हैं।
'महात्मा श्रीराम मुनियों की भाँति नियम का पालन करते हुए दण्डकारण्य में निवास करते थे। एक दिन रावण ने आकर सूने आश्रम से इनकी पत्नी सीता का अपहरण कर लिया। उन्हीं की खोज में आपसे सहायता लेने के लिये ये आपकी शरण में आये हैं। ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण आपसे मित्रता करना चाहते हैं। आप चलकर इन्हें अपनावें और इनका यथोचित सत्कार करें; क्योंकि ये दोनों ही वीर हमलोगों के लिये परम पूजनीय हैं।'
हनुमानजी का यह वचन सुनकर वानरराज सुग्रीव स्वेच्छा से अत्यन्त दर्शनीय रूप धारण करके श्रीरघुनाथजी के पास आये और बड़े प्रेम से बोले - प्रभो! आप धर्म के विषय में भलीभाँति सुशिक्षित, परम तपस्वी और सब पर दया करने वाले हैं। पवनकुमार हनुमानजी ने मुझसे आपके यथार्थ गुणों का वर्णन किया है। भगवन्! मैं वानर हूँ और आप नर। मेरे साथ जो आप मैत्री करना चाहते हैं, इसमें मेरा ही सत्कार है और मुझे ही उत्तम लाभ प्राप्त हो रहा है। यदि मेरी मैत्री आपको पसंद हो तो मेरा यह हाथ फैला हुआ है। आप इसे अपने हाथ में ले लें और परस्पर मैत्री का अटूट सम्बन्ध बना रहे इसके लिये स्थिर मर्यादा बाँध दें।
सुग्रीव का यह सुन्दर वचन सुनकर भगवान् श्रीराम का चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने अपने हाथ से उनका हाथ पकड़कर दबाया और सौहार्द का आश्रय ले बड़े हर्ष के साथ शोकपीड़ित सुग्रीव को छाती से लगा लिया। (सुग्रीव के पास जाने से पूर्व हनुमानजी ने पुनः भिक्षुरूप धारण कर लिया था।) श्रीराम सुग्रीव की मैत्री के समय शत्रुदमन हनुमानजी ने भिक्षुरूप को त्यागकर अपना स्वाभाविक रूप धारण कर लिया और दो लकड़ियों को रगड़कर आग पैदा की।
तत्पश्चात् उस अग्नि को प्रज्वलित करके उन्होंने फूलों द्वारा अग्निदेव का सादर पूजन किया; फिर एकाग्रचित्त हो श्रीराम और सुग्रीव के बीच में साक्षी के रूप में उस अग्नि को प्रसन्नतापूर्वक स्थापित कर दिया। इसके बाद सुग्रीव और श्रीरामचन्द्रजी ने उस प्रज्वलित अग्नि की प्रदक्षिणा की और दोनों एक-दूसरे के मित्र बन गये। इससे उन वानर राज तथा श्रीरघुनाथजी दोनों के हृदय में बड़ी प्रसन्नता हुई। वे एक-दूसरे की ओर देखते हुए तृप्त नहीं होते थे।
उस समय सुग्रीव ने श्रीरामचन्द्रजी से प्रसन्नतापूर्वक कहा - आप मेरे प्रिय मित्र हैं। आज से हम दोनों का दुःख और सुख एक है।
यह कहकर सुग्रीव ने अधिक पत्ते और फूलों वाली शाल वृक्ष की एक शाखा तोड़ी और उसे बिछाकर वे श्रीरामचन्द्रजी के साथ उस पर बैठे। तदनन्तर पवनपुत्र हनुमान ने अत्यन्त प्रसन्न हो चन्दन-वृक्ष की एक डाली, जिसमें बहुत-से फूल लगे हुए थे, तोड़कर लक्ष्मण को बैठने के लिये दी।
इसके बाद हर्ष से भरे हुए सुग्रीव ने जिनके नेत्र हर्ष से खिल उठे थे, उस समय भगवान् श्रीराम से स्निग्ध मधुर वाणी में कहा - श्रीराम! मैं घर से निकाल दिया गया हूँ और भय से पीड़ित होकर यहाँ विचरता हूँ। मेरी पत्नी भी मुझसे छीन ली गयी। मैंने आतङ्कित होकर वन में इस दुर्गम पर्वत का आश्रय लिया है। रघुनन्दन! मेरे बड़े भाई वाली ने मुझे घर से निकालकर मेरे साथ वैर बाँध लिया है। उसी के त्रास और भय से उद्भान्तचित्त होकर मैं इस वन में निवास करता हूँ। महाभाग! वाली के भय से पीड़ित हुए मुझ सेवक को आप अभय-दान दीजिये। काकुत्स्थ! आपको ऐसा करना चाहिये, जिससे मेरे लिये किसी प्रकार का भय न रह जाय।
सुग्रीव के ऐसा कहने पर धर्म के ज्ञाता, धर्मवत्सल, ककुत्स्थकुलभूषण तेजस्वी श्रीराम ने हँसते हुए-से वहाँ सुग्रीव को इस प्रकार उत्तर दिया – महाकपे! मुझे मालूम है कि मित्र उपकार रूपी फल देने वाला होता है। मैं तुम्हारी पत्नी का अपहरण करने वाले वालीका वध कर दूँगा। मेरे तूणीर में संगृहीत हुए ये सूर्यतुल्य तेजस्वी बाण अमोघ हैं - इनका वार खाली नहीं जाता। ये बड़े वेगशाली हैं। इनमें कंक पक्षी परों के पंख लगे हुए हैं, जिनसे ये आच्छादित हैं। इनके अग्रभाग बड़े तीखे हैं और गाँठें भी सीधी हैं। ये रोष में भरे हुए सर्पों के समान छूटते हैं और इन्द्र के वज्र की भाँति भयंकर चोट करते हैं। उस दुराचारी वाली पर मेरे ये बाण अवश्य गिरेंगे। आज देखना, मैं अपने विषधर सर्पों के समान तीखे बाणों से मारकर वाली को पृथ्वी पर गिरा दूँगा। वह इन्द्र के वज्र से टूट-फूटकर गिरे हुए पर्वत के समान दिखायी देगा।
अपने लिये परम हितकर वह श्रीरघुनाथजी का वचन सुनकर सुग्रीव को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उत्तम वाणी में बोले – वीर! पुरुषसिंह! मैं आपकी कृपा से अपनी प्यारी पत्नी तथा राज्य को प्राप्त कर सकूँ, ऐसा यत्न कीजिये। नरदेव ! मेरा बड़ा भाई वैरी हो गया है। आप उसकी ऐसी अवस्था कर दें जिससे वह फिर मुझे मार न सके।
सुग्रीव और श्रीराम की इस प्रेमपूर्ण मैत्री के प्रसङ्ग में सीता के प्रफुल्ल कमल-जैसे, कपिराज वाली के सुवर्ण-जैसे तथा निशाचरों के प्रज्वलित अग्नि-जैसे बायें नेत्र एक साथ ही फड़कने लगे।
