श्रीरामजी की बात सुनकर तथा सुग्रीव के विषय में उनका सौम्यभाव जानकर और साथ ही यह समझकर कि इन्हें भी सुग्रीव से कोई आवश्यक काम है, हनुमानजी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने मन-ही-मन सुग्रीव का स्मरण किया - अब अवश्य ही महामना सुग्रीव को राज्य की प्राप्ति होने वाली है; क्योंकि ये महानुभाव किसी कार्य या प्रयोजन से यहाँ आये हैं और यह कार्य सुग्रीव के ही द्वारा सिद्ध होनेवाला है।
तत्पश्चात् बातचीत में कुशल वानरश्रेष्ठ हनुमानजी अत्यन्त हर्ष में भरकर श्रीरामचन्द्रजी से बोले - पम्पा-तटवर्ती कानन से सुशोभित यह वन भयंकर और दुर्गम है। इसमें नाना प्रकार के हिंसक जन्तु निवास करते हैं। आप अपने छोटे भाई के साथ यहाँ किसलिये आये हैं?'
हनुमानजी का यह वचन सुनकर श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण ने दशरथनन्दन महात्मा श्रीराम का इस प्रकार परिचय देना आरम्भ किया - विद्वन्! इस पृथ्वी पर दशरथ नाम से प्रसिद्ध जो धर्मानुरागी तेजस्वी राजा थे, वे सदा ही अपने धर्म के अनुसार चारों वर्णों की प्रजा का पालन करते थे। इस भूतल पर उनसे द्वेष रखने वाला कोई नहीं था और वे भी किसी से द्वेष नहीं रखते थे। वे समस्त प्राणियों पर दूसरे ब्रह्माजी के समान स्नेह रखते थे। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणा वाले अग्निष्टोम आदि यज्ञों का अनुष्ठान किया था। ये उन्हीं महाराज के ज्येष्ठ पुत्र हैं। लोग इन्हें श्रीराम कहते हैं।
‘ये सब प्राणियों को शरण देने वाले और पिता की आज्ञा का पालन करने वाले हैं। महाराज दशरथ के चारों पुत्रों में ये सबसे अधिक गुणवान् हैं। ये राजा के उत्तम लक्षणों से सम्पन्न हैं। जब इन्हें राज्य - सम्पत्ति से संयुक्त किया जा रहा था, उस समय कुछ ऐसा कारण आ पड़ा, जिससे ये राज्य से वञ्चित हो गये और वन में निवास करने के लिये मेरे साथ यहाँ आ गये। महाभाग! जैसे दिन का क्षय होने पर सायंकाल महातेजस्वी सूर्य अपने प्रभा के साथ अस्ताचल को जाते हैं, उसी प्रकार ये जितेन्द्रिय श्रीरघुनाथजी अपनी पत्नी सीता के साथ वन में आये थे।'
'मैं इनका छोटा भाई हूँ। मेरा नाम लक्ष्मण है। मैं अपने कृतज्ञ और बहुज्ञ भाई के गुणों से आकृष्ट होकर इनका दास हो गया हूँ। सम्पूर्ण भूतों के हित में मन लगाने वाले, सुख भोगने के योग्य, महापुरुषों द्वारा पूजनीय, ऐश्वर्य से हीन तथा वनवास में तत्पर मेरे भाई की पत्नी को इच्छानुसार रूप धारण करने वाले एक राक्षस ने सूने आश्रम से हर लिया। जिसने इनकी पत्नी का हरण किया है, वह राक्षस कौन है और कहाँ रहता है? इत्यादि बातों का ठीक-ठीक पता नहीं लग रहा है।'
'दनु (कबंध) नामक एक दैत्य था, जो शाप से राक्षसभाव को प्राप्त हुआ था। उसने सुग्रीव का नाम बताया और कहा - "वानरराज सुग्रीव सामर्थ्यशाली और महान् पराक्रमी हैं। वे आपकी पत्नी का अपहरण करने वाले राक्षस का पता लगा देंगे।" 'ऐसा कहकर तेज से प्रकाशित होता हुआ दनु स्वर्गलोक में पहुँचने के लिये आकाश में उड़ गया। आपके प्रश्न के अनुसार मैंने सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। मैं और श्रीराम दोनों ही सुग्रीव की शरण में आये हैं।'
‘ये पहले बहुत-से धन-वैभव का दान करके परम उत्तम यश प्राप्त कर चुके हैं। जो पूर्वकाल में सम्पूर्ण जगत के नाथ (संरक्षक) थे, वे आज सुग्रीव को अपना रक्षक बनाना चाहते हैं। सीता जिनकी पुत्रवधू है, जो शरणागत पालक और धर्मवत्सल रहे हैं, उन्हीं महाराज दशरथ के पुत्र शरणदाता श्रीराम आज सुग्रीव की शरण में आये हैं। जो मेरे धर्मात्मा बड़े भाई श्रीरघुनाथजी पहले सम्पूर्ण जगत को शरण देने वाले तथा शरणागतवत्सल रहे हैं, वे इस समय सुग्रीव की शरण में आये हैं।'
‘जिनके प्रसन्न होने पर सदा यह सारी प्रजा प्रसन्नता से खिल उठती थी, वे ही श्रीराम आज वानर राज सुग्रीव की प्रसन्नता चाहते हैं। जिन राजा दशरथ ने सदा अपने यहाँ आये हुए भूमण्डल के सर्वसद्गुणसम्पन्न समस्त राजाओं का निरन्तर सम्मान किया, उन्हीं के ये त्रिभुवनविख्यात ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम आज वानर राज सुग्रीव की शरण में आये हैं। श्रीराम शोक से अभिभूत और आर्त होकर शरण में आये हैं। यूथपतियों सहित सुग्रीव को इन पर कृपा करनी चाहिये।'
लक्ष्मण के मुख से श्रीराम का परिचय जानकर नेत्रों से आँसू बहाकर करुणा जनक स्वर में कुशल वक्ता हनुमानजी ने इस प्रकार कहा - जिस समय मैं अपने गुरुदेव भगवान सूर्य से अपने अंतिम चरण में शिक्षा प्राप्त कर चूका था, तभी उन्होंने मुझे आपके मिलन के बारे में बताया था। उस समय उन्होंने मुझसे कहा था कि एक समय अपनी भार्या कि खोज में जब श्रीराम आएँगे तब तुम्हारी भेंट उनसे होगी। प्रभु! उन्होंने मुझसे यह भी कहा था कि आप श्रीराम अमिट तेजस्वी, भक्तवत्सल, चराचर जगत के स्वामी श्रीमान नारायण हैं।
'हे दीनों के रक्षक! आपके दर्शन से मेरा जन्म सफल हो गया। मेरा जन्म केवल आपकी सेवा के लिए ही हुआ है फिर भी आपने अपने तुच्छ सेवक को कैसे नहीं पहचाना ? मैं तो एक जड़बुद्धि वानर हूँ जो आपके समक्ष अपने अहंकार जनित पांडित्य का प्रदर्शन कर रहा था। कदाचित इसी कारण आपने जानकर भी मुझे नहीं पहचाना। मेरे इस अपराध को क्षमा करें नाथ !'
प्रभु को पहचानकर हनुमान्जी उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर गिर पड़े (उन्होंने साष्टांग दंडवत् प्रणाम किया)। (शिवजी कहते हैं-) हे पार्वती! वह सुख वर्णन नहीं किया जा सकता। शरीर पुलकित है, मुख से वचन नहीं निकलता। वे प्रभु के सुंदर वेष की रचना देख रहे हैं! फिर धीरज धर कर स्तुति की। अपने नाथ को पहचान लेने से हृदय में हर्ष हो रहा है।
फिर हनुमान्जी ने कहा - हे स्वामी! मैं तो आपकी माया के वश भूला फिरता हूँ इसी से मैंने अपने स्वामी (आप) को नहीं पहचाना। एक तो मैं यों ही मंद हूँ, दूसरे मोह के वश में हूँ, तीसरे हृदय का कुटिल और अज्ञान हूँ, फिर हे दीनबंधु भगवान्! प्रभु (आप) ने भी मुझे भुला दिया!
'हे नाथ! यद्यपि मुझ में बहुत से अवगुण हैं, तथापि सेवक स्वामी की विस्मृति में न पड़े (आप उसे न भूल जाएँ)। हे नाथ! जीव आपकी माया से मोहित है। वह आप ही की कृपा से निस्तार पा सकता है।'
'उस पर हे रघुवीर! मैं आपकी दुहाई (शपथ) करके कहता हूँ कि मैं भजन-साधन कुछ नहीं जानता। सेवक स्वामी के और पुत्र माता के भरोसे निश्चिंत रहता है। प्रभु को सेवक का पालन-पोषण करते ही बनता है (करना ही पड़ता है)।
ऐसा कहकर हनुमान्जी अकुलाकर प्रभु के चरणों पर गिर पड़े, उन्होंने अपना असली शरीर प्रकट कर दिया। उनके हृदय में प्रेम छा गया। तब श्री रघुनाथजी ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया और अपने नेत्रों के जल से सींचकर शीतल किया।
फिर कहा - हे कपि! सुनो, मन में ग्लानि मत मानना (मन छोटा न करना)। तुम मुझे लक्ष्मण से भी दूने प्रिय हो। सब कोई मुझे समदर्शी कहते हैं (मेरे लिए न कोई प्रिय है न अप्रिय) पर मुझको सेवक प्रिय है, क्योंकि वह अनन्यगति होता है (मुझे छोड़कर उसको कोई दूसरा सहारा नहीं होता) और हे हनुमान्! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर (जड़-चेतन) जगत् मेरे स्वामी भगवान् का रूप है।
स्वामी को अनुकूल (प्रसन्न) देखकर पवन कुमार हनुमान्जी के हृदय में हर्ष छा गया और उनके सब दुःख जाते रहे। उन्होंने कहा - हे नाथ! वानरराज सुग्रीव को आप जैसे बुद्धिमान्, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय पुरुषों से मिलने की आवश्यकता थी। सौभाग्य की बात है कि आपने स्वयं ही दर्शन दे दिया। वे भी राज्य से भ्रष्ट हैं। बाली के साथ उनकी शत्रुता हो गयी है। उनकी स्त्री का भी बाली ने ही अपहरण कर लिया है तथा उस दुष्ट भाई ने उन्हें घर से निकाल दिया है, इसलिये वे अत्यन्त भयभीत होकर वन में निवास करते है। सूर्यनन्दन सुग्रीव माता सीता का पता लगाने में हमारे साथ स्वयं रहकर आप दोनों की पूर्ण सहायता करेंगे।
ऐसा कहकर हनुमानजी ने श्रीरघुनाथजी से स्निग्ध मधुर वाणी में कहा – 'अच्छा, अब हम लोग सुग्रीव के पास चलें।'
उस समय धर्मात्मा लक्ष्मण ने उपर्युक्त बात कहने वाले हनुमानजी का यथोचित सम्मान किया और श्रीरामचन्द्रजी से कहा – भैया रघुनन्दन! ये वानर श्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान् अत्यन्त हर्ष से भरकर जैसी बात कह रहे हैं, उससे जान पड़ता है कि सुग्रीव को भी आपसे कुछ काम है। ऐसी दशा में आप अपना कार्य सिद्ध हुआ ही समझें। इनके मुख की कान्ति स्पष्टतः प्रसन्न दिखायी देती है और ये हर्ष से उत्फुल्ल होकर बातचीत करते हैं। अत: मेरा विश्वास है कि पवनपुत्र वीर हनुमानजी झूठ नहीं बोलेंगे।
तदनन्तर परम बुद्धिमान् पवनपुत्र हनुमानजी उन दोनों रघुवंशी वीरों को साथ ले सुग्रीव से मिलने के लिये चले। कपिवर हनुमान उन दोनों वीरों को पीठ पर बिठाकर वहाँ से चल दिये। महान् यशस्वी तथा शुभ विचार वाले महापराक्रमी वे कपिवीर पवनकुमार कृतकृत्य से होकर अत्यन्त हर्ष में भर गये और श्रीराम-लक्ष्मण के साथ गिरिवर ऋष्यमूक पर जा पहुँचे।
