भाग-५(5) हनुमानजी का श्रीराम और लक्ष्मण से वन में आने का कारण पूछना और अपना तथा सुग्रीव का परिचय देना, श्रीराम का उनके वचनों की प्रशंसा करके लक्ष्मण को अपनी ओर से बात करने की आज्ञा देना

 


महात्मा सुग्रीव के कथन का तात्पर्य समझकर हनुमानजी ऋष्यमूक पर्वत से उस स्थान की ओर उछलते हुए चले, जहाँ वे दोनों रघुवंशी बन्धु विराजमान थे। पवनकुमार वानरवीर हनुमान ने यह सोचकर कि मेरे इस कपि रूप पर किसी का विश्वास नहीं जम सकता, अपने उस रूप का परित्याग करके भिक्षु (सामान्य तपस्वी) का रूप धारण कर लिया। तदनन्तर हनुमान ने विनीतभाव से उन दोनों रघुवंशी वीरों के पास जाकर उन्हें प्रणाम करके मन को अत्यन्त प्रिय लगने वाली मधुर वाणी में उनके साथ वार्तालाप आरम्भ किया। 

वानरशिरोमणि हनुमान ने पहले तो उन दोनों वीरों की यथोचित प्रशंसा की। फिर विधिवत् उनका पूजन (आदर) करके स्वच्छन्द रूप से मधुर वाणी में कहा - वीरो! आप दोनों सत्यपराक्रमी, राजर्षियों और देवताओं के समान प्रभावशाली, तपस्वी तथा कठोर व्रत का पालन करने वाले जान पड़ते हैं। आपके शरीर की कान्ति बड़ी सुन्दर है। आप दोनों इस वन्य प्रदेश में किसलिये आये हैं। वन में विचरने वाले मृगसमूहों तथा अन्य जीवों को भी त्रास देते पम्पासरोवर के तटवर्ती वृक्षों को सब ओर से देखते और इस सुन्दर जलवाली नदी - सरीखी पम्पा को सुशोभित करते हुए आप दोनों वेगशाली वीर कौन हैं? आपके अंगों की कान्ति सुवर्ण के समान प्रकाशित होती है। आप दोनों बड़े धैर्यशाली दिखायी देते हैं। आप दोनों के अङ्गों पर चीर वस्त्र शोभा पाता है। आप दोनों लंबी साँस खींच रहे हैं। आपकी भुजाएँ विशाल हैं। आप अपने प्रभाव से इस वन के प्राणियों को पीड़ा दे रहे हैं। बताइये, आपका क्या परिचय है ? 

'आप दोनों वीरों की दृष्टि सिंह के समान है। आपके बल और पराक्रम महान् हैं। इन्द्र-धनुष के समान महान् शरासन धारण करके आप शत्रुओं को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। आप कान्तिमान् तथा रूपवान् हैं। आप विशालकाय साँड़ के समान मन्दगति से चलते हैं। आप दोनों की भुजाएँ हाथी की सूँड़ के समान जान पड़ती हैं। आप मनुष्यों में श्रेष्ठ और परम तेजस्वी हैं।' 

‘आप दोनों की प्रभा से गिरिराज ऋष्यमूक जगमगा रहा है। आप लोग देवताओं के समान पराक्रमी और राज्य भोगने के योग्य हैं। भला, इस दुर्गम वनप्रदेश में आपका आगमन कैसे सम्भव हुआ। आपके नेत्र प्रफुल्ल कमल - दल के समान शोभा पाते हैं। आपमें वीरता भरी है। आप दोनों अपने मस्तक पर जटामण्डल धारण करते हैं और दोनों ही एक-दूसरे के समान हैं। वीरो! क्या आप देवलोक से यहाँ पधारे हैं?'

‘आप दोनों को देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमा और सूर्य स्वेच्छा से ही इस भूतल पर उतर आये हैं। आपके वक्ष:स्थल विशाल हैं। मनुष्य होकर भी आपके रूप देवताओं के तुल्य हैं। आपके कंधे सिंह के समान हैं। आपमें महान् उत्साह भरा हुआ है। आप दोनों मदमत्त साँड़ों के समान प्रतीत होते हैं। आपकी भुजाएँ विशाल, सुन्दर, गोल-गोल और परिघ के समान सुदृढ़ हैं। ये समस्त आभूषणों को धारण करने के योग्य हैं तो भी आपने इन्हें विभूषित क्यों नहीं किया है? मैं तो समझता हूँ कि आप दोनों समुद्रों और वनों से युक्त तथा विन्ध्य और मेरु आदि पर्वतों से विभूषित इस सारी पृथ्वी की रक्षा करने के योग्य हैं।' 

‘आपके ये दोनों धनुष विचित्र, चिकने तथा अद्भुत अनुलेपन से चित्रित हैं। इन्हें सुवर्ण से विभूषित किया गया है; अत: ये इन्द्र के वज्र के समान प्रकाशित हो रहे हैं। प्राणों का अन्त कर देने वाले सर्पों के समान भयंकर तथा प्रकाशमान तीखे बाणों से भरे हुए आप दोनों के तूणीर बड़े सुन्दर दिखायी देते हैं। आपके ये दोनों खड्ग बहुत बड़े और विस्तृत हैं। इन्हें पक्के सोने से विभूषित किया गया है। ये दोनों केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पों के समान शोभा पाते हैं।' 

‘वीरो! इस तरह मैं बारम्बार आपका परिचय पूछ रहा हूँ, आप लोग मुझे उत्तर क्यों नहीं दे रहे हैं? यहाँ सुग्रीव नामक एक श्रेष्ठ वानर रहते हैं, जो बड़े धर्मात्मा और वीर हैं। उनके भाई बाली ने उन्हें घर से निकाल दिया है; इसलिये वे अत्यन्त दु:खी होकर सारे जगत में मारे-मारे फिरते हैं। उन्हीं वानरशिरोमणियों के राजा महात्मा सुग्रीव के भेजने से मैं यहाँ आया हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं भी वानर जाति का ही हूँ।' 

'धर्मात्मा सुग्रीव आप दोनों से मित्रता करना चाहते हैं। मुझे आप लोग उन्हीं का मन्त्री समझें। मैं वायुदेवता का वानरजातीय पुत्र हूँ। मेरी जहाँ इच्छा हो, जा सकता हूँ और जैसा चाहूँ, रूप धारण कर सकता हूँ। इस समय सुग्रीव का प्रिय करने के लिये भिक्षु के रूप में अपने को छिपाकर मैं ऋष्यमूक पर्वत से यहाँ पर आया हूँ।' 

उन दोनों भाई वीरवर श्रीराम और लक्ष्मण से ऐसा कहकर बातचीत करने में कुशल तथा बात का मर्म समझने में निपुण हनुमान चुप हो गये; फिर कुछ न बोले। 

उनकी यह बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी का मुख प्रसन्नता से खिल उठा। वे अपने बगल में खड़े हुए छोटे भाई लक्ष्मण से इस प्रकार कहने लगे  - सुमित्रानन्दन ! ये महामनस्वी वानरराज सुग्रीव के सचिव हैं और उन्हीं के हित की इच्छा से यहाँ मेरे पास आये हैं। लक्ष्मण! इन शत्रुदमन सुग्रीव सचिव कपिवर हनुमान से, जो बात के मर्म को समझने वाले हैं, तुम स्नेहपूर्वक मीठी वाणी में बातचीत करो। जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली, जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया तथा जो सामवेद का विद्वान् नहीं है, वह इस प्रकार सुन्दर भाषा में वार्तालाप नहीं कर सकता। 

'निश्चय ही इन्होंने समूचे व्याकरण का कई बार स्वाध्याय किया है; क्योंकि बहुत सी बातें बोल जाने पर भी इनके मुँह से कोई अशुद्धि नहीं निकली। सम्भाषण के समय इनके मुख, नेत्र, ललाट, भौंह तथा अन्य सब अङ्गों से भी कोई दोष प्रकट हुआ हो, ऐसा कहीं ज्ञात नहीं हुआ। इन्होंने थोड़े में ही बड़ी स्पष्टता के साथ अपना अभिप्राय निवेदन किया है। उसे समझने में कहीं कोई संदेह नहीं हुआ है। रुक-रुककर अथवा शब्दों या अक्षरों को तोड़-मरोड़कर किसी ऐसे वाक्य का उच्चारण नहीं किया है, जो सुनने में कर्णकटु हो।' 

'इनकी वाणी हृदय में मध्यमारूप से स्थित है और कण्ठ से बैखरी रूप में प्रकट होती है, अत: बोलते समय इनकी आवाज न बहुत धीमी रही है न बहुत ऊँची। मध्यम स्वर में ही इन्होंने सब बातें कही हैं। ये संस्कार और क्रम से सम्पन्न, अद्भुत, अविलम्बित तथा हृदय को आनन्द प्रदान करने वाली कल्याणमयी वाणी का उच्चारण करते हैं।' 

'हृदय, कण्ठ और मूर्धा – इन तीनों स्थानों द्वारा स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होने वाली इनकी इस विचित्र वाणी को सुनकर किसका चित्त प्रसन्न न होगा। वध करने के लिये तलवार उठाये हुए शत्रु का हृदय भी इस अद्भुत वाणी से बदल सकता है। निष्पाप लक्ष्मण! जिस राजा के पास इनके समान दूत न हो, उसके कार्यों की सिद्धि कैसे हो सकती है। जिसके कार्यसाधक दूत ऐसे उत्तम गुणों से युक्त हों, उस राजा के सभी मनोरथ दूतों की बातचीत से ही सिद्ध हो जाते हैं। 

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर बातचीत की कला जानने वाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण बात का मर्म समझने वाले पवनकुमार सुग्रीव सचिव कपिवर हनुमान से इस प्रकार बोले – विद्वन्! महामना सुग्रीव के गुण हमें ज्ञात हो चुके हैं। हम दोनों भाई वानरराज सुग्रीव की ही खोज में यहाँ आये हैं। साधुशिरोमणि हनुमानजी ! आप सुग्रीव के कथनानुसार यहाँ आकर जो मैत्री की बात चला रहे हैं, वह हमें स्वीकार है। हम आपके कहने से ऐसा कर सकते हैं। 

लक्ष्मण के यह स्वीकृति सूचक निपुणतायुक्त वचन सुनकर पवनकुमार कपिवर हनुमान् बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सुग्रीव की विजय सिद्धि में मन लगाकर उस समय उन दोनों भाइयों के साथ उनकी मित्रता करने की इच्छा की 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-५(5) समाप्त ! 

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