महात्मा श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयों को श्रेष्ठ आयुध धारण किये वीर वेश में आते देख (ऋष्यमूक पर्वत पर बैठे हुए) सुग्रीव के मन में बड़ी शङ्का हुई। वे उद्विग्नचित्त होकर चारों दिशाओं की ओर देखने लगे। उस समय वानरशिरोमणि सुग्रीव किसी एक स्थान पर स्थिर न रह सके। महाबली श्रीराम और लक्ष्मण को देखते हुए सुग्रीव अपने मन को स्थिर न रख सके। उस समय अत्यन्त भयभीत हुए उन वानरराज का चित्त बहुत दुःखी हो गया।
सुग्रीव धर्मात्मा थे- उन्हें राजधर्म का ज्ञान था। उन्होंने मन्त्रियों के साथ विचार कर अपनी दुर्बलता और शत्रुपक्ष की प्रबलता का निश्चय किया। तत्पश्चात् वे समस्त वानरों के साथ अत्यन्त उद्विग्न हो उठे। वानरराज सुग्रीव के हृदय में बड़ा उद्वेग हो गया था।
वे श्रीराम और लक्ष्मण की ओर देखते हुए अपने मन्त्रियों से इस प्रकार बोले – निश्चय ही ये दोनों वीर बाली के भेजे हुए ही इस दुर्गम वन में विचरते हुए यहाँ आये हैं। इन्होंने छल से चीर वस्त्र धारण कर लिये हैं, जिससे हम इन्हें पहचान न सकें।
उधर सुग्रीव के सहायक दूसरे - दूसरे वानरों ने जब उन महाधनुर्धर श्रीराम और लक्ष्मण को देखा, तब वे उस पर्वततट से भागकर दूसरे उत्तम शिखर पर जा पहुँचे। वे यूथपति वानर शीघ्रतापूर्वक जाकर यूथपतियों के सरदार वानरशिरोमणि सुग्रीव को चारों ओर से घेरकर उनके पास खड़े हो गये। इस तरह एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर उछलते-कूदते और अपने वेग से उन पर्वत-शिखरों को प्रकम्पित करते हुए वे समस्त महाबली वानर एक मार्ग पर आ गये। उन सबने उछल कूदकर उस समय वहाँ दुर्गम स्थानों में स्थित हुए पुष्पशोभित बहुसंख्यक वृक्षों को तोड़ डाला था।
उस बेला में चारों ओर से उस महान् पर्वत पर उछलकर आते हुए वे श्रेष्ठ वानर वहाँ रहने वाले मृगों, बिलावों तथा व्याघ्रों को भयभीत करते हुए जा रहे थे। इस प्रकार सुग्रीव के सभी सचिव पर्वतराज ऋष्यमूक पर आ पहुँचे और एकाग्रचित्त हो उन वानरराज से मिलकर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये।
तदनन्तर बाली से बुराई की आशङ्का करके सुग्रीव को भयभीत देख बातचीत करने में कुशल हनुमानजी बोले – आप सब लोग बाली के कारण होने वाली इस भारी घबराहट को छोड़ दीजिये। यह मलय नामक श्रेष्ठ पर्वत है। यहाँ बाली से कोई भय नहीं है। वानरशिरोमणे! जिससे उद्विग्नचित्त होकर आप भागे हैं, उस क्रूर दिखायी देने वाले निर्दय बाली को मैं यहाँ नहीं देखता हूँ। अतः सौम्य! आपको अपने जिस पापाचारी बड़े भाई से भय प्राप्त हुआ है, वह दुष्टात्मा बाली यहाँ नहीं आ सकता; मुझे आपके भय का कोई कारण नहीं दिखायी देता।
'आश्चर्य है कि इस समय आपने अपनी वानरोचित चपलता को ही प्रकट किया है। वानरप्रवर! आपका चित्त चञ्चल है। इसलिये आप अपने को विचार-मार्ग पर स्थिर नहीं रख पाते हैं। बुद्धि और विज्ञान से सम्पन्न होकर आप दूसरों की चेष्टाओं के द्वारा उनका मनोभाव समझें और उसी के अनुसार सभी आवश्यक कार्य करें; क्योंकि जो राजा बुद्धि-बल का आश्रय नहीं लेता, वह सम्पूर्ण प्रजा पर शासन नहीं कर सकता।'
हनुमानजी के मुख से निकले हुए इन सभी श्रेष्ठ वचनों को सुनकर सुग्रीव ने उनसे बहुत ही उत्तम बात कही - इन दोनों वीरों की भुजाएँ लंबी और नेत्र बड़े-बड़े हैं। ये धनुष, बाण और तलवार धारण किये देवकुमारों के समान शोभा पा रहे हैं। इन दोनों को देखकर किसके मन में भय का संचार न होगा। मेरे मन में संदेह है कि ये दोनों श्रेष्ठ पुरुष बाली के ही भेजे हुए हैं; क्योंकि राजाओं के बहुत-से मित्र होते हैं। अत: उन पर विश्वास करना उचित नहीं है।
'प्राणिमात्र को छद्मवेष में विचरने वाले शत्रुओं को विशेषरूप से पहचानने की चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि वे दूसरों पर अपना विश्वास जमा लेते हैं, परंतु स्वयं किसी का विश्वास नहीं करते और अवसर पाते ही उन विश्वास पुरुषों पर ही प्रहार कर बैठते हैं। बाली इन सब कार्यों में बड़ा कुशल है। राजालोग बहुदर्शी होते हैं - वञ्चना के अनेक उपाय जानते हैं, इसीलिये शत्रुओं का विध्वंस कर डालते हैं। ऐसे शत्रुभूत राजाओं को प्राकृत वेशभूषा वाले मनुष्यों (गुप्तचरों) द्वारा जानने का प्रयत्न करना चाहिये।
'अतः कपिश्रेष्ठ! तुम भी एक साधारण पुरुष की भाँति यहाँ से जाओ और उनकी चेष्टाओं से, रूप से तथा बातचीत के तौर-तरीकों से उन दोनों का यथार्थ परिचय प्राप्त करो। उनके मनोभावों को समझो। यदि वे प्रसन्नचित्त जान पड़ें तो बारंबार मेरी प्रशंसा करके तथा मेरे अभिप्राय को सूचित करने वाली चेष्टाओं द्वारा मेरे प्रति उनका विश्वास उत्पन्न करो।'
'वानरशिरोमणे ! तुम मेरी ही ओर मुँह करके खड़ा होना और उन धनुर्धर वीरों से इस वन में प्रवेश करने का कारण पूछना। यदि उनका हृदय शुद्ध जान पड़े तो भी तरह-तरह की बातों और आकृति के द्वारा यह जानने की विशेष चेष्टा करनी चाहिये कि वे दोनों कोई दुर्भावना लेकर तो नहीं आये हैं।'
वानरराज सुग्रीव के इस प्रकार आदेश देने पर पवनकुमार हनुमानजी ने उस स्थान पर जाने का विचार किया, जहाँ श्रीराम और लक्ष्मण विद्यमान थे। अत्यन्त डरे हुए दुर्जय वानर सुग्रीव के उस वचन का आदर करके 'बहुत अच्छा कहकर' महानुभाव हनुमानजी जहाँ अत्यन्त बलशाली श्रीराम और लक्ष्मण थे, उस स्थान के लिये तत्काल चल दिये।
