भाग-३(3) लक्ष्मण का श्रीराम को समझाना तथा दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना


इस प्रकार महात्मा श्रीराम को अनाथ की भाँति विलाप करते देख भाई लक्ष्मण ने युक्तियुक्त एवं निर्दोष वाणी में कहा – पुरुषोत्तम श्रीराम ! आपका भला हो। आप अपने को सँभालिये। शोक न कीजिये। आप जैसे पुण्यात्मा पुरुषों की बुद्धि उत्साहशून्य नहीं होती। स्वजनों के अवश्यम्भावी वियोग का दुःख सभी को सहना पड़ता है, इस बात को स्मरण करके अपने प्रियजनों के प्रति अधिक स्नेह (आसक्ति) को त्याग दीजिये; क्योंकि जल आदि से भीगी हुई बत्ती भी अधिक स्नेह (तेल) में डुबो दी जाने पर जलने लगती है। 

‘तात रघुनन्दन! यदि रावण पाताल में या उससे भी अधिक दूर चला जाय तो भी वह अब किसी तरह जीवित नहीं रह सकता। पहले उस पापी राक्षस का पता लगाइये। फिर या तो वह भाभी सीता को वापस करेगा या अपने प्राणों से हाथ धो बैठेगा। रावण यदि माता सीता को साथ लेकर दिति के गर्भ में जाकर छिप जाय तो भी यदि मिथिलेशकुमारी को लौटा न देगा तो मैं वहाँ भी उसे मार डालूँगा। अत: आर्य! आप कल्याणकारी धैर्य को अपनाइये। वह दीनतापूर्ण विचार त्याग दीजिये। जिनका प्रयत्न और धन नष्ट हो गया है, वे पुरुष यदि उत्साहपूर्वक उद्योग न करें तो उन्हें उस अभीष्ट अर्थ की प्राप्ति नहीं हो सकती।  

‘भैया! उत्साह ही बलवान् होता है। उत्साह से बढ़कर दूसरा कोई बल नहीं है। उत्साही पुरुष के लिये संसार में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। जिनके हृदय में उत्साह होता है वे पुरुष कठिन से कठिन कार्य आ पड़ने पर हिम्मत नहीं हारते। हमलोग केवल उत्साह का आश्रय लेकर ही जनकनन्दिनी को प्राप्त कर सकते हैं। शोक को पीछे छोड़कर कामी के से व्यवहार का त्याग कीजिये। आप महात्मा एवं कृतात्मा (पवित्र अन्तःकरणवाले) हैं, किंतु इस समय अपने-आपको भूल गये हैं - अपने स्वरूप का स्मरण नहीं कर रहे हैं।' 

लक्ष्मण के इस प्रकार समझाने पर शोक से संतप्तचित्त हुए श्रीराम ने शोक और मोह का परित्याग करके धैर्य धारण किया। तदनन्तर व्यग्रतारहित (शान्तस्वरूप ) अचिन्त्य - पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी जिसके तटवर्ती वृक्ष वायु के झोंके खाकर झूम रहे थे, उस परम सुन्दर रमणीय पम्पासरोवर को लाँघकर आगे बढ़े। सीता के स्मरण से जिनका चित्त उद्विग्न हो गया था, अतएव जो दुःख में डूबे हुए थे, वे महात्मा श्रीराम लक्ष्मण की कही हुई बातों पर विचार करके सहसा सावधान हो गये और झरनों तथा कन्दराओं सहित उस सम्पूर्ण वन का निरीक्षण करते हुए वहाँ से आगे को प्रस्थित हुए। 

मतवाले हाथी के समान विलासपूर्ण गति से चलने वाले शान्तचित्त महात्मा लक्ष्मण आगे-आगे चलते हुए श्रीरघुनाथजी की उनके अनुकूल चेष्टा करते धर्म और बल के द्वारा रक्षा करने लगे। ऋष्यमूक पर्वत के समीप विचरने वाले बलवान् वानरराज सुग्रीव पम्पा के निकट घूम रहे थे। उसी समय उन्होंने उन अद्भुत दर्शनीय वीर श्रीराम और लक्ष्मण को देखा। देखते ही उनके मन में यह भय हो गया कि हो न हो इन्हें मेरे शत्रु बाली ने ही भेजा होगा, फिर तो वे इतने डर गये कि खाने-पीने आदि की भी चेष्टा न कर सके। 

हाथी के समान मन्दगति से चलने वाले महामना वानरराज सुग्रीव जो वहाँ विचर रहे थे, उस समय एक साथ आगे बढ़ते हुए उन दोनों भाइयों को देखकर चिन्तित हो उठे। भय के भारी भार से उनका उत्साह नष्ट हो गया। वे महान् दु:ख में पड़ गये। मतङ्ग मुनि का वह आश्रम परम पवित्र एवं सुखदायक था। मुनि के शाप से उसमें बाली का प्रवेश होना कठिन था, इसलिये वह दूसरे वानरों का आश्रय बना हुआ था। उस आश्रम या वन के भीतर सदा ही अनेकानेक शाखामृग निवास करते थे। उस दिन उन महातेजस्वी श्रीराम और लक्ष्मण को देखकर दूसरे दूसरे वानर भी भयभीत हो आश्रम के भीतर चले गये। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-३(3) समाप्त ! 

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