भाग-३०(30) सुग्रीव का दक्षिण दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए वहाँ प्रमुख वानर वीरों को भेजना

 


इस प्रकार वानरों की बहुत बड़ी सेना को पूर्व दिशा में प्रस्थापित करके सुग्रीव ने दक्षिण दिशा की ओर चुने हुए वानरों को, जो भलीभाँति परख लिये गये थे, भेजा। अग्निपुत्र नील, कपिवर हनुमानजी, ब्रह्माजी के महाबली पुत्र जाम्बवान्, सुहोत्र, शरारि, शरगुल्म, गज, गवाक्ष, गवय, सुषेण (प्रथम - तारा के पिता), वृषभ, मैन्द, द्विविद, सुषेण (द्वितीय - वानरयूथपति), गन्धमादन, हुताशन के दो पुत्र उल्कामुख और अनङ्ग (असङ्ग) तथा अङ्गद आदि प्रधान प्रधान वीरों को, जो महान् वेग और पराक्रम से सम्पन्न थे, विशेषज्ञ वानरराज सुग्रीव ने दक्षिण की ओर जाने की आज्ञा दी। महान् बलशाली अङ्गद को उन समस्त वानर वीरों का अगुआ बनाकर उन्हें दक्षिण दिशा में सीता की खोज का भार सौंपा। उस दिशा में जो कोई भी स्थान अत्यन्त दुर्गम थे, उनका भी कपिराज सुग्रीव ने उन श्रेष्ठ वानरों को परिचय दिया। 

वे बोले - वानरो! तुमलोग भाँति-भाँति के वृक्षों और लताओं से सुशोभित सहस्रों शिखरों वाले विन्ध्यपर्वत, बड़े- बड़े नागों से सेवित रमणीय नर्मदा नदी, सुरम्य गोदावरी, महानदी, कृष्णवेणी तथा बड़े-बड़े नागों से सेवित महाभागा वरदा आदि नदियों के तटों पर और मेखल (मेकल), उत्कल एवं दशार्ण देश के नगरों में तथा आब्रवन्ती और अवन्तीपुरी में भी सब जगह सीता की खोज करो। इसी प्रकार विदर्भ, ऋष्टिक, रम्य माहिषक देश, वङ्ग, कलिङ्ग तथा कौशिक आदि देशों में सब ओर देखभाल करके पर्वत, नदी और गुफाओं सहित समूचे दण्डकारण्य में छानबीन करना। वहाँ जो गोदावरी नदी है, उसमें सब ओर बारंबार देखना। इसी प्रकार आन्ध्र, पुण्ड्र, चोल, पाण्ड्य तथा केरल आदि देशों में भी ढूँढना। 

‘तदनन्तर अनेक धातुओं से अलंकृत अयोमुख (मलय) पर्वत पर भी जाना, उसके शिखर बड़े विचित्र हैं। वह शोभाशाली पर्वत फूले हुए विचित्र काननों से युक्त है। उसके सभी स्थानों में सुन्दर चन्दन के वन हैं। उस महापर्व मलय पर सीता की अच्छी तरह खोज करना। तत्पश्चात् स्वच्छ जल वाली दिव्य नदी कावेरी को देखना, जहाँ अप्सराएँ विहार करती हैं। उस प्रसिद्ध मलयपर्वत के शिखर पर बैठे हुए सूर्य के समान महान् तेज से सम्पन्न मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य का दर्शन करना।' 

‘इसके बाद उन प्रसन्नचित्त महात्मा से आज्ञा लेकर ग्राहों से सेवित महानदी ताम्रपर्णी को पार करना। उसके द्वीप और जल विचित्र चन्दनवनों से आच्छादित हैं; अत: वह सुन्दर साड़ी से विभूषित युवती प्रेयसी की भाँति अपने प्रियतम समुद्र से मिलती है। वानरो! वहाँ से आगे बढ़ने पर तुम लोग पाण्ड्यवंशी राजाओं के नगरद्वार पर लगे हुए सुवर्णमय कपाट का दर्शन करोगे, जो मुक्तामणियों से विभूषित एवं दिव्य है। तत्पश्चात् समुद्र के तट पर जाकर उसे पार करने के सम्बन्ध में अपने कर्तव्य का भलीभाँति निश्चय करके उसका पालन करना।' 

'महर्षि अगस्त्य ने समुद्र के भीतर एक सुन्दर सुवर्णमय पर्वत को स्थापित किया है, जो महेन्द्रगिरि के नाम से विख्यात है। उसके शिखर तथा वहाँ के वृक्ष विचित्र शोभा से सम्पन्न हैं। वह शोभाशाली पर्वत श्रेष्ठ समुद्र के भीतर गहराई तक घुसा हुआ है। नाना प्रकार के खिले हुए वृक्ष और लताएँ उस पर्वत की शोभा बढ़ाती हैं। देवता, ऋषि, श्रेष्ठ यक्ष और अप्सराओं की उपस्थिति से उसकी शोभा और भी बढ़ जाती है। सिद्धों और चारणों के समुदाय वहाँ सब ओर फैले रहते हैं। इन सब के कारण महेन्द्रपर्वत अत्यन्त मनोरम जान पड़ता है। सहस्र नेत्रधारी इन्द्र प्रत्येक पर्व के दिन उस पर्वत पर पदार्पण करते हैं। 

'उस समुद्र के उस पार एक द्वीप है, जिसका विस्तार सौ योजन है। वहाँ मनुष्यों की पहुँच नहीं है। वह जो दीप्तिशाली द्वीप है, उसमें चारों ओर पूरा प्रयत्न करके तुम्हें सीता की विशेषरूप से खोज करनी चाहिये। वही देश इन्द्र के समान तेजस्वी दुरात्मा राक्षसराज रावण का, जो हमारा वध्य है, निवासस्थान है। उस दक्षिण समुद्र के बीच में अङ्गारका नाम से प्रसिद्ध एक राक्षसी रहती है, जो छाया पकड़कर ही प्राणियों को खींच लेती और उन्हें खा जाती है। 

‘उस लङ्काद्वीप में जो संदिग्ध स्थान हैं, उन सबमें इस तरह खोज करके जब तुम उन्हें संदेह रहित समझ लो और तुम्हारे मन का संशय निकल जाय, तब तुम लङ्काद्वीप को भी लाँघकर आगे बढ़ जाना और अमित तेजस्वी महाराज श्रीराम की पत्नी का अन्वेषण करना। लङ्का को लाँघकर आगे बढ़ने पर सौ योजन विस्तृत समुद्र में एक पुष्पितक नाम का पर्वत है, जो परम शोभा से सम्पन्न तथा सिद्धों और चारणों से सेवित है। वह चन्द्रमा और सूर्य के समान प्रकाशमान है तथा समुद्र के जल में गहराई तक घुसा हुआ है। वह अपने विस्तृत शिखरों से आकाश में रेखा खींचता हुआ-सा सुशोभित होता है। उस पर्वत का एक सुवर्णमय शिखर है, जिसका प्रतिदिन सूर्यदेव सेवन करते हैं। उसी प्रकार इसका एक रजतमय श्वेत-शिखर है, जिसका चन्द्रमा सेवन करते हैं। कृतघ्न, नृशंस और नास्तिक पुरुष उस पर्वत-शिखर को नहीं देख पाते हैं।' 

‘वानरो! तुम लोग मस्तक झुकाकर उस पर्वत को प्रणाम करना और वहाँ सब ओर सीता को ढूँढना। उस दुर्धर्ष पर्वत को लाँघकर आगे बढ़ने पर सूर्यवान् नामक पर्वत मिलेगा। वहाँ जाने का मार्ग बड़ा दुर्गम है और वह पुष्पितक से चौदह योजन दूर है। सूर्यवान् को लाँघकर जब तुम लोग आगे जाओगे, तब तुम्हें ‘वैद्युत' नामक पर्वत मिलेगा। वहाँके वृक्ष सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलों से युक्त और सभी ऋतुओं में मनोहर शोभा से सम्पन्न हैं।' 

'वानरो! उनसे सुशोभित वैद्युत पर्वत पर उत्तम फल मूल खाकर और सेवन करने योग्य मधु पीकर तुम लोग आगे जाना। फिर कुञ्जर नामक पर्वत दिखायी देगा, जो नेत्रों और मन को भी अत्यन्त प्रिय लगने वाला है। उसके ऊपर विश्वकर्मा का बनाया हुआ महर्षि अगस्त्य का एक सुन्दर भवन है । कुञ्जर पर्वत पर बना हुआ अगस्त्य का वह दिव्य भवन सुवर्णमय तथा नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित है। उसका विस्तार एक योजन का और ऊँचाई दस योजन की है। उसी पर्वत पर सर्पों की निवासभूता एक नगरी है, जिसका नाम भोगवती है (यह पाताल की भोगवती पुरी से भिन्न है)। यह पुरी दुर्जय है। उसकी सड़कें बहुत बड़ी और विस्तृत हैं। वह सब ओर से सुरक्षित है। तीखी दाढ़ वाले महाविषैले भयंकर सर्प उसकी रक्षा करते हैं।' 

‘उस भोगवती पुरी में महाभयंकर सर्पराज वासुकि निवास करते हैं (ये योगशक्ति से अनेक रूप धारण करके दोनों भोगवती पुरियों में एक साथ रह सकते हैं) । तुम्हें विशेषरूप से उस भोगवती पुरी में प्रवेश करके वहाँ सीता की खोज करनी चाहिये। उस पुरी में जो गुप्त एवं व्यवधान रहित स्थान हों, उन सब में सीता का अन्वेषण करना चाहिये। उस प्रदेश को लाँघकर आगे बढ़ने पर तुम्हें ऋषभ नामक महान् पर्वत मिलेगा। वह शोभाशाली ऋषभ पर्वत सम्पूर्ण रत्नों से भरा हुआ है। वहाँ गोशीर्षक, पद्मक, हरिश्याम आदि नामों वाला दिव्य चन्दन उत्पन्न होता है। वह चन्दन वृक्ष अग्नि के समान प्रज्वलित होता रहता है। उस चन्दन को देखकर कदापि तुम्हें उसका स्पर्श नहीं करना चाहिये। क्योंकि ‘रोहित’ नाम वाले गन्धर्व उस घोर वन की रक्षा करते हैं। वहाँ सूर्य के समान कान्तिमान् पाँच गन्धर्वराज रहते हैं।' 

'उनके नाम ये हैं - शैलूष, ग्रामणी, शिक्ष (शिग्रु), शुक और बभ्रु। उस ऋषभ से आगे पृथ्वी की अन्तिम सीमा पर सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि के तुल्य तेजस्वी पुण्यकर्मा पुरुषों का निवास स्थान है। अत: वहाँ दुर्धर्ष स्वर्गविजयी (स्वर्ग के अधिकारी) पुरुष ही वास करते हैं। उससे आगे अत्यन्त भयानक पितृलोक है; वहाँ तुम लोगों को नहीं जाना चाहिये। यह भूमि यमराज की राजधानी है, जो कष्टप्रद अन्धकार से आच्छादित है।' 

‘वीर वानरों! बस, दक्षिण दिशा में इतनी ही दूर तक तुम्हें जाना और खोजना है। उससे आगे पहुँचना असम्भव है; क्योंकि उधर जंगम प्राणियों की गति नहीं है। इन सब स्थानों में अच्छी तरह देख-भाल करके और भी जो स्थान अन्वेषण के योग्य दिखायी दे, वहाँ भी विदेहकुमारी का पता लगाना; तदनन्तर तुम सबको लौट आना चाहिये। जो एक मास पूर्ण होने पर सबसे पहले यहाँ आकर यह कहेगा कि 'मैंने सीताजी का दर्शन किया है' वह मेरे समान वैभव से सम्पन्न हो भोग्य-पदार्थों का अनुभव करता हुआ सुखपूर्वक विहार करेगा। उससे बढ़कर प्रिय मेरे लिये दूसरा कोई नहीं होगा। वह मेरे लिये प्राणों से भी बढ़कर प्यारा होगा तथा अनेक बार अपराध किया हो तो भी वह मेरा बन्धु होकर रहेगा। तुम सबके बल और पराक्रम असीम हैं। तुम विशेष गुणशाली उत्तम कुलों में उत्पन्न हुए हो। राजकुमारी सीता का जिस प्रकार भी पता मिल सके, उसके अनुरूप उच्च कोटि का पुरुषार्थ आरम्भ करो।' 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-३०(30) समाप्त ! 

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