भाग-२(2) श्रीराम का लक्ष्मण से पम्पा की शोभा तथा वहाँ की उद्दीपन सामग्री का वर्णन करना


श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा - लक्ष्मण! ये मञ्जरियों से सुशोभित होने वाले आम के वृक्ष श्रृङ्गार - विलास से मदमत्तहृदय होकर चन्दन आदि अङ्गराग धारण करने वाले मनुष्यों के समान दिखायी देते हैं। नरश्रेष्ठ सुमित्राकुमार! देखो, पम्पा की विचित्र वन श्रेणियों में इधर-उधर किन्नर विचर रहे हैं। लक्ष्मण! देखो, पम्पा के जल में सब ओर खिले हुए ये सुगन्धित कमल प्रात: काल के सूर्य की भाँति प्रकाशित हो रहे हैं। पम्पा का जल बड़ा ही स्वच्छ है। इसमें लाल कमल और नील कमल खिले हुए हैं। हंस और कारण्डव आदि पक्षी सब ओर फैले हुए हैं तथा सौगन्धिक कमल इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं। 

‘जल में प्रात:काल के सूर्य की भाँति प्रकाशित होने वाले कमलों के द्वारा सब ओर से घिरी हुई पम्पा बड़ी शोभा पा रही है। उन कमलों के केसरों को भ्रमरों ने चूस लिया है। इसमें चक्रवाक सदा निवास करते हैं। यहाँ के वनों में विचित्र-विचित्र स्थान हैं तथा पानी पीने के लिये आये हुए हाथियों और मृगों के समूहों से इस पम्पा की शोभा और भी बढ़ जाती है।' 

‘लक्ष्मण! वायु के थपेड़े से जिनमें वेग पैदा होता है, उन लहरों से ताड़ित होने वाले कमल पम्पा के निर्मल जल में बड़ी शोभा पाते हैं। प्रफुल्ल कमलदल के समान विशाल नेत्रों वाली विदेहराजकुमारी सीता को कमल सदा ही प्रिय रहे हैं। उसे न देखने के कारण मुझे जीवित रहना अच्छा नहीं लगता है। अहो ! काम कितना कुटिल है, जो अन्यत्र गयी हुई एवं परम दुर्लभ होने पर भी कल्याणमय वचन बोलने वाली उस कल्याणस्वरूपा सीता का बारंबार स्मरण दिला रहा है। यदि खिले हुए वृक्षों वाला यह वसन्त मुझ पर पुन: प्रहार न करे तो प्राप्त हुई कामवेदना को मैं किसी तरह मन में ही रोके रह सकता हूँ। सीता के साथ रहने पर जो जो वस्तुएँ मुझे रमणीय प्रतीत होती थीं, वे ही आज उसके बिना असुन्दर जान पड़ती हैं।' 

'लक्ष्मण! ये कमल कोशों के दल सीता के नेत्रकोशों के समान हैं। इसलिये मेरी आँखें इन्हें ही देखना चाहती हैं। कमलकेसरों का स्पर्श करके दूसरे वृक्षों के बीच से निकली हुई यह सौरभयुक्त मनोहर वायु सीता के नि:श्वास की भाँति चल रही है। सुमित्रानन्दन! वह देखो, पम्पा के दक्षिण भाग में पर्वत शिखरों पर खिली हुई कनेर की डाल कितनी अधिक शोभा पा रही है। विभिन्न धातुओं से विभूषित हुआ यह पर्वतराज ऋष्यमूक वायु के वेग से लायी हुई विचित्र धूलि की सृष्टि कर रहा है।' 

‘सुमित्राकुमार! चारों ओर खिले हुए और सब ओर से रमणीय प्रतीत होने वाले पत्रहीन पलाश वृक्षों से उपलक्षित इस पर्वत के पृष्ठ भाग आग में जलते हुए-से जान पड़ते हैं। पम्पा के तट पर उत्पन्न हुए ये वृक्ष इसी के जल से अभिषिक्त हो बढ़े हैं और मधुर मकरन्द एवं गन्ध से सम्पन्न हुए हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं - मालती, मल्लिका, पद्म और करवीर। ये सब-के-सब फूलों से सुशोभित हैं।' 

'केतकी (केवड़े), सिन्दुवार तथा वासन्ती लताएँ भी सुन्दर फूलों से भरी हुई हैं! गन्धभरी माधवी लता तथा कुन्द कुसुमों की झाड़ियाँ सब ओर शोभा पा रही हैं। चिरिबिल्व (चिलबिल), महुआ, बेंत, मौलसिरी, चम्पा, तिलक और नागकेसर भी खिले दिखायी देते हैं। पर्वत के पृष्ठभागों पर पद्मक और खिले हुए नील अशोक भी शोभा पाते हैं। वहीं सिंह के अयाल की भाँति पिङ्गल वर्ण वाले लोध्र भी सुशोभित हो रहे हैं। अङ्कोल, कुरंट, चूर्णक (सेमल), पारिभद्रक (नीम या मदार), आम, पाटलि, कोविदार, मुचुकुन्द (नारङ्ग) और अर्जुन नामक वृक्ष भी पर्वत-शिखरों पर फूलों से लदे दिखायी देते हैं। केतक, उद्दालक (लसोड़ा), शिरीष, शीशम, धव, सेमल, पलाश, लाल कुरबक, तिनिश, नक्तमाल, चन्दन, स्यन्दन, हिन्ताल, तिलक तथा नागकेसर के पेड़ भी फूलों से भरे दिखायी देते हैं।' 

'सुमित्रानन्दन! जिनके अग्रभाग फूलों से भरे हुए हैं, उन लता- वल्लरियों से लिपटे हुए पम्पा के इन मनोहर और बहुसंख्यक वृक्षों को तो देखो। वे सब-के-सब यहाँ फूलों के भार से लदे हुए हैं। हवा के झोंके खाकर जिनकी डालें हिल रही हैं, वे ये वृक्ष झुककर इतने निकट आ जाते हैं कि हाथ से इनकी डालियों का स्पर्श किया जा सके। सलोनी लताएँ मदमत्त सुन्दरियों की भाँति इनका अनुसरण करती हैं। एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर, एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर तथा एक वन से दूसरे वन में जाती हुई वायु अनेक रसों के आस्वादन से आनन्दित सी होकर बह रही है।' 

‘कुछ वृक्ष प्रचुर पुष्पों से भरे हुए हैं और मधु एवं सुगन्ध से सम्पन्न हैं। कुछ मुकुलों से आवेष्टित हो श्यामवर्ण-से प्रतीत हो रहे हैं। वह भ्रमर राग से रँगा हुआ है और 'यह मधुर है, यह स्वादिष्ट है तथा यह अधिक खिला हुआ है' इत्यादि बातें सोचता हुआ फूलों में ही लीन हो रहा है। पुष्पों में छिपकर फिर ऊपर को उड़ जाता है और सहसा अन्यत्र चल देता है। इस प्रकार मधु का लोभी भ्रमर पम्पातीर वर्ती वृक्षों पर विचर रहा है। स्वयं झड़कर गिरे हुए पुष्पसमूहों से आच्छादित हुई यह भूमि ऐसी सुखदायिनी हो गयी है, मानो इस पर शयन करने के लिये मुलायम बिछौने बिछा दिये गये हों।' 

‘सुमित्रानन्दन! पर्वत के शिखरों पर जो नाना प्रकार की विशाल शिलाएँ हैं, उन पर झड़े हुए भाँति-भाँति के फूलों ने उन्हें लाल-पीले रंग की शय्याओं के समान बना दिया है। सुमित्राकुमार! वसन्त ऋतु में वृक्षों के फूलों का यह वैभव तो देखो। इस चैत्र मास में ये वृक्ष मानो परस्पर होड़ लगाकर फूले हुए हैं। लक्ष्मण! वृक्ष अपनी ऊपरी डालियों पर फूलों का मुकुट धारण करके बड़ी शोभा पा रहे हैं तथा वे भ्रमरों के गुञ्जारव से इस तरह कोलाहलपूर्ण हो रहे हैं, मानो एक-दूसरे का आह्वान कर रहे हों। यह कारण्डव पक्षी पम्पा के स्वच्छ जल में प्रवेश करके अपनी प्रियतमा के साथ रमण करता हुआ काम का उद्दीपन-सा कर रहा है। मन्दाकिनी के समान प्रतीत होने वाली इस पम्पा का जब ऐसा मनोरम रूप है, तब संसार में उसके जो मनोरम गुण विख्यात हैं, वे उचित ही हैं।' 

‘रघुश्रेष्ठ लक्ष्मण! यदि साध्वी सीता दीख जाय और यदि उसके साथ हम यहाँ निवास करने लगें तो हमें न इन्द्रलोक में जाने की इच्छा होगी और न अयोध्या में लौटने की ही। हरी-हरी घासों से सुशोभित ऐसे रमणीय प्रदेशों में सीता के साथ सानन्द विचरने का अवसर मिले तो मुझे (अयोध्या का राज्य न मिलने के कारण) कोई चिन्ता नहीं होगी और न दूसरे ही दिव्य भोगों की अभिलाषा हो सकेगी। इस वन में भाँति-भाँति के पल्लवों से सुशोभित और नाना प्रकार के फूलों से उपलक्षित ये वृक्ष प्राण- वल्लभा सीता के बिना मेरे मन में चिन्ता उत्पन्न कर देते हैं।'

‘सुमित्राकुमार! देखो, इस पम्पा का जल कितना शीतल है। इसमें असंख्य कमल खिले हुए हैं। चकवे विचरते हैं और कारण्डव निवास करते हैं। इतना ही नहीं, जलकुक्कुट तथा क्रौञ्च भरे हुए हैं एवं बड़े-बड़े मृग इसका सेवन करते हैं। चहकते हुए पक्षियों से इस पम्पा की बड़ी शोभा हो रही है। आनन्द में निमग्न हुए ये नाना प्रकार के पक्षी मेरे सीताविषयक अनुराग को उद्दीप्त कर देते हैं; क्योंकि इनकी बोली सुनकर मुझे नूतन अवस्थावाली कमलनयनी चन्द्रमुखी प्रियतमा सीता का स्मरण हो आता है।' 

'लक्ष्मण ! देखो, पर्वत के विचित्र शिखरों पर ये हिरण अपनी हिरणियों के साथ विचर रहे हैं और मैं मृगनयनी सीता से बिछुड़ गया हूँ। इधर-उधर विचरते हुए ये मृग मेरे चित्त को व्यथित किये देते हैं। मतवाले पक्षियों से भरे हुए इस पर्वत के रमणीय शिखर पर यदि प्राणवल्लभा सीता का दर्शन पा सकूँ तभी मेरा कल्याण होगा। सुमित्रानन्दन! यदि सुमध्यमा सीता मेरे साथ रहकर इस पम्पासरोवर के तट पर सुखद समीर का सेवन कर सके तो मैं निश्चय ही जीवित रह सकता हूँ।' 

‘लक्ष्मण! जो लोग अपनी प्रियतमा के साथ रहकर पद्म और सौगन्धिक कमलों की सुगन्ध लेकर बहनेवाली शीतल, मन्द एवं शोकनाशन पम्पा वन की वायु का सेवन करते हैं, वे धन्य हैं। हाय! वह नयी अवस्थावाली कमललोचना जनकनन्दिनी प्रिया सीता मुझसे बिछुड़कर बेबसी की दशा में अपने प्राणों को कैसे धारण करती होगी।' 

‘लक्ष्मण! धर्म के जानने वाले सत्यवादी राजा जनक जब जन-समुदाय में बैठकर मुझसे सीता का कुशल- समाचार पूछेंगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा। हाय ! पिता के द्वारा वन में भेजे जाने पर जो धर्म का आश्रय ले मेरे पीछे-पीछे यहाँ चली आयी, वह मेरी प्रिया इस समय कहाँ है ?लक्ष्मण! जिसने राज्य से वञ्चित और हताश हो जाने पर भी मेरा साथ नहीं छोड़ा - मेरा ही अनुसरण किया, उसके बिना अत्यन्त दीन होकर मैं कैसे जीवन धारण करूँगा। जो कमलदल के समान सुन्दर, मनोहर एवं प्रशंसनीय नेत्रों से सुशोभित है, जिससे मीठी-मीठी सुगन्ध निकलती रहती है, जो निर्मल तथा चेचक आदि के चिह्न से रहित है, जनककिशोरी के उस दर्शनीय मुख को देखे बिना मेरी सुध- बुध खोयी जा रही है।' 

'लक्ष्मण! वैदेही के द्वारा कभी हँसकर और कभी मुसकराकर कही हुई वे मधुर, हितकर एवं लाभदायक बातें जिनकी कहीं तुलना नहीं है, मुझे अब कब सुनने को मिलेंगी? सोलह वर्ष की - सी अवस्था वाली साध्वी सीता यद्यपि वन में आकर कष्ट उठा रही थी, तथापि जब मुझे अनङ्गवेदना या मानसिक कष्ट से पीड़ित देखती, तब मानो उसका अपना सारा दुःख नष्ट हो गया हो, इस प्रकार प्रसन्न -सी होकर मेरी पीड़ा दूर करनेके लिये अच्छी-अच्छी बातें करने लगती थी। राजकुमार! अयोध्या में चलने पर जब मनस्विनी माता कौशल्या पूछेंगी कि "मेरी बहूरानी कहाँ है?” तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? लक्ष्मण! तुम जाओ, भ्रातृवत्सल भरत से मिलो। मैं तो जनकनन्दिनी सीता के बिना जीवित नहीं रह सकता।' 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-२(2) समाप्त ! 

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