तदनन्तर बल-वैभव से सम्पन्न वानरराज राजा सुग्रीव शत्रुसेना का संहार करने वाले पुरुषसिंह श्रीराम से बोले – भगवन्! जो मेरे राज्य में निवास करते हैं, वे महेन्द्र के समान तेजस्वी, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले और बलवान् वानर-यूथपति यहाँ आकर पड़ाव डाले बैठे हैं। ये अपने साथ ऐसे बलवान् वानर योद्धाओं को ले आये हैं, जो बहुत से युद्धस्थलों में अपना पराक्रम प्रकट कर चुके हैं और भयंकर पुरुषार्थ कर दिखाने वाले हैं। यहाँ ऐसे-ऐसे वानर उपस्थित हुए हैं, जो दैत्यों और दानवों के समान भयानक हैं। अनेक युद्धों में इन वानर वीरों की शूरवीरता का परिचय मिल चुका है। ये बल के भण्डार हैं, युद्ध से थकते नहीं हैं। इन्होंने थकावट को जीत लिया है। ये अपने पराक्रम के लिये प्रसिद्ध और उद्योग करने में श्रेष्ठ हैं।
'श्रीराम! यहाँ आये हुए ये वानरों के करोड़ों यूथ विभिन्न पर्वतों पर निवास करने वाले हैं। जल और थल – दोनों में समान रूप से चलने की शक्ति रखते हैं। ये सब-के-सब आपके किंकर (आज्ञापालक) हैं। शत्रुदमन! ये सभी आपकी आज्ञा के अनुसार चलने वाले हैं। आप इनके गुरु स्वामी हैं। ये आपके हितसाधन में तत्पर रहकर आपके अभीष्ट मनोरथ को सिद्ध कर सकेंगे। दैत्यों और दानवों के समान घोर रूपधारी ये सभी वानर- -यूथपति अपने साथ भयंकर पराक्रम करने वाली कई सहस्र सेनाएँ लेकर आये हैं।'
'पुरुषसिंह! अब इस समय आप जो कर्तव्य उचित समझते हैं, उसे बताइये। आपकी यह सेना आपके वश में है। आप इसे यथोचित कार्य के लिये आज्ञा प्रदान करें। यद्यपि सीताजी के अन्वेषण का यह कार्य इन सबको तथा मुझे भी अच्छी तरह ज्ञात है, तथापि आप जैसा उचित हो, वैसे कार्य के लिये हमें आज्ञा दें।'
जब सुग्रीव ने ऐसी बात कही, तब दशरथनन्दन श्रीराम ने दोनों भुजाओं से पकड़कर उन्हें हृदय से लगा लिया और इस प्रकार कहा - सौम्य! महाप्राज्ञ! पहले यह तो पता लगाओ कि विदेहकुमारी सीता जीवित है या नहीं तथा वह देश, जिसमें रावण निवास करता है, कहाँ है ? जब सीता के जीवित होने का और रावण के निवासस्थान का निश्चित पता मिल जायगा, तब जो समयोचित कर्तव्य होगा, उसका मैं तुम्हारे साथ मिलकर निश्चय करूँगा।
‘वानरराज! इस कार्य को सिद्ध करने में न तो मैं समर्थ हूँ और न लक्ष्मण ही। कपीश्वर ! इस कार्य की सिद्धि तुम्हारे ही हाथ है। तुम्हीं इसे पूर्ण करने में समर्थ हो। मेरे कार्य का भलीभाँति निश्चय करके तुम्हीं वानरों को उचित आज्ञा दो। वीर ! मेरा कार्य क्या है? इसे तुम्हीं ठीक-ठीक जानते हो, इसमें संशय नहीं है। लक्ष्मण के बाद तुम्हीं मेरे दूसरे सुहृद् हो। तुम पराक्रमी, बुद्धिमान्, समयोचित कर्तव्य के ज्ञाता, हित में संलग्न रहने वाले, हितैषी बन्धु, विश्वासपात्र तथा मेरे प्रयोजन को अच्छी तरह समझने वाले हो।'
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर सुग्रीव ने उनके और बुद्धिमान् लक्ष्मण के समीप ही विनत नामक यूथपति से, जो पर्वत के समान विशालकाय, मेघ के समान गम्भीर गर्जना करने वाले, बलवान् तथा वानरों के शासक थे और चन्द्रमा एवं सूर्य के समान कान्ति वाले वानरों के साथ उपस्थित हुए थे, कहा – वानरशिरोमणे ! तुम देश और काल के अनुसार नीति का प्रयोग करने वाले तथा कार्य का निश्चय करने में चतुर हो। तुम एक लाख वेगवान् वानरों के साथ पर्वत, वन और काननों सहित पूर्व दिशा की ओर जाओ और वहाँ पहाड़ों के दुर्गम प्रदेशों, वनों तथा सरिताओं में विदेहकुमारी सीता एवं रावण के निवास स्थान की खोज करो।
'भागीरथी गङ्गा, रमणीय सरयू, कौशिकी, सुरम्य 'कलिन्दनन्दिनी यमुना, महापर्वत यामुन, सरस्वती नदी, सिंधु, मणि के समान निर्मल जल वाले शोणभद्र, मही तथा पर्वतों और वनों से सुशोभित कालमही आदि नदियों के किनारे ढूँढो। ब्रह्ममाल, विदेह, मालव, काशी, कोसल, मगध देश के बड़े-बड़े ग्राम, पुण्ड्रदेश तथा अङ्ग आदि जनपदों में छानबीन करो। रेशम के कीड़ों की उत्पत्ति के स्थानों और चाँदी के खानों में भी खोज करनी चाहिये। इधर-उधर ढूँढते हुए तुम सब लोगों को इन सभी स्थानों में राजा दशरथ की पुत्रवधू तथा श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी पत्नी सीता का अन्वेषण करना चाहिये।'
'समुद्र के भीतर प्रविष्ट हुए पर्वतों पर, उसके अन्तर्वर्ती द्वीपों के विभिन्न नगरों में तथा मन्दराचल की चोटी पर जो कोई गाँव बसे हैं, उन सब में सीता का अनुसंधान करो। जो कर्णप्रावरण (वस्त्र की भाँति पैर तक लटके हुए कान वाले), ओष्ठकर्णक (ओठ तक फैले हुए कान वाले) तथा घोरलोहमुख (लोहे के समान काले एवं भयंकर मुख वाले) हैं, जो एक ही पैर के होते हुए भी वेग पूर्वक चलने वाले हैं, जिनकी संतानपरम्परा कभी क्षीण नहीं होती, वे पुरुष तथा जो बलवान् नरभक्षी राक्षस हैं, जो सूची के अग्रभाग की भाँति तीखी चोटी वाले, सुवर्ण के समान कान्तिमान्, प्रियदर्शन (सुन्दर ), कच्ची मछली खाने वाले, द्वीपवासी तथा जल के भीतर विचरने वाले किरात हैं, जिनके नीचे का आकार मनुष्य- जैसा और ऊपर की आकृति व्याघ्रके समान है, ऐसे और भयंकर प्राणी बताये गये हैं; वानरो ! इन सबके निवासस्थानों में जाकर तुम्हें सीता तथा रावण की खोज करनी चाहिये।'
‘जिन द्वीपों में पर्वतों पर होकर जाना पड़ता है, जहाँ समुद्र को तैरकर या नाव आदि के द्वारा पहुँचा जाता है, उन सब स्थानों में सीता को ढूँढना चाहिये। इसके सिवा तुम लोग यत्नशील होकर सात राज्यों से सुशोभित यवद्वीप ( जावा ), सुवर्णद्वीप (सुमात्रा) तथा रूप्यकद्वीप में भी जो सुवर्ण की खानों से सुशोभित हैं, ढूँढ़ने का प्रयत्न करो। यवद्वीप को लाँघकर आगे जाने पर एक शिशिर नामक पर्वत मिलता है, जिसके ऊपर देवता और दानव निवास करते हैं। वह पर्वत अपने उच्च शिखर से स्वर्गलोक का स्पर्श करता-सा जान पड़ता है। इन सब द्वीपों के पर्वतों तथा शिशिर पर्वत के दुर्गम प्रदेशों में, झरनों के आस-पास और जंगलों में तुम सब लोग एक साथ होकर श्रीरामचन्द्रजी की यशस्विनी पत्नी सीता का अन्वेषण करो।'
‘तदनन्तर समुद्र के उस पार जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं, जाकर लाल जल से भरे हुए शीघ्र प्रवाहित होने वाले शोण नामक नद के तट पर पहुँच जाओगे। उसके तटवर्ती रमणीय तीर्थों और विचित्र वनों में जहाँ-तहाँ विदेहकुमारी सीता के साथ रावण की खोज करना। पर्वतों से निकली हुई बहुत सी ऐसी नदियाँ मिलेंगी, जिनके तटों पर बड़े भयंकर अनेकानेक उपवन प्राप्त होंगे। साथ ही वहाँ बहुत-सी गुफाओं वाले पर्वत उपलब्ध होंगे और अनेक वन भी दृष्टिगोचर होंगे। उन सब में सीता का पता लगाना चाहिये।'
'तत्पश्चात् पूर्वोक्त देशों से परे जाकर तुम इक्षुरस से परिपूर्ण समुद्र तथा उसके द्वीपों को देखोगे, जो बड़े ही भयंकर प्रतीत होते हैं। इक्षुरस का वह समुद्र महाभयंकर है। उसमें हवा के वेग से उत्ताल तरंगें उठती रहती हैं तथा वह गर्जना करता हुआ-सा जान पड़ता है। उस समुद्र में बहुत-से विशालकाय असुर निवास करते हैं। वे बहुत दिनों के भूखे होते हैं और छाया पकड़कर ही प्राणियों को अपने पास खींच लेते हैं। यही उनका नित्य का आहार है। इसके लिये उन्हें ब्रह्माजी से अनुमति मिल चुकी है।'
'इक्षुरस का वह समुद्र काले मेघ के समान श्याम दिखायी देता है। बड़े-बड़े नाग उसके भीतर निवास करते हैं। उससे बड़ी भारी गर्जना होती रहती है। विशेष उपायों से उस महासागर के पार जाकर तुम लाल रंग के जल से भरे हुए लोहित नामक भयंकर समुद्र के तट पर पहुँच जाओगे और वहाँ शाल्मलीद्वीप के चिह्नभूत कूटशाल्मली नामक विशाल वृक्ष का दर्शन करोगे। उसके पास ही विश्वकर्मा का बनाया हुआ विनतानन्दन गरुड़ का एक सुन्दर भवन है, जो नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित तथा कैलाश पर्वत के समान उज्ज्वल एवं विशाल है।'
‘उस द्वीप में पर्वत के समान शरीर वाले भयंकर मंदेह नामक राक्षस निवास करते हैं, जो सुरासमुद्र के मध्यवर्ती शैल-शिखरों पर लटकते रहते हैं। वे अनेक प्रकार के रूप धारण करने वाले तथा भयदायक हैं। प्रतिदिन सूर्योदय के समय वे राक्षस ऊर्ध्वमुख होकर सूर्य से जूझने लगते हैं, परंतु सूर्यमण्डल के ताप से संतप्त तथा ब्रह्मतेज से निहत हो सुरा-समुद्र के जल में गिर पड़ते हैं। वहाँ से फिर जीवित हो उन्हीं शैल-शिखरों पर लटक जाते हैं। उनका बारंबार ऐसा ही क्रम चला करता है।'
'शाल्मलिद्वीप एवं सुरा-समुद्र से आगे बढ़ने पर (क्रमश: घृत और दधि के समुद्र प्राप्त होंगे। वहाँ देवी सीता की खोज करने के पश्चात् जब आगे बढ़ोगे, तब) सफेद बादलों की-सी आभा वाले क्षीरसमुद्र का दर्शन करोगे। दुर्धर्ष वानरो! वहाँ पहुँचकर उठती हुई लहरों से युक्त क्षीरसागर को इस प्रकार देखोगे, मानो उसने मोतियों के हार पहन रखे हों। उस सागर के बीच में ऋषभ नाम से प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो श्वेत वर्ण का है। उस पर्वत पर सब ओर बहुत से वृक्ष भरे हुए हैं, जो फूलों से सुशोभित तथा दिव्य गन्ध से सुवासित हैं। उसके ऊपर सुदर्शन नाम का एक सरोवर है, जिसमें चाँदी के समान श्वेत रंग वाले कमल खिले हुए हैं। उन कमलों के केसर सुवर्णमय होते हैं और सदा दिव्य दीप्ति से दमकते रहते हैं। वह सरोवर राजहंसों से भरा रहता है।'
'देवता, चारण, यक्ष, किन्नर और अप्सराएँ बड़ी प्रसन्नता के साथ जल-विहार करने के लिये वहाँ आया करती हैं। वानरो! क्षीरसागर लाँघकर जब तुम लोग आगे बढ़ोगे, तब शीघ्र ही सुस्वादु जल से भरे हुए समुद्र को देखोगे। वह महासागर समस्त प्राणियों को भय देने वाला है। उसमें ब्रह्मर्षि और्व के कोप से प्रकट हुआ वडवामुख नामक महान् तेज विद्यमान है। उस समुद्र में जो चराचर प्राणियों सहित महान् वेगशाली जल है, वही उस वडवामुख नामक अग्नि का आहार बताया जाता है। वहाँ जो वडवानल प्रकट हुआ है, उसे देखकर उसमें पतन के भय से चीखते-चिल्लाते हुए समुद्र निवासी असमर्थ प्राणियों का आर्तनाद निरन्तर सुनायी देता है।'
'स्वादिष्ट जल से भरे हुए उस समुद्र के उत्तर तेरह योजन की दूरी पर सुवर्णमयी शिलाओं से सुशोभित, कनक की कमनीय कान्ति धारण करने वाला एक बहुत ऊँचा पर्वत है। वानरो! उसके शिखर पर इस पृथ्वी को धारण करने वाले भगवान् अनन्त (शेषनाग) बैठे दिखायी देंगे। उनका श्रीविग्रह चन्द्रमा के समान गौरवर्ण का है। वे सर्प जाति के हैं; परंतु उनका स्वरूप देवताओं के तुल्य है। उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान हैं और शरीर नील वस्त्र से आच्छादित है। उन अनन्तदेव के सहस्र मस्तक हैं।'
‘पर्वत के ऊपर उन महात्मा की ताड़ के चिह्न से युक्त सुवर्णमयी ध्वजा फहराती रहती है। उस ध्वजा की तीन शिखाएँ हैं और उसके नीचे आधार भूमि पर वेदी बनी हुई है। इस तरह उस ध्वज की बड़ी शोभा होती है। यही तालध्वज पूर्व दिशा की सीमा के सूचक चिह्न के रूप में देवताओं द्वारा स्थापित किया गया है। उसके बाद सुवर्णमय उदय पर्वत है, जो दिव्य शोभा से सम्पन्न है। उसका गगनचुम्बी शिखर सौ योजन लंबा है। उसका आधारभूत पर्वत भी वैसा ही है। उसके साथ वह दिव्य सुवर्णशिखर अद्भुत शोभा पाता है।'
‘वहाँ के साल, ताल, तमाल और फूलों से लदे कनेर आदि वृक्ष भी सुवर्णमय ही हैं। उन सूर्यतुल्य तेजस्वी दिव्य वृक्षों से उदयगिरि की बड़ी शोभा होती है। उस सौ योजन लंबे उदयगिरि के शिखर पर एक सौमनस नामक सुवर्णमय शिखर है, जिसकी चौड़ाई एक योजन और ऊँचाई दस योजन है। पूर्वकाल में वामन अवतार के समय पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु ने अपना पहला पैर उस सौमनस नामक शिखर पर रखकर दूसरा पैर मेरु पर्वत के शिखर पर रखा था। सूर्यदेव उत्तर से घूमकर जम्बूद्वीप की परिक्रमा करते हुए जब अत्यन्त ऊँचे 'सौमनस' नामक शिखर पर आकर स्थित होते हैं, तब जम्बूद्वीप निवासियों को उनका अधिक स्पष्टता के साथ दर्शन होता है।'
‘उस सौमनस नामक शिखर पर वैखानस महात्मा महर्षि बालखिल्यगण प्रकाशित होते देखे जाते हैं, जो सूर्य के समान कान्तिमान् और तपस्वी हैं। यह उदयगिरि के सौमनस शिखर के सामने का द्वीप सुदर्शन नाम से प्रसिद्ध है; क्योंकि उक्त शिखर पर जब भगवान् सूर्य उदित होते हैं, तभी इस द्वीप के समस्त प्राणियों का तेज से सम्बन्ध होता है और सबके नेत्रों को प्रकाश प्राप्त होता है (यही इस द्वीप के 'सुदर्शन' नाम होने का कारण है)।'
‘उदयाचल के पृष्ठभागों में, कन्दराओं में तथा वनों में भी तुम्हें जहाँ-तहाँ विदेहकुमारी सीता सहित रावण का पता लगाना चाहिये। उस सुवर्णमय उदयाचल तथा महात्मा सूर्यदेव के तेज से व्याप्त हुई उदयकालिक पूर्व संध्या रक्तवर्ण की प्रभा से प्रकाशित होती है। सूर्य के उदय का यह स्थान सबसे पहले ब्रह्माजी ने बनाया है; अतः यही पृथ्वी एवं ब्रह्मलोक का द्वार है (ऊपर के लोकों में रहने वाले प्राणी इसी द्वार से भूलोक में प्रवेश करते हैं तथा भूलोक के प्राणी इसी द्वार से ब्रह्मलोक में जाते हैं)। पहले इसी दिशा में इस द्वार का निर्माण हुआ, इसलिये इसे पूर्व दिशा कहते हैं।'
‘उदयाचल की घाटियों, झरनों और गुफाओं में यत्र-तत्र घूमकर तुम्हें विदेहकुमारी सीता सहित रावण का अन्वेषण करना चाहिये।
‘इससे आगे पूर्व दिशा अगम्य है। उधर देवता रहते हैं। उस ओर चन्द्रमा और सूर्य का प्रकाश न होने से वहाँकी भूमि अन्धकार से आच्छन्न एवं अदृश्य है। उदयाचल के आस-पास के जो समस्त पर्वत, कन्दराएँ तथा नदियाँ हैं, उनमें तथा जिन स्थानों का मैंने निर्देश नहीं किया है, उनमें भी तुम्हें जानकी की खोज करनी चाहिये। वानरशिरोमणियो! केवल उदयगिरि तक ही वानरों की पहुँच हो सकती है। इससे आगे न तो सूर्य का प्रकाश है और न देश आदि की कोई सीमा ही है। अत: आगे की भूमि के बारे में मुझे कुछ भी मालूम नहीं है। तुम लोग उदयाचल तक जाकर सीता और रावण के स्थान का पता लगाना और एक मास पूरा होते-होते तक लौट आना।
'एक महीने से अधिक न ठहरना। जो अधिक काल तक वहाँ रह जायगा, वह मेरे द्वारा मारा जायगा। मिथिलेशकुमारी का पता लगाकर अन्वेषण का प्रयोजन सिद्ध हो जाने पर अवश्य लौट आना। वानरो! वनसमूह से अलंकृत पूर्व दिशा में अच्छी तरह भ्रमण करके श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी पत्नी सीता का समाचार जानकर तुम वहाँ से लौट आओ। इससे तुम सुखी होओगे।
