भाग-२८(28) लक्ष्मण सहित सुग्रीव का भगवान् श्रीराम के पास आकर उनके चरणों में प्रणाम करना, श्रीरामचन्द्रजी का सुग्रीव के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना तथा विभिन्न वानर- यूथपतियों का अपनी सेनाओं के साथ आगमन

 


उनके लाये हुए उन समस्त उपहारों को ग्रहण करके सुग्रीव ने सम्पूर्ण वानरों को मधुर वचनों द्वारा सान्त्वना दी। फिर सबको विदा कर दिया। कार्य पूरा करके लौटे हुए उन सहस्रों वानरों को विदा करके सुग्रीव ने अपने-आपको कृतार्थ माना और महाबली श्रीरघुनाथजी का भी कार्य सिद्ध हुआ ही समझा। 

तत्पश्चात् लक्ष्मण समस्त वानरों में श्रेष्ठ भयंकर बलशाली सुग्रीव का हर्ष बढ़ाते हुए उनसे यह विनीत वचन बोले - सौम्य ! यदि तुम्हारी रुचि हो तो अब किष्किन्धा से बाहर निकलो। 

लक्ष्मण की यह सुन्दर बात सुनकर सुग्रीव अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले - अच्छा, ऐसा ही हो। चलिये, चलें। मुझे तो आपकी आज्ञा का पालन करना है। 

शुभ लक्षणों से युक्त लक्ष्मण से ऐसा कहकर सुग्रीव ने तारा आदि सब स्त्रियों को तत्काल विदा कर दिया। इसके बाद सुग्रीव ने शेष वानरों को 'आओ, आओ' कहकर उच्च स्वर से पुकारा। उनकी वह पुकार सुनकर सब बानर, जो अन्त:पुर की स्त्रियों को देखने के अधिकारी थे, दोनों हाथ जोड़े शीघ्रतापूर्वक उनके पास आये। 

पास आये हुए उन वानरों से सूर्यतुल्य तेजस्वी राजा सुग्रीव ने कहा - वानरो ! तुम लोग शीघ्र मेरी शिबिका को यहाँ ले आओ। 

उनकी बात सुनकर शीघ्रगामी वानरों ने एक सुन्दर शिबिका (पालकी) वहाँ उपस्थित कर दी। 

पालकी को वहाँ उपस्थित देख वानरराज सुग्रीव ने सुमित्राकुमार से कहा – कुमार लक्ष्मण ! आप शीघ्र इस पर आरूढ़ हो जायँ। 

ऐसा कहकर लक्ष्मण सहित सुग्रीव उस सूर्य की - सी प्रभावाली सुवर्णमयी पालकी पर, जिसे ढोने के लिये बहुत-से वानर लगे थे, आरूढ़ हुए। उस समय सुग्रीव के ऊपर श्वेत छत्र लगाया गया और सब ओर से सफेद चँवर डुलाये जाने लगे। शङ्ख और भेरी की ध्वनि के साथ वन्दीजनों का अभिनन्दन सुनते हुए राजा सुग्रीव परम उत्तम राजलक्ष्मी को पाकर किष्किन्धापुरी से बाहर निकले। हाथ में शस्त्र लिये तीक्ष्ण स्वभाव वाले कई सौ वानरों से घिरे हुए राजा सुग्रीव उस स्थान पर गये, जहाँ भगवान् श्रीराम निवास करते थे। 

श्रीरामचन्द्रजी से सेवित उस श्रेष्ठ स्थान में पहुँचकर लक्ष्मण सहित महातेजस्वी सुग्रीव पालकी से उतरे और श्रीराम के पास जा हाथ जोड़कर खड़े हो गये। वानरराज के हाथ जोड़कर खड़े होने पर उनके अनुयायी वानर भी उन्हीं की भाँति अञ्जलि बाँधे खड़े हो गये। मुकुलित कमलों से भरे हुए विशाल सरोवर की भाँति वानरों की उस बड़ी भारी सेना को देखकर श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव पर बहुत प्रसन्न हुए। वानरराज को चरणों में मस्तक रखकर पड़ा हुआ देख श्रीरघुनाथजी ने हाथ से पकड़कर उठाया और बड़े आदर तथा प्रेम के साथ उन्हें हृदय से लगाया। 

हृदय से लगाकर धर्मात्मा श्रीराम ने उनसे कहा – बैठो'। उन्हें पृथ्वी पर बैठा देख श्रीराम बोले - वीर! वानरशिरोमणे! जो धर्म, अर्थ और काम के लिये समय का विभाग करके सदा उचित समय पर उनका (न्याययुक्त) सेवन करता है, वही श्रेष्ठ राजा है। किंतु जो धर्म-अर्थ का त्याग करके केवल काम का ही सेवन करता है, वह वृक्ष की अगली शाखा पर सोये हुए मनुष्य के समान है। गिरने पर ही उसकी आँख खुलती है। जो राजा शत्रुओं के वध और मित्रों के संग्रह में संलग्न रहकर योग्य समय पर धर्म, अर्थ और काम का (न्याययुक्त) सेवन करता है, वह धर्म के फल का भागी होता है। शत्रुसूदन ! यह हम लोगों के लिये उद्योग का समय आया है। वानरराज! तुम इस विषय में इन वानरों और मन्त्रियों के साथ विचार करो। 

श्रीराम के ऐसा कहने पर सुग्रीव ने उनसे कहा - महाबाहो ! मेरी श्री, कीर्ति तथा सदा से चला आने वाला वानरों का राज्य – ये सब नष्ट हो चुके थे। आपकी कृपा से ही मुझे पुन: इन सबकी प्राप्ति हुई है। विजयी वीरों में श्रेष्ठ देव! आप और आपके भाई की कृपा से ही मैं वानर - राज्य पर पुनः प्रतिष्ठित हुआ हूँ। जो किये हुए उपकार का बदला नहीं चुकाता है, वह पुरुषों में धर्म को कलङ्कित करने वाला माना गया है। शत्रुसूदन! ये सैकड़ों बलवान् और मुख्य वानर भूमण्डल के सभी बलशाली वानरों को साथ लेकर यहाँ आये हैं।

‘रघुनन्दन! इनमें रीछ हैं, वानर हैं और शौर्य सम्पन्न गोलाङ्गूल (लङ्गूर) हैं। ये सब-के-सब देखने में बड़े भयंकर हैं और बीहड़ वनों तथा दुर्गम स्थानों के जानकार हैं। रघुनाथजी! जो देवताओं और गन्धर्वो के पुत्र हैं और इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हैं, वे श्रेष्ठ वानर अपनी-अपनी सेनाओं के साथ चल पड़े हैं और इस समय मार्ग में हैं।

'शत्रुओंको संताप देने वाले वीर ! इनमें से किसी के साथ सौ, किसी के साथ लाख, किसी के साथ करोड़, किसी के साथ अयुत (दस हजार) और किसी के साथ एक शंकु वानर हैं। कितने ही वानर अर्बुद (दस करोड़), सौ अर्बुद (दस अरब ), मध्य (दस पद्म) तथा अन्त्य (एक पद्म) वानर- सैनिकों के साथ आ रहे हैं। कितने ही वानरों तथा वानर-यूथपतियों की संख्या समुद्र (दस नील) तथा परार्ध (शंख) तक पहुँच गयी हैं।' 

‘राजन्! वे देवराज इन्द्र के समान पराक्रमी तथा मेघों और पर्वतों के समान विशालकाय वानर, जो मेरु और विन्ध्याचल में निवास करते हैं, यहाँ शीघ्र ही उपस्थित होंगे। जो युद्ध में रावण का वध करके मिथिलेश कुमारी सीता को लङ्का से ला देंगे, वे शक्तिशाली वानर महान् संग्राम में उस राक्षस से युद्ध करने के लिये अवश्य आपके पास आयेंगे' 

यह सुनकर परम पराक्रमी राजकुमार श्रीराम अपनी आज्ञा के अनुसार चलने वाले वानरों के प्रमुख वीर सुग्रीव का यह सैन्य-विषयक उद्योग देखकर बड़े प्रसन्न हुए। उनके नेत्र हर्ष से खिल उठे और प्रफुल्ल नील कमल के समान दिखायी देने लगे। 

[यहाँ अर्बुद, शंकु, अन्त्य और मध्य आदि संख्यावाचक शब्दों का आधुनिक गणित के अनुसार मान समझने के लिये प्राचीन संज्ञाओं का पूर्ण रूप से उल्लेख किया जाता है और कोष्ठ में उसका आधुनिक मान दिया जा रहा है - एक (इकाई), दश (दहाई), शत (सैकड़ा), सहस्र (हजार), अयुत (दस हजार), लक्ष (लाख), प्रयुत (दस लाख), कोटि (करोड़), अर्बुद (दस करोड़), अब्ज (अरब), खर्व (दस अरब ). निखर्व (खर्व), महापद्म ( दस खर्व), शंकु (नील), जलधि (दस नील), अन्त्य (पद्म), मध्य (दस पद्म), परार्ध (शंख) — ये संख्याबोधक संज्ञाएँ उत्तरोत्तर दसगुनी मानी गयी हैं। (नारदपुराण से)]

सुग्रीव के ऐसा कहने पर धर्मात्माओं में श्रेष्ठ श्रीराम ने अपनी दोनों भुजाओं से उनका आलिङ्गन किया और हाथ जोड़कर खड़े हुए उनसे इस प्रकार कहा - सखे! इन्द्र जो जल की वर्षा करते हैं, सहस्रों किरणों से शोभा पाने वाले सूर्यदेव जो आकाश का अन्धकार दूर कर देते हैं तथा सौम्य! चन्द्रमा अपनी प्रभा से जो अँधेरी रात को भी उज्ज्वल कर देते हैं, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि यह उनका स्वाभाविक गुण है। शत्रुओं को संताप देने वाले सुग्रीव ! इसी तरह तुम्हारे समान पुरुष भी यदि अपने मित्रों का उपकार करके उन्हें प्रसन्न कर दें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिये। 

'सौम्य सुग्रीव! इसी प्रकार तुममें जो मित्रों का हितसाधन रूप कल्याणकारी गुण है, वह आश्चर्य का विषय नहीं है; क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम सदा प्रिय बोलने वाले हो – यह तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। सखे! तुम्हारी सहायता से सनाथ होकर मैं युद्ध में समस्त शत्रुओं को जीत लूँगा। तुम्हीं मेरे हितैषी मित्र हो और मेरी सहायता कर सकते हो। राक्षसाधम रावण ने अपना नाश करने के लिये ही मिथिलेशकुमारी को धोखा देकर उसका अपहरण किया है। ठीक उसी तरह, जैसे अनुलाद ने अपने विनाश के लिये ही पुलोम पुत्री शची को छलपूर्वक हर लिया था। जैसे शत्रुहन्ता इन्द्र ने शची के अहंकारी पिता को मार डाला था, उसी प्रकार मैं भी शीघ्र ही अपने तीखे बाणों से रावण का वध कर डालूँगा।' 

[पुलोम दानव की कन्या शची इन्द्रदेव के प्रति अनुरक्त थीं, परंतु अनुलाद ने उनके पिता को फुसलाकर अपने पक्ष में कर लिया और उसकी अनुमति से शची को हर लिया। जब इन्द्र को इसका पता लगा, तब वे अनुमति देने वाले पुलोम को और अपहरण करने वाले अनुलाद को भी मारकर शची को अपने घर ले आये। यह पुराणप्रसिद्ध कथा है। (रामायणतिलक से)]

श्रीराम और सुग्रीव में जब इस प्रकार बातें हो रही थीं, उसी समय बड़े जोर की धूल उठी, जिसने आकाश में फैलकर सूर्य की प्रचण्ड प्रभा को ढक दिया। फिर तो उस धूलजनित अन्धकार से सम्पूर्ण दिशाएँ दूषित एवं व्याप्त हो गयीं तथा पर्वत, वन और काननों के साथ समूची पृथ्वी डगमग होने लगी। तदनन्तर पर्वतराज के समान शरीर और तीखी दाढ़ वाले असंख्य महाबली वानरों से वहाँ की सारी भूमि आच्छादित हो गयी। 

पलक मारते-मारते अरबों वानरों से घिरे हुए अनेकानेक यूथपतियों ने वहाँ आकर सारी भूमि को ढक लिया। नदी, पर्वत, वन और समुद्र सभी स्थानों के निवासी महाबली वानर जुट गये, जो मेघों की गर्जना के समान उच्च स्वर से सिंहनाद करते थे। कोई बालसूर्य के समान लाल रंग के थे तो कोई चन्द्रमा के समान गौर वर्ण के। कितने ही वानर कमल के केसरों के समान पीले रंग के थे और कितने ही हिमाचलवासी वानर सफेद दिखायी देते थे। 

उस समय परम कान्तिमान् शतबलि नामक वीर वानर दस अरब वानरों के साथ दृष्टिगोचर हुआ। तत्पश्चात् सुवर्णशैल के समान सुन्दर एवं विशाल शरीर वाले तारा के महाबली पिता कई सहस्र कोटि वानरों के साथ वहाँ उपस्थित देखे गये। इसी प्रकार रुमा पिता और सुग्रीव के श्वशुर, जो बड़े वैभवशाली थे, वहाँ उपस्थित हुए। उनके साथ भी दस अरब वानर थे। 

तदनन्तर हनुमानजी के पिता कपिश्रेष्ठ श्रीमान् केसरी दिखायी दिये। उनके शरीर का रंग कमल के केसरों की भाँति पीला और मुख प्रात:काल के सूर्य के समान लाल था। वे बड़े बुद्धिमान् और समस्त वानरों में श्रेष्ठ थे। वे कई सहस्र वानरों से घिरे हुए थे। फिर लंगूर-जाति वाले वानरों के महाराज भयंकर पराक्रमी गवाक्ष का दर्शन हुआ। उनके साथ दस अरब वानरों की सेना थी। शत्रुओं का संहार करने वाले धूम्र भयंकर वेगशाली बीस अरब रीछों की सेना लेकर आये। 

महापराक्रमी यूथपति पनस तीन करोड़ वानरों के साथ उपस्थित हुए। वे सब-के-सब बड़े भयंकर तथा महान् पर्वताकार दिखायी देते थे। यूथपति नील का शरीर भी बड़ा विशाल था। वे नीले कज्जल गिरि के समान नीलवर्ण के थे और दस करोड़ कपियों से घिरे हुए थे। तदनन्तर यूथपति गवय, जो सुवर्णमय पर्वत मेरु के समान कान्तिमान् और महापराक्रमी थे, पाँच करोड़ वानरों के साथ उपस्थित हुए। उसी समय वानरों के बलवान् सरदार दरीमुख भी आ पहुँचे। वे दस अरब वानरों के साथ सुग्रीव की सेवा में उपस्थित हुए थे। अश्विनीकुमारों के महाबली पुत्र मैन्द और द्विविद, ये दोनों भाई भी दस-दस अरब वानरों की सेना के साथ वहाँ दिखायी दिये। 

तदनन्तर महातेजस्वी बलवान् वीर गज तीन करोड़ वानरों के साथ सुग्रीव के पास आया। रीछों के राजा जाम्बवान् बड़े तेजस्वी थे। वे दस करोड़ रीछों से घिरे हुए आये और सुग्रीव के अधीन होकर खड़े हुए। रुमण (रुमण्वान्) नामक तेजस्वी और बलवान् वानर एक अरब पराक्रमी वानरों को साथ लिये बड़ी तीव्र गति से वहाँ आया। इसके बाद यूथपति गन्धमादन उपस्थित हुए। उनके पीछे एक पद्म वानरों की सेना आयी थी। 

तत्पश्चात् युवराज अङ्गद आये। ये अपने पिता के समान ही पराक्रमी थे। इनके साथ एक सहस्र पद्म और सौ शंकु (एक पद्म) वानरों की सेना थी (इनके सैनिकों की कुल संख्या दस शंख एक पद्म थी )। तदनन्तर तारों के समान कान्तिमान् तार नामक वानर पाँच करोड़ भयंकर पराक्रमी वानर वीरों के साथ दूर से आता दिखायी दिया। इन्द्रजानु (इन्द्रभानु) नामक वीर यूथपति, जो बड़ा ही विद्वान् एवं बुद्धिमान् था, ग्यारह करोड़ वानरों के साथ उपस्थित देखा गया। वह उन सबका स्वामी था। इसके बाद रम्भ नामक वानर उपस्थित हुआ, जो प्रात: काल के सूर्य की भाँति लाल रंग का था। उसके साथ ग्यारह हजार एक सौ वानरों की सेना थी। 

तत्पश्चात् वीर यूथपति दुर्मुख नामक बलवान् वानर उपस्थित देखा गया, जो दो करोड़ वानर सैनिकों से घिरा हुआ था। इसके बाद हनुमानजी ने दर्शन दिया। उनके साथ कैलाश शिखर के समान श्वेत शरीर वाले भयंकर पराक्रमी वानर दस अरब की संख्या में मौजूद थे। फिर महापराक्रमी नल उपस्थित हुए, जो एक अरब एक हजार एक सौ द्रुमवासी वानरों से घिरे हुए थे। तदनन्तर श्रीमान् दधिमुख दस करोड़ वानरों के साथ गर्जना करते हुए किष्किन्धा में महात्मा सुग्रीव के पास आये। 

इनके सिवा शरभ, कुमुद, वहिन तथा रह - ये और दूसरे भी बहुत-से इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वानरयूथपति सारी पृथ्वी, पर्वत और वनों को आवृत करके वहाँ उपस्थित हुए, जिनकी कोई गणना नहीं की जा सकती। वहाँ आये हुए सभी वानर पृथ्वी पर बैठे। वे सब-के-सब उछलते कूदते और गर्जते हुए वहाँ सुग्रीव के चारों ओर जमा हो गये। जैसे सूर्य को सब ओर से घेरकर बादलों के समूह छा रहे हों। अपनी भुजाओं से सुशोभित होने वाले बहुतेरे श्रेष्ठ वानरों ने (जो भीड़ के कारण सुग्रीव के पास तक न पहुँच सके थे) अनेक प्रकार की बोली बोलकर तथा मस्तक झुकाकर वानरराज सुग्रीव को अपने आगमन की सूचना दी। 

बहुत-से श्रेष्ठ वानर उनके पास गये और यथोचितरूप से मिलकर लौटे तथा कितने ही वानर सुग्रीव से मिलने के बाद उनके पास ही हाथ जोड़कर खड़े हो गये। धर्म के ज्ञाता वानरराज सुग्रीव ने वहाँ आये हुए उन सब वानरशिरोमणियों का समाचार निवेदन करके श्रीरामचन्द्रजी को शीघ्रतापूर्वक उनका परिचय दिया, फिर हाथ जोड़कर वे उनके सामने खड़े हो गये। उन वानर-यूथपतियों ने वहाँ के पर्वतीय झरनों के आस-पास तथा समस्त वनों में अपनी सेनाओं को यथोचितरूप से सुखपूर्वक ठहरा दिया। तत्पश्चात् सब सेनाओं के ज्ञाता सुग्रीव उनका पूर्णत: ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ हो सके। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-२८(28) समाप्त ! 

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