भाग-२७(27) तारा का लक्ष्मण को युक्तियुक्त वचनों द्वारा शान्त करना, सुग्रीव का लक्ष्मण से क्षमा माँगना और राजा की आज्ञा सुनकर समस्त वानरों का किष्किन्धा के लिये प्रस्थान

 


सुमित्राकुमार लक्ष्मण अपने तेज के कारण प्रज्वलित-से हो रहे थे। वे जब उपर्युक्त बात कह चुके, तब चन्द्रमुखी तारा उनसे बोली - कुमार लक्ष्मण ! आपको सुग्रीव से ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। ये वानरों के राजा हैं; अतः इनके प्रति कठोर वचन बोलना उचित नहीं है। विशेषत: आप जैसे सुहृद् के मुख से तो ये कदापि कटु वचन सुनने के अधिकारी नहीं हैं। वीर! कपिराज सुग्रीव न कृतघ्न हैं, न शठ हैं, न क्रूर हैं, न असत्यवादी हैं और न कुटिल ही हैं। 

‘वीर लक्ष्मण! श्रीरामचन्द्रजी ने इनका जो उपकार किया है, वह युद्ध में दूसरों के लिये दुष्कर है। उसे इन वीर कविराज ने कभी भुलाया नहीं है। शत्रुओं को संताप देने वाले सुमित्रानन्दन ! श्रीरामचन्द्रजी के कृपाप्रसाद से ही सुग्रीव ने वानरों के अक्षय राज्य को, यश को, रुमा को तथा मुझको भी प्राप्त किया है। पहले इन्होंने बड़ा दु:ख उठाया है। अब इस उत्तम सुख को पाकर ये इसमें ऐसे रम गये कि इन्हें प्राप्त हुए समय का ज्ञान ही नहीं रहा। ठीक उसी तरह, जैसे विश्वामित्र मुनि को मेनका में आसक्त हो जाने के कारण समय की सुध- बुध नहीं रह गयी थीं।' 

‘लक्ष्मण! कहते हैं, धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्र ने घृताची (मेनका) नामक अप्सरा में आसक्त होने के कारण दस वर्ष समय को एक दिन ही माना था। काल का ज्ञान रखने वालों में श्रेष्ठ महातेजस्वी विश्वामित्र को भी जब भोगासक्त होने पर काल का ज्ञान नहीं रह गया, तब फिर दूसरे साधारण प्राणी को कैसे रह सकता है? कुमार लक्ष्मण ! आहार, निद्रा और काम आदि जो देह के धर्म हैं, (जो पशुओं में भी समान रूप से पाये जाते हैं) उनमें स्थित हुए ये सुग्रीव पहले तो चिरकाल तक दुःख भोगने के कारण थके-माँदे एवं खिन्न थे। अब भगवान् श्रीराम की कृपा से इन्हें जो काम - भोग प्राप्त हुए हैं, उनसे अभी तक इनकी तृप्ति नहीं हुई ( इसीलिये इनसे कुछ असावधानी हो गयी); अत: परम कृपालु श्रीरघुनाथजी को यहाँ इनका अपराध क्षमा करना चाहिये।' 

‘तात लक्ष्मण! आपको यथार्थ बात जाने बिना साधारण मनुष्य की भाँति सहसा क्रोध के अधीन नहीं होना चाहिये। पुरुषप्रवर! आप-जैसे सत्त्वगुण सम्पन्न पुरुष विचार किये बिना ही सहसा रोष के वशीभूत नहीं होते हैं। धर्मज्ञ! मैं एकाग्र हृदय से सुग्रीव के लिये आपसे कृपा की याचना करती हूँ। आप क्रोध से उत्पन्न हुए इस महान् क्षोभ का परित्याग कीजिये। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय करने के लिये रुमा का, मेरा, कुमार अङ्गद का तथा धन-धान्य और पशुओं सहित सम्पूर्ण राज्य का भी परित्याग कर सकते हैं।' 

'सुग्रीव उस अधम राक्षस का वध करके श्रीराम को सीता से उसी तरह मिलायेंगे, जैसे चन्द्रमा का रोहिणी के साथ संयोग हुआ हो। कहते हैं कि लङ्का में सौ हजार करोड़, छत्तीस अयुत, छत्तीस हजार और छत्तीस सौ राक्षस रहते हैं। वे सब-के-सब राक्षस इच्छानुसार रूप धारण करने वाले तथा दुर्जय हैं। उन सबका संहार किये बिना रावण का, जिसने मिथिलेशकुमारी सीता का अपहरण किया है, वध नहीं हो सकता।' 

‘लक्ष्मण! किसी की सहायता लिये बिना अकेले किसी वीर के द्वारा न तो उन राक्षसों का संग्राम में वध किया जा सकता है और न क्रूरकर्मा रावण का ही। इसलिये सुग्रीव से सहायता लेने की विशेष आवश्यकता है। वानरराज वाली लङ्का के राक्षसों की इस संख्या से परिचित थे, उन्हींने मुझे उनकी इस तरह गणना बतायी थी। रावण ने इतनी सेना का संग्रह कैसे किया? यह तो मुझे नहीं मालूम है। किंतु इस संख्या को मैंने उनके मुँह से सुना था। वह इस समय मैं आपको बता रही हूँ। आपकी सहायता के लिये सुग्रीव ने बहुतेरे श्रेष्ठ वानरों को युद्ध के निमित्त असंख्य वानर वीरों की सेना एकत्र करने के लिये भेज रखा है।' 

'वानरराज सुग्रीव उन महाबली और पराक्रमी वीरों के आनेकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। अतएव भगवान् श्रीराम का कार्य सिद्ध करने के लिये अभी नगर से बाहर नहीं निकल सके हैं। सुमित्रानन्दन! सुग्रीव ने उन सबके एकत्र होने के लिये पहले से ही जो अवधि निश्चित कर रखी है, उसके अनुसार उन समस्त महाबली वानरों को आज ही यहाँ उपस्थित हो जाना चाहिये। शत्रुदमन लक्ष्मण! आज आपकी सेवा में कोटि सहस्र (दस अरब ) रीछ, सौ करोड़ (एक अरब) लंगूर तथा और भी बढ़े हुए तेज वाले कई करोड़ वानर उपस्थित होंगे। इसलिये आप क्रोध को त्याग दीजिये। आपका मुख क्रोध से तमतमा उठा है और आँखें रोष से लाल हो गयी हैं। यह सब देखकर हम वानरराज की स्त्रियों को शान्ति नहीं मिल रही है। हम सबको प्रथम भय ( वालिबध) के समान ही किसी अनिष्ट की आशङ्का हो रही है।' 

तारा ने जब इस प्रकार धर्म के अनुकूल विनययुक्त बात कही, तब कोमल स्वभाव वाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उसे मान लिया (क्रोध को त्याग दिया )। उनके द्वारा तारा की बात मान ली जाने पर वानरयूथपति सुग्रीव ने लक्ष्मण से प्राप्त होने वाले महान् भय को भीगे हुए वस्त्र की भाँति त्याग दिया। तदनन्तर वानरराज सुग्रीव ने अपने कण्ठ में पड़ी हुई फूलों की विचित्र, विशाल एवं बहुगुण सम्पन्न माला तोड़ डाली और वे मद से रहित हो गये। 

फिर समस्त वानरों में शिरोमणि सुग्रीव ने भयंकर बलशाली लक्ष्मण का हर्ष बढ़ाते हुए उनसे यह विनययुक्त बात कही -सुमित्राकुमार! मेरी श्री, कीर्ति तथा सदा से चला आता हुआ वानरों का राज्य – ये सब नष्ट हो चुके थे। भगवान् श्रीराम की कृपा से ही मुझे पुन: इन सबकी प्राप्ति हुई है। राजकुमार ! वे भगवान् श्रीराम अपने कर्मों से ही सर्वत्र विख्यात हैं। उनके उपकार का वैसा ही बदला अंशमात्र से भी कौन चुका सकता है? 

'धर्मात्मा श्रीराम अपने ही तेज से रावण का वध करेंगे और सीता को प्राप्त कर लेंगे। मैं तो उनका एक तुच्छ सहायक मात्र रहूँगा। जिन्होंने एक ही बाण से सात बड़े-बड़े ताल वृक्ष, पर्वत, पृथ्वी, पाताल और वहाँ रहने वाले दैत्यों को भी विदीर्ण कर दिया था, उनको दूसरे किसी सहायक की आवश्यकता भी क्या है? लक्ष्मण! जिनके धनुष खींचते समय उसकी टंकार से पर्वतों सहित पृथ्वी काँप उठी थी, उन्हें सहायकों से क्या लेना है?' 

'नरश्रेष्ठ! मैं तो बैरी रावण का वध करने के लिये अग्रगामी सैनिकों सहित यात्रा करने वाले महाराज श्रीराम के पीछे-पीछे चलूँगा। विश्वास अथवा प्रेम के कारण यदि कोई अपराध बन गया हो तो मुझ दास के उस अपराध को क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि ऐसा कोई सेवक नहीं है, जिससे कभी कोई अपराध होता ही न हो।' 

महात्मा सुग्रीव के ऐसा कहने पर लक्ष्मण प्रसन्न हो गये और बड़े प्रेम से इस प्रकार बोले - वानरराज सुग्रीव! विशेषत: तुम जैसे विनयशील सहायक को पाकर मेरे भाई श्रीराम सर्वथा सनाथ हैं। सुग्रीव! तुम्हारा जो प्रभाव है और तुम्हारे हृदय में जो इतना शुद्ध भाव है, इससे तुम वानरराज्य की परम उत्तम लक्ष्मी का सदा ही उपभोग करने के अधिकारी हो। सुग्रीव! तुम्हें सहायक के रूप में पाकर प्रतापी श्रीराम रणभूमि में अपने शत्रुओं का शीघ्र ही वध कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है। 

'सुग्रीव! तुम धर्मज्ञ, कृतज्ञ तथा युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले हो। तुम्हारा यह भाषण सर्वथा युक्ति संगत और उचित है। वानरशिरोमणे! तुमको और मेरे बड़े भाई को छोड़कर दूसरा कौन ऐसा विद्वान् है, जो अपने में सामर्थ्य होते हुए भी ऐसा नम्रतापूर्ण वचन कह सके। कपिराज! तुम बल और पराक्रम में भगवान् श्रीराम के बराबर हो । देवताओं ने ही हमें दीर्घकाल के लिये तुम- जैसा सहायक प्रदान किया है। किंतु वीर! अब तुम शीघ्र ही मेरे साथ इस पुरी से बाहर निकलो। तुम्हारे मित्र अपनी पत्नी के अपहरण से बहुत दु:खी हैं। उन्हें चलकर सान्त्वना दो। सखे! शोकमग्न श्रीराम के वचनों को सुनकर जो मैंने तुम्हारे प्रति कठोर बातें कह दी हैं, उनके लिये मुझे क्षमा करो।' 

महात्मा लक्ष्मण ने जब ऐसा कहा, तब सुग्रीव अपने पास ही खड़े हुए हनुमानजी से यों बोले – महेन्द्र, हिमवान्, विन्ध्य, कैलाश तथा श्वेत शिखर वाले मन्दराचल – इन पाँच पर्वतों के शिखरों पर जो श्रेष्ठ वानर रहते हैं, पश्चिम दिशा में समुद्र के परवर्ती तट पर प्रात: कालिक सूर्य के समान कान्तिमान् और नित्य प्रकाश मान पर्वतों पर जिन वानरों का निवास है, भगवान् सूर्य के निवास स्थान तथा संध्या कालिक मेघसमूह के समान अरुण वर्ण वाले उदयाचल एवं अस्ताचल पर जो वानर वास करते हैं, पद्माचलवर्ती वन का आश्रय लेकर जो भयानक पराक्रमी वानर-शिरोमणि निवास करते हैं, अञ्जनपर्वत पर जो काजल और मेघ के समान काले तथा गजराज के समान महाबली वानर रहते हैं, बड़े-बड़े पर्वतों की गुफाओं में निवास करने वाले तथा मेरुपर्वत के आस-पास रहने वाले जो सुवर्ण की-सी कान्ति वाले वानर हैं, जो धूम्रगिरि का आश्रय लेकर रहते हैं, मैरेय मधु का पान करते हुए जो महारुण पर्वत पर प्रात:काल के सूर्य की भाँति लाल रंग के भयानक वेगशाली वानर निवास करते हैं तथा सुगन्ध से परिपूर्ण एवं तपस्वियों के आश्रमों से सुशोभित बड़े-बड़े रमणीय वनों और वनान्तों में चारों ओर जो वानर रहते हैं, भूमण्डल के उन सभी वानरों को तुम शीघ्र यहाँ ले आओ। शक्तिशाली तथा अत्यन्त वेगवान् वानरों को भेजकर उनके द्वारा साम, दान आदि उपायों का प्रयोग करके उन सबको यहाँ बुलवाओ। 

‘मेरी आज्ञा से पहले जो महान् वेगशाली वानर भेजे गये हैं, उनको जल्दी करने के लिये प्रेरणा देने के निमित्त तुम पुन: दूसरे श्रेष्ठ वानरों को भेजो। जो वानर काम भोग में फँसे हुए हों तथा जो दीर्घसूत्री (प्रत्येक कार्य को विलम्ब से करने वाले) हों, उन सभी कपीश्वरों को शीघ्र यहाँ ले आओ। जो मेरी आज्ञा से दस दिन के भीतर यहाँ न आ जायँ, राजाज्ञा को कलङ्कित करने वाले उन दुरात्मा वानरों को मार डालना चाहिये। जो मेरी आज्ञा के अधीन रहते हों, ऐसे सैकड़ों, हजारों तथा करोड़ों वानरसिंह मेरे आदेश से जायँ।' 

'जो मेघ और पर्वत के समान अपने विशाल शरीर से आकाश को आच्छादित-सा कर लेते हैं, वे घोर रूपधारी श्रेष्ठ वानर मेरा आदेश मानकर यहाँ से यात्रा करें। वानरों के निवासस्थानों को जानने वाले सभी वानर तीव्र गति से भूमण्डल में चारों ओर जाकर मेरे आदेश से उन- उन स्थानों के सम्पूर्ण वानरगणों को तुरंत यहाँ ले आवें।' 

वानरराज सुग्रीव की बात सुनकर वायुपुत्र हनुमानजी ने सम्पूर्ण दिशाओं में बहुत-से पराक्रमी वानरों को भेजा। राजा की आज्ञा पाकर वे सब वानर तत्काल आकाश में पक्षियों और नक्षत्रों के मार्ग से चल दिये। उन वानरों ने समुद्रों के किनारे, पर्वतों पर, वनों में और सरोवरों के तटों पर रहने वाले समस्त वानरों को श्रीरामचन्द्रजी का कार्य करने के लिये चलने को कहा। अपने सम्राट् सुग्रीव का, जो मृत्यु एवं काल के समान भयानक दण्ड देने वाले थे, आदेश सुनकर वे सभी वानर उनके भय से थर्रा उठे और तुरंत ही किष्किन्धा की ओर प्रस्थित हुए। 

तदनन्तर कज्जल गिरि से काजल के ही समान काले और महान् बलवान् तीन करोड़ वानर उस स्थान पर जाने के लिये निकले, जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे। जहाँ सूर्यदेव अस्त होते हैं, उस श्रेष्ठ पर्वत पर रहने वाले दस करोड़ वानर, जिनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्ण के समान थी, वहाँ से किष्किन्धा के लिये चले। कैलाश के शिखरों से सिंह के अयाल की-सी श्वेत कान्ति वाले दस अरब वानर आये। जो हिमालय पर रहकर फल मूल से जीवननिर्वाह करते थे, वे वानर एक नील की संख्या में वहाँ आये।  

विन्ध्याचल पर्वत से मङ्गल के समान लाल रंग वाले भयानक पराक्रमी भयंकर रूप धारी वानरों की दस अरब सेना बड़े वेग से किष्किन्धा में आयी। क्षीरसमुद्र के किनारे और तमालवन में नारियल खाकर रहने वाले वानर इतनी अधिक संख्या में आये कि उनकी गणना नहीं हो सकती थी। वनों से, गुफाओं से और नदियों के किनारों से असंख्य महाबली वानर एकत्र हुए। वानरों की वह सारी सेना सूर्यदेव को पीती (आच्छादित करती हुई-सी आयी। जो वानर समस्त वानरों को शीघ्र आने के लिये प्रेरित करने के निमित्त किष्किन्धा से दुबारा भेजे गये थे, उन वीरों ने हिमालय पर्वत पर उस प्रसिद्ध विशाल वृक्ष को देखा (जो भगवान् शंकर की यज्ञशाला में स्थित था )। 

उस पवित्र एवं श्रेष्ठ पर्वत पर पूर्वकाल में भगवान् शंकर का यज्ञ हुआ था, जो सम्पूर्ण देवताओं के मन को संतोष देने वाला और अत्यन्त मनोरम था। उस पर्वत पर खीर आदि अन्न (होमद्रव्य) से घृत आदि का स्राव हुआ था, उससे वहाँ अमृत के समान स्वादिष्ट फल और मूल उत्पन्न हुए थे। उन फलों को उन वानरों ने देखा। उक्त अन्न से उत्पन्न हुए उस दिव्य एवं मनोहर फल- मूल को जो कोई एक बार खा लेता था, वह एक मास तक उससे तृप्त बना रहता था। 

फलाहार करने वाले उन वानरशिरोमणियों ने उन दिव्य मूल- फलों और दिव्य औषधों को अपने साथ ले लिया। वहाँ जाकर उस यज्ञ-मण्डप से वे सब वानर सुग्रीव का प्रिय करने के लिये सुगन्धित पुष्प भी लेते आये। वे समस्त श्रेष्ठ वानर भूमण्डल के सम्पूर्ण वानरों को तुरंत चलने का आदेश देकर उनके यूथों के पहुँचने के पहले ही सुग्रीव के पास आ गये। वे शीघ्रगामी वानर उसी मुहूर्त में चलकर बड़ी उतावली के साथ किष्किन्धापुरी में जहाँ वानरराज सुग्रीव थे, जा पहुँचे। 

उस सम्पूर्ण ओषधियों और फल - मूलों को लेकर उन वानरों ने सुग्रीव की सेवा में अर्पित कर दिया और इस प्रकार कहा -  महाराज! हम लोग सभी पर्वतों, नदियों और वनों में घूम आये। भूमण्डल के समस्त वानर आपकी आज्ञा से यहाँ आ रहे हैं। 

यह सुनकर वानरराज सुग्रीव को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उनकी दी हुई सारी भेंट - सामग्री सानन्द ग्रहण की।

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-२७(27) समाप्त ! 

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