भाग-२६(26) लक्ष्मण का किष्किन्धा पुरी की शोभा देखते हुए सुग्रीव के महल में प्रवेश करके क्रोध पूर्वक धनुष को टंकारना, भयभीत सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्त: पुर में ले आना

 


इधर गुफा में प्रवेश करने के लिये अङ्गद के प्रार्थना करने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले लक्ष्मण ने श्रीराम की आज्ञा के अनुसार किष्किन्धा नामक रमणीय गुफा में प्रवेश किया। किष्किन्धा के द्वार पर जो विशाल शरीर वाले महाबली वानर थे, वे सब लक्ष्मण को देख हाथ जोड़कर खड़े हो गये। 

दशरथनन्दन लक्ष्मण को क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचते देख वे सब वानर अत्यन्त भयभीत हो गये थे। इसलिये वे उन्हें चारों ओर से घेरकर उनके साथ-साथ नहीं चल सके। श्रीमान् लक्ष्मण ने द्वार के भीतर प्रवेश करके देखा, किष्किन्धा पुरी एक बहुत बड़ी रमणीय गुफा के रूप में बसी हुई है। वह रत्नमयी पुरी नाना प्रकार के रत्नों से भरी-पूरी होने के कारण दिव्य शोभा से सम्पन्न है। वहाँ के वन-उपवन फूलों से सुशोभित दिखायी दिये। 

हय (धनियों की अट्टालिकाओं) तथा प्रासादों (देवमन्दिरों और राजभवनों) से वह पुरी अत्यन्त घनी दिखायी देती थी। नाना प्रकार के रत्न उसकी शोभा बढ़ाते थे। सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले फलों से युक्त खिले हुए वृक्षों से वह पुरी सुशोभित थी। वहाँ दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करने वाले परम सुन्दर वानर, जो देवताओं और गन्धर्वो के पुत्र तथा इच्छानुसार रूप धारण करने वाले थे, निवास करते हुए उस नगरी की शोभा बढ़ाते थे। वहाँ चन्दन, अगर और कमलों की मनोहर सुगन्ध छा रही थी। उस पुरी की लंबी-चौड़ी सड़कें भी मैरेय तथा मधु के आमोद से महक रही थीं। 

उस पुरी में विन्ध्याचल तथा मेरु के समान ऊँचे-ऊँचे महल बने थे, जो कई मंजिल के थे। लक्ष्मण ने उस गुफा के निकट ही निर्मल जल से भरी हुई पहाड़ी नदियाँ देखीं। उन्होंने राजमार्ग पर अङ्गद का रमणीय भवन देखा। साथ ही वहाँ मैन्द, द्विविद, गवय, गवाक्ष, गज, शरभ, विद्युन्माली, सम्पाति, सूर्याक्ष, हनुमान्, वीरबाहु, सुबाहु, महात्मा नल, कुमुद, सुषेण, तार, जाम्बवान्, दधिमुख, नील, सुपाटल और सुनेत्र – इन महामनस्वी वानर शिरोमणियों के भी अत्यन्त सुदृढ़ श्रेष्ठ भवन लक्ष्मण को दृष्टिगोचर हुए। वे सब-के-सब राजमार्ग पर ही बने हुए थे। 

वे सभी भवन श्वेत बादलों के समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें सुगन्धित पुष्पमालाओं से सजाया गया था। वे प्रचुर धन-धान्य से सम्पन्न तथा रत्नस्वरूपा रमणियों से सुशोभित थे। वानरराज सुग्रीव का सुन्दर भवन इन्द्रसदन के समान रमणीय दिखायी देता था। उसमें प्रवेश करना किसी के लिये भी अत्यन्त कठिन था। वह श्वेत पर्वत की चहार दीवारी से घिरा हुआ था। कैलाश-शिखर के समान श्वेत प्रासाद-शिखर तथा समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाले फलों से युक्त पुष्पित दिव्य वृक्ष उस राजभवन की शोभा बढ़ाते थे। 

वहाँ इन्द्र के दिये हुए दिव्य फल-फूलों से सम्पन्न मनोरम वृक्ष लगाये गये थे, जो परम सुन्दर, नीले मेघ के समान श्याम तथा शीतल छाया से युक्त थे। अनेक बलवान् वानर हाथों में हथियार लिये उसकी ड्योढ़ी पर पहरा दे रहे थे। वह सुन्दर महल दिव्य मालाओं से अलंकृत था और उसका बाहरी फाटक पक्के सोने का बना हुआ था। 

महाबली सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने सुग्रीव के उस रमणीय भवन में प्रवेश किया। मानो सूर्यदेव महान् मेघ के भीतर प्रविष्ट हुए हों। उस समय किसी ने रोक-टोक नहीं की। धर्मात्मा लक्ष्मण ने सवारियों तथा विविध आसनों से सुशोभित उस भवन की सात ड्योढ़ियों को पार करके बहुत ही गुप्त और विशाल अन्त:पुर को देखा। उसमें जहाँ-तहाँ चाँदी और सोने के बहुत से पलंग तथा अनेकानेक श्रेष्ठ आसन रखे हुए थे और उन सब पर बहुमूल्य बिछौने बिछे थे। उन सबसे वह अन्त: पुर सुसज्जित दिखायी देता था। 

उसमें प्रवेश करते ही लक्ष्मण के कानों में संगीत की मीठी तान सुनायी पड़ी, जो वहाँ निरन्तर गूँज रही थी। वीणा के लय पर कोई कोमल कण्ठ से गा रहा था। प्रत्येक पद और अक्षर का उच्चारण सम - ताल का प्रदर्शन करते हुए हो रहा था। महाबली लक्ष्मण ने सुग्रीव के उस अन्त: पुर में अनेक रूपरंग की बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ देखीं, जो रूप और यौवन गर्व से भरी हुई थीं। वे सब-की-सब उत्तम कुल में उत्पन्न हुई थीं, फूलों के गजरों से अलंकृत थीं, उत्तम पुष्पहारों के निर्माण में लगी हुई थीं और सुन्दर आभूषणों से विभूषित थीं। 

उन सबको देखकर लक्ष्मण ने सुग्रीव के सेवकों पर भी दृष्टिपात किया, जो अतृप्त या असंतुष्ट नहीं थे। स्वामी के कार्य सिद्ध करने के लिये अत्यन्त फुर्ती की भी उनमें कमी नहीं थी तथा उनके वस्त्र और आभूषण भी निम्न श्रेणी के नहीं थे। नूपुरों की झनकार और करधनी की खनखनाहट सुनकर श्रीमान् सुमित्राकुमार लज्जित हो गये (परायी स्त्रियों पर दृष्टि पड़ने के कारण उन्हें स्वभावत: संकोच हुआ )। तत्पश्चात् पुनः आभूषणों की झनकार सुनकर वीर लक्ष्मण रोष के आवेग से और भी कुपित हो उठे और उन्होंने अपने धनुष पर टंकार दी, जिसकी ध्वनि से समस्त दिशाएँ गूंज उठीं। 

रघुकुलोचित सदाचार का विचार करके महाबाहु लक्ष्मण कुछ पीछे हट गये और एकान्त में जाकर खड़े हो गये। श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये वहाँ कोई प्रयत्न होता न देख वे मन-ही-मन कुपित हो रहे थे। धनुष की टंकार सुनकर वानरराज सुग्रीव समझ गये कि लक्ष्मण यहाँ तक आ पहुँचे हैं। फिर तो वे भय से संत्रस्त होकर अपना सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये। वे मन-ही-मन सोचने लगे कि अङ्गद ने पहले मुझे जैसा बताया था, उसके अनुसार ये भ्रातृवत्सल सुमित्राकुमार लक्ष्मण अवश्य ही यहाँ आ गये। अङ्गद के द्वारा उनके आगमन का समाचार तो उन्हें पहले ही मिल गया था। अब धनुष की टंकार से वानर सुग्रीव को इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव हो गया कि लक्ष्मण ने अवश्य यहाँ पदार्पण किया है। फिर तो उनका मुख सूख गया। 

भय के कारण वे मन-ही-मन घबरा उठे। (लक्ष्मण के सामने जाने का उन्हें साहस न हुआ ।) तथापि किसी तरह धैर्य धारण करके वानरश्रेष्ठ सुग्रीव परम सुन्दरी तारा से हित की बात बोले – देवी तारा ! इनके रोष का क्या कारण हो सकता है? जिससे स्वभावत: कोमल चित्त होने पर भी ये श्रीरघुनाथजी के छोटे भाई रुष्ट से होकर यहाँ पधारे हैं। अनिन्दिते! तुम्हारे देखने में कुमार लक्ष्मण के रोष का आधार क्या है? ये मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं। अत: बिना किसी कारण के निश्चय ही क्रोध नहीं कर सकते। 

‘यदि हम लोगों ने इनका कोई अपराध किया हो और तुम्हें उसका पता हो तो अपनी बुद्धि से विचार कर शीघ्र ही बताओ। अथवा भामिनि ! तुम स्वयं ही जाकर लक्ष्मण को देखो और सान्त्वनायुक्त बातें कहकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करो। उनका हृदय शुद्ध है। तुम्हारे सामने वे क्रोध नहीं करेंगे; क्योंकि महात्मा पुरुष स्त्रियों के प्रति कभी कठोर बर्ताव नहीं करते हैं। जब तुम उनके पास जाकर मीठे वचनों से उन्हें शान्त कर दोगी और जब उनका मन स्वस्थ एवं इन्द्रियाँ प्रसन्न हो जायँगी, उस समय मैं उन शत्रुदमन कमलनयन लक्ष्मण का दर्शन करूँगा।' 

सुग्रीव के ऐसा कहने पर शुभलक्षणा तारा लक्ष्मण के पास गयी। उसका पतला शरीर स्वाभाविक संकोच एवं विनय से झुका हुआ था। उसके नेत्र मद से चञ्चल हो रहे थे, पैर लड़खड़ा रहे थे और उसकी करधनी के सुवर्णमय सूत्र लटक रहे थे। वानरराज की पत्नी तारा पर दृष्टि पड़ते ही राजकुमार महात्मा लक्ष्मण अपना मुँह नीचा करके उदासीन भाव से खड़े हो गये। स्त्री के समीप होने से उनका क्रोध दूर हो गया। मधुपान के कारण तारा की नारीसुलभ लज्जा निवृत्त हो गयी थी । 

उसे राजकुमार लक्ष्मण की दृष्टि में कुछ प्रसन्नता का आभास मिला। इसलिये उसने स्नेहजनित निर्भीकता के साथ महान् अर्थ से युक्त यह सान्त्वनापूर्ण बात कही – राजकुमार ! आपके क्रोध का क्या कारण है? कौन आपकी आज्ञा के अधीन नहीं है? कौन निडर होकर सूखे वृक्षों से भरे हुए वन के भीतर चारों ओर फैलते हुए दावानल में प्रवेश कर रहा है ?

तारा के इस वचन में सान्त्वना भरी थी। उसमें अधिक प्रेमपूर्वक हृदय का भाव प्रकट किया गया था। उसे सुनकर लक्ष्मण के हृदयकी आशङ्का जाती रही। वे कहने लगे - अपने स्वामी के हित में संलग्न रहने वाली तारा! सुग्रीव विषय-भोग में आसक्त होकर धर्म और अर्थ के संग्रह का लोप कर रहा है। क्या तुम्हें इसकी इस अवस्था का पता नहीं है? तुम इसे समझाती क्यों नहीं? तारे! सुग्रीव अपने राज्य की स्थिरता के लिये ही प्रयास करता है। हम लोग शोक में डूबे हुए हैं, परंतु हमारी इसे तनिक भी चिन्ता नहीं होती है। यह अपने मन्त्रियों तथा राज- सभा के सदस्यों सहित केवल विषय-भोगों का ही सेवन कर रहा है। 

‘वानरराज सुग्रीव ने चार महीनों की अवधि निश्चित की थी। वे कभी बीत गये, परंतु वह मधुपान के मद से अत्यन्त उन्मत्त होकर स्त्रियों के साथ क्रीडा - विहार कर रहा है। उसे बीते हुए समय का पता ही नहीं है। धर्म और अर्थ की सिद्धि के निमित्त प्रयत्न करने वाले पुरुष के लिये इस तरह मद्यपान अच्छा नहीं माना जाता है; क्योंकि मद्यपान से अर्थ, धर्म और काम तीनों का नाश होता है। मित्रके किये हुए उपकार का यदि अवसर आने पर भी बदला न चुकाया जाय तो धर्म की हानि तो होती ही है। गुणवान् मित्र के साथ मित्रता का नाता टूट जाने पर अपने अर्थ की भी बहुत बड़ी हानि उठानी पड़ती है। 

‘मित्र दो प्रकार के होते हैं - एक तो अपने मित्र के अर्थसाधन में तत्पर होता है और दूसरा सत्य एवं धर्म ही आश्रित रहता है। तुम्हारे स्वामी ने मित्र के दोनों ही गुणों का परित्याग कर दिया है। वह न तो मित्र का कार्य सिद्ध करता है और न स्वयं ही धर्म में स्थित है। ऐसी स्थिति में प्रस्तुत कार्य की सिद्धि के लिये हम लोगों को भविष्य में क्या करना चाहिये? हमारे लिये जो समुचित कर्तव्य हो, उसे तुम्हीं बताओ; क्योंकि तुम कार्य के तत्त्व को जानती हो।' 

लक्ष्मण का वचन धर्म और अर्थ के निश्चय से संयुक्त था। उससे उनके मधुर स्वभाव का परिचय मिल रहा था। उसे सुनकर तारा भगवान्श्री रामचन्द्रजी के कार्य के विषय में, जिसका प्रयोजन उसे ज्ञात हो चुका था, पुन: लक्ष्मण से विश्वास के योग्य बात बोली - वीर राजकुमार! यह क्रोध करने का समय नहीं है। आत्मीय जनों पर क्रोध करना भी नहीं चाहिये। सुग्रीव के मन में सदा आपका कार्य सिद्ध करने की इच्छा बनी रहती है। अतः यदि उनसे कोई भूल भी हो जाय तो उसे आपको क्षमा करना चाहिये। 

'कुमार! गुणों में श्रेष्ठ पुरुष किसी हीन गुण वाले प्राणी पर क्रोध कैसे कर सकता है? जो सत्त्वगुण से अवरुद्ध होने के कारण शास्त्र - विपरीत व्यापार में लग नहीं सकता, अतएव जो सद्विचार को जन्म देने वाला है, वह आप जैसा कौन पुरुष क्रोध के वशीभूत हो सकता है? वानरवीर सुग्रीव के मित्र भगवान् श्रीराम के क्रोध का कारण मैं जानती हूँ। उनके कार्य में जो विलम्ब हुआ है, उससे भी मैं अपरिचित नहीं हूँ। सुग्रीव का जो कार्य आपके अधीन था और जिसे आप लोगों ने पूरा किया है, उसका भी मुझे पता है तथा इस समय जो आपका कार्य प्रस्तुत है, उसके विषय में हम लोगों का क्या कर्तव्य है, इसका भी मुझे अच्छी तरह ज्ञान है।' 

‘नरश्रेष्ठ! इस शरीर में उत्पन्न हुए काम का जो असह्य बल है, उसको भी मैं जानती हूँ तथा उस काम द्वारा आबद्ध होकर सुग्रीव जहाँ आसक्त हो रहे हैं, वह भी मुझे मालूम है। साथ ही इस बात से भी मैं परिचित हूँ कि कामासक्ति के कारण ही इन दिनों सुग्रीव का मन दूसरे किसी कार्य में नहीं लगता। आप जो क्रोध के वशीभूत हो गये हैं, इससे जान पड़ता है कि काम के अधीन हुए पुरुष की स्थिति का आपको बिलकुल ज्ञान नहीं है, वानर की तो बात ही क्या है ? कामासक्त मनुष्य को भी देश, काल, अर्थ और धर्म का ज्ञान नहीं रह जाता। उनकी ओर उसकी दृष्टि नहीं जाती है।' 

'विपक्षी वीरों का विनाश करने वाले राजकुमार ! वानरराज सुग्रीव विषय-भोग में आसक्त होकर इस समय रुमा के ही पास थे। काम के आवेश में उन्होंने अपनी लज्जा का परित्याग कर दिया है, तो भी उन्हें अपना भाई समझकर क्षमा कीजिये। जो निरन्तर धर्म और तपस्या में ही संलग्न रहते हैं, जिन्होंने मोह को अवरुद्ध कर दिया है - अविवेक को दूर भगा दिया है, वे महर्षि भी कभी-कभी विषयाभिलाषी हो जाते हैं; फिर जो स्वभाव से ही चञ्चल वानर हैं, वह राजा सुग्रीव सुख-भोग में क्यों न आसक्त हों?'

अप्रमेय शक्तिशाली लक्ष्मण से इस प्रकार महान् अर्थ से युक्त बात कहकर मद से चञ्चल नेत्र वाली वानरपत्नी तारा ने पुनः खेदपूर्वक वानरराज के लिये यह हितकर वचन कहा – नरश्रेष्ठ! यद्यपि सुग्रीव इस समय काम के वशीभूत हो रहे हैं, तथापि इन्होंने आपका कार्य सिद्ध करने के लिये बहुत पहले से ही उद्योग आरम्भ करने की आज्ञा दे रखी है। इसके फलस्वरूप इस समय विभिन्न पर्वतों पर निवास करने वाले लाखों और करोड़ों वानर, जो इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ एवं महान् पराक्रमी हैं, यहाँ उपस्थित हुए हैं। 

'महाबाहो ! (दूसरे की स्त्रियों को देखना अनुचित समझकर जो आप भीतर नहीं आये, बाहर ही खड़े रह गये- इसके द्वारा) आपने सदाचार की रक्षा की है; अत: अब भीतर आइये। मित्रभाव से स्त्रियों की ओर देखना (उनके प्रति माता-बहन आदि का भाव रखकर दृष्टि डालना) सत्पुरुषों के लिये अधर्म नहीं है।' 

तारा के आग्रह और कार्य की शीघ्रता से प्रेरित होकर शत्रुदमन महाबाहु लक्ष्मण सुग्रीव के महल के भीतर गये। वहाँ जाकर उन्होंने देखा, एक सोने के सिंहासन पर बहुमूल्य बिछौना बिछा है और वानरराज सुग्रीव सूर्यतुल्य तेजस्वी रूप धारण किये उसके ऊपर विराजमान हैं। उस समय दिव्य आभूषणों के कारण उनके शरीर की विचित्र शोभा हो रही थी। दिव्यरूपधारी यशस्वी सुग्रीव दिव्य मालाएँ और दिव्य वस्त्र धारण करके दुर्जय वीर देवराज इन्द्र के समान दिखायी दे रहे थे। 

दिव्य आभूषणों और मालाओं से अलंकृत युवती स्त्रियाँ उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़ी थीं। उन्हें इस अवस्था में देख लक्ष्मण के नेत्र रोषावेश के कारण लाल हो गये। वे उस समय यमराज के समान भयंकर प्रतीत होने लगे। सुन्दर सुवर्ण के समान कान्ति और विशाल नेत्र वाले वीर सुग्रीव अपनी पत्नी रुमा को गाढ आलिङ्गन पाश में बाँधे हुए एक श्रेष्ठ आसन पर विराजमान थे। उसी अवस्था में उन्होंने उदार हृदय और विशाल नेत्र वाले सुमित्रा कुमार लक्ष्मण को देखा। 

लक्ष्मण बेरोक-टोक भीतर घुस आये थे। उन पुरुषशिरोमणि को क्रोधसे भरा देख सुग्रीव की सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं। दशरथ पुत्र लक्ष्मण रोषपूर्वक लंबी साँस खींच रहे थे और तेज से प्रज्वलित-से जान पड़ते थे। अपने भाई के कष्ट से उनके मन में बड़ा संताप था। उन्हें सामने आया देख वानरश्रेष्ठ सुग्रीव सुवर्ण का सिंहासन छोड़कर कूद पड़े, मानो देवराज इन्द्र का भलीभाँति सजाया हुआ महान् ध्वज आकाश से पृथ्वी पर उतर आया हो। 

सुग्रीव के उतरते ही रुमा आदि स्त्रियाँ भी उनके पीछे उस सिंहासन से उतरकर खड़ी हो गयीं। जैसे आकाश में पूर्ण चन्द्रमा का उदय होने पर तारों के समुदाय भी उदित हो गये हों। श्रीमान् सुग्रीव के नेत्र मद से लाल हो रहे थे। वे टहलते हुए लक्ष्मण के पास आये और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। लक्ष्मण वहाँ महान् कल्पवृक्ष के समान स्थित थे। सुग्रीव के साथ उनकी पत्नी रुमा भी थी। वे स्त्रियों के बीच में खड़े होकर तारिकाओं से घिरे हुए चन्द्रमा की भाँति शोभा पाते थे। 

उन्हें देखकर लक्ष्मण ने क्रोधपूर्वक कहा – वानरराज! धैर्यवान्, कुलीन, दयालु, जितेन्द्रिय और सत्यवादी राजा का ही संसार में आदर होता है। जो राजा अधर्म में स्थित होकर उपकारी मित्रों के सामने की हुई अपनी प्रतिज्ञा को झूठी कर देता है, उससे बढ़कर अत्यन्त क्रूर कौन होगा? अश्वदान की प्रतिज्ञा करके उसकी पूर्ति न करने पर 'अश्वानृत' (अश्वविषयक असत्य) नामक पाप होता है। यह पाप बन जाने पर मनुष्य सौ अश्वों की हत्या के पाप का भागी होता है। इसी प्रकार गोदानविषयक प्रतिज्ञा को मिथ्या कर देने पर सहस्र गौओं के वध का पाप लगता है तथा किसी पुरुष के समक्ष उसका कार्य पूर्ण कर देने की प्रतिज्ञा करके जो उसकी पूर्ति नहीं करता है, वह पुरुष आत्मघात और स्वजन वध के पाप का भागी होता है। (फिर जो परम पुरुष श्रीराम के समक्ष की हुई प्रतिज्ञा को मिथ्या करता है, उसके पाप की कोई इयत्ता नहीं हो सकती)। 

‘वानरराज! जो पहले मित्रों के द्वारा अपना कार्य सिद्ध करके बदले में उन मित्रों का कोई उपकार नहीं करता है, वह कृतघ्न एवं सब प्राणियों के लिये वध्य है। कपिराज! किसी कृतघ्न को देखकर कुपित हुए ब्रह्माजी ने सब लोगों के लिये आदरणीय यह एक श्लोक कहा है, इसे सुनो। गोहत्यारे, शराबी, चोर और व्रत-भंग करने वाले पुरुष के लिये सत्पुरुषों ने प्रायश्चित्त का विधान किया है; किंतु कृतघ्न के उद्धार का कोई उपाय नहीं है।' 

‘वानर! तुम अनार्य, कृतघ्न और मिथ्यावादी हो; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजी की सहायता से तुमने पहले अपना कार्य तो बना लिया, किंतु जब उनके लिये सहायता करने का अवसर आया, तब तुम कुछ नहीं करते। वानर! तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो चुका है; अतः अब तुम्हें प्रत्युपकार की इच्छा से श्रीराम की पत्नी सीता की खोज के लिये प्रयत्न करना चाहिये।' 

'परंतु तुम्हारी दशा यह है कि अपनी प्रतिज्ञा को झूठी करके ग्राम्यभोगों में आसक्त हो रहे हो । श्रीरामचन्द्रजी यह नहीं जानते हैं कि तुम मेढक की-सी बोली बोलने वाले सर्प हो (जैसे साँप अपने मुँह में किसी मेढक को जब दबा लेता है, तब केवल मेढक ही बोलता है, दूर के लोग उसे मेढक ही समझते हैं; परंतु वह वास्तव में सर्प होता है। वही दशा तुम्हारी है। तुम्हारी बातें कुछ और हैं और स्वरूप कुछ और)।' 

‘महाभाग श्रीरामचन्द्रजी परम महात्मा तथा दया से द्रवित हो जाने वाले हैं; अतएव उन्होंने तुम जैसे पापी और दुरात्मा को भी वानरों के राज्य पर बिठा दिया। यदि तुम महात्मा रघुनाथजी के किये हुए उपकार को नहीं समझोगे तो शीघ्र ही उनके तीखे बाणों से मारे जाकर वाली का दर्शन करोगे। सुग्रीव! वाली मारा जाकर जिस रास्ते से गया है, वह आज भी बंद नहीं हुआ है। इसलिये तुम अपनी प्रतिज्ञा पर डटे रहो। वाली मार्ग का अनुसरण न करो। इक्ष्वाकुवंश शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी के धनुष से छूटे हुए उन वज्रतुल्य बाणों की ओर निश्चय ही तुम्हारी दृष्टि नहीं जा रही है। इसीलिये तुम ग्राम्य सुख का सेवन कर रहे हो और उसी में सुख मानकर श्रीरामचन्द्रजी के कार्य का मन से भी विचार नहीं करते हो।' 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-२६(26) समाप्त ! 

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