भाग-२५ (25) सुग्रीव पर लक्ष्मण का रोष, लक्ष्मण का किष्किन्धा के द्वार पर जाकर अङ्गद को सुग्रीव के पास भेजना तथा हनुमानजी का चिन्तित हुए सुग्रीव को समझाना

 


श्रीराम के छोटे भाई नरेन्द्र कुमार लक्ष्मण ने उस समय सीता की कामना से युक्त, दु:खी, उदारहृदय, शोकग्रस्त तथा बढ़े हुए रोष वाले ज्येष्ठ भ्राता महाराजपुत्र श्रीराम से इस प्रकार कहा - आर्य! सुग्रीव वानर है, वह श्रेष्ठ पुरुषों के लिये उचित सदाचार पर स्थिर नहीं रह सकेगा। सुग्रीव इस बात को भी नहीं मानता है कि अग्नि को साक्षी देकर श्रीरघुनाथजी के साथ मित्रता स्थापन रूप जो सत्-कर्म किया गया है, उसी के फल से मुझे निष्कण्टक राज्यभोग प्राप्त हुए हैं। अतः वह वानरों की राज्य लक्ष्मी का पालन एवं उपभोग नहीं कर सकेगा; क्योंकि उसकी बुद्धि मित्रधर्म के पालन के लिये अधिक आगे नहीं बढ़ रही है। 

'सुग्रीव की बुद्धि मारी गयी है, इसलिये वह विषयभोगों में आसक्त हो गया है। आपकी कृपा से जो उसे राज्य आदि का लाभ हुआ है, उस उपकार का बदला चुकाने की उसकी नीयत नहीं है। अत: अब वह भी मारा जाकर अपने बड़े भाई वीरवर वाली का दर्शन करे। ऐसे गुणहीन पुरुष को राज्य नहीं देना चाहिये। मेरे क्रोध का वेग बढ़ा हुआ है। मैं इसे रोक नहीं सकता। असत्यवादी सुग्रीव को आज ही मारे डालता हूँ। अब वालिकुमार अङ्गद ही राजा होकर प्रधान वानरवीरों के साथ भाभी सीता की खोज करे।' 

यों कहकर लक्ष्मण धनुष-बाण हाथ में ले बड़े वेग से चल पड़े। उन्होंने अपने जाने का प्रयोजन स्पष्ट शब्दों में निवेदन कर दिया था। युद्ध के लिये उनका प्रचण्ड कोप बढ़ा हुआ था तथा वे क्या करने जा रहे हैं, इस पर उन्होंने अच्छी तरह विचार नहीं किया था। 

उस समय विपक्षी वीरों का संहार करने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें शान्त करने के लिये यह अनुनययुक्त बात कही - सुमित्रानन्दन! तुम-जैसे श्रेष्ठ पुरुष को संसार में ऐसा (मित्रवध रूप) निषिद्ध आचरण नहीं करना चाहिये। जो उत्तम विवेक के द्वारा अपने क्रोध को मार देता है, वह वीर समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ है। 

'लक्ष्मण! तुम सदाचारी हो। तुम्हें इस प्रकार सुग्रीव के मारने का निश्चय नहीं करना चाहिये। उसके प्रति जो तुम्हारा प्रेम था, उसी का अनुसरण करो और उसके साथ पहले जो मित्रता की गयी है, उसे निबाहो। तुम्हें सान्त्वना पूर्ण वाणी द्वारा कटु वचनों का परित्याग करते हुए सुग्रीव से इतना ही कहना चाहिये कि तुमने सीता की खोज के लिये जो समय नियत किया था, वह बीत गया (फिर भी चुप क्यों बैठे हो )।' 

अपने बड़े भाई के इस प्रकार यथोचित रूप से समझाने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले पुरुषप्रवर वीर लक्ष्मण ने किष्किन्धा पुरी में प्रवेश करने का विचार किया। भाई के प्रिय और हित में तत्पर रहने वाले शुभ बुद्धि से युक्त बुद्धिमान् लक्ष्मण रोष में भरे हुए ही वानरराज सुग्रीव के भवन की ओर चले। उस समय वे इन्द्रधनुष के समान तेजस्वी, काल और अन्तक के समान भयंकर तथा पर्वत शिखर के समान विशाल धनुष को हाथ में लेकर श्रृङ्गसहित मन्दराचल के समान जान पड़ते थे। 

श्रीराम के अनुज लक्ष्मण अपने बड़े भाई की आज्ञा का यथोक्त रूप से पालन करने वाले तथा बृहस्पति के समान बुद्धिमान् थे। वे सुग्रीव से जो बात कहते, सुग्रीव उसका जो कुछ उत्तर देते और उस उत्तर का भी ये जो कुछ उत्तर देते, उन सबको अच्छी तरह समझ-बूझकर वहाँ से प्रस्थित हुए थे। सीता की खोज विषयक जो श्रीराम की कामना थी और सुग्रीव की असावधानी के कारण उसमें बाधा पड़ने से जो उन्हें क्रोध हुआ था, उन दोनों के कारण लक्ष्मण की भी क्रोधाग्नि भड़क उठी थी। उस क्रोधाग्नि से घिरे हुए लक्ष्मण सुग्रीव के प्रति प्रसन्न नहीं थे। वे उसी अवस्था में वायु के समान वेग से चले। 

उनका वेग ऐसा बढ़ा हुआ था कि वे मार्ग में मिलने वाले साल, ताल और अश्वकर्ण नामक वृक्षों को उसी वेग से बलपूर्वक गिराते तथा पर्वत शिखरों एवं अन्य वृक्षों को उठा-उठाकर दूर फेंकते जाते थे। शीघ्रगामी हाथी के समान अपने पैरों की ठोकर से शिलाओं को चूर-चूर करते और लंबी-लंबी डगें भरते हुए वे कार्यवश बड़ी तेजी के साथ चले। इक्ष्वाकुकुल के सिंह लक्ष्मण ने निकट जाकर वानरराज सुग्रीव की विशाल पुरी किष्किन्धा देखी, जो पहाड़ों के बीच में बसी हुई थी। वानर सेना से व्याप्त होने के कारण वह पुरी दूसरों के लिये दुर्गम थी। 

उस समय लक्ष्मण के ओष्ठ सुग्रीव के प्रति रोष से फड़क रहे थे। उन्होंने किष्किन्धा के पास बहुतेरे भयंकर वानरों को देखा जो नगर के बाहर विचर रहे थे। उन वानरों के शरीर हाथियों के समान विशाल थे। उन समस्त वानरों ने पुरुषप्रवर लक्ष्मण को देखते ही पर्वत के अंदर विद्यमान सैकड़ों शैल - शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष उठा लिये। उन सबको हथियार उठाते देख लक्ष्मण दूने क्रोध से जल उठे, मानो जलती आग में बहुत-सी सूखी लकड़ियाँ डाल दी गयी हों। 

क्षुब्ध हुए लक्ष्मण काल मृत्यु तथा प्रलयकालीन अग्रि के समान भयंकर दिखायी देने लगे। उन्हें देखकर उन वानरों के शरीर भय से काँपने लगे और वे सैकड़ों की संख्या में चारों दिशाओं में भाग गये। तदनन्तर कई श्रेष्ठ वानरों ने सुग्रीव के महल में जाकर लक्ष्मण के आगमन और क्रोध का समाचार निवेदन किया। उस समय काम के अधीन हुए वानरराज सुग्रीव भोगासक्त हो रुमा के साथ थे। इसलिये उन्होंने उन श्रेष्ठ वानरों की बातें नहीं सुनीं। 

तब सचिव की आज्ञा से पर्वत, हाथी और मेघ के समान विशालकाय वानर जो रोंगटे खड़े कर देने वाले थे, नगर से बाहर निकले। वे सब-के-सब वीर थे। नख और दाँत ही उनके आयुध थे। वे बड़े विकराल दिखायी देते थे। उन सबकी दाढ़े व्याघ्रों की दाढ़ों के समान थीं और सबके नेत्र खुले हुए थे (अथवा उन सबका वहाँ स्पष्ट दर्शन होता था कोई छिपे नहीं थे)। किन्हीं में दस हाथियों के बराबर बल था तो कोई सौ हाथियों के समान बलशाली थे तथा किन्हीं - किन्हीं का तेज (बल और पराक्रम) एक हजार हाथियों के तुल्य था। 

हाथ में वृक्ष लिये उन महाबली वानरों से व्याप्त हुई किष्किन्धापुरी अत्यन्त दुर्जय दिखायी देती थी। लक्ष्मण ने कुपित होकर उस पुरी की ओर देखा। तदनन्तर वे सभी महाबली वानर पुरी की चहारदीवारी और खाईं के भीतर से निकलकर प्रकट रूप से सामने आकर खड़े हो गये। आत्मसंयमी वीर लक्ष्मण सुग्रीव के प्रमाद तथा अपने बड़े भाई के महत्त्वपूर्ण कार्य पर दृष्टिपात करके पुनः वानरराज के प्रति क्रोध के वशीभूत हो गये। वे अधिक गरम और लंबी साँस खींचने लगे। उनके नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उस समय पुरुषसिंह लक्ष्मण धूमयुक्त अग्रि के समान प्रतीत हो रहे थे। 

इतना ही नहीं, वे पाँच मुख वाले सर्प के समान दिखायी देने लगे। बाण का फल ही उस सर्प की लपलपाती हुई जिह्वा जान पड़ता था, धनुष ही उसका विशाल शरीर था तथा वे सर्परूपी लक्ष्मण अपने तेजोमय विष से व्याप्त हो रहे थे। उस अवसर पर कुमार अगद प्रज्वलित प्रलयाग्नि तथा क्रोध में भरे हुए नागराज शेष की भाँति दृष्टिगोचर होने वाले लक्ष्मण के पास डरते-डरते गये। वे अत्यन्त विषाद में पड़ गये थे। 

महायशस्वी लक्ष्मण ने क्रोध से लाल आँखें करके अङ्गद को आदेश दिया - पुत्र! सुग्रीव को मेरे आने की सूचना दो। उनसे कहना - शत्रुदमन वीर ! श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई लक्ष्मण अपने भ्राता के दु:ख से दुःखी होकर आपके पास आये हैं और नगर द्वार पर खड़े हैं। वानरराज! यदि आपकी इच्छा हो तो उनकी आज्ञा का अच्छी तरह पालन कीजिये। शत्रुदमन वत्स अङ्गद! बस, इतना ही कहकर तुम शीघ्र मेरे पास लौट आओ। 

लक्ष्मण की बात सुनकर शोकाकुल अङ्गद ने पिता समान सुग्रीव के समीप आकर कहा - तात ! ये सुमित्रानन्दन लक्ष्मण यहाँ पधारे हैं। (अब इसी बात को कुछ विस्तार के साथ कहते हैं - ) लक्ष्मण की कठोर वाणी से अङ्गद के मन में बड़ी घबराहट हुई। उनके मुख पर अत्यन्त दीनता छा गयी। उन वेगशाली कुमार ने वहाँ से निकलकर पहले वानरराज सुग्रीव के, फिर तारा तथा रुमा के चरणों में प्रणाम किया। 

उग्र तेज वाले अङ्गद ने पहले तो पितातुल्य सुग्रीव के दोनों पैर पकड़े फिर अपनी माता तारा के दोनों चरणों का स्पर्श किया। तदनन्तर रुमा के दोनों पैर दबाये। इसके बाद पूर्वोक्त बात कही। किंतु सुग्रीव मदमत्त एवं काम से मोहित होकर पड़े थे। निद्रा ने उनके ऊपर पूरा अधिकार जमा लिया था। इसलिये वे जाग न सके। इतने में बाहर क्रोध में भरे हुए लक्ष्मण को देखकर भय से मोहितचित्त हुए वानर उन्हें प्रसन्न करने के लिये दीनता सूचक वाणी में किलकिलाने लगे। 

लक्ष्मण पर दृष्टि पड़ते ही उन वानरों ने सुग्रीव के निकटवर्ती स्थान में एक साथ ही महान् जलप्रवाह तथा वज्र की गड़गड़ाहट के समान जोर-जोर से सिंहनाद किया ( जिससे सुग्रीव जाग उठें)। वानरों की उस भयंकर गर्जना से कपिराज सुग्रीव की नींद खुल गयी। उस समय उनके नेत्र मद से चञ्चल और लाल हो रहे थे। मन भी स्वस्थ नहीं था। उनके गले में सुन्दर पुष्पमाला शोभा दे रही थी। 

अङ्गद की पूर्वोक्त बात सुनकर उन्हीं के साथ आये हुए दो मन्त्री प्लक्ष और प्रभाव ने भी, जो वानरराज के सम्मान पात्र और उदार दृष्टि वाले थे तथा राजा को अर्थ और धर्म के विषय में ऊँच-नीच समझाने के लिये नियुक्त थे, लक्ष्मण के आगमन की सूचना दी। 

राजा के निकट खड़े हुए उन दोनों मन्त्रियों ने देवराज इन्द्र के समान बैठे हुए सुग्रीव को खूब सोच विचार कर निश्चित किये हुए सार्थक वचनों द्वारा प्रसन्न किया और इस प्रकार कहा - राजन् ! महाभाग श्रीराम और लक्ष्मण- दोनों भाई सत्यप्रतिज्ञ हैं। (वे वास्तव में भगवत्स्वरूप हैं) उन्होंने स्वेच्छा से मनुष्य शरीर धारण किया है। वे दोनों समस्त त्रिलोकी का राज्य चलाने के योग्य हैं। वे ही आपके राज्यदाता हैं। उनमें से एक वीर लक्ष्मण हाथ में धनुष लिये किष्किन्धा के दरवाजे पर खड़े हैं, जिनके भय से काँपते हुए वानर जोर-जोर से चीख रहे हैं। 

'श्रीराम का आदेशवाक्य ही जिनका सारथि और कर्तव्य का निश्चय ही जिनका रथ है, वे लक्ष्मण श्रीराम की आज्ञा से यहाँ पधारे हैं। राजन्! निष्पाप वानरराज ! लक्ष्मण ने तारा देवी के इन प्रिय पुत्र अङ्गद को आपके निकट बड़ी उतावली के साथ भेजा है। वानरपते! पराक्रमी लक्ष्मण क्रोध से लाल आँखें किये नगर द्वार पर उपस्थित हैं और वानरों की ओर इस तरह देख रहे हैं, मानो वे अपनी नेत्राग्नि से उन्हें दग्ध कर डालेंगे।' 

‘महाराज! आप शीघ्र चलें तथा पुत्र और बन्धु बान्धवों के साथ उनके चरणों में मस्तक नवावें और इस प्रकार आज उनका रोष शान्त करें। राजन्! धर्मात्मा श्रीराम जैसा कहते हैं, सावधानी के साथ उसका पालन कीजिये। आप अपनी दी हुई बात पर अटल रहिये और सत्यप्रतिज्ञ बनिये।' 

मन्त्रियों सहित अङ्गद का वचन सुनकर और लक्ष्मण के कुपित होने का समाचार पाकर मन को वश में रखने वाले सुग्रीव आसन छोड़कर खड़े हो गये। वे मन्त्रणा (कर्तव्यविषयक विचार) के परिनिष्ठित विद्वान् होने के कारण मन्त्र प्रयोग में अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने श्रीरामचन्द्रजी की महत्ता और अपनी लघुता का विचार करके मन्त्रज्ञ मन्त्रियों से कहा - मैंने न तो कोई अनुचित बात मुँह से निकाली है और न कोई बुरा काम ही किया है। फिर श्रीरघुनाथजी के भ्राता लक्ष्मण मुझ पर कुपित क्यों हुए हैं? इस बात पर मैं बारंबार विचार करता हूँ। जो सदा मेरे छिद्र देखने वाले हैं तथा जिनका हृदय मेरे प्रति शुद्ध नहीं है, उन शत्रुओं ने निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई लक्ष्मण से मेरे ऐसे दोष सुनाये हैं जो मेरे भीतर कभी प्रकट नहीं हुए थे। 

'लक्ष्मण के कोप के विषय में पहले तुम सब लोगों को धीरे-धीरे कुशलतापूर्वक उनके मनोभाव का विधिवत् निश्चय कर लेना चाहिये, जिससे उनके कोप के कारण का यथार्थ रूप से ज्ञान हो जाय। अवश्य ही मुझे लक्ष्मण से तथा श्रीरघुनाथजी से कोई भय नहीं है, तथापि बिना अपराध के कुपित हुआ मित्र हृदय में घबराहट उत्पन्न कर ही देता है। किसी को मित्र बना लेना सर्वथा सुकर है, परंतु उस मैत्री को पालना या निभाना बहुत ही कठिन है; क्योंकि मन का भाव सदा एक-सा नहीं रहता। किसी के द्वारा थोड़ी-सी भी चुगली कर दी जाने पर प्रेम में अन्तर आ जाता है। इसी कारण मैं और भी डर गया हूँ; क्योंकि महात्मा श्रीराम ने मेरा जो उपकार किया है, उसका बदला चुकाने की मुझमें शक्ति नहीं है।' 

सुग्रीव के ऐसा कहने पर वानरों में श्रेष्ठ हनुमानजी अपनी युक्ति का सहारा लेकर वानरमन्त्रियों के बीच में बोले - कपिराज! मित्र के द्वारा अत्यन्त स्नेहपूर्वक किये गये उत्तम उपकार को जो आप भूल नहीं रहे हैं, इसमें सर्वथा कोई आश्चर्य की बात नहीं है (क्योंकि अच्छे पुरुषों का ऐसा स्वभाव ही होता है )। वीरवर श्रीरघुनाथजी ने तो लोकापवाद के भय को दूर हटाकर आपका प्रिय करने के लिये इन्द्रतुल्य पराक्रमी वाली का वध किया है; अत: वे नि:संदेह आप पर कुपित नहीं हैं। 

'श्रीरामचन्द्रजी ने शोभा-सम्पत्ति की वृद्धि करने वाले अपने भाई लक्ष्मण को जो आपके पास भेजा है, इसमें सर्वथा आपके प्रति उनका प्रेम ही कारण है। समय का ज्ञान रखने वालों में श्रेष्ठ कपिराज! आपने माता सीता की खोज करने के लिये जो समय निश्चित किया था, उसे आप इन दिनों प्रमाद में पड़ जाने के कारण भूल गये हैं। देखिये न, यह सुन्दर शरद् ऋतु आरम्भ हो गयी है, जो खिले हुए छितवन के फूलों से श्यामवर्ण की प्रतीत होती है। आकाशमें अब बादल नहीं रहे। ग्रह, नक्षत्र निर्मल दिखायी देते हैं। सम्पूर्ण दिशाओं में प्रकाश छा गया है तथा नदियों और सरोवरों के जल पूर्णत: स्वच्छ हो गये हैं।' 

‘वानरराज! राजाओं के लिये विजय यात्रा की तैयारी करने का समय आ गया है; किंतु आपको कुछ पता ही नहीं है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि आप प्रमाद में पड़ गये हैं। इसीलिये लक्ष्मण यहाँ आये हैं। महात्मा श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी का अपहरण हुआ है, इसलिये वे बहुत दुःखी हैं। अतः यदि लक्ष्मण के मुख से उनका कठोर वचन भी सुनना पड़े तो आपको चुपचाप सह लेना चाहिये। आपकी ओर से अपराध हुआ है। अत: हाथ जोड़कर लक्ष्मण को प्रसन्न करने के सिवा आपके लिये और कोई उचित कर्तव्य मैं नहीं देखता।' 

'राज्य की भलाई के काम पर नियुक्त हुए मन्त्रियों का यह कर्तव्य है कि राजा को उसके हित की बात अवश्य बतावें। अतएव मैं भय छोड़कर अपना निश्चित विचार बता रहा हूँ। भगवान् श्रीराम यदि क्रोध करके धनुष हाथ में ले लें तो देवता-असुर-गन्धर्वों सहित सम्पूर्ण जगत को अपने वश में कर सकते हैं। जिसे पीछे हाथ जोड़कर मनाना पड़े, ऐसे पुरुष को क्रोध दिलाना कदापि उचित नहीं है। विशेषत: वह पुरुष जो मित्र के किये हुए पहले उपकार को याद रखता हो और कृतज्ञ हो, इस बात का अधिक ध्यान रखे।' 

‘राजन्! इसलिये आप पुत्र और मित्रों के साथ मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम कीजिये और अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहिये। जैसे पत्नी अपने पति के वश में रहती है, उसी प्रकार आप सदा श्रीरामचन्द्रजी के अधीन रहिये। वानरराज! श्रीराम और लक्ष्मण के आदेश की आपको मन से भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी लक्ष्मण सहित श्रीरघुनाथजी के अलौकिक बल का ज्ञान तो आपके मन को है ही।' 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-२५ (25) समाप्त ! 

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