भाग-२४(24) हनुमानजी के समझाने से सुग्रीव का नील को वानर सैनिकों को एकत्र करने का आदेश देना, शरद् ऋतु का वर्णन तथा श्रीराम का लक्ष्मण को सुग्रीव के पास जाने का आदेश देना

 


पवनकुमार हनुमान् शास्त्र के निश्चित सिद्धान्त को जानने वाले थे। क्या करना चाहिये और क्या नहीं - इन सभी बातों का उन्हें यथार्थ ज्ञान था। किस समय किस विशेष धर्म का पालन करना चाहिये – इसको भी वे ठीक-ठीक समझते थे। उन्हें बातचीत करने की कला का भी अच्छा ज्ञान था। उन्होंने देखा, आकाश निर्मल हो गया है। अब उसमें न तो बिजली चमकती है और न बादल ही दिखायी देते हैं । अन्तरिक्ष में सब ओर सारस उड़ रहे हैं और उनकी बोली सुनायी देती है। (चन्द्रोदय होने पर) आकाश ऐसा जान पड़ता है, मानो उस पर श्वेत चन्दनसदृश रमणीय चाँदनी का लेप चढ़ा दिया गया हो। 

सुग्रीव का प्रयोजन सिद्ध हो जाने के कारण अब वे धर्म और अर्थ के संग्रह में शिथिलता दिखाने लगे हैं। असाधु पुरुषों के मार्ग (काम सेवन) का ही अधिक आश्रय ले रहे हैं। एकान्त में ही (जहाँ स्त्रियों के सङ्ग में कोई बाधा न पड़े) उनका मन लगता है। उनका काम पूरा हो गया है। उनके अभीष्ट प्रयोजन की सिद्धि हो चुकी है। अब वे सदा युवती स्त्रियों के साथ क्रीडा - विलास में ही लगे रहते हैं। उन्होंने अपने सारे अभिलषित मनोरथों को प्राप्त कर लिया है। 

अपनी मनोवाञ्छित पत्नी रुमा को प्राप्त करके अब वे कृतकृत्य एवं निश्चिन्त होकर दिन-रात भोग-विलास में लगे रहते हैं। जैसे देवराज इन्द्र गन्धर्वों और अप्सराओं के समुदाय के साथ क्रीडा में तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार सुग्रीव भी अपने मन्त्रियों पर राजकार्य का भार रखकर क्रीडा - विहार में तत्पर हैं। मन्त्रियों के कार्यों की देखभाल वे कभी नहीं करते हैं। 

मन्त्रियों की सज्जनता के कारण यद्यपि राज्य को किसी प्रकार की हानि पहुँचने का संदेह नहीं है, तथापि स्वयं सुग्रीव ही स्वेच्छाचारी से हो रहे हैं। यह सब सोचकर हनुमानजी वानरराज सुग्रीव के पास गये और उन्हें युक्तियुक्त विविध एवं मनोरम वचनों के द्वारा प्रसन्न करके बातचीत का मर्म समझने वाले उन सुग्रीव से हितकर, सत्य, लाभदायक, साम, धर्म और अर्थ - नीति से युक्त, शास्त्रविश्वासी पुरुषों के सुदृढ़ निश्चय से सम्पन्न तथा प्रेम और प्रसन्नता से भरे वचन बोले। 

‘राजन्! आपने राज्य और यश प्राप्त कर लिया तथा कुलपरम्परा से आयी हुई लक्ष्मी को भी बढ़ाया; किंतु अभी मित्रों को अपनाने का कार्य शेष रह गया है, उसे आपको इस समय पूर्ण करना चाहिये। जो राजा ‘कब प्रत्युपकार करना चाहिये' इस बात को जानकर मित्रों के प्रति सदा साधुतापूर्ण बर्ताव करता है, उसके राज्य, यश और प्रताप की वृद्धि होती है।' 

'पृथ्वीनाथ ! जिस राजा का कोश, दण्ड (सेना), मित्र और अपना शरीर – ये सब के सब समान रूप से उसके वशमें रहते हैं, वह विशाल राज्य का पालन एवं उपभोग करता है। आप सदाचार से सम्पन्न और नित्य सनातन धर्म के मार्ग पर स्थित हैं; अतः मित्र के कार्य को सफल बनाने के लिये जो प्रतिज्ञा की है, उसे यथोचित रूप से पूर्ण कीजिये। जो अपने सब कार्यों को छोड़कर मित्र का कार्य सिद्ध करने के लिये विशेष उत्साहपूर्वक शीघ्रता के साथ नहीं लग जाता है, उसे अनर्थ का भागी होना पड़ता है।' 

‘कार्यसाधन का उपयुक्त अवसर बीत जाने के बाद जो मित्र के कार्यों में लगता है, वह बड़े-से-बड़े कार्यों को सिद्ध करके भी मित्र के प्रयोजन को सिद्ध करने वाला नहीं माना जाता है। शत्रुदमन! भगवान् श्रीराम हमारे परम सुहृद् हैं। उनके इस कार्य का समय बीता जा रहा है; अतः विदेहकुमारी सीता की खोज आरम्भ कर देनी चाहिये। राजन् ! परम बुद्धिमान् श्रीराम समय का ज्ञान रखते हैं और उन्हें अपने कार्य की सिद्धि के लिये जल्दी लगी हुई है, तो भी वे आपके अधीन बने हुए हैं। संकोचवश आपसे नहीं कहते कि मेरे कार्य का समय बीत रहा है।' 

‘वानरराज! भगवान् श्रीराम चिरकाल तक मित्रता निभाने वाले हैं। वे आपके समृद्धिशाली कुल के अभ्युदय के हेतु हैं। उनका प्रभाव अतुलनीय है। वे गुणों में अपना शानी नहीं रखते हैं। अब आप उनका कार्य सिद्ध कीजिये; क्योंकि उन्होंने आपका काम पहले ही सिद्ध कर दिया है। आप प्रधान प्रधान वानरों को इस कार्य के लिये आज्ञा दीजिये। श्रीरामचन्द्रजी के कहने के पहले ही यदि हम लोग कार्य प्रारम्भ कर दें तो समय बीता हुआ नहीं माना जायगा; किंतु यदि उन्हें इसके लिये प्रेरणा करनी पड़ी तो यही समझा जायगा कि हमने समय बिता दिया है। उनके कार्य में बहुत विलम्ब कर दिया है।' 

‘वानरराज! जिसने आपका कोई उपकार नहीं किया हो, उसका कार्य भी आप सिद्ध करने वाले हैं। फिर जिन्होंने वाली का वध तथा राज्य प्रदान करके आपका उपकार किया है, उनका कार्य आप शीघ्र सिद्ध करें, इसके लिये तो कहना ही क्या है। वानर और भालू समुदाय के स्वामी सुग्रीव! आप शक्तिमान् और अत्यन्त पराक्रमी हैं; फिर भी दशरथनन्दन श्रीराम का प्रिय कार्य करने के लिये वानरों को आज्ञा देने में क्यों विलम्ब करते हैं? इसमें संदेह नहीं कि दशरथकुमार भगवान् श्रीराम अपने बाणों से समस्त देवताओं, असुरों और बड़े-बड़े नागों को भी अपने वश में कर सकते हैं, तथापि आपने जो उनके कार्य को सिद्ध करने की प्रतिज्ञा की है, उसी की वे राह देख रहे हैं।' 

'उन्हें आपके लिये वाली के प्राण तक लेने में हिचक नहीं हुई। वे आपका बहुत बड़ा प्रिय कार्य कर चुके हैं; अतः अब हम लोग उनकी पत्नी विदेहकुमारी सीता का इस भूतल पर और आकाश में भी पता लगावें। देवता, दानव, गन्धर्व, असुर, मरुद्गण तथा यक्ष भी श्रीराम को भय नहीं पहुँचा सकते; फिर राक्षसों की तो बिसात ही क्या है। वानरराज! ऐसे शक्तिशाली तथा पहले ही उपकार करने वाले भगवान् श्रीराम का प्रिय कार्य आपको अपनी सारी शक्ति लगाकर करना चाहिये।' 

'कपीश्वर! आपकी आज्ञा हो जाय तो जल में, थल में, नीचे (पाताल में) तथा ऊपर आकाश में कहीं भी हम लोगों की गति रुक नहीं सकती। निष्पाप कपिराज ! अत: आप आज्ञा दीजिये कि कौन कहाँ से आपकी किस आज्ञा का पालन करने के लिये उद्योग करे। आपके अधीन करोड़ों से भी अधिक ऐसे वानर मौजूद हैं, जिन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता।' 

सुग्रीव सत्त्वगुण से सम्पन्न थे। उन्होंने हनुमानजी के द्वारा ठीक समय पर अच्छे ढंगसे कही हुई उपर्युक्त बातें सुनकर भगवान् श्रीराम का कार्य सिद्ध करने के लिये अत्यन्त उत्तम निश्चय किया। वे परम बुद्धिमान् थे। अतः नित्य उद्यमशील नील नामक वानर को उन्होंने समस्त दिशाओं से सम्पूर्ण वानर- सेनाओं को एकत्र करने के लिये आज्ञा दी और कहा - तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे मेरी सारी सेना यहाँ इकट्ठी हो जाय और सभी यूथपति अपनी सेना एवं सेनापतियों के साथ अविलम्ब उपस्थित हो जायँ। 

'राज्य - सीमा की रक्षा करने वाले जो-जो उद्योगी और शीघ्रगामी वानर हैं, वे सब मेरी आज्ञा से शीघ्र यहाँ आ जायँ। उसके बाद जो कुछ कर्तव्य हो, उस पर तुम स्वयं ही ध्यान दो। जो वानर पंद्रह दिनों के बाद यहाँ पहुँचेगा, उसे प्राणान्त दण्ड दिया जायगा। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। यह मेरी निश्चित आज्ञा है। इसके अनुसार इस व्यवस्था का अधिकार लेकर अङ्गद के साथ तुम स्वयं बड़े-बूढ़े वानरों के पास जाओ।' 

ऐसा प्रबन्ध करके महाबली वानरराज सुग्रीव अपने महल में चले गये। 

पूर्वोक्त आदेश देकर सुग्रीव तो अपने महल में चले गये और उधर श्रीरामचन्द्रजी, जो वर्षा की रातों में प्रस्रवणगिरि पर निवास करते थे, आकाश के मेघों से मुक्त एवं निर्मल हो जाने पर सीता से मिलने की उत्कण्ठा लिये उनके विरहजन्य शोक से अत्यन्त पीड़ा का अनुभव करने लगे। उन्होंने देखा, आकाश श्वेत वर्ण का हो रहा है, चन्द्रमण्डल स्वच्छ दिखायी देता है तथा शरद् ऋतु की रजनी के अङ्गों पर चाँदनी का अङ्गराग लगा हुआ है। यह सब देखकर वे सीता से मिलने के लिये व्याकुल हो उठे। 

उन्होंने सोचा - सुग्रीव काम में आसक्त हो रहा है, जनककुमारी सीता का अब तक कुछ पता नहीं लगा है और रावण पर चढ़ाई करने का समय भी बीता जा रहा है।' यह सब देखकर अत्यन्त आतुर हुए श्रीराम का हृदय व्याकुल हो उठा। दो घड़ी के बाद जब उनका मन कुछ स्वस्थ हुआ, तब वे बुद्धिमान् नरेश श्रीरघुनाथजी अपने मन में बसी हुई विदेहनन्दिनी सीता का चिन्तन करने लगे। 

उन्होंने देखा, आकाश निर्मल है। न कहीं बिजली की गड़गड़ाहट है न मेघों की घटा। वहाँ सब ओर सारसों की बोली सुनायी देती है। यह सब देखकर वे आर्तवाणी में विलाप करने लगे। सुनहरे रंग की धातुओं से विभूषित पर्वतशिखर पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी शरत्काल के स्वच्छ आकाश की ओर दृष्टिपात करके मन-ही-मन अपनी प्यारी पत्नी सीता का ध्यान करने लगे। 

वे बोले - जिसकी बोली सारसों की आवाज के समान मीठी थी तथा जो मेरे आश्रम पर सारसों द्वारा परस्पर एक- दूसरे को बुलाने के लिये किये गये मधुर शब्दों से मन बहलाती थी, वह मेरी भोली-भाली स्त्री सीता आज किस तरह मनोरञ्जन करती होगी ? सुवर्णमय वृक्षों के समान निर्मल और खिले हुए असन नामक वृक्षों को देखकर बार-बार उन्हें निहारती हुई भोली-भाली सीता जब मुझे अपने पास नहीं देखती होगी, तब कैसे उसका मन लगता होगा ? 

‘जिसके सभी अङ्ग मनोहर हैं तथा जो स्वभाव से ही मधुर भाषण करने वाली है, वह सीता पहले कलहंसों के मधुर शब्द से जागा करती थी; किंतु आज वह मेरी प्रिया वहाँ कैसे प्रसन्न रहती होगी ? जिसके विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान शोभा पाते हैं, वह मेरी प्रिया जब साथ विचरने वाले चकवों की बोली सुनती होगी, तब उसकी कैसी दशा हो जाती होगी ? हाय ! मैं नदी, तालाब, बावली, कानन और वन सब जगह घूमता हूँ; परंतु कहीं भी उस मृगशावकनयनी सीता बिना अब मुझे सुख नहीं मिलता है। कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि शरद् ऋतु के गुणों से निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होने वाला काम भामिनी सीता को अत्यन्त पीड़ित कर दे; क्योंकि ऐसी सम्भावना के दो कारण हैं एक तो उसे मेरे वियोग का कष्ट है, दूसरे वह अत्यन्त सुकुमारी होने के कारण इस कष्ट को सहन नहीं कर पाती होगी।' 

इन्द्र से पानी की याचना करने वाले प्यासे पपीहे की भाँति नरश्रेष्ठ नरेन्द्रकुमार श्रीराम ने इस तरह की बहुत-सी बातें कहकर विलाप किया। उस समय शोभाशाली लक्ष्मण फल लेने के लिये गये थे। वे पर्वत के रमणीय शिखरों पर घूम-फिरकर जब लौटे तब उन्होंने अपने बड़े भाई की अवस्था पर दृष्टिपात किया। दुस्सह चिन्ता में मग्न होकर अचेत से हो गये थे और एकान्त में अकेले ही दुःखी होकर बैठे थे। 

उस समय मनस्वी सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने जब उन्हें देखा तब वे तुरंत ही भाई के विषाद से अत्यन्त दुःखी हो गये और उनसे इस प्रकार बोले – आर्य! इस प्रकार काम के अधीन होकर अपने पौरुष का तिरस्कार करने से – पराक्रम को भूल जाने से क्या लाभ होगा? इस लज्जाजनक शोक के कारण आपके चित्त की एकाग्रता नष्ट हो रही है। क्या इस समय योग का सहारा लेने से - मन को एकाग्र करने से यह सारी चिन्ता दूर नहीं हो सकती ? 

‘तात! आप आवश्यक कर्मों के अनुष्ठान में पूर्णरूप से लग जाइये, मन को प्रसन्न कीजिये और हर समय चित्त की एकाग्रता बनाये रखिये। साथ ही, अन्तःकरण में दीनता को स्थान न देते हुए अपने पराक्रम की वृद्धि के लिये सहायता और शक्ति को बढ़ाने का प्रयत्न कीजिये। मानव वंश के नाथ तथा श्रेष्ठ पुरुषों के भी पूजनीय वीर रघुनन्दन ! जिनके स्वामी आप हैं, वे जनकनन्दिनी सीता किसी भी दूसरे पुरुष के लिये सुलभ नहीं हैं; क्योंकि जलती हुई आग की लपट के पास जाकर कोई भी दग्ध हुए बिना नहीं रह सकता।' 

लक्ष्मण उत्तम लक्षणों से सम्पन्न थे। उन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता था। भगवान् श्रीराम ने उनसे यह स्वाभाविक बात कही - कुमार ! तुमने जो बात कही है, वह वर्तमान समय में हितकर, भविष्य में भी सुख पहुँचाने वाली, राजनीति के सर्वथा अनुकूल तथा साम के साथ-साथ धर्म और अर्थ से भी संयुक्त है। निश्चय ही सीता के अनुसंधान कार्य पर ध्यान देना चाहिये तथा उसके लिये विशेष कार्य या उपाय का भी अनुसरण करना चाहिये; किंतु प्रयत्न छोड़कर पूर्णरूप से बढ़े हुए दुर्लभ एवं बलवान् कर्म के फल पर ही दृष्टि रखना उचित नहीं है। 

तदनन्तर प्रफुल्ल कमलदल के समान नेत्रवाली मिथिलेशकुमारी सीता का बार-बार चिन्तन करते हुए श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण को सम्बोधित करके सूखे हुए (उदास) मुँह से बोले – सुमित्रानन्दन! सहस्रनेत्र धारी इन्द्र इस पृथ्वी को जल से तृप्त करके यहाँ के अनाजों को पकाकर अब कृतकृत्य हो गये हैं। राजकुमार! देखो, जो अत्यन्त गम्भीर स्वर से गर्जना किया करते और पर्वतों, नगरों तथा वृक्षों के ऊपर से होकर निकलते थे, वे मेघ अपना सारा जल बरसाकर शान्त हो गये हैं। 

'नील कमलदल के समान श्यामवर्ण वाले मेघ दसों दिशाओं को श्याम बनाकर मदरहित गजराजों के समान वेगशून्य हो गये हैं; उनका वेग शान्त हो गया है। सौम्य ! जिनके भीतर जल विद्यमान था तथा जिनमें कुटज और अर्जुन के फूलों की सुगन्ध भरी हुई थी, वे अत्यन्त वेगशाली झंझावात उमड़-घुमड़कर सम्पूर्ण दिशाओं में विचरण करके अब शान्त हो गये हैं।' 

‘निष्पाप लक्ष्मण! बादलों, हाथियों, मोरों और झरनों के शब्द इस समय सहसा शान्त हो गये हैं। महान् मेघों द्वारा बरसाये हुए जल से घुल जाने के कारण ये विचित्र शिखरों वाले पर्वत अत्यन्त निर्मल हो गये हैं। इन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो चन्द्रमा की किरणों द्वारा इनके ऊपर सफेदी कर दी गयी है। आज शरद् ऋतु सप्तच्छद (छितवन) की डालियों में, सूर्य, चन्द्रमा और तारों की प्रभा में तथा श्रेष्ठ गजराजों की लीलाओं में अपनी शोभा बाँटकर आयी है।' 

'इस समय शरत्काल के गुणों से सम्पन्न हुई लक्ष्मी यद्यपि अनेक आश्रयों में विभक्त होकर विचित्र शोभा धारण करती हैं, तथापि सूर्य की प्रथम किरणों से विकसित हुए कमल-वनों में वे सबसे अधिक सुशोभित होती हैं। छितवन के फूलों की सुगन्ध धारण करने वाला शरत्काल स्वभावतः वायु का अनुसरण कर रहा है। भ्रमरों के समूह उसके गुणगान कर रहे हैं। वह मार्ग के जल को सोखता और मत वाले हाथियों के दर्प को बढ़ाता हुआ अधिक शोभा पा रहा है। जिनके पंख सुन्दर और विशाल हैं, जिन्हें काम क्रीडा अधिक प्रिय है, जिनके ऊपर कमलों के पराग बिखरे हुए हैं, जो बड़ी-बड़ी नदियों तटों पर उतरे हैं और मानसरोवर से साथ ही आये हैं, उन चक्रवाकों के साथ हंस क्रीडा कर रहे हैं।' 

‘मदमत्त गजराजों में, दर्प-भरे वृषभों के समूहों में तथा स्वच्छ जल वाली सरिताओं में नाना रूपों में विभक्त हुई लक्ष्मी विशेष शोभा पा रही है। आकाश को बादलों से शून्य हुआ देख वनों में पंखरूपी आभूषणों का परित्याग करने वाले मोर अपनी प्रियतमाओं से विरक्त हो गये हैं। उनकी शोभा नष्ट हो गयी है और वे आनन्द शून्य हो ध्यानमग्न होकर बैठे हैं। वन के भीतर बहुत-से असन नामक वृक्ष खड़े हैं, जिनकी डालियों के अग्रभाग फूलों के अधिक भार से झुक गये हैं। उन पर मनोहर सुगन्ध छा रही है। वे सभी वृक्ष सुवर्ण के समान गौर तथा नेत्रों को आनन्द प्रदान करने वाले हैं। उनके द्वारा वनप्रान्त प्रकाशित से हो रहे हैं।' 

‘जो अपनी प्रियतमाओं के साथ विचरते हैं, जिन्हें कमल के पुष्प तथा वन अधिक प्रिय हैं, जो छितवन के फूलों को सूँघकर उन्मत्त हो उठे हैं, जिनमें अधिक मद है तथा जिन्हें मदजनित कामभोग की लालसा बनी हुई है, उन गजराजों की गति आज मन्द हो गयी है। इस समय आकाश का रंग शान पर चढ़े हुए शस्त्र की धार के समान स्वच्छ दिखायी देता है, नदियों के जल मन्दगति से प्रवाहित हो रहे हैं, श्वेत कमल की सुगन्ध लेकर शीतल मन्द वायु चल रही है, दिशाओं का अन्धकार दूर हो गया है और अब उनमें पूर्ण प्रकाश छा रहा है।' 

‘घाम लगने से धरती का कीचड़ सूख गया है। अब उस पर बहुत दिनों के बाद घनी धूल प्रकट हुई है। परस्पर वैर रखने वाले राजाओं के लिये युद्ध के निमित्त उद्योग करने का समय अब आ गया है। शरद्-ऋतु के गुणों ने जिनके रूप और शोभा को बढ़ा दिया है, जिनके सारे अङ्गों पर धूल छा रही है तथा जो युद्ध के लिये लुभाये हुए हैं, वे साँड़ इस समय गौओं के बीच में खड़े होकर अत्यन्त हर्षपूर्वक हँकड़ रहे हैं।' 

‘जिसमें कामभाव का उदय हुआ है, इसीलिये जो अत्यन्त तीव्र अनुराग से युक्त है और अच्छे कुल में उत्पन्न हुई है, वह मन्दगति से चलने वाली हथिनी वनों में जाते हुए अपने मदमत्त स्वामी को घेरकर उसका अनुगमन करती है। अपने आभूषणरूप श्रेष्ठ पंखों को त्यागकर नदियों के तटों पर आये हुए मोर मानो सारस--समूहों की फटकार सुनकर दुःखी और खिन्नचित्त हो पीछे लौट जाते हैं।' 

‘जिनके कीचड़ दूर हो गये हैं। जो बालुकाओं से सुशोभित हैं, जिनका जल बहुत ही स्वच्छ है तथा गौओं के समुदाय जिनके जल का सेवन करते हैं, सारसों के कलरवों से गूँजती हुई उन सरिताओं में हंस बड़े हर्ष के साथ उतर रहे हैं। नदी, मेघ, झरनों के जल, प्रचण्ड वायु, मोर और हर्ष रहित मेढकों के शब्द निश्चय ही इस समय शान्त हो गये हैं। नूतन मेघों के उदित होने पर जो चिरकाल से बिलों में छिपे बैठे थे, जिनकी शरीर यात्रा नष्टप्राय हो गयी थी और इस प्रकार जो मृतवत् हो रहे थे, वे भयंकर विष वाले बहुरंगे सर्प भूख से पीड़ित होकर अब बिलों से बाहर निकल रहे हैं। 

‘शोभाशाली चन्द्रमा की किरणों के स्पर्श से होने वाले हर्ष के कारण जिसके तारे किंचित् प्रकाशित हो रहे हैं (अथवा प्रियतम के करस्पर्श जनित हर्ष से जिसके नेत्रों की पुतली किंचित् खिल उठी है) वह रागयुक्त संध्या (अथवा अनुरागभरी नायिका) स्वयं ही अम्बर (आकाश अथवा वस्त्र) का त्याग कर रही है, यह कैसे आश्चर्य की बात है !' 

'चाँदनी की चादर ओढ़े हुए शरत्काल की यह रात्रि श्वेत साड़ी से ढके हुए अङ्गवाली एक सुन्दरी नारी के समान शोभा पाती है। उदित हुआ चन्द्रमा ही उसका सौम्य मुख है और तारे ही उसकी खुली हुई मनोहर आँखें हैं। पके हुए धान की बालों को खाकर हर्ष से भरी हुई और तीव्र वेग से चलने वाली सारसों की वह सुन्दर पंक्ति वायुकम्पित गुँथी हुई पुष्पमाला की भाँति आकाश में उड़ रही है। कुमुदके फूलों से भरा हुआ उस महान् तालाब का जल जिसमें एक हंस सोया हुआ है, ऐसा जान पड़ता है मानो रात के समय बादलों के आवरण से रहित आकाश सब ओर छिटके हुए तारों से व्याप्त होकर पूर्ण चन्द्रमा के साथ शोभा पा रहा हो।' 

‘सब ओर बिखरे हुए हंस ही जिनकी फैली हुई मेखला (करधनी) हैं, जो खिले हुए कमलों और उत्पलों की मालाएँ धारण करती हैं। उन उत्तम बावड़ियों की शोभा आज वस्त्राभूषणों से विभूषित हुई सुन्दरी वनिताओं के समान हो रही है। वेणु के स्वर के रूप में व्यक्त हुए वाद्यघोष से मिश्रित और प्रातःकाल की वायु से वृद्धि को प्राप्त होकर सब ओर फैला हुआ दही मथने के बड़े-बड़े भाण्डों और साँड़ों का शब्द, मानो एक-दूसरे का पूरक हो रहा है। 

‘नदियों के तट मन्द-मन्द वायु से कम्पित, पुष्परूपी हास से सुशोभित और धुले हुए निर्मल रेशमी वस्त्रों के समान प्रकाशित होने वाले नूतन कासों से बड़ी शोभा पा रहे हैं। वन में ढिठाई के साथ घूमने वाले तथा कमल और असन के परागों से गौरवर्ण को प्राप्त हुए मत वाले भ्रमर, जो पुष्पों के मकरन्द का पान करने में बड़े चतुर हैं, अपनी प्रियाओं के साथ हर्ष में भरकर वनों में (गन्ध के लोभ से) वायु के पीछे-पीछे जा रहे हैं। 

‘जल स्वच्छ हो गया है, धान की खेती पक गयी है, वायु मन्दगति से चलने लगी है और चन्द्रमा अत्यन्त निर्मल दिखायी देता है – ये सब लक्षण उस शरत्काल के आगमन की सूचना देते हैं। जिसमें वर्षा की समाप्ति हो जाती है, क्रौञ्च पक्षी बोलने लगते हैं और फूल उस ऋतु के हास की भाँति खिल उठते हैं। रात को प्रियतम के उपभोग में आकर प्रात: काल अलसायी गति से चलने वाली कामिनियों की भाँति उन नदीस्वरूपा वधुओं की गति भी आज मन्द हो गयी है, जो मछलियों की मेखला-सी धारण किये हुए हैं।' 

'नदियों के मुख नव वधुओं के मुँह के समान शोभा पाते हैं। उनमें जो चक्रवाक हैं, वे गोरोचनद्वारा निर्मित तिलक के समान प्रतीत होते हैं, जो सेवार हैं, वे वधू के मुख पर बनी हुई पत्रभङ्गी के समान जान पड़ते हैं तथा जो काश हैं, वे ही मानो श्वेत दुकूल बनकर नदीरूपिणी वधू के मुँह को ढके हुए हैं। फूले हुए सरकण्डों और असन के वृक्षों से जिनकी विचित्र शोभा हो रही है तथा जिनमें हर्षभरे भ्रमरों की आवाज गूँजती रहती है, उन वनों में आज प्रचण्ड धनुर्धर कामदेव प्रकट हुआ है, जो धनुष हाथ में लेकर विरही जनों को दण्ड देने के लिये उद्यत हो अत्यन्त कोप का परिचय दे रहा है।' 

‘अच्छी वर्षा से लोगों को संतुष्ट करके नदियों और तालाबों को पानी से भरकर तथा भूतल को परिपक्व धान की खेती से सम्पन्न करके बादल आकाश छोड़कर अदृश्य हो गये। सौम्य ! सभी जलाशयों के जल स्वच्छ हो गये हैं। वहाँ कुरर पक्षियों के कलनाद गूंज रहे हैं और चक्रवाकों के समुदाय चारों ओर बिखरे हुए हैं। इस प्रकार उन जलाशयों की बड़ी शोभा हो रही है।' 

‘सौम्य! राजकुमार! जिनमें परस्पर वैर बँधा हुआ है और जो एक-दूसरे को जीतने की इच्छा रखते हैं, उन भूमिपालों के लिये यह युद्ध के निमित्त उद्योग करने का समय उपस्थित हुआ है। नरेशनन्दन! राजाओं की विजय यात्रा का यह प्रथम अवसर है, किंतु न तो मैं सुग्रीव को यहाँ उपस्थित देखता हूँ और न उनका कोई वैसा उद्योग ही दृष्टिगोचर होता है। पर्वत के शिखरों पर असन, छितवन, कोविदार, बन्धु-जीव तथा श्याम तमाल खिले दिखायी देते हैं।'  

‘लक्ष्मण! देखो तो सही, नदियों के तटों पर सब ओर हंस, सारस, चक्रवाक और कुरर नामक पक्षी फैले हुए हैं। मैं सीता को न देखने के कारण शोक से संतप्त हो रहा हूँ; अतः ये वर्षा के चार महीने मेरे लिये सौ वर्षों के समान बीते हैं। जैसे चकवी अपने स्वामी का अनुसरण करती है, उसी प्रकार कल्याणी सीता इस भयंकर एवं दुर्गम दण्डकारण्य को उद्यान - सा समझकर मेरे पीछे यहाँ तक चली आयी थी।' 

‘लक्ष्मण! मैं अपनी प्रियतमा से बिछुड़ा हुआ हूँ। मेरा राज्य छीन लिया गया है और मैं देश से निकाल दिया गया हूँ। इस अवस्था में भी राजा सुग्रीव मुझ पर कृपा नहीं कर रहा है। सौम्यलक्ष्मण! मैं अनाथ हूँ। राज्य से भ्रष्ट हो गया हूँ। रावण ने मेरा तिरस्कार किया है। मैं दीन हूँ। मेरा घर यहाँ से बहुत दूर है। मैं कामना लेकर यहाँ आया हूँ तथा सुग्रीव यह भी समझता है कि राम मेरी शरण में आये हैं। इन्हीं सब कारणों से वानरों का राजा दुरात्मा सुग्रीव मेरा तिरस्कार कर रहा है; किंतु उसे पता नहीं है कि मैं सदा शत्रुओं को संताप देने में समर्थ हूँ।' 

'उसने सीता की खोज के लिये समय निश्चित कर दिया था; किंतु उसका तो अब काम निकल गया है, इसीलिये वह दुर्बुद्धि वानर प्रतिज्ञा करके भी उसका कुछ खयाल नहीं कर रहा है। अत: लक्ष्मण! तुम मेरी आज्ञा से किष्किन्धापुरी में जाओ और विषयभोग में फँसे हुए मूर्ख वानरराज सुग्रीव से इस प्रकार कहो - जो बल-पराक्रम से सम्पन्न तथा पहले ही उपकार करने वाले कार्यार्थी पुरुषों को प्रतिज्ञापूर्वक आशा देकर पीछे उसे तोड़ देता है, वह संसार के सभी पुरुषोंमें नीच है।' 

‘जो अपने मुख से प्रतिज्ञा के रूप में निकले हुए भले या बुरे सभी तरह के वचनों को अवश्य पालनीय समझकर सत्य की रक्षा के उद्देश्य से उनका पालन करता है, वह वीर समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ माना जाता है। जो अपना स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर, जिनके कार्य नहीं पूरे हुए हैं। उन मित्रों के सहायक नहीं होते। उनके कार्य को सिद्ध करने की चेष्टा नहीं करते, उन कृतघ्न पुरुषों के मरने पर मांसाहारी जन्तु भी उनका मांस नहीं खाते हैं।' 

'सुग्रीव! निश्चय ही तुम युद्ध में मेरे द्वारा खींचे गये सोने की पीठ वाले धनुष का कौंधती हुई बिजली के समान रूप देखना चाहते हो। संग्राम में कुपित होकर मेरे द्वारा खींची गयी प्रत्यञ्चा की भयंकर टङ्कार को, जो वज्र की गड़गड़ाहट को भी मात करने वाली है, अब फिर तुम्हें सुनने की इच्छा हो रही है।' 

‘वीर राजकुमार! सुग्रीव को तुम जैसे सहायक के साथ रहने वाले मेरे पराक्रम का ज्ञान हो चुका है, ऐसी दशा में भी यदि उसे यह चिन्ता न हो कि ये वाली की भाँति मुझे मार सकते हैं तो यह आश्चर्य की ही बात है ! शत्रु-नगरी पर विजय पाने वाले लक्ष्मण! जिसके लिये यह मित्रता आदि का सारा आयोजन किया गया, सीता की खोजविषयक उस प्रतिज्ञा को इस समय वानर राज सुग्रीव भूल गया है उसे याद नहीं कर रहा है; क्योंकि उसका अपना काम सिद्ध हो चुका।' 

'सुग्रीव ने यह प्रतिज्ञा की थी कि वर्षा का अन्त होते ही सीता की खोज आरम्भ कर दी जायगी, किंतु वह क्रीड़ा- विहार में इतना तन्मय हो गया है कि इन बीते हुए चार महीनों का उसे कुछ पता ही नहीं है। सुग्रीव मन्त्रियों तथा परिजनों सहित क्रीडाजनित आमोद-प्रमोद में फँसकर विविध पेय पदार्थों का ही सेवन कर रहा है। हमलोग शोक से व्याकुल हो रहे हैं। तो भी वह हम पर दया नहीं करता है।' 

‘महाबली वीर लक्ष्मण! तुम जाओ। सुग्रीव से बात करो। मेरे रोष का जो स्वरूप है, वह उसे बताओ और मेरा यह संदेश भी कह सुनाओ। सुग्रीव! वाली मारा जाकर जिस रास्ते से गया है, वह आज भी बंद नहीं हुआ है। इसलिये तुम अपनी प्रतिज्ञा पर डटे रहो। वाली के मार्ग का अनुसरण न करो। वाली तो रणक्षेत्र में अकेला ही मेरे बाण से मारा गया था, परंतु यदि तुम सत्य से विचलित हुए तो मैं तुम्हें बन्धु- बान्धव सहित काल के गाल में डाल दूंगा।' 

'पुरुषप्रवर! नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ! जब इस तरह कार्य बिगड़ने लगे, ऐसे अवसर पर और भी जो-जो बातें कहनी उचित हों जिनके कहने से अपना हित होता हो, वे सब बातें कहना शीघ्र करो; क्योंकि कार्य आरम्भ करने का समय बीता जा रहा है। सुग्रीव से कहो - वानरराज! तुम सनातन धर्म पर दृष्टि रखकर अपनी की हुई प्रतिज्ञा को सत्य कर दिखाओ, अन्यथा ऐसा न हो कि तुम्हें आज ही मेरे बाणों से प्रेरित हो प्रेतभाव को प्राप्त होकर यमलोक में वाली का दर्शन करना पड़े।' 

बढ़े हुए तीव्र रोष से युक्त मानव- वंश की वृद्धि करने वाले उग्र तेजस्वी लक्ष्मण ने जब अपने बड़े भाई को दु:खी, तथा अधिक बोलते देखा, तब वानर राज सुग्रीव के प्रति कठोर भाव धारण कर लिया। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-२४(24) समाप्त ! 

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