भाग-२३(23) श्रीराम के द्वारा वर्षा ऋतु का वर्णन

 



इस प्रकार वाली का वध और सुग्रीव का राज्याभिषेक करने के अनन्तर माल्यवान् पर्वत के पृष्ठभाग में निवास करते हुए श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण से कहने लगे - सुमित्रानन्दन! अब यह जल की प्राप्ति कराने वाला वह प्रसिद्ध वर्षाकाल आ गया। देखो, पर्वत के समान प्रतीत होने वाले मेघों से आकाशमण्डल आच्छन्न हो गया है। यह आकाश स्वरूपा तरुणी सूर्य की किरणों द्वारा समुद्रों का रस पीकर कार्तिक आदि नौ मासों तक धारण किये हुए गर्भ के रूप में जल रूपी रसायन को जन्म दे रही है। इस समय मेघरूपी सोपान पंक्तियों (सीढ़ियों) द्वारा आकाश में चढ़कर गिरिमल्लिका और अर्जुनपुष्प की मालाओं से सूर्यदेव को अलंकृत करना सरल-सा हो गया है। 

'संध्याकाल की लाली प्रकट होने से बीच में लाल तथा किनारे के भागों में श्वेत एवं स्निग्ध प्रतीत होने वाले मेघखण्डों से आच्छादित हुआ आकाश ऐसा जान पड़ता है, मानो उसने अपने घाव में रक्तरञ्जित सफेद कपड़ों की पट्टी बाँध रखी हो। मन्द मन्द हवा नि:श्वास - सी प्रतीत होती है, संध्याकाल की लाली लाल चन्दन बनकर ललाट आदि अङ्ग को अनुरञ्जित कर रही है तथा मेघरूपी कपोल कुछ-कुछ पाण्डुवर्ण का प्रतीत होता है। इस तरह यह आकाश कामातुर पुरुष के समान जान पड़ता है।' 

‘जो ग्रीष्म ऋतु में घाम से तप गयी थी, वह पृथ्वी वर्षाकाल में नूतन जल से भीगकर (सूर्य किरणों से तपी और आँसुओं से भीगी हुई) शोकसंतप्त सीता की भाँति वाष्प विमोचन (उष्णता का त्याग अथवा अश्रुपात) कर रही है। मेघ के उदर से निकली, कपूर की डली के समान ठंडी तथा केवड़े की सुगन्ध से भरी हुई इस बरसाती वायु को मान अञ्जलियों में भरकर पीया जा सकता है। यह पर्वत, जिस पर अर्जुन के वृक्ष खिले हुए हैं तथा जो केवड़ों से सुवासित हो रहा है, शान्त हुए शत्रु वाले सुग्रीव की भाँति जल की धाराओं से अभिषिक्त हो रहा है।' 

'मेघरूपी काले मृग चर्म तथा वर्षा की धारा रूप यज्ञोपवीत धारण किये वायु से पूरित गुफा (या हृदय) वाले ये पर्वत ब्रह्मचारियों की भाँति मानो वेदाध्ययन आरम्भ कर रहे हैं। ये बिजलियाँ सोने के बने हुए कोड़ों के समान जान पड़ती हैं। इनकी मार खाकर मानो व्यथित हुआ आकाश अपने भीतर व्यक्त हुई मेघों की गम्भीर गर्जना के रूप में आर्तनाद-सा कर रहा है। नील मेघ का आश्रय लेकर प्रकाशित होती हुई यह विद्युत् मुझे रावण के अङ्क में छटपटाती हुई तपस्विनी सीता के समान प्रतीत होती है।' 

'बादलों का लेप लग जाने से जिनमें ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा अदृश्य हो गये हैं, अतएव जो नष्ट-सी हो गयी है- जिनके पूर्व, पश्चिम आदि भेदों का विवेक लुप्त-सा हो गया है, वे दिशाएँ, उन कामियों को, जिन्हें प्रेयसी का संयोगसुख सुलभ है, हितकर प्रतीत होती हैं। सुमित्रानन्दन! देखो, इस पर्वत के शिखरों पर खिले हुए कुटज कैसी शोभा पाते हैं? कहीं तो पहली बार वर्षा होने पर भूमि से निकले हुए भाप से ये व्याप्त हो रहे हैं और कहीं वर्षा के आगमन से अत्यन्त उत्सुक (हर्षोत्फुल्ल) दिखायी देते हैं। मैं तो प्रिया-विरह के शोक से पीड़ित हूँ और ये कुटज पुष्प मेरी प्रेमाग्नि को उद्दीप्त कर रहे हैं।' 

'धरती की धूल शान्त हो गयी। अब वायु में शीतलता आ गयी। गर्मी के दोषों का प्रसार बंद हो गया। भूपालों की युद्ध यात्रा रुक गयी और परदेशी मनुष्य अपने-अपने देश को लौट रहे हैं। मानसरोवर में निवास के लोभी हंस वहाँ के लिये प्रस्थित हो गये। इस समय चकवे अपनी प्रियाओं से मिल रहे हैं। निरन्तर होने वाली वर्षा के जल से मार्ग टूट-फूट गये हैं, इसलिये उन पर रथ आदि नहीं चल रहे हैं। आकाश में सब ओर बादल छिटके हुए हैं। कहीं तो उन बादलों से ढक जाने के कारण आकाश दिखायी नहीं देता है। और कहीं उनके फट जाने पर वह स्पष्ट दिखायी देने लगता है। ठीक उसी तरह जैसे जिसकी तरङ्गमालाएँ शान्त हो गयी हों, उस महासागर का रूप कहीं तो पर्वतमालाओं से छिप जाने के कारण नहीं दिखायी देता है और कहीं पर्वतों का आवरण न होने से दिखायी देता है।' 

‘इस समय पहाड़ी नदियाँ वर्षा के नूतन जल को बड़े वेग से बहा रही हैं। वह जल सर्ज और कदम्ब के फूलों से मिश्रित है, पर्वत के गेरू आदि धातुओं से लाल रंग का हो गया है तथा मयूरों की केकाध्वनि उस जल के कलकलनाद का अनुसरण कर रही है। काले-काले भौंरों के समान प्रतीत होने वाले जामुन के सरस फल आजकल लोग जी भरकर खाते हैं और हवा के वेग से हिले हुए आम के पके हुए बहुरंगी फल पृथ्वी पर गिरते रहते है।' 

'जैसे युद्धस्थल में खड़े हुए मतवाले गजराज उच्चस्वर से चिग्घाड़ते हैं, उसी प्रकार गिरिराज के शिखरों की-सी आकृति वाले मेघ जोर-जोर से गर्जना कर रहे हैं। चमकती हुई बिजलियाँ इन मेघरूपी गजराजों पर पताकाओं के समान फहरा रही हैं और बगुलों की पंक्तियाँ माला के समान शोभा देती हैं। देखो, अपराह्णकाल में इन वनों की शोभा अधिक बढ़ जाती है। वर्षा के जल से इनमें हरी-हरी घासें बढ़ गयी हैं। झुंड के झुंड मोरों ने अपना नृत्योत्सव आरम्भ कर दिया है और मेघों ने इनमें निरन्तर जल बरसाया है।' 

‘बक-पंक्तियों से सुशोभित ये जलधर मेघ जल का अधिक भार ढोते और गर्जते हुए बड़े-बड़े पर्वत शिखरों पर मानो विश्राम ले-लेकर आगे बढ़ते हैं । गर्भ धारण के लिये मेघों की कामना रखकर आकाश में उड़ती हुई आनन्दमग्न बलाकाओं की पंक्ति ऐसी जान पड़ती है, मानो आकाश के गले में हवा से हिलती हुई श्वेत कमलों की सुन्दर माला लटक रही हो। छोटे-छोटे इन्द्रगोप (वीरबहूटी) नामक कीड़ों से बीच-बीच में चित्रित हुई नूतन घास से आच्छादित भूमि उस नारी के समान शोभा पाती है, जिसने अपने अङ्गों पर तोते के समान रंग वाला एक ऐसा कम्बल ओढ रखा हो, जिसको बीच-बीच में महावर के रंग से रँगकर विचित्र शोभा से सम्पन्न कर दिया गया हो।' 

‘चौमासे के इस आरम्भकाल में निद्रा धीरे-धीरे भगवान् केशव के समीप जा रही है। नदी तीव्र वेग से समुद्र के निकट पहुँच रही है। हर्षभरी बलाका उड़कर मेघ की ओर जा रही है और प्रियतमा सकामभाव से अपने प्रियतम की सेवा में उपस्थित हो रही है। वनप्रान्त मोरों के सुन्दर नृत्य से सुशोभित हो गये हैं। कदम्बवृक्ष फूलों और शाखाओं से सम्पन्न हो गये हैं। साँड गौओं के प्रति उन्हीं के समान कामभाव से आसक्त हैं और पृथ्वी हरी-हरी खेती तथा हरे-भरे वनों से अत्यन्त रमणीय प्रतीत होने लगी है।' 

'नदियाँ बह रही हैं, बादल पानी बरसा रहे हैं, मतवाले हाथी चिग्घाड़ रहे हैं, वनप्रान्त शोभा पा रहे हैं, प्रियतमा के संयोग से वञ्चित हुए वियोगी प्राणी चिन्तामग्न हो रहे हैं, मोर नाच रहे हैं और वानर निश्चिन्त एवं सुखी हो रहे हैं। वन के झरनों के समीप क्रीडा से उल्लसित हुए मदवर्षी गजराज केवड़े के फूल की सुगन्ध को सूंघकर मतवाले हो उठे हैं और झरने के जल के गिरने से जो शब्द होता है, उससे आकुल हो ये मोरों के बोलने के साथ-साथ स्वयं भी गर्जना करते हैं।' 

‘जलकी धारा गिरने से आहत होते और कदम्ब की डालियों पर लटकते हुए भ्रमर तत्काल ग्रहण किये पुष्परस से उत्पन्न गाढ़ मद को धीरे-धीरे त्याग रहे हैं। कोयलों की चूर्णराशि के समान काले और प्रचुर रस से भरे हुए बड़े-बड़े फलों से लदी हुई जामुन-वृक्ष की शाखाएँ ऐसी जान पड़ती हैं, मानो भ्रमरों के समुदाय उनमें सटकर उनके रस पी रहे हैं। विद्युत्-रूपी पताकाओं से अलंकृत एवं जोर-जोर से गम्भीर गर्जना करने वाले इन बादलों के रूप युद्ध के लिये उत्सुक हुए गजराजों के समान प्रतीत होते हैं।' 

'पर्वतीय वनों में विचरण करने वाला तथा अपने प्रतिद्वन्द्वी के साथ युद्ध की इच्छा रखने वाला मदमत्त गजराज, जो अपने मार्ग का अनुसरण करके आगे बढ़ा जा रहा था, पीछे से मेघ की गर्जना सुनकर प्रतिपक्षी हाथी के गर्जने की आशङ्का करके सहसा पीछे को लौट पड़ा। कहीं भ्रमरों के समूह गीत गा रहे हैं, कहीं मोर नाच रहे हैं और कहीं गजराज मदमत्त होकर विचर रहे हैं। इस प्रकार ये वनप्रान्त अनेक भावों के आश्रय बनकर शोभा पा रहे हैं।' 

‘कदम्ब, सर्ज, अर्जुन और स्थल- कमल से सम्पन्न वन के भीतर की भूमि मधु - जल से परिपूर्ण हो मोरों के मदयुक्त कलरवों और नृत्यों से उपलक्षित होकर आपानभूमि (मधुशाला) के समान प्रतीत होती है। आकाश से गिरता हुआ मोती के समान स्वच्छ एवं निर्मल जल पत्तों के दोनों में संचित हुआ देख प्यासे पक्षी पपीहे हुर्ष से भरकर देवराज इन्द्र के दिये हुए उस जल को पीते हैं। वर्षा से भीग जाने के कारण उनकी पाँखें विविध रंग की दिखायी देती हैं। भ्रमर रूप वीणा की मधुर झंकार हो रही है। मेढकों की आवाज कण्ठताल - सी जान पड़ती है। मेघों की गर्जना के रूप में मृदङ्ग बज रहे हैं। इस प्रकार वनों में संगीतोत्सव का आरम्भ-सा हो रहा है।' 

‘विशाल पंख रूपी आभूषणों से विभूषित मोर वनों में कहीं नाच रहे हैं, कहीं जोर-जोर से मीठी बोली बोल रहे हैं। और कहीं वृक्षों की शाखाओं पर अपने सारे शरीर का बोझ डालकर बैठे हुए हैं। इस प्रकार उन्होंने संगीत ( नाच-गान ) का आयोजन - सा कर रखा है। मेघों की गर्जना सुनकर चिरकाल से रोकी हुई निद्रा को त्यागकर जागे हुए अनेक प्रकार के रूप, आकार, वर्ण और बोली वाले मेढक नूतन जल की धारा से अभिहत होकर जोर-जोर से बोल रहे हैं।' 

(कामातुर युवतियों की भाँति दर्पभरी नदियाँ अपने वक्ष पर (उरोजों के स्थान में) चक्रवाकों को वहन करती हैं और मर्यादा में रखने वाले जीर्ण-शीर्ण कुलकगारों को तोड़-फोड़ एवं दूर बहाकर नूतन पुष्प आदि के उपहार से पूर्ण भोग के लिये सादर स्वीकृत अपने स्वामी समुद्र के समीप वेगपूर्वक चली जा रही हैं। नीले मेघों में सटे हुए नूतन जल से परिपूर्ण नील मेघ ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो दावानल से जले हुए पर्वतों में दावानल से दग्ध हुए दूसरे पर्वत बद्धमूल होकर सट गये हों।' 

'जहाँ मतवाले मोर कलनाद कर रहे हैं, जहाँ की हरी-हरी घासें वीरबहूटियों के समुदाय से व्याप्त हो रही हैं तथा जो नीप और अर्जुन-वृक्षों के फूलों की सुगन्ध से सुवासित हैं, उन परम रमणीय वनप्रान्तों में बहुत-से हाथी विचरा करते हैं। भ्रमरों के समुदाय नूतन जल की धारा से नष्ट हुए केसर वाले कमल-पुष्पों को तुरंत त्यागकर केसर शोभित नवीन कदम्ब-पुष्पों का रस बड़े हर्ष के साथ पी रहे हैं।'

‘गजेन्द्र (हाथी) मतवाले हो रहे हैं। गवेन्द्र (वृषभ) आनन्द में मग्न हैं, मृगेन्द्र (सिंह) वनों में अत्यन्त पराक्रम प्रकट करते हैं, नगेन्द्र (बड़े-बड़े पर्वत ) रमणीय दिखायी देते हैं, नरेन्द्र (राजालोग) मौन हैं - युद्धविषयक उत्साह छोड़ बैठे हैं और सुरेन्द्र (इन्द्रदेव) जलधरों के साथ क्रीडा कर रहे हैं। आकाश में लटके हुए ये मेघ अपनी गर्जना से समुद्र के कोलाहल को तिरस्कृत करके अपने जल के महान् प्रवाह से नदी, तालाब, सरोवर, बावली तथा समूची पृथ्वी को आप्लावित कर रहे हैं। बड़े वेग से वर्षा हो रही है, जोरों की हवा चल रही है और नदियाँ अपने कगारों को काटकर अत्यन्त तीव्र गति से जल बहा रही हैं। उन्होंने मार्ग रोक दिये हैं।'

‘जैसे मनुष्य जल के कलशों से नरेशों का अभिषेक करते हैं, उसी प्रकार इन्द्र के दिये और वायुदेव के द्वारा लाये गये मेघरूपी जल कलशों से जिनका अभिषेक हो रहा है, वे पर्वतराज अपने निर्मल रूप तथा शोभा सम्पत्ति का दर्शन-सा करा रहे हैं। मेघों की घटा से समस्त आकाश आच्छादित हो गया है। न रात में तारे दिखायी देते हैं, न दिन में सूर्य। नूतन जलराशि पाकर पृथ्वी पूर्ण तृप्त हो गयी है। दिशाएँ अन्धकार से आच्छन्न हो रही हैं, अतएव प्रकाशित नहीं होती हैं - उनका स्पष्ट ज्ञान नहीं हो पाता है।' 

“जल की धाराओं से घुले हुए पर्वतों के विशाल शिखर मोतियों के लटकते हुए हारों की भाँति एवं बहुसंख्यक झरनों के कारण अधिक शोभा पाते हैं। पर्वतीय प्रस्तरखण्डों पर गिरने से जिनका वेग टूट गया है, वे श्रेष्ठ पर्वतों के बहुतेरे झरने मयूरों की बोली से गूँजती हुई गुफाओं में टूटकर बिखरते हुए मोतियों के हारों के समान प्रतीत होते हैं। जिनके वेग शीघ्रगामी हैं, जिनकी संख्या अधिक है, जिन्होंने पर्वतीय शिखरों के निम्न प्रदेशों को धोकर स्वच्छ बना दिया है तथा जो देखने में मुक्तामालाओं के समान प्रतीत होते हैं, पर्वतों के उन झरते हुए झरनों को बड़ी-बड़ी गुफाएँ अपनी गोद में धारण कर लेती हैं।' 

‘सुरत-क्रीडा के समय होने वाले अगों के आमर्दन से टूटे हुए देवाङ्गनाओं के मौक्तिक हारों के समान प्रतीत होने वाली जल की अनुपम धाराएँ सम्पूर्ण दिशाओं में सब ओर गिर रही हैं। पक्षी अपने घोसलों में छिप रहे हैं, कमल संकुचित हो रहे हैं और मालती खिलने लगी है; इससे जान पड़ता है कि सूर्यदेव अस्त हो गये। राजाओं की युद्ध-यात्रा रुक गयी। प्रस्थित हुई सेना भी रास्ते में ही पड़ाव डाले पड़ी है। वर्षा के जल ने राजाओं के वैर शान्त कर दिये हैं और मार्ग भी रोक दिये हैं। इस प्रकार वैर और मार्ग दोनों की एक-सी अवस्था कर दी है।'  

‘भादों का महीना आ गया। यह वेदों के स्वाध्याय की इच्छा रखने वाले ब्राह्मणों के लिये उपाक्रम का समय उपस्थित हुआ है। सामगान करने वाले विद्वानों के स्वाध्याय का भी यही समय है। कोशल देश के राजा भरत ने चार महीने के लिये आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करके गत आषाढ की पूर्णिमा को निश्चय ही किसी उत्तम व्रत की दीक्षा ली होगी। मुझे वन की ओर आते देख जिस प्रकार अयोध्यापुरी के लोगों का आर्तनाद बढ़ गया था, उसी प्रकार इस समय वर्षा के जल से परिपूर्ण होती हुई सरयू नदी का वेग अवश्य ही बढ़ रहा होगा।' 

'यह वर्षा अनेक गुणों से सम्पन्न है। इस समय सुग्रीव अपने शत्रु को परास्त करके विशाल वानर - राज्य पर प्रतिष्ठित हैं और अपनी स्त्री के साथ रहकर सुख भोग रहे हैं। किंतु लक्ष्मण! मैं अपने महान् राज्य से तो भ्रष्ट हो ही गया हूँ, मेरी स्त्री भी हर ली गयी है; इसलिये पानी से गले हुए नदी तट की भाँति कष्ट पा रहा हूँ। मेरा शोक बढ़ गया है। मेरे लिये वर्षा के दिनों को बिताना अत्यन्त कठिन हो गया है और मेरा महान् शत्रु रावण भी मुझे अजेय-सा प्रतीत होता है।' 

‘एक तो यह यात्रा का समय नहीं है, दूसरे मार्ग भी अत्यन्त दुर्गम है। इसलिये सुग्रीव के नतमस्तक होने पर भी मैंने उनसे कुछ कहा नहीं है। वानर सुग्रीव बहुत दिनों से कष्ट भोगते थे और दीर्घकाल के पश्चात् अब अपनी पत्नी से मिले हैं। इधर मेरा कार्य बड़ा भारी है (थोड़े दिनों में सिद्ध होने वाला नहीं है); इसलिये मैं इस समय उससे कुछ कहना नहीं चाहता हूँ। कुछ दिनों तक विश्राम करके उपयुक्त समय आया हुआ जान वे स्वयं ही मेरे उपकार को समझेंगे; इसमें संशय नहीं है। अतः शुभलक्षण लक्ष्मण! मैं सुग्रीव की प्रसन्नता और नदियों के जल की स्वच्छता चाहता हुआ शरत्काल की प्रतीक्षा में चुपचाप बैठा हुआ हूँ। जो वीर पुरुष किसी के उपकार से उपकृत होता है, वह प्रत्युपकार करके उसका बदला अवश्य चुकाता है; किंतु यदि कोई उपकार को न मानकर या भुलाकर प्रत्युपकार से मुँह मोड़ लेता है, वह शक्तिशाली श्रेष्ठ पुरुषों के मन को ठेस पहुँचाता है।' 

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर लक्ष्मण ने सोच विचार कर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और दोनों हाथ जोड़कर अपनी शुभ दृष्टि का परिचय देते हुए वे नयनाभिराम श्रीराम से इस प्रकार बोले - नरेश्वर! जैसा कि आपने कहा है, वानर राज सुग्रीव शीघ्र ही आपका यह सारा मनोरथ सिद्ध करेंगे। अतः आप शत्रु के संहार करने का दृढ़ निश्चय लिये शरत्काल की प्रतीक्षा कीजिये और इस वर्षाकाल के विलम्ब को सहन कीजिये। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-२३(23) समाप्त ! 

No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...