भाग-२२(22) सुग्रीव और अङ्गद का अभिषेक, प्रस्रवण गिरि पर श्रीराम और लक्ष्मण की परस्पर बातचीत

 


तदनन्तर वानर सेना के प्रधान - प्रधान वीर (हनुमान् आदि) भीगे वस्त्र वाले शोक संतप्त सुग्रीव को चारों ओर से घेरकर उन्हें साथ लिये अनायास ही महान् कर्म करने वाले महाबाहु श्रीराम की सेवा में उपस्थित हुए। श्रीराम के पास आकर वे सभी वानर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये, जैसे ब्रह्माजी के सम्मुख महर्षिगण खड़े रहते हैं।  

तत्पश्चात् सुवर्णमय मेरु पर्वत के समान सुन्दर एवं विशाल शरीर वाले वायुपुत्र हनुमानजी, जिनका मुख प्रात: काल के सूर्य की भाँति अरुण प्रभा से प्रकाशित हो रहा था, दोनों हाथ जोड़कर बोले - ककुत्स्थकुलनन्दन! आपकी कृपा से सुग्रीव को सुन्दर दाढ़ वाले पूर्ण बलशाली और महामनस्वी वानरों का यह विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ, जो इनके पिता-पितामहों के समय से चला आ रहा है। प्रभो! यद्यपि इसका मिलना बहुत ही कठिन था तो भी आपके प्रसाद से यह इन्हें सुलभ हो गया। अब यदि आप आज्ञा दें तो ये अपने सुन्दर नगर में प्रवेश करके सुहृदों के साथ अपना सब राजकार्य सँभालें। 

'ये शास्त्र विधि के अनुसार नाना प्रकार के सुगन्धित पदार्थों और ओषधियों सहित जल से राज्य पर अभिषिक्त होकर मालाओं तथा रत्नों द्वारा आपकी विशेष पूजा करेंगे। अत: आप इस रमणीय पर्वत - गुफा किष्किन्धा में पधारने की कृपा करें और इन्हें इस राज्य का स्वामी बनाकर वानरों का हर्ष बढ़ावें।' 

हनुमानजी के ऐसा कहने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले तथा बातचीत में कुशल बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजी ने उन्हें यों उत्तर दिया - हनुमन्! सौम्य! मैं पिता की आज्ञा का पालन कर रहा हूँ, अत: चौदह वर्षों के पूर्ण होने तक किसी ग्राम या नगर में प्रवेश नहीं करूँगा। वानर श्रेष्ठ वीर सुग्रीव इस समृद्धिशालिनी दिव्य गुफा में प्रवेश करें और वहाँ शीघ्र ही इनका विधिपूर्वक राज्याभिषेक कर दिया जाय। 

हनुमान से ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव से बोले – मित्र ! तुम लौकिक और शास्त्रीय सभी व्यवहार जानते हो। कुमार अङ्गद सदाचार सम्पन्न तथा महान् बल-पराक्रम से परिपूर्ण हैं। इनमें वीरता कूट-कूटकर भरी है, अत: तुम इनको भी युवराज पद पर अभिषिक्त करो। ये तुम्हारे बड़े भाई के ज्येष्ठ पुत्र हैं। पराक्रम में भी उन्हीं के समान हैं तथा इनका हृदय उदार है। अत: अङ्गद युवराजपद के सर्वथा अधिकारी हैं। 

'सौम्य ! वर्षा कहलाने वाले चार मास या चौमासे आ गये। इनमें पहला मास यह श्रावण, जो जल की प्राप्ति कराने वाला है, आरम्भ हो गया। सौम्य! यह किसी पर चढ़ाई करने का समय नहीं है। इसलिये तुम अपनी सुन्दर नगरी में जाओ। मैं लक्ष्मण के साथ इस पर्वत पर निवास करूँगा। सौम्य सुग्रीव ! यह पर्वतीय गुफा बड़ी रमणीय और विशाल है। इसमें आवश्यकता के अनुरूप हवा भी मिल जाती है। यहाँ पर्याप्त जल भी सुलभ है और कमल तथा उत्पल भी बहुत हैं। सखे! कार्तिक आने पर तुम रावण के वध के लिये प्रयत्न करना। यही हम लोगों का निश्चय रहा। अब तुम अपने महल में प्रवेश करो और राज्य पर अभिषिक्त होकर सुहृदों को आनन्दित करो।' 

श्रीरामचन्द्रजी की यह आज्ञा पाकर वानर श्रेष्ठ सुग्रीव उस रमणीय किष्किन्धापुरी में गये, जिसकी रक्षा वाली ने की थी। उस समय गुफा में प्रविष्ट हुए उन वानरराज को चारों ओर से घेरकर हजारों वानर उनके साथ ही गुहा में घुसे। वानरराज को देखकर प्रजा आदि समस्त प्रकृतियों ने एकाग्रचित्त हो पृथ्वी पर माथा टेककर उन्हें प्रणाम किया। महाबली पराक्रमी सुग्रीव ने उन सबको उठने की आज्ञा दी और उन सबसे बातचीत करके वे भाई के सौम्य अन्त:पुर में प्रविष्ट हुए। 

भयंकर पराक्रम प्रकट करने वाले वानर श्रेष्ठ सुग्रीव को अन्तःपुर में आया देख उनके सुहृदों ने उनका उसी प्रकार अभिषेक किया, जैसे देवताओं ने सहस्र नेत्रधारी इन्द्र का किया था। पहले तो वे सब लोग उनके लिये सुवर्णभूषित श्वेत छत्र, सोने की डाँड़ी वाले दो सफेद चँवर, सब प्रकार के रत्न, बीज और ओषधियाँ, दूध वाले वृक्षों की नीचे लटकने वाली जटाएँ, श्वेत पुष्प, श्वेत वस्त्र, श्वेत अनुलेपन, जल और थल में होने वाले सुगन्धित फूलों की मालाएँ, दिव्य चन्दन, नाना प्रकार के बहुत से सुगन्धित पदार्थ, अक्षत, सोना, प्रियङ्गु (कगनी), मधु, घी, दही, व्याघ्र चर्म, सुन्दर एवं बहुमूल्य जूते, अङ्गराग, गोरोचन और मैनसिल आदि सामग्री लेकर वहाँ उपस्थित हुए, साथ ही हर्ष से भरी हुई सोलह सुन्दरी कन्याएँ भी सुग्रीव के पास आयीं। 

तदनन्तर उन सबने श्रेष्ठ ब्राह्मणों को नाना प्रकार के रत्न, वस्त्र और भक्ष्य पदार्थों से संतुष्ट करके वानर श्रेष्ठ सुग्रीव का विधिपूर्वक अभिषेक कार्य आरम्भ किया। मन्त्रवेत्ता पुरुषों ने वेदी पर अग्नि की स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया और अग्नि वेदी के चारों ओर कुश बिछाये। फिर अग्नि का संस्कार करके मन्त्रपूत हविष्य के द्वारा प्रज्वलित अग्नि में आहुति दी। 

तत्पश्चात् रंग-बिरंगी पुष्पमालाओं से सुशोभित रमणीय अट्टालिका पर एक सोने का सिंहासन रखा गया और उस पर सुन्दर बिछौना बिछाकर उसके ऊपर सुग्रीव को पूर्वाभिमुख करके विधिवत् मन्त्रोच्चारण करते हुए बिठाया गया। इसके बाद श्रेष्ठ वानरों ने नदियों, नदों, सम्पूर्ण दिशाओं के तीर्थों और समस्त समुद्रों से लाये हुए निर्मल जल को एकत्र करके उसे सोने के कलशों में रखा। फिर गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, हनुमान् और जाम्बवान ने महर्षियों की बतायी हुई शास्त्रोक्त विधि के अनुसार सुवर्णमय कलशों में रखे हुए स्वच्छ और सुगन्धित जल से सुग्रीव का उसी प्रकार अभिषेक किया, जैसे वसुओं ने इन्द्र का अभिषेक किया था। 

सुग्रीव का अभिषेक हो जाने पर वहाँ लाखों की संख्या में एकत्र हुए समस्त महामनस्वी श्रेष्ठ वानर हर्ष से भरकर जयघोष करने लगे। श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा का पालन करते हुए वानरराज सुग्रीव ने अङ्गद को हृदय से लगाकर उन्हें भी युवराज के पद पर अभिषिक्त कर दिया। अङ्गद का अभिषेक हो जाने पर महामनस्वी दयालु वानर 'साधु-साधु' कहकर सुग्रीव की सराहना करने लगे।  

इस प्रकार अभिषेक होकर किष्किन्धा में सुग्रीव और अङ्गद के विराजमान होने पर समस्त वानर परम प्रसन्न हो महात्मा श्रीराम और लक्ष्मण की बारंबार स्तुति करने लगे। उस समय पर्वत की गुफा में बसी हुई किष्किन्धापुरी हृष्ट-पुष्ट पुरवासियों से व्याप्त तथा ध्वजापताकाओं से सुशोभित होने के कारण बड़ी रमणीय प्रतीत होती थी।वानरसेना के स्वामी पराक्रमी सुग्रीव ने महात्मा श्रीरामचन्द्रजी के पास जाकर अपने महाभिषेक का समाचार निवेदन किया और अपनी पत्नी रुमा को पाकर उन्होंने उसी प्रकार वानरों का साम्राज्य प्राप्त किया, जैसे देवराज इन्द्र ने त्रिलोकी का। 

जब वानर सुग्रीव का राज्याभिषेक हो गया और वे किष्किन्धा में जाकर रहने लगे, उस समय अपने भाई लक्ष्मण के साथ श्रीरामजी प्रस्रवण गिरि पर चले गये। वहाँ चीतों और मृगों की आवाज गूंजती रहती थी। भयंकर गर्जना करने वाले सिंहों से वह स्थान भरा था। नाना प्रकार की झाड़ियाँ और लताएँ उस पर्वत को आच्छादित किये हुए थीं और घने वृक्षों के द्वारा वह सब ओर से व्याप्त था।

रीछ्, वानर, लंगूर और बिलाव आदि जन्तु वहाँ निवास करते थे। वह पर्वत मेघों के समूह-सा जान पड़ता था। दर्शन करने वाले लोगों के लिये वह सदा ही मङ्गलमय और पवित्रकारक था। उस पर्वत के शिखर पर एक बहुत बड़ी और विस्तृत गुफा थी। लक्ष्मणसहित श्रीराम ने उसी का अपने रहने के लिये आश्रय लिया। रघुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी वर्षा का अन्त होने पर सुग्रीव के साथ रावण पर चढ़ाई करने का निश्चय करके वहाँ आये थे। 

उन्होंने लक्ष्मी की वृद्धि करने वाले अपने विनययुक्त भ्राता लक्ष्मण से यह समयोचित बात कही - शत्रुदमन सुमित्राकुमार! यह पर्वत की गुफा बड़ी ही सुन्दर और विशाल है। यहाँ हवा के आने-जाने का भी मार्ग है। हमलोग वर्षा की रात में इसी गुफा के भीतर निवास करेंगे। राजकुमार! पर्वत का यह शिखर बहुत ही उत्तम और रमणीय है। सफेद, काले और लाल हर तरह के प्रस्तर- खण्ड इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं। यहाँ नाना प्रकार के धातुओं की खानें हैं। पास ही नदी बहती है। उसमें रहने वाले मेढक यहाँ भी उछलते-कूदते चले आते हैं। नाना प्रकार के वृक्ष समूह इसकी शोभा बढ़ाते हैं । सुन्दर और विचित्र लताओं से यह शैल - शिखर हरा- भरा दिखायी देता है। भाँति-भाँति के पक्षी यहाँ चहक रहे हैं तथा सुन्दर मोरों की मीठी बोली गूंज रही है। 

'मालती और कुन्द की झाड़ियाँ, सिन्दुवार, शिरीष, कदम्ब, अर्जुन और सर्ज के फूले हुए वृक्ष इस स्थान की शोभा बढ़ा रहे हैं। राजकुमार ! यह पुष्करिणी खिले हुए कमलों से अलंकृत हो बड़ी रमणीय दिखायी देती है। यह हम लोगों की गुफा से अधिक दूर नहीं होगी। सौम्य ! यहाँ का स्थान ईशान कोण की ओर से नीचा है, अतः यहाँ यह गुफा हमारे निवास के लिये बहुत अच्छी रहेगी। पश्चिम-दक्षिण के कोण की ओर से ऊँची यह गुफा हवा और वर्षा से बचाने के लिये अच्छी होगी।' 

'सुमित्रानन्दन! इस गुफा के द्वार पर समतल शिला है, जो बाहर बैठने के लिये सुविधाजनक होने के कारण सुखदायिनी है। यह लंबी-चौड़ी होने के साथ ही खान से काटकर निकाले हुए कोयलों की राशि के समान काली है। तात! देखो, यह सुन्दर पर्वत शिखर उत्तर की ओर से कटे हुए कोयलों की राशि तथा घुमड़े हुए मेघों की घटा के समान काला दिखायी देता है। इसी तरह दक्षिण दिशा में भी इसका जो शिखर है, वह श्वेत वस्त्र और कैलाश श्रृङ्ग के समान श्वेत दिखायी देता है। नाना प्रकार की धातुएँ उसकी शोभा बढ़ाती हैं।' 

‘वह देखो, इस गुफा के दूसरी ओर त्रिकूट पर्वत के समीप बहने वाली मन्दाकिनी के समान तुङ्गभद्रा नदी बह रही है। उसकी धारा पश्चिम से पूर्व की ओर जा रही है। उसमें कीचड़ का नाम भी नहीं है। चन्दन, तिलक, साल, तमाल, अतिमुक्तक, पद्मक, सरल और शोक आदि नाना प्रकार के वृक्षों से उस नदी की कैसी शोभा हो रही है? जलबेंत, तिमिद, बकुल, केतक, हिन्ताल, तिनिश, नीप, स्थलबेंत, कृतमाल (अमिलतास) आदि भाँति-भाँति तटवर्ती वृक्षों से जहाँ-तहाँ सुशोभित हुई यह नदी वस्त्राभूषणों से विभूषित श्रृङ्गारसज्जित युवती स्त्री के समान जा पड़ती है।' 

‘सैकड़ों पक्षिसमूहों से संयुक्त हुई यह नदी उनके नाना प्रकार के कलरवों से गूँजती रहती है। परस्पर अनुरक्त हुए चक्रवाक इस सरिता की शोभा बढ़ाते हैं। अत्यन्त रमणीय तटों से अलंकृत, नाना प्रकार के रत्नों से सम्पन्न तथा हंस और सारसों से सेवित यह नदी अपनी हास्यच्छटा बिखेरती हुई-सी जान पड़ती है। कहीं तो यह नील कमलों से ढकी हुई है, कहीं लाल कमलों से सुशोभित होती है और कहीं श्वेत एवं दिव्य कुमुद कलिकाओं से शोभा पाती है।' 

‘सैकड़ों जल-पक्षियों से सेवित तथा मोर एवं क्रौञ्च के कलरवों से मुखरित हुई यह सौम्य नदी बड़ी रमणीय प्रतीत होती है। मुनियों के समुदाय इसके जल का सेवन करते हैं। वह देखो, अर्जुन और चन्दन वृक्षों की पंक्तियाँ कितनी सुन्दर दिखायी देती हैं। मालूम होता है ये मन के संकल्प के साथ ही प्रकट हो गयी हैं। शत्रुसूदन सुमित्राकुमार! यह स्थान अत्यन्त रमणीय और अद्भुत है। यहाँ हम लोगों का मन खूब लगेगा। अतः यहीं रहना ठीक होगा।' 

‘राजकुमार! विचित्र काननों से सुशोभित सुग्रीव की रमणीय किष्किन्धा पुरी भी यहाँ से अधिक दूर नहीं होगी। विजयी वीरों में श्रेष्ठ लक्ष्मण! मृदङ्ग की मधुर ध्वनि के साथ गर्जते हुए वानरों के गीत और वाद्य का गम्भीर घोष यहाँ से सुनायी देता है। निश्चय ही कपिश्रेष्ठ सुग्रीव अपनी पत्नी को पाकर, राज्य को हस्तगत करके और बड़ी भारी लक्ष्मी पर अधिकार प्राप्त करके सुहृदों के साथ आनन्दोत्सव मना रहे हैं।' 

ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण के साथ उस प्रस्रवण पर्वत पर जहाँ बहुत सी कन्दराओं और कुञ्जों के दर्शन होते थे, निवास करने लगे। यद्यपि उस पर्वत पर परम सुख प्रदान करने वाले बहुत से फल-फूल आदि आवश्यक पदार्थ थे, तथापि राक्षस द्वारा हरी गयी प्राणों से भी बढ़कर आदरणीय सीता का स्मरण करते हुए भगवान् श्रीराम को वहाँ तनिक भी सुख नहीं मिलता था। विशेषत: उदयाचल पर उदित हुए चन्द्रदेव का दर्शन करके रात में शय्या पर लेट जाने पर भी उन्हें नींद नहीं आती थी। 

सीता के वियोगजनित शोक से आँसू बहाते हुए वे अचेत हो जाते थे। श्रीराम को निरन्तर शोकमग्न रहकर चिन्ता करते देख उनके दु:ख में समान रूप से भाग लेने वाले भाई लक्ष्मण ने उनसे विनयपूर्वक कहा - वीर ! इस प्रकार व्यथित होने से कोई लाभ नहीं है। अतः आपको शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक करने वाले पुरुष के सभी मनोरथ नष्ट हो जाते हैं, यह बात आपसे छिपी नहीं है। रघुनन्दन ! आप जगत में कर्मठ - वीर तथा देवताओं का समादर करने वाले हैं। आस्तिक, धर्मात्मा और उद्योगी हैं। 

'यदि आप शोकवश उद्यम छोड़ बैठते हैं तो पराक्रम के स्थान स्वरूप समराङ्गण में कुटिल कर्म करने वाले उस शत्रु का, जो विशेषतः राक्षस है, वध करने में समर्थ न हो सकेंगे। अत: आप अपने शोक को जड़ से उखाड़ फेंकिये और उद्योग के विचार को सुस्थिर कीजिये। तभी आप

परिवार सहित उस राक्षस का विनाश कर सकते हैं।' 

‘काकुत्स्थ! आप तो समुद्र, वन और पर्वतों सहित समूची पृथ्वी को भी उलट सकते हैं; फिर उस रावण का संहार करना आपके लिये कौन बड़ी बात है ? यह वर्षाकाल आ गया है। अब शरद् ऋतु की प्रतीक्षा कीजिये। फिर राज्य और सेना सहित रावण का वध कीजियेगा। जैसे राख में छिपी हुई आग को हवन काल में आहुतियों द्वारा प्रज्वलित किया जाता है, उसी प्रकार मैं आपके सोये हुए पराक्रम को जगा रहा हूँ - भूले हुए बल - विक्रम की याद दिला रहा हूँ।' 

लक्ष्मण के इस शुभ एवं हितकर वचन की सराहना करके श्रीरघुनाथजी ने अपने स्नेही सुहृत् सुमित्राकुमार से इस प्रकार कहा - लक्ष्मण! अनुरागी, स्नेही, हितैषी और सत्यपराक्रमी वीर को जैसी बात कहनी चाहिये वैसी ही तुमने कही है। लो, सब तरह के काम बिगाड़ने वाले शोक को मैंने त्याग दिया। अब मैं पराक्रम विषयक दुर्धर्ष तेज को प्रोत्साहित करता हूँ (बढ़ाता हूँ)। तुम्हारी बात मान लेता हूँ। सुग्रीव के प्रसन्न होकर सहायता करने और नदियों के जल के स्वच्छ होने की बाट देखता हुआ मैं शरत्- काल की प्रतीक्षा करूँगा। जो वीर पुरुष किसी के उपकार से उपकृत होता है, वह प्रत्युपकार करके उसका बदला अवश्य चुकाता है, किंतु यदि कोई उपकार को न मानकर या भुलाकर प्रत्युपकार से मुँह मोड़ लेता है, वह शक्तिशाली श्रेष्ठ पुरुषों के मन को ठेस पहुँचाता है। 

श्रीरामजी के उस कथन को ही युक्तियुक्त मानकर लक्ष्मण ने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और दोनों हाथ जोड़कर अपनी शुभ दृष्टि का परिचय देते हुए वे नयनाभिराम श्रीराम से इस प्रकार बोले - नरेश्वर! जैसा कि आपने कहा है, वानरराज सुग्रीव शीघ्र ही आपका यह सारा मनोरथ सिद्ध करेंगे। अत: आप शत्रु के संहार करने का दृढ़ निश्चय लिये शरत्काल की प्रतीक्षा कीजिये और इस वर्षाकाल के विलम्ब को सहन कीजिये। क्रोध को वश में रखकर शरत्काल की राह देखिये। बरसात के चार महीनों तक जो भी कष्ट हो, उसे सहन कीजिये तथा शत्रुवध में समर्थ होने पर भी इस वर्षाकाल को व्यतीत करते हुए मेरे साथ इस सिंह सेवित पर्वत पर निवास कीजिये। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-२२(22) समाप्त ! 

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