भाग-२१(21) सुग्रीव का शोक मग्न होकर श्रीराम से प्राण त्याग के लिये आज्ञा माँगना, तारा का श्रीराम से अपने वध के लिये प्रार्थना करना और श्रीराम का उसे समझाना, अङ्गद के द्वारा वाली का दाह संस्कार कराना और उसे जलाञ्जलि देना

 


अत्यन्त वेगशाली और दु:सह शोकसमुद्र में डूबी हुई तारा की ओर दृष्टिपात करके वाली के छोटे भाई वेगवान् सुग्रीव को उस समय अपने भाई के वध से बड़ा संताप हुआ। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह चली। उनका मन खिन्न हो गया और वे भीतर ही भीतर कष्ट का अनुभव करते हुए अपने भृत्यों के साथ धीरे-धीरे श्रीरामचन्द्रजी के पास गये। जिन्होंने धनुष ले रखा था, जिनमें धीरोदात्त नायक का स्वभाव विद्यमान था, जिनके बाण विषधर सर्प के समान भयंकर थे, जिनका प्रत्येक अङ्ग सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार उत्तम लक्षणोंसे लक्षित था तथा जो परम यशस्वी थे, वहाँ खड़े हुए उन श्रीरघुनाथजी के पास जाकर सुग्रीव इस प्रकार बोले। 

‘नरेन्द्र! आपने जैसी प्रतिज्ञा की थी, उसके अनुसार यह काम कर दिखाया। इस कर्म का राज्य-लाभरूप फल भी प्रत्यक्ष ही है। किंतु राजकुमार ! इससे मेरा जीवन निन्दनीय हो गया है। अतः अब मेरा मन सभी भोगों से निवृत्त हो गया।। श्रीराम ! राजा वाली के मारे जाने से ये महारानी तारा अत्यन्त विलाप कर रही हैं। सारा नगर दु:ख से संतप्त होकर चीख रहा है तथा कुमार अङ्गद का जीवन भी संशय में पड़ गया है। इन सब कारणों से अब राज्य में मेरा मन नहीं लगता है।' 

‘इक्ष्वाकु कुल के गौरव श्रीरघुनाथजी ! भाई ने मेरा बहुत अधिक तिरस्कार किया था, इसलिये क्रोध और अमर्ष के कारण पहले मैंने उसके वध के लिये अनुमति दे दी थी; परंतु अब वानर-यूथपति वाली के मारे जाने पर मुझे बड़ा संताप हो रहा है। सम्भवत: जीवन भर यह संताप बना ही रहेगा। अपनी जातीय वृत्ति के अनुसार जैसे-तैसे जीवन निवार्ह करते हुए उस श्रेष्ठ पर्वत ऋष्यमूक पर चिरकाल तक रहना ही आज मैं अपने लिये कल्याणकारी समझता हूँ; किंतु अपने इस भाई का वध कराकर अब मुझे स्वर्ग का भी राज्य मिल जाय तो मैं उसे अपने लिये श्रेयस्कर नहीं मानता हूँ।' 

'बुद्धिमान् महात्मा वाली ने युद्ध के समय मुझसे कहा था कि 'तुम चले जाओ, मैं तुम्हारे प्राण लेना नहीं चाहता। श्रीराम ! उनकी यह बात उन्हीं के योग्य थी और मैंने जो आपसे कहकर उनका वध कराया, मेरा वह क्रूरतापूर्ण वचन और कर्म मेरे ही अनुरूप है। वीर रघुनन्दन! कोई कितना ही स्वार्थी क्यों न हो? यदि राज्य के सुख तथा भ्रातृ-वध से होने वाले दु:ख की प्रबलता पर विचार करेगा तो वह भाई होकर अपने महान् गुणवान् भाई का वध कैसे अच्छा समझेगा?' 

‘वाली के मन में मेरे वध का विचार नहीं था; क्योंकि इससे उन्हें अपनी मान-प्रतिष्ठा में बट्टा लगने का डर था। मेरी ही बुद्धि में दुष्टता भरी थी, जिसके कारण मैंने अपने भाई के प्रति ऐसा अपराध कर डाला, जो उनके लिये घातक सिद्ध हुआ। जब वाली ने मुझे एक वृक्ष की शाखा से घायल कर दिया और मैं दो घड़ी तक कराहता रहा, तब उन्होंने मुझे सान्त्वना देकर कहा - 'जाओ, फिर मेरे साथ युद्ध करने की इच्छा न करना।' 

‘उन्होंने भ्रातृभाव, आर्यभाव और धर्म की भी रक्षा की है; परंतु मैंने केवल काम, क्रोध और वानरोचित चपलता का ही परिचय दिया है। मित्र! जैसे वृत्रासुर का वध करने से इन्द्र पाप के भागी हुए थे, उसी प्रकार मैं भाई का वध कराकर ऐसे पाप का भागी हुआ हूँ, जिसको करना तो दूर रहा, सोचना भी अनुचित है। श्रेष्ठ पुरुषों के लिये जो सर्वथा त्याज्य, अवाञ्छनीय तथा देखने के भी अयोग्य है। इन्द्र के पाप को तो पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियों ने स्वेच्छा से ग्रहण कर लिया था; परंतु मुझ जैसे वानर के इस परंतु मुझ जैसे वानरके इस पाप को कौन लेना चाहेगा? अथवा कौन ले सकेगा?' 

'रघुनाथजी! अपने कुल का नाश करने वाला ऐसा पापपूर्ण कर्म करके मैं प्रजा के सम्मान का पात्र नहीं रहा। राज्य पाना तो दूर की बात है, मुझमें युवराज होने की भी योग्यता नहीं है। मैंने वह लोकनिन्दित पापकर्म किया है, जो नीच पुरुषों के योग्य तथा सम्पूर्ण जगत को हानि पहुँचानेवाला है। जैसे वर्षा के जल का वेग नीची भूमि की ओर जाता है, उसी प्रकार यह भ्रातृ-वधजनित महान् शोक सब ओर से मुझ पर ही आक्रमण कर रहा है।' 

'भाई का वध ही जिसके शरीर का पिछला भाग और पुच्छ है तथा उससे होने वाला संताप ही जिसकी सूँड, नेत्र, मस्तक और दाँत हैं, वह पापरूपी महान् मदमत्त गजराज नदी तट की भाँति मुझ पर ही आघात कर रहा है। नरेश्वर! रघुनन्दन! मैंने जो दुःसह पाप किया है, यह मेरे हृदयस्थित सदाचार को भी नष्ट कर रहा है। ठीक उसी तरह, जैसे आग में तपाया जाने वाला मलिन सुवर्ण अपने भीतर के मल को नष्ट कर देता है ।' 

'रघुनाथजी ! मेरे ही कारण वाली का वध हुआ, जिससे इस अङ्गद का भी शोक संताप बढ़ गया और इसीलिये इन महाबली वानर-यूथपतियों का समुदाय अधमरा-सा जान पड़ता है। वीरवर! सुजन और वश में रहने वाला पुत्र तो मिल सकता है, परंतु अङ्गद के समान पुत्र कहाँ मिलेगा? तथा ऐसा कोई देश नहीं है, जहाँ मुझे अपने भाई का सामीप्य मिल सके। अब वीरवर अङ्गद भी जीवित नहीं रह सकता। यदि जी सकता तो उसकी रक्षा के लिये उसकी माता भी जीवन धारण करती। वह बेचारी तो यों ही संताप से दीन हो रही है, यदि पुत्र भी न रहा तो उसके जीवन का अन्त हो जायगा – यह बिलकुल निश्चित बात है। अत: मैं अपने भाई और पुत्र का साथ देने की इच्छा से प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करूँगा। ये वानर वीर आपकी आज्ञा में रहकर माता सीता की खोज करेंगे।' 

‘राजकुमार! मेरी मृत्यु हो जाने पर भी आपका सारा कार्य सिद्ध हो जायगा। मैं कुल की हत्या करने वाला और अपराधी हूँ। अत: संसार में जीवन धारण करने के योग्य नहीं हूँ। इसलिये श्रीराम ! मुझे प्राणत्याग करने की आज्ञा दीजिये।' 

दु:ख से आतुर हुए सुग्रीव के, जो वाली के छोटे भाई थे, ऐसे वचन सुनकर शत्रुवीरों का संहार करने में समर्थ, रघुकुल के वीर भगवान् श्रीराम के नेत्रों से आँसू बहने लगे। वे दो घड़ी तक मन-ही-मन दुःख का अनुभव करते रहे। श्रीरघुनाथजी पृथ्वी के समान क्षमाशील और सम्पूर्ण जगत की  रक्षा करने वाले हैं। उन्होंने उस समय अधिक उत्सुक होकर जब इधर-उधर बारंबार दृष्टि दौड़ायी, तब शोकमग्ना तारा उन्हें दिखायी दी, जो अपने स्वामी के लिये रो रही थी। 

कपियों में सिंह के समान वीर वाली जिसके स्वामी एवं संरक्षक थे, जो वानरराज वाली की रानी थी, जिसका हृदय उदार और नेत्र मनोहर थे, वह तारा उस समय अपने मृत पति का आलिङ्गन करके पड़ी थी। श्रीराम को आते देख प्रधान - प्रधान मन्त्रियों ने तारा को वहाँ से उठाया। तारा जब पति के समीप से हटायी जाने लगी, तब बारंबार उसका आलिङ्गन करती हुई वह अपने को छुड़ाने और छटपटाने लगी। इतने ही में उसने अपने सामने धनुष-बाण धारण किये श्रीराम को खड़ा देखा, जो अपने तेज से सूर्यदेव के समान प्रकाशित हो रहे थे। 

वे राजोचित शुभ लक्षणों से सम्पन्न थे। उनके नेत्र बड़े मनोहर थे। उन पुरुषप्रवर श्रीराम को, जो पहले कभी देखने में नहीं आये थे, देखकर मृगशावकनयनी तारा समझ गयी कि ये ही ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम हैं। उस समय घोर संकट में पड़ी हुई शोक पीड़ित आर्या तारा अत्यन्त विह्वल हो गिरती पड़ती तीव्र गति से महेन्द्रतुल्य दुर्जय वीर महानुभाव भगवान् श्रीराम के समीप गयी। 

शोक के कारण वह अपने शरीर की भी सुध-बुध खो बैठी थी। भगवान् श्रीराम विशुद्ध अन्तःकरण वाले तथा युद्धस्थल में सबसे अधिक निपुणता के कारण लक्ष्य बेधने में अचूक थे, उनके पास पहुँचकर वह मनस्विनी तारा इस प्रकार बोली - रघुनन्दन! आप अप्रमेय (देश, काल और वस्तु की सीमा से रहित) हैं। आपको पाना बहुत कठिन है। आप जितेन्द्रिय तथा उत्तम धर्म का पालन करने वाले हैं। आपकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं होती। आप दूरदर्शी एवं पृथ्वी के समान क्षमाशील हैं। आपकी आँखें कुछ-कुछ लाल हैं। आपके हाथ में धनुष और बाण शोभा पा रहे हैं। आपका बल महान् है। आप सुदृढ शरीर से सम्पन्न हैं और मनुष्य-शरीर से प्राप्त होने वाले लौकिक सुख का परित्याग करके भी दिव्य शरीर के ऐश्वर्य से युक्त हैं। अत: मैं प्रार्थना करती हूँ कि आपने जिस बाण से मेरे प्रियतम पति का वध किया है, उसी बाण से आप मुझे भी मार डालिये। मैं मरकर उनके समीप चली जाऊँगी। वीर ! मेरे बिना वाली कहीं भी सुखी नहीं रह सकेंगे। 

‘अमलकमलदललोचन राम ! स्वर्ग में जाकर भी जब वाली सब ओर दृष्टि डालने पर मुझे नहीं देखेंगे, तब उनका मन वहाँ कदापि नहीं लगेगा; नाना प्रकार के लाल फूलों से विभूषित चोटी धारण करने वाली तथा विचित्र वेशभूषा से मनोहर प्रतीत होने वाली स्वर्ग की अप्सराओं को वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। वीरवर! स्वर्ग में भी वाली मेरे बिना शोक का अनुभव करेंगे और उनके शरीर की कान्ति फीकी पड़ जायगी। वे उसी तरह दु:खी रहेंगे जैसे गिरिराज ऋष्यमूक के सुरम्य तट- प्रान्त में विदेहनन्दिनी सीता के बिना आप कष्ट का अनुभव करते हैं।' 

'स्त्री के बिना युवा पुरुष को जो दुःख उठाना पड़ता है, उसे आप अच्छी तरह जानते हैं। इस तत्त्व को समझकर आप मेरा वध करिये, जिससे बाली को मेरे विरह का दुःख न भोगना पड़े। महाराजकुमार! आप महात्मा हैं, इसलिये यदि ऐसा चाहते हों कि मुझे स्त्री- हत्या का पाप न लगे तो यह बाली की आत्मा है' ऐसा समझकर मेरा वध कीजिये। इससे आपको स्त्री हत्या का पाप नहीं लगेगा।' 

‘शास्त्रोक्त यज्ञ-यागादि कर्मों में पति और पत्नी दोनों का संयुक्त अधिकार होता है - पत्नी को साथ लिये बिना पुरुष यज्ञकर्म का अनुष्ठान नहीं कर सकता। इसके सिवा नाना प्रकार की वैदिक श्रुतियाँ भी पत्नी को पति का आधा शरीर बतलाती हैं। दूसरे स्त्रियों का अपने पति से अभिन्न होना सिद्ध होता है। (अत: मुझे मारने से आपको स्त्रीवध का दोष नहीं लग सकता और वाली को स्त्री की प्राप्ति हो जायगी; क्योंकि) संसार में ज्ञानी पुरुषों की दृष्टि में स्त्रीदान से बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है।' 

'वीरशिरोमणे! यदि धर्म की ओर दृष्टि रखते हुए आप भी मुझे मेरे प्रियतम वाली को समर्पित कर देंगे तो इस दान के प्रभाव से मेरी हत्या करने पर भी आपको पाप नहीं लगेगा। मैं दु:खिनी और अनाथा हूँ। पति से दूर कर दी गयी हूँ। ऐसी दशा में मुझे जीवित छोड़ना आपके लिये उचित नहीं है। नरेन्द्र! मैं सुन्दर एवं बहुमूल्य श्रेष्ठ सुवर्णमाला से अलंकृत तथा गजराज के समान विलासयुक्त गति से चलने वाले बुद्धिमान् वानरश्रेष्ठ वाली के बिना अधिक काल तक जीवित नहीं रह सकूँगी।' 

तारा के ऐसा कहने पर महात्मा भगवान् श्रीराम ने उसे आश्वासन देकर हित की बात कही - 'वीरपत्नी! तुम मृत्यु- विषयक विपरीत विचार का त्याग करो; क्योंकि विधाता ने इस सम्पूर्ण जगत की सृष्टि की है। विधाता ने ही इस सारे जगत को सुख-दु:ख से संयुक्त किया है। यह बात साधारण लोग भी कहते और जानते हैं। तीनों लोकों के प्राणी विधाता के विधान का उल्लङ्घन नहीं कर सकते; क्योंकि सभी उसके अधीन हैं। तुम्हें पहले की ही भाँति अत्यन्त सुख एवं आनन्द की प्राप्ति होगी तथा तुम्हारा पुत्र युवराज पद प्राप्त करेगा। विधाता का ऐसा ही विधान है। शूरवीरों की स्त्रियाँ इस प्रकार विलाप नहीं करती हैं। (अत: तुम भी शोक छोड़कर शान्त हो जाओ )। 

शत्रुओं को संताप देने वाले परम प्रभावशाली महात्मा श्रीराम के इस प्रकार सान्त्वना देने पर सुन्दर वेश और रूप वाली वीरपत्नी तारा, जिसके मुख से विलाप की ध्वनि निकलती रहती थी, चुप हो गयी - उसने रोनाधोना छोड़ दिया। 

लक्ष्मण सहित श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव आदि के शोक से उनके समान ही दु:खी थे। उन्होंने सुग्रीव, अङ्गद और तारा को सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा - शोक-संताप करने से मरे हुए जीव की कोई भलाई नहीं होती। अत: अब आगे जो कुछ कर्तव्य है, उसको तुम्हें विधिपूर्वक सम्पन्न करना चाहिये। तुम सब लोग बहुत आँसू बहा चुके। अब उसकी आवश्यकता नहीं है। लोकाचार का भी पालन होना चाहिये। समय बिताकर कोई भी विहित कर्म नहीं किया जा सकता (क्योंकि उचित समय पर न किया जाय तो उस कर्म का कोई फल नहीं होता )। 

'जगत में नियति (काल) ही सबका कारण है। वही समस्त कर्मों का साधन है और काल ही समस्त प्राणियों को विभिन्न कर्मों में नियुक्त करने का कारण है (क्योंकि वही सबका प्रवर्तक है )। कोई भी पुरुष न तो स्वतन्त्रतापूर्वक किसी काम को कर सकता है और न किसी दूसरे को ही उसमें लगाने की शक्ति रखता है। सारा जगत् स्वभाव के अधीन है और स्वभाव का आधार काल है। काल भी काल का (अपनी की हुई व्यवस्था का ) उल्लंघन नहीं कर सकता। वह काल कभी क्षीण नहीं होता। स्वभाव (प्रारब्ध कर्म) को पाकर कोई भी उसका उल्लङ्घन नहीं करता।' 

'काल का किसी के साथ भाई-चारे का, मित्रता का अथवा जाति-बिरादरी का सम्बन्ध नहीं है। उसको वश में करने का कोई उपाय नहीं है तथा उस पर किसी का पराक्रम नहीं चल सकता। कारणस्वरूप भगवान् काल जीव के भी वश में नहीं है। अत: साधुदर्शी विवेकी पुरुष को सब कुछ काल का ही परिणाम समझना चाहिये। धर्म, अर्थ और काम भी काल क्रम से ही प्राप्त होते हैं। (मेरे द्वारा मारे जाने के कारण) वानरराज वाली शरीर से मुक्त हो अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त हुए हैं। नीतिशास्त्र के अनुकूल साम, दान और अर्थ के समुचित प्रयोग से मिलने वाले जो पवित्र कर्म हैं, वे सभी उन्हें प्राप्त हो गये।' 

‘महात्मा वाली ने पहले अपने धर्म के संयोग से जिस पर विजय पायी थी, उसी स्वर्ग को इस समय युद्ध में प्राणों की रक्षा न करके उन्होंने अपने हाथ में कर लिया है। यही सर्वश्रेष्ठ गति है, जिसे वानरों के सरदार वाली ने प्राप्त किया है। अतः अब उनके लिये शोक करना व्यर्थ है। इस समय तुम्हारे सामने जो कर्तव्य उपस्थित है, उसे पूरा करो।' 

श्रीरामचन्द्रजी की बात समाप्त होने पर शत्रुवीरों का संहार करने वाले लक्ष्मण ने, जिनकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी थी, उन सुग्रीव से नम्रतापूर्वक इस प्रकार कहा - सुग्रीव! अब तुम अङ्गद और तारा के साथ रहकर वाली के दाह संस्कार सम्बन्धी प्रेतकार्य करो। सेवकों को आज्ञा दो - वे वाली के दाह संस्कार के निमित्त प्रचुर मात्रा में सूखी लकड़ियाँ और दिव्य चन्दन ले आवें। अङ्गद का चित्त बहुत दुःखी हो गया है। इन्हें धैर्य बँधाओ। तुम अपने मन में मूढता न लाओ - किंकर्तव्यविमूढ़ न बनो; क्योंकि यह सारा नगर तुम्हारे ही अधीन है। 

'अङ्गद पुष्पमाला, नाना प्रकार के वस्त्र, घी, तेल, सुगन्धित पदार्थ तथा अन्य सामान, जिनकी अभी आवश्यकता है, स्वयं ले आवें। तार! तुम शीघ्र जाकर वेगपूर्वक एक पालकी ले आओ; क्योंकि इस समय अधिक फुर्ती दिखानी चाहिये। ऐसे अवसर पर वही लाभदायक होती है। पालकी को उठाकर ले चलने के योग्य जो बलवान् एवं समर्थ वानर हों, वे तैयार हो जायँ। वे ही बाली को यहाँ से श्मशानभूमि में ले चलेंगे।' 

सुग्रीव से ऐसा कहकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण अपने भाई के पास जाकर खड़े हो गये। लक्ष्मण की बात सुनकर तार  के मन में हड़बड़ी मच गयी। वह शिबिका ले आने के लिये शीघ्रतापूर्वक किष्किन्धा नामक गुफा में गया। वहाँ से शिबिका ढोने के योग्य शूरवीर वानरों द्वारा कंधों पर उठायी हुई उस शिबिका को साथ लेकर तार फिर तुरंत ही लौट आया। 

वह दिव्य पालकी रथ के समान बनी हुई थी। उसके बीच में राजा के बैठने योग्य उत्तम आसन था। उसमें शिल्पियों द्वारा कृत्रिम पक्षी और वृक्ष बनाये गये थे, जो उस पालकी को विचित्र शोभा से सम्पन्न बना रहे थे। वह शिबिका चित्र के रूप में बने हुए पैदल सिपाहियों से भरी प्रतीत होती थी। उसकी निर्माणकला सब ओर से बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी । देखने में वह सिद्धों के विमान - सी प्रतीत होती थी। उसमें कई खिड़कियाँ बनी थीं, जिनमें जालियाँ लगी हुई थीं। 

कारीगरों ने उस पालकी को बहुत सुन्दर बनाने का प्रयत्न किया था। उसका एक-एक भाग बड़ा सुघड़ बनाया गया था। आकार में वह बहुत बड़ी थी। उसमें लकड़ियों के क्रीडा - पर्वत बने हुए थे। वह मनोहर शिल्प-कर्म से सुशोभित थी। सुन्दर आभूषण और हारों से उसको सजाया गया था। विचित्र फूलों से उसकी शोभा बढ़ायी गयी थी। शिल्पियों द्वारा निर्मित गुफा और वन से वह संयुक्त थी तथा लाल चन्दन द्वारा उसे विभूषित किया गया था। नाना प्रकार के पुष्पसमूहों द्वारा वह सब ओर से आच्छादित थी तथा प्रातः काल के सूर्य की भाँति अरुण कान्तिवाली दीप्तिमती पद्म मालाओं से अलंकृत थी। 

ऐसी पालकी का अवलोकन करके श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मण की ओर देखते हुए कहा – अब वाली को शीघ्र ही यहाँ से श्मशानभूमि में ले जाया जाय और उनका प्रेतकार्य किया जाय। तब अङ्गद के साथ करुण - क्रन्दन करते हुए सुग्रीव ने वाली के शव को उठाकर उस शिविका में रखा। मृत वाली को शिबिका में चढ़ाकर उन्हें नाना प्रकार के अलंकारों, फूलों के गजरों और भाँति-भाँति के वस्त्रों से विभूषित किया। तदनन्तर वानरों के स्वामी राजा सुग्रीव ने आज्ञा दी कि 'मेरे बड़े भाई का और्ध्वदेहिक संस्कार शास्त्रानुकूल विधि से सम्पन्न किया जाय।' 

‘आगे-आगे बहुत-से वानर नाना प्रकार के बहुसंख्यक रत्न लुटाते हुए चलें। उनके पीछे शिबिका चले। इस भूतल पर राजाओं के और्ध्वदेहिक संस्कार उनकी बढ़ी हुई समृद्धि के अनुसार जैसे धूमधाम से होते देखे जाते हैं, उसी प्रकार अधिक धन लगाकर सब वानर अपने स्वामी महाराज वाली का अन्त्येष्टि संस्कार करें।' 

तब तार आदि वानरों ने वाली के और्ध्वदेहिक संस्कार का शीघ्र वैसा ही आयोजन किया। जिनके बान्धव वाली मारे गये थे, वे सब-के-सब वानर अङ्गद को हृदय से लगाकर शीघ्रतापूर्वक वहाँ से रोते हुए शव के साथ चले। उनके पीछे वाली के अधीन रहने वाली सभी वानर- पत्नियाँ समीप आकर 'हा वीर, हा वीर' कहती हुई अपने प्रियतम को पुकार पुकारकर बारंबार रोने-चिल्लाने लगीं। जिनके जीवन धन का वध किया गया था, वे तारा आदि सब वानरियाँ करुणस्वर से विलाप करती हुई अपने स्वामी के पीछे-पीछे चलने लगीं। 

वन के भीतर रोती हुई उन वानर वधुओं के रोदन - शब्द से गूँजते हुए वन और पर्वत भी सब ओर रोते हुए-से प्रतीत होते थे। पहाड़ी नदी तुङ्गभद्रा के एकान्त तट पर जो जल से घिरा था, पहुँचकर बहुत से वनचारी वानरों ने एक चिता तैयार की। तदनन्तर पालकी ढोने वाले श्रेष्ठ वानरों ने उसे अपने कंधे से उतारा और वे सब शोकमग्न हो एकान्त स्थान में जा बैठे। 

तत्पश्चात् तारा ने शिबिका में सुलाये हुए अपने पति के शव को देखकर उनके मस्तक को अपनी गोद में ले लिया और अत्यन्त दुःखी होकर वह विलाप करने लगी - हा वानरों के महाराज! हा मेरे दयालु प्राणनाथ! हा परम पूजनीय महाबाहु वीर! हा मेरे प्रियतम! एक बार मेरी ओर देखो तो सही। इस शोक पीड़ित दासी की ओर तुम दृष्टिपात क्यों नहीं करते हो? दूसरों को मान देने वाले प्राणवल्लभ ! प्राणों के निकल जाने पर भी तुम्हारा मुख जीवित अवस्था की भाँति अस्ताचलवर्ती सूर्य के समान अरुण प्रभा से युक्त एवं प्रसन्न ही दिखायी देता है। 

'वानरराज! श्रीराम के रूप में यह काल ही तुम्हें खींचकर लिये जा रहा है, जिसने युद्ध के मैदान में एक ही बाण मारकर हम सबको विधवा बना दिया। महाराज! ये तुम्हारी प्यारी वानरियाँ, जो वानरों की भाँति उछलकर चलना नहीं जानती हैं, तुम्हारे पीछे-पीछे बहुत दूर के मार्ग पर पैदल ही चली आयी हैं। इस बात को क्या तुम नहीं जानते? वानरराज! जो तुम्हें परम प्रिय थीं वे तुम्हारी सभी चन्द्रमुखी भार्याएँ यहाँ उपस्थित हैं। तुम इन सबको तथा अपने भाई सुग्रीव को भी इस समय क्यों नहीं देख रहे हो? राजन्! ये तार आदि तुम्हारे सचिव तथा ये पुरवासीजन तुम्हें चारों ओर से घेरकर दुःखी हो रहे हैं। शत्रुदमन! आप पहले की भाँति इन मन्त्रियों को विदा कर दीजिये। फिर हम सब प्रेमोन्मत्त होकर इन वनों में आपके साथ क्रीडा करेंगी।' 

पति शोक में डूबी हुई तारा को इस प्रकार विलाप करती देख उस समय शोक से दुर्बल हुई अन्य वानरियों ने उसे उठाया। इसके बाद संताप पीड़ित इन्द्रियों वाले अङ्गद ने रोते-रोते सुग्रीव की सहायता से पिता को चिता पर रखा। फिर शास्त्रीय विधि के अनुसार उसमें आग लगाकर उन्होंने उसकी प्रदक्षिणा की। इसके बाद यह सोचकर कि ‘मेरे पिता लंबी यात्रा के लिये प्रस्थित हुए हैं' अङ्गद की सारी इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो उठीं। 

इस प्रकार विधिवत् वाली का दाह संस्कार करके सभी वानर जलाञ्जलि देने के लिये पवित्र जल से भरी हुई कल्याणमयी तुङ्गभद्रा नदी के तट पर आये। वहाँ अङ्गद को आगे रखकर सुग्रीव और तारा सहित सभी वानरों ने वाली के लिये एक साथ जलाञ्जलि दी। दुःखी हुए सुग्रीव के साथ ही उन्हीं के समान शोकग्रस्त एवं दुःखी हो महाबली श्रीराम ने वाली के समस्त प्रेतकार्य करवाये। इस प्रकार इक्ष्वाकुवंश शिरोमणि श्रीराम के बाण से मारे गये श्रेष्ठ पराक्रमी और प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी सुविख्यात वाली का दाह संस्कार करके सुग्रीव उस समय लक्ष्मण सहित श्रीराम के पास आये। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-२१(21) समाप्त ! 

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