भाग-२०(20) बाली का सुग्रीव और अङ्गद से अपने मन की बात कहकर प्राणों को त्याग देना तथा तारा का विलाप

 


वाली के प्राणों की गति शिथिल पड़ गयी थी। वह धीरे-धीरे ऊर्ध्व साँस लेता हुआ सब ओर देखने लगा। सबसे पहले उसने अपने सामने खड़े हुए छोटे भाई सुग्रीव को देखा। 

युद्ध में जिन्हें विजय प्राप्त हुई थी, उन वानरराज सुग्रीव को सम्बोधित करके वाली ने बड़े स्नेह के साथ स्पष्ट वाणी में कहा - सुग्रीव! पूर्वजन्म के किसी पाप से अवश्यम्भावी बुद्धिमोह ने मुझे बलपूर्वक आकृष्ट कर लिया था, इसीलिये मैं तुम्हें शत्रु समझने लगा था और इस कारण मेरे द्वारा जो तुम्हारे प्रति अपराध हुए, उसके लिये तुम्हें मेरे प्रति दोष- दृष्टि नहीं करनी चाहिये। तात! मैं समझता हूँ हम दोनों के लिये एक साथ रहकर सुख भोगना नहीं बनता  था, इसीलिये दो भाइयों में जो प्रेम होना चाहिये, वह न होकर हमलोगों में उसके विपरीत वैरभाव उत्पन्न हो गया। 

‘भाई! तुम आज ही यह वानरों का राज्य स्वीकार करो तथा मुझे अभी यमराज के घर जाने को तैयार समझो। मैं अपने जीवन, राज्य, विपुल सम्पत्ति और प्रशंसित यश का भी तुरंत ही त्याग कर रहा हूँ। वीर! राजन्! इस अवस्था में मैं जो कुछ कहूँगा, वह यद्यपि करने में कठिन है, तथापि तुम उसे अवश्य करना। देखो, मेरा पुत्र अङ्गद धरती पर पड़ा है। इसका मुँह आँसुओं से भीगा है। यह सुख में पला है और सुख भोगने के ही योग्य है। बालक होने पर भी यह मूढ़ नहीं है।' 

‘यह मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय है। मेरे न रहने पर तुम इसे सगे पुत्र की भाँति मानना। इसके लिये किसी भी सुख-सुविधा की कमी न होने देना और सदा सब जगह इसकी रक्षा करते रहना। वानरराज! मेरे ही समान तुम भी इसके पिता, दाता, सब प्रकार से रक्षक और भय के अवसरों पर अभय देनेवाले हो। तारा का यह तेजस्वी पुत्र तुम्हारे समान ही पराक्रमी है। उन राक्षसों के वध के समय यह सदा तुम्हारे आगे रहेगा। यह बलवान् तेजस्वी तरुण ताराकुमार अङ्गद रणभूमि में पराक्रम प्रकट करते हुए अपने योग्य कर्म करेगा।' 

'सुषेण की पुत्री यह तारा सूक्ष्म विषयों के निर्णय करने तथा नाना प्रकार के उत्पातों के चिह्नों को समझने में सर्वथा निपुण है। जिस कार्य को अच्छा बताये, उसे संदेह रहित होकर करना। तारा की किसी भी सम्मति का परिणाम उलटा नहीं होता। श्रीरामचन्द्रजी का काम तुम्हें निःशङ्क होकर करना चाहिये। उसको न करने से तुम्हें पाप लगेगा और अपमानित होने पर श्रीरामचन्द्रजी तुझे मार डालेंगे। सुग्रीव ! मेरी यह सोने की दिव्यमाला तुम धारण कर लो। इसमें उदार लक्ष्मी का वास है। मेरे मर जाने पर इसकी श्री नष्ट हो जायगी। अत: अभी से पहन लो।' 

वाली ने भ्रातृस्नेह के कारण जब ऐसी बातें कहीं, तब उसके वध के कारण जो हर्ष हुआ था, उसे त्यागकर सुग्रीव फिर दुःखी हो गये, मानो चन्द्रमा पर ग्रहण लग गया हो। वाली के उस वचन से सुग्रीव का वैर भाव शान्त हो गया। वे सावधान होकर उचित बर्ताव करने लगे। उन्होंने भाई की आज्ञा से वह सोने की माला ग्रहण कर ली। 

सुग्रीव को वह सुवर्णमयी माला देने के पश्चात् वाली ने मरने का निश्चय कर लिया। फिर अपने सामने खड़े हुए पुत्र अङ्गद की ओर देखकर स्नेह के साथ कहा - पुत्र ! अब देश - काल को समझो - कब और कहाँ कैसा बर्ताव करना चाहिये, इसका निश्चय करके वैसा ही आचरण करो। समयानुसार प्रिय अप्रिय, सुख-दुःख – जो कुछ आ पड़े उसको सहो। अपने हृदय में क्षमाभाव रखो और सदा सुग्रीव की आज्ञा के अधीन रहो। महाबाहो! सदा मेरा दुलार पाकर जिस प्रकार तुम रहते आये हो, यदि वैसा ही बर्ताव अब भी करोगे तो सुग्रीव तुम्हारा विशेष आदर नहीं करेंगे। 

'शत्रुदमन अङ्गद! तुम इनके शत्रुओं का साथ मत दो। जो इनके मित्र न हों, उनसे भी न मिलो और अपनी इन्द्रियों को वश में रखकर सदा अपने स्वामी सुग्रीव के कार्य साधन में संलग्न रहते हुए उन्हीं के अधीन रहो। किसीके साथ अत्यन्त प्रेम न करो और प्रेम का सर्वथा अभाव भी न होने दो; क्योंकि ये दोनों ही महान् दोष हैं। अत: मध्यम स्थिति पर ही दृष्टि रखो।' 

ऐसा कहकर बाण के आघात से अत्यन्त घायल हुए वाली की आँखें घूमने लगीं। उसके भयंकर दाँत खुल गये और प्राण-पखेरू उड़ गये। उस समय अपने यूथपति की मृत्यु हो जाने से सभी श्रेष्ठ वानर जोर-जोर से रोने और विलाप करने लगे – हाय! आज वानरराज वाली के स्वर्गलोक चले जाने से सारी किष्किन्धापुरी सूनी हो गयी। उद्यान, पर्वत और वन भी सूने हो गये। वानरश्रेष्ठ वाली के मारे जाने से सारे वानर श्रीहीन हो गये। जिनके महान् वेग ( प्रताप) से समस्त कानन और वन पुष्पसमूहों से सदा संयुक्त बने रहते थे, आज उनके न रहने से कौन ऐसा चमत्कार पूर्ण कार्य करेगा?

‘उन्होंने महामना महाबाहु गोलभ नामक गन्धर्व को महान् युद्ध का अवसर दिया था। वह युद्ध पंद्रह वर्षों तक लगातार चलता रहा। न दिन में बंद होता था, न रात में। तदनन्तर सोलहवाँ वर्ष आरम्भ होने पर गोलभ वाली के हाथसे मारा गया। उस दुष्ट गन्धर्व का वध करके जिन विकराल दाढ़ों वाले वाली ने हम सबको अभय दान दिया था, वे ही ये हमारे स्वामी वानरराज स्वयं कैसे मार गिराये गये?'

उस समय वीर वानरराज वाली के मारे जाने पर वनों में विचरने वाले वानर वहाँ चैन न पा सके। जैसे सिंह से युक्त विशाल वन में साँड़ के मारे जाने पर गौएँ दु:खी हो जाती हैं, वही दशा उन वानरों की हुई। तदनन्तर शोक के समुद्र में डूबी हुई तारा ने जब अपने मरे हुए स्वामी की ओर दृष्टिपात किया, तब वह वाली का आलिङ्गन करके कटे हुए महान् वृक्ष से लिपटी हुई लता की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ी। 

उस समय वानरराज का मुख सूँघती हुई लोक विख्यात तारा ने रोकर अपने मृत पति से इस प्रकार कहा - ‘वीर! दु:ख की बात है कि आपने मेरी बात नहीं मानी और अब आप प्रस्तर से पूर्ण अत्यन्त दुःखदायक और ऊँचे- नीचे भूतल पर शयन कर रहे हैं। वानरराज! निश्चय ही यह पृथ्वी आपको मुझसे भी बढ़कर प्रिय है, तभी तो आप इसका आलिङ्गन करके सो रहे हैं और मुझसे बात तक नहीं करते। 

'वीर! साहसपूर्ण कार्यों से प्रेम रखने वाले वानरराज ! यह श्रीराम रूपी विधाता सुग्रीव के वश में हो गया है (- आपके नहीं) यह बड़े आश्चर्य की बात है, अत: अब इस राज्य पर सुग्रीव ही पराक्रमी राजा के रूप में आसीन होंगे। प्राणनाथ! प्रधान-प्रधान भालू और वानर जो आप महावीर की सेवा में रहा करते थे, इस समय बड़े दु:ख से विलाप कर रहे हैं। पुत्र अङ्गद भी शोक में पड़ा है। उन वानरों का दुःखमय विलाप, अङ्गद का शोको द्वार तथा मेरी यह अनुनय-विनयभरी वाणी सुनकर भी आप जागते क्यों नहीं हैं?' 

‘यही वह वीर-शय्या है, जिस पर पूर्वकाल में आपने ही बहुत-से शत्रुओं को मारकर सुलाया था, किंतु आज स्वयं ही युद्ध में मारे जाकर आप इस पर शयन कर रहे हैं। विशुद्ध बलशाली कुल में उत्पन्न युद्धप्रेमी तथा दूसरों को मान देने वाले मेरे प्रियतम! तुम मुझ अनाथा को अकेली छोड़कर कहाँ चले गये ? निश्चय ही बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि वह अपनी कन्या किसी शूरवीर के हाथ में न दे। देखो, मैं शूरवीर की पत्नी होने के कारण तत्काल विधवा बना दी गयी और इस प्रकार सर्वथा मारी गयी।' 

'राजरानी होने का जो मेरा अभिमान था, वह भङ्ग हो गया। नित्य निरन्तर सुख पाने की मेरी आशा नष्ट हो गयी तथा मैं अगाध एवं विशाल शोकसमुद्र में डूब गयी हूँ। निश्चय ही यह मेरा कठोर हृदय लोहे का बना हुआ है। तभी तो अपने स्वामी को मारा गया देखकर इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते। हाय! जो मेरे सुहृद्, स्वामी और स्वभाव से ही प्रिय थे तथा संग्राम में महान् पराक्रम प्रकट करने वाले शूरवीर थे, वे संसार से चल बसे। 

'पतिहीन नारी भले ही पुत्रवती एवं धन-धान्य से समृद्ध भी हो, किन्तु लोग उसे विधवा ही कहते हैं। वीर! अपने ही शरीर से प्रकट हुई रक्तराशि में आप उसी तरह शयन करते हैं, जैसे पहले इन्द्र गोप नामक रंगवाले बिछौने से युक्त अपने पलंग पर सोया करते थे। वानरश्रेष्ठ! आपका सारा शरीर धूल और रक्त से लथपथ हो रहा है; इसलिये मैं अपनी दोनों भुजाओं से आपका आलिङ्गन नहीं कर पाती। इस अत्यन्त भयंकर वैर में आज सुग्रीव कृतकृत्य हो गये। श्रीराम के छोड़े हुए एक ही बाण ने उनका सारा भय हर लिया। आपकी छाती में जो बाण धँसा हुआ है; वह मुझे आपके शरीर का आलिङ्गन करने से रोक रहा है, इस कारण आपकी मृत्यु हो जाने पर भी मैं चुपचाप देख रही हूँ (आपको हृदय से लगा नहीं पाती)।' 

उस समय नील ने वाली के शरीर में धँसे हुए उस बाण को निकाला, मानो पर्वत की कन्दरा में छिपे हुए प्रज्वलित मुख वाले विषधर सर्प को वहाँ से निकाला गया हो। वाली के शरीर से निकाले जाते हुए उस बाण की कान्ति अस्ताचल के शिखर पर अवरुद्ध किरणों वाले सूर्य की प्रभा के समान जान पड़ती थी। बाण के निकाल लिये जाने पर वाली के शरीर के सभी घावों से खूनकी धाराएँ गिरने लगीं, मानो किसी पर्वत से लाल गेरू मिश्रित जल की धाराएँ बह रही हों। 

वाली का शरीर रणभूमि की धूल से भर गया था। उस समय तारा बाण से आहत हुए अपने शूरवीर स्वामी के उस शरीर को पोंछती हुई उन्हें नेत्रों  के अश्रुजल से सींचने लगी। 

अपने मारे गये पति के सारे अङ्गों को रक्त से भीगा हुआ देख वालि - पत्नी तारा ने अपने भूरे नेत्रों वाले पुत्र अङ्गद से कहा - बेटा! देखो, तुम्हारे पिता की अन्तिम अवस्था कितनी भयंकर है। ये इस समय पूर्व पाप के कारण प्राप्त हुए वैर से पार हो चुके हैं। वत्स! प्रात:काल के सूर्य की भाँति अरुण गौर शरीर वाले तुम्हारे पिता राजा वाली अब यमलोक को जा पहुँचे। ये तुम्हें बड़ा आदर देते थे। तुम इनके चरणों में प्रणाम करो। 

माता के ऐसा कहने पर अङ्गद ने उठकर अपनी मोटी और गोलाकार भुजाओं द्वारा पिता के दोनों पैर पकड़ लिये और प्रणाम करते हुए कहा - पिताजी! मैं अङ्गद हूँ। 

तब तारा फिर कहने लगी - प्राणनाथ! कुमार अङ्गद पहले की ही भाँति आज भी आपके चरणों में प्रणाम करता है, किंतु आप इसे 'चिरंजीवी रहो पुत्र' ऐसा कहकर आशीर्वाद क्यों नहीं देते हैं ? जैसे कोई बछड़े सहित गाय सिंह के द्वारा तत्काल मार गिराये हुए साँड़ के पास खड़ी हो, उसी प्रकार पुत्रसहित मैं प्राणहीन हुए आपकी सेवा में बैठी हूँ। आपने युद्धरूपी यज्ञ का अनुष्ठान करके श्रीराम के बाणरूपी जल से मुझ पत्नी के बिना अकेले ही अवभृथस्नान कैसे कर लिया? 

'युद्ध में आपसे संतुष्ट हुए देवराज इन्द्र ने आपको जो सोने की प्रिय माला दे रखी थी, उसे मैं इस समय आपके गले में क्यों नहीं देखती हूँ ? दूसरों को मान देने वाले वानरराज! प्राणहीन हो जाने पर भी आपको राज्यलक्ष्मी उसी प्रकार नहीं छोड़ रही है, जैसे चारों ओर चक्कर लगाने वाले सूर्यदेव की प्रभा गिरिराज मेरु को कभी नहीं छोड़ती है। मैंने आपके हित की बात कही थी; परंतु आपने उसे नहीं स्वीकार किया। मैं भी आपको रोक रखने में समर्थ न हो सकी। इसका फल यह हुआ कि आप युद्ध में मारे गये। आपके मारे जाने से मैं भी अपने पुत्रसहित मारी गयी। अब लक्ष्मी आपके साथ ही मुझे और मेरे पुत्र को भी छोड़ रही है।' 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-२०(20) समाप्त ! 

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