भाग-१(1) पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता

 


कमल, उत्पल तथा मत्स्यों से भरी हुई उस पम्पा नामक पुष्करिणी के पास पहुँचकर सीता की सुधि आ जाने के कारण श्रीराम की इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो उठीं। वे विलाप करने लगे। उस समय सुमित्राकुमार लक्ष्मण उनके साथ थे। वहाँ पम्पा पर दृष्टि पड़ते ही (कमल-पुष्पों में सीता के नेत्र मुख आदि का किञ्चित् सादृश्य पाकर ) हर्षोल्लास से श्रीराम की सारी इन्द्रियाँ चञ्चल हो उठीं। उनके मन में सीता के दर्शनकी प्रबल इच्छा जाग उठी। 

उस इच्छा के अधीन- से होकर वे सुमित्राकुमार लक्ष्मण से इस प्रकार बोले - सुमित्रानन्दन! यह पम्पा कैसी शोभा पा रही है? इसका जल वैदूर्यमणि के समान स्वच्छ एवं श्याम है। इसमें बहुत-से पद्म और उत्पल खिले हुए हैं। तट पर उत्पन्न हुए नाना प्रकार के वृक्षों से इसकी शोभा और भी बढ़ गयी है। सुमित्राकुमार! देखो तो सही, पम्पा के किनारे का वन कितना सुन्दर दिखायी दे रहा है। यहाँ के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष अपनी फैली हुई शाखाओं के कारण अनेक शिखरों से युक्त पर्वतों के समान सुशोभित होते हैं। 

‘परंतु मैं इस समय भरत के दु:ख और सीताहरण की चिन्ता के शोक से संतप्त हो रहा हूँ। मानसिक वेदनाएँ मुझे बहुत कष्ट पहुँचा रही हैं। यद्यपि मैं शोक से पीड़ित हूँ तो भी मुझे यह पम्पा बड़ी सुहावनी लग रही है। इसके निकटवर्ती वन बड़े विचित्र दिखायी देते हैं। यह नाना प्रकार के फूलों से व्याप्त है। इसका जल बहुत शीतल है और यह बहुत सुखदायिनी प्रतीत होती है। कमलों से यह सारी पुष्करिणी ढकी हुई है। इसलिये बड़ी सुन्दर दिखायी देती है। इसके आस-पास सर्प तथा हिंसक जन्तु विचर रहे हैं। मृग आदि पशु और पक्षी भी सब ओर छा रहे हैं।' 

'नयी-नयी घासों से ढका हुआ यह स्थान अपनी नीली-पीली आभा के कारण अधिक शोभा पा रहा है। यहाँ वृक्षों के नाना प्रकार के पुष्प सब और बिखरे हुए हैं। इससे ऐसा जान पड़ता है मानो यहाँ बहुत-से गलीचे बिछा दिये गये हों। चारों ओर वृक्षों के अग्रभाग फूलों के भार से लदे होने के कारण समृद्धिशाली प्रतीत होते हैं। ऊपर से खिली हुई लताएँ उनमें सब ओर से लिपटी हुई हैं।' 

‘सुमित्रानन्दन! इस समय मन्द मन्द सुखदायिनी हवा चल रही है, जिससे कामना का उद्दीपन हो रहा है (सीता को देखने की इच्छा प्रबल हो उठी है)। यह चैत्र का महीना है। वृक्षों में फूल और फल लग गये हैं और सब ओर मनोहर सुगन्ध छा रही है। लक्ष्मण! फूलों से सुशोभित होने वाले इन वनों के रूप तो देखो। ये उसी तरह फूलों की वर्षा कर रहे हैं जैसे मेघजल की वृष्टि करते हैं। वन के ये विविध वृक्ष वायु के वेग से झूम-झूमकर रमणीय शिलाओं पर फूल बरसा रहे हैं और यहाँ की भूमि को ढक देते हैं। 

'सुमित्राकुमार! उधर तो देखो, जो वृक्षों से झड़ गये हैं, झड़ रहे हैं तथा जो अभी डालियों में ही लगे हुए हैं, उन सभी फूलों के साथ सब ओर वायु खेल-सा कर रही है। फूलों से भरी हुई वृक्षों की विभिन्न शाखाओं को झकझोरती हुई वायु जब आगे को बढ़ती है, तब अपने-अपने स्थान से विचलित हुए भ्रमर मानो उसका यशोगान करते हुए उसके पीछे-पीछे चलने लगते हैं। पर्वत की कन्दरा से विशेष ध्वनि के साथ निकली हुई वायु मानो उच्च स्वर से गीत गा रही है। मतवाले कोकिलों के कलनाद वाद्य का काम देते हैं और उन वाद्यों की ध्वनि के साथ वह वायु इन झूमते हुए वृक्षों को मानो नृत्य की शिक्षा-सी दे रही है। 

‘वायु के वेग पूर्वक हिलाने से जिनकी शाखाओं के अग्रभाग सब ओर से परस्पर सट गये हैं, वे वृक्ष एक-दूसरे से गुँथे हुए की भाँति जान पड़ते हैं।  मलयचन्दन का स्पर्श करके बहने वाली यह शीतलवायु शरीर से छू जाने पर कितनी सुखद जान पड़ती है। यह थकावट दूर करती हुई बह रही है और सर्वत्र पवित्र सुगन्ध फैला रही है। मधुर मकरन्द और सुगन्ध से भरे हुए इन वनों में गुनगुनाते हुए भ्रमरों के व्याज से ये वायुद्वारा हिलाये गये वृक्ष मानो नृत्य के साथ गान कर रहे हैं। अपने रमणीय पृष्ठ भागों पर उत्पन्न फूलों से सम्पन्न तथा मन को लुभाने वाले विशाल वृक्षों से सटे हुए शिखर वाले पर्वत अद्भुत शोभा पा रहे हैं।' 

‘जिनकी शाखाओं के अग्रभाग फूलों से ढके हैं, जो वायु के झोंके से हिल रहे हैं तथा भ्रमरों को पगड़ी के रूप में सिर पर धारण किये हुए हैं, वे वृक्ष ऐसे जान पड़ते हैं मानो इन्होंने नाचना-गाना आरम्भ कर दिया है। देखो, सब ओर सुन्दर फूलों से भरे हुए ये कनेर सोने के आभूषणों से विभूषित पीताम्बरधारी मनुष्यों के समान शोभा पा रहे हैं।' 

‘सुमित्रानन्दन! नाना प्रकार के विहङ्गमों के कलरवों से गूँजता हुआ यह वसन्त का समय सीता से बिछुड़े हुए मेरे लिये शोक को बढ़ाने वाला हो गया है। वियोग के शोक से तो मैं पीड़ित हूँ ही, यह कामदेव (सीता-विषयक अनुराग) मुझे और भी संताप दे रहा है। कोकिल बड़े हर्ष के साथ कलनाद करता हुआ मानो मुझे ललकार रहा है। लक्ष्मण ! वन के रमणीय झरने के निकट बड़े हर्ष के साथ बोलता हुआ यह जलकुक्कुट सीता से मिलने की इच्छा वाले मुझ राम को शोकमग्न किये देता है। पहले मेरी प्रिया जब आश्रम में रहती थी, उन दिनों इसका शब्द सुनकर आनन्दमग्न हो जाती थी और मुझे भी निकट बुलाकर अत्यन्त आनन्दित कर देती थी। देखो, इस प्रकार भाँति-भाँति की बोली बोलने वाले विचित्र पक्षी चारों ओर वृक्षों, झारियों और लताओं की ओर उड़ रहे हैं। 

‘सुमित्रानन्दन! देखो, ये पक्षिणियाँ नर पक्षियों से संयुक्त हो अपने झुंड में आनन्द का अनुभव कर रही हैं, भौंरों का गुञ्जारव सुनकर प्रसन्न हो रही हैं और स्वयं भी मीठी बोली बोल रही हैं। इस पम्पा के तट पर यहाँ झुंड के झुंड पक्षी आनन्दमग्न होकर चहक रहे हैं। जलकुक्कुटों के रतिसम्बन्धी कूजन तथा नर कोकिलों के कलनाद के व्याज से मानो ये वृक्ष ही मधुर बोली बोलते हैं और मेरी अनङ्ग वेदना को उद्दीप्त कर रहे हैं। जान पड़ता है, यह वसन्त रूपी आग मुझे जलाकर भस्म कर देगी। अशोक पुष्प के लाल-लाल गुच्छे ही इस अग्नि के अङ्गार हैं, नूतन पल्लव ही इसकी लाल-लाल लपटें हैं तथा भ्रमरों का गुञ्जारव ही इस जलती आगका 'चट- चट' शब्द है।' 

‘सुमित्रानन्दन! यदि मैं सूक्ष्म बरौनियों और सुन्दर केशों वाली मधुरभाषिणी सीता को न देख सका तो मुझे इस जीवन से कोई प्रयोजन नहीं है। निष्पाप लक्ष्मण! वसन्त ऋतु में वन की शोभा बड़ी मनोहर हो जाती है, इसकी सीमा में सब ओर कोयल की मधुर कूक सुनायी पड़ती है। मेरी प्रिया सीता को यह समय बड़ा ही प्रिय लगता था। अनङ्गवेदना से उत्पन्न हुई शोकाग्नि वसन्तऋतु के गुणों का - ईंधन पाकर बढ़ गयी है; जान पड़ता है, यह मुझे शीघ्र ही अविलम्ब जला देगी। अपनी उस प्रियतमा पत्नी को मैं नहीं देख पाता हूँ और इन मनोहर वृक्षों को देख रहा हूँ, इसलिये मेरा यह अनङ्गज्वर अब और बढ़ जायगा।' 

'विदेहनन्दिनी सीता यहाँ मुझे नहीं दिखायी दे रही है, इसलिये मेरा शोक बढ़ाती है तथा मन्द मलयानिल के द्वारा स्वेदसंसर्ग का निवारण करने वाला यह वसन्त भी मेरे शोक की वृद्धि कर रहा है। सुमित्राकुमार! मृगनयनी सीता चिन्ता और शोक से बलपूर्वक पीड़ित किये गये मुझ राम को और भी संताप दे रही है। साथ ही यह वन में बहने वाली चैत्रमास की वायु भी मुझे पीड़ा दे रही है। ये मोर स्फटिकमणि के बने हुए गवाक्षों (झरोखों) के समान प्रतीत होने वाले अपने फैले हुए पंखों से, जो वायु से कम्पित हो रहे हैं, इधर-उधर नाचते हुए कैसी शोभा पा रहे हैं ? मयूरियों से घिरे हुए ये मदमत्त मयूर अनङ्गवेदना से संतप्त हुए मेरी इस कामपीड़ा को और भी बढ़ा रहे हैं।  

‘लक्ष्मण! वह देखो, पर्वतशिखर पर नाचते हुए अपने स्वामी मयूर के साथ-साथ वह मोरनी भी कामपीड़ित होकर नाच रही है। मयूर भी अपने दोनों सुन्दर पंखों को फैलाकर मन-ही-मन अपनी उसी रामा (प्रिया) का अनुसरण कर रहा है तथा अपने मधुर स्वरों से मेरा उपहास करता-सा जान पड़ता है। निश्चय ही वन में किसी राक्षस ने मोर की प्रिया का अपहरण नहीं किया है, इसीलिये यह रमणीय वनों में अपनी वल्लभा के साथ नृत्य कर रहा है। फूलोंसे भरे हुए इस चैत्रमास में सीता के बिना यहाँ निवास करना मेरे लिये अत्यन्त दु:सह है।' 

'लक्ष्मण ! देखो तो सही, तिर्यग्योनि में पड़े हुए प्राणियों में भी परस्पर कितना अधिक अनुराग है। इस समय यह मोरनी कामभाव से अपने स्वामी के सामने उपस्थित हुई है। यदि विशाल नेत्रों वाली सीता का अपहरण न हुआ होता तो वह भी इसी प्रकार बड़े प्रेम से वेग पूर्वक मेरे पास आती। लक्ष्मण! इस वसन्त ऋतु में फूलों के भार से सम्पन्न हुए इन वनों के ये सारे फूल मेरे लिये निष्फल हो रहे हैं। प्रिया सीता के यहाँ न होने से इनका मेरे लिये कोई प्रयोजन नहीं रह गया है।' 

‘अत्यन्त शोभा से मनोहर प्रतीत होने वाले ये वृक्षों के फूल भी निष्फल होकर भ्रमर समूहों के साथ ही पृथ्वी पर गिर जाते हैं। हर्ष में भरे हुए ये झुंड-के-झुंड पक्षी एक-दूसरे को बुलाते हुए-से इच्छानुसार कलरव कर रहे हैं और मेरे मन में प्रेमोन्माद उत्पन्न किये देते हैं। जहाँ मेरी प्रिया सीता निवास करती है, वहाँ भी यदि इसी तरह वसन्त छा रहा हो तो उसकी क्या दशा होगी? निश्चय ही वहाँ पराधीन हुई सीता मेरी ही तरह शोक कर रही होगी। अवश्य ही जहाँ सीता है, उस एकान्त स्थान में वसन्त का प्रवेश नहीं है तो भी मेरे बिना वह कजरारे नेत्रों वाली कमलनयनी सीता कैसे जीवित रह सकेगी। अथवा सम्भव है जहाँ मेरी प्रिया है वहाँ भी इसी तरह वसन्त छा रहा हो, परंतु उसे तो शत्रुओं की डाँट फटकार सुननी पड़ती होगी; अत: वह बेचारी सुन्दरी सीता क्या कर सकेगी।' 

'जिसकी अभी नयी-नयी अवस्था है और प्रफुल्ल कमलदल के समान मनोहर नेत्र हैं, वह मीठी बोली बोलने वाली मेरी प्राणवल्लभा जानकी निश्चय ही इस वसन्त ऋतु को पाकर अपने प्राण त्याग देगी। मेरे हृदय में यह विचार दृढ़ होता जा रहा है कि साध्वी सीता मुझसे अलग होकर अधिक काल तक जीवित नहीं रह सकती। वास्तव में विदेहकुमारी का हार्दिक अनुराग मुझमें और मेरा सम्पूर्ण प्रेम सर्वथा विदेहह्नन्दिनी सीता में ही प्रतिष्ठित है।' 

‘फूलों की सुगन्ध लेकर बहने वाली यह शीतल वायु, जिसका स्पर्श बहुत ही सुखद है, प्राणवल्लभा सीता की याद आने पर मुझे आग की भाँति तपाने लगती है। पहले जानकी के साथ रहने पर जो मुझे सदा सुखद जान पड़ती थी, वही वायु आज सीता के विरह में मेरे लिये शोकजनक हो गयी है। जब सीता मेरे साथ थी उन दिनों जो पक्षी कौआ आकाश में जाकर काँव-काँव करता था, वह उसके भावी वियोग को सूचित करने वाला था। अब सीता के वियोग काल में वह कौआ वृक्ष पर बैठकर बड़े हर्ष के साथ अपनी बोली बोल रहा है (इससे सूचित हो रहा है कि सीता का संयोग शीघ्र ही सुलभ होगा )।' 

'यही वह पक्षी है, जो आकाश में स्थित होकर बोलने पर वैदेही के अपहरण का सूचक हुआ; किंतु आज यह जैसी बोली बोल रहा है, उससे जान पड़ता है कि यह मुझे विशाललोचना सीता के समीप ले जायगा। लक्ष्मण ! देखो, जिनकी ऊपरी डालियाँ फूलों से लदी हैं, वन में उन वृक्षों पर कलरव करने वाले पक्षियों का यह मधुर शब्द विरहीजनों के मदनोन्माद को बढ़ाने वाला है। वायु के द्वारा हिलायी जाती हुई उस तिलक वृक्ष की मंजरी पर भ्रमर सहसा जा बैठा है । मानो कोई प्रेमी काममद से कम्पित हुई प्रेयसी से मिल रहा हो। यह अशोक प्रियाविरही कामी पुरुषों के लिये अत्यन्त शोक बढ़ाने वाला है। यह वायु के झोंके से कम्पित हुए पुष्पगुच्छों द्वारा मुझे डाँट बताता हुआ सा खड़ा है।' 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-१(1) समाप्त ! 

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