भाग-१७(17) वाली का तारा को डाँटकर लौटाना और सुग्रीव से जूझना तथा श्रीराम के बाण से घायल होकर पृथ्वी पर गिरना तथा वाली का श्रीरामचन्द्रजी को फटकारना

 


तारापति चन्द्रमा के समान मुखवाली तारा को ऐसी बातें करती देख वाली ने उसे फटकारा और इस प्रकार कहा - वरानने! इस गर्जते हुए भाई की, जो विशेषत: मेरा शत्रु है, यह उत्तेजना पूर्ण चेष्टा मैं किस कारण से सहन करूँगा। भीरु! जो कभी परास्त नहीं हुए और जिन्होंने युद्ध के अवसरों पर कभी पीठ नहीं दिखायी, उन शूरवीरों के लिये शत्रु की ललकार सह लेना मृत्यु से भी बढ़कर दुःखदायी होता है। यह हीन ग्रीवा वाला सुग्रीव संग्राम भूमि में मेरे साथ युद्ध की इच्छा रखता है। मैं इसके रोषावेश और गर्जन तजर्न को सहन करने में असमर्थ हूँ। 

'श्रीरामचन्द्रजी की बात सोचकर भी तुम्हें मेरे लिये विषाद नहीं करना चाहिये। क्योंकि वे धर्म के ज्ञाता तथा कर्तव्याकर्तव्य को समझने वाले हैं। अतः पाप कैसे करेंगे। तुम इन स्त्रियों के साथ लौट जाओ। क्यों मेरे पीछे बार-बार आ रही हो। तुमने मेरे प्रति अपना स्नेह दिखाया। भक्ति का भी परिचय दे दिया। अब जाओ, घबराहट छोड़ो। मैं आगे बढ़कर सुग्रीव का सामना करूँगा। उसके घमण्ड को चूर-चूर कर डालूँगा। किंतु प्राण नहीं लूँगा। युद्ध के मैदान में खड़े हुए सुग्रीव की जो-जो इच्छा है, उसे मैं पूर्ण करूँगा। वृक्षों और मुक्कों की मार से पीड़ित होकर वह स्वयं ही भाग जायगा।' 

'तारे! दुरात्मा सुग्रीव मेरे युद्धविषयक दर्प और आयास (उद्योग) को नहीं सह सकेगा। तुमने मेरी बौद्धिक सहायता अच्छी तरह कर दी और मेरे प्रति अपना सौहार्द भी दिखा दिया। अब मैं प्राणों की सौगन्ध दिलाकर कहता हूँ कि अब तुम इन स्त्रियों के साथ लौट जाओ। अब अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है, मैं युद्ध में अपने उस भाई को जीतकर लौट आऊँगा।' 

यह सुनकर अत्यन्त उदार स्वभाव वाली तारा ने वाली का आलिङ्गन करके मन्द स्वर में रोते-रोते उसकी परिक्रमा की। वह पति की विजय चाहती थी और उसे मन्त्र का भी ज्ञान था। इसलिये उसने वाली की मङ्गल-कामना से स्वस्तिवाचन किया और शोक से मोहित हो वह अन्य स्त्रियों के साथ अन्तःपुर को चली गयी। 

स्त्रियों सहित तारा के अपने महल में चले जाने पर वाली क्रोध से भरे हुए महान् सर्प की भाँति लम्बी साँस खींचता हुआ नगर से बाहर निकला। महान् रोष से युक्त और अत्यन्त वेगशाली वाली लम्बी साँस छोड़कर शत्रु को देखने की इच्छा से चारों ओर अपनी दृष्टि दौड़ाने लगा। इतने ही में श्रीमान् वाली ने सुवर्ण के समान पिङ्गल वर्ण वाले सुग्रीव को देखा, जो लँगोट बाँधकर युद्ध के लिये डटकर खड़े थे और प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशित हो रहे थे। 

सुग्रीव को खड़ा देख महाबाहु वाली अत्यन्त कुपित हो उठा। उसने अपना लँगोट भी दृढ़ता के साथ बाँध लिया। लँगोट को मजबूती के साथ कसकर पराक्रमी वाली प्रहार का अवसर देखता हुआ मुक्का तानकर सुग्रीव की ओर चला। सुग्रीव भी सुवर्णमाला धारी वाली के उद्देश्य से बँधा हुआ मुक्का ताने बड़े आवेश के साथ उसकी ओर बढ़े। 

युद्धकला के पण्डित महावेगशाली सुग्रीव को अपनी ओर आते देख वाली की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं और वहइस प्रकार बोला – सुग्रीव! देख ले। यह बड़ा भारी मुक्का खूब कसकर बँधा हुआ है। इसमें सारी अगुलियाँ सुनियन्त्रित रूप से परस्पर सटी हुई हैं। मेरे द्वारा वेगपूर्वक चलाया हुआ यह मुक्का तेरे प्राण लेकर ही जायगा। 

वाली के ऐसा कहने पर सुग्रीव क्रोधपूर्वक उससे बोले – मेरा यह मुक्का भी तेरे प्राण लेने के लिये तेरे मस्तक पर गिरे। 

इतने ही में वाली ने वेगपूर्वक आक्रमण करके सुग्रीव पर मुक्का प्रहार किया। उस चोट से घायल एवं कुपित हुए सुग्रीव झरनों से युक्त पर्वत की भाँति मुँह से रक्त वमन करने लगे। तत्पश्चात् सुग्रीव ने भी निःशङ्क होकर बलपूर्वक एक साल वृक्ष को उखाड़ लिया और उसे वाली के शरीर पर दे मारा, मानो इन्द्र ने किसी विशाल पर्वत पर वज्र का प्रहार किया हो। उस वृक्ष की चोट से वाली के शरीर में घाव हो गया। उस आघात से विह्वल हुआ वाली व्यापारियों के समूह के चढ़ने से भारी भार के द्वारा दबकर समुद्र में डगमगाती हुई नौका के समान काँपने लगा। 

उन दोनों भाइयों का बल और पराक्रम भयंकर था। दोनों के ही वेग गरुड़ के समान थे। वे दोनों भयंकर रूप धारण करके बड़े जोर से जूझ रहे थे और पूर्णिमा के आकाश में चन्द्रमा और सूर्य के समान दिखायी देते थे। वे शत्रुसूदन वीर अपने विपक्षी को मार डालने की इच्छा से एक-दूसरे की दुर्बलता ढूँढ रहे थे; परंतु उस युद्ध में बल- विक्रम सम्पन्न वाली बढ़ने लगा और महापराक्रमी सूर्यपुत्र सुग्रीव की शक्ति क्षीण होने लगी। 

बाली ने सुग्रीव का घमण्ड चूर्ण कर दिया। उनका पराक्रम मन्द पड़ने लगा। तब वाली के प्रति अमर्ष में भरे हुए सुग्रीव ने श्रीरामचन्द्रजीको अपनी अवस्था का लक्ष्य कराया। इसके बाद डालियों सहित वृक्षों, पर्वत के शिखरों, वज्र के समान भयंकर नखों, मुक्कों, घुटनों, लातों और हाथों की मार से उन दोनों में इन्द्र और वृत्रासुर की भाँति भयंकर संग्राम होने लगा। वे दोनों वनचारी वानर लहूलुहान होकर लड़ रहे थे और दो बादलों की तरह अत्यन्त भयंकर गर्जना करते हुए एक-दूसरे को डाँट रहे थे। श्रीरघुनाथजी ने देखा, वानरराज सुग्रीव कमजोर पड़ रहे हैं और बारंबार इधर-उधर दृष्टि दौड़ा रहे हैं। वानरराज को पीड़ित देख महातेजस्वी श्रीराम ने वाली के वध की इच्छा से अपने बाण पर दृष्टिपात किया। 

उन्होंने अपने धनुष पर विषधर सर्प के समान भयंकर बाण रखा और उसे जोर से खींचा, मानो यमराज ने कालचक्र उठा लिया हो। उसकी प्रत्यञ्चा की टङ्कारध्वनि से भयभीत हो बड़े-बड़े पक्षी और मृग भाग खड़े हुए। वे प्रलयकाल के समय मोहित हुए जीवों के समान किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये। श्रीरघुनाथजी ने वज्र की भाँति गड़गड़ाहट और प्रज्वलित अशनि की भाँति प्रकाश पैदा करने वाला वह महान् बाण छोड़ दिया तथा उसके द्वारा वाली के वक्ष:स्थल पर चोट पहुँचायी। 

उस बाण से वेगपूर्वक आहत हो महातेजस्वी पराक्रमी वानरराज वाली तत्काल पृथ्वी पर गिर पड़ा। आश्विन की पूर्णिमा के दिन इन्द्रध्वजोत्सव के अन्त में ऊपर फेंका गया इन्द्रध्वज जैसे पृथ्वी पर गिर पड़ता है, उसी प्रकार वाली ग्रीष्मऋतु के अन्त में श्रीहीन, अचेत और आँसुओं से गद्गदकण्ठ हो धराशायी हो गया और धीरे-धीरे आर्तनाद करने लगा। 

श्रीराम का वह उत्तम बाण युगान्तकाल के समान भयंकर तथा सोने-चाँदी से विभूषित था। पूर्वकाल में महादेवजी ने जैसे अपने मुख से (मुख - मण्डल के अन्तर्गत ललाटवर्ती नेत्र से) शत्रुभूत कामदेव का नाश करने के लिये धूमयुक्त अग्नि की सृष्टि की थी, उसी प्रकार पुरुषोत्तम श्रीराम ने सुग्रीव शत्रु वाली का मर्दन करने के लिये उस प्रज्वलित बाण को छोड़ा था। इन्द्रकुमार वाली के शरीर से पानी के समान रक्त की धारा बहने लगी। वह उससे नहा गया और अचेत हो वायु के उखाड़े हुए पुष्पित अशोक वृक्ष एवं आकाश से नीचे गिरे हुए इन्द्रध्वज के समान समराङ्गण में पृथ्वी पर गिर पड़ा। 

युद्धमें कठोरता दिखाने वाला वाली श्रीराम के बाण से घायल हो कटे वृक्ष की भाँति सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसका सारा शरीर पृथ्वी पर पड़ा हुआ था। तपाये हुए सुवर्ण के आभूषण अब भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह देवराज इन्द्र के बन्धनरहित ध्वज की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा था। वानरों और भालुओं के यूथपति वाली के धराशायी हो जाने पर यह पृथ्वी चन्द्ररहित आकाश की भाँति शोभाहीन हो गयी। 

पृथ्वी पर पड़े होने पर भी महामना वाली के शरीर को शोभा, प्राण, तेज और पराक्रम नहीं छोड़ सके थे। इन्द्र की दी हुई रत्नजटित श्रेष्ठ सुवर्णमाला उस वानरराज के प्राण, तेज और शोभा को धारण किये हुए थी। उस सुवर्णमाला से विभूषित हुआ वानरयूथपति वीर वाली संध्या की लाली से रंगे हुए प्रान्त भाग वाले मेघखण्ड के समान शोभा पा रहा था। पृथ्वी पर गिरे होने पर भी वाली की वह सुवर्णमाला, उसका शरीर तथा मर्मस्थल को विदीर्ण करने वाला वह बाण – ये तीनों पृथक्-पृथक् तीन भागों में विभक्त की हुई अङ्गलक्ष्मी के समान शोभा पा रहे थे। 

वीरवर श्रीराम के धनुष से चलाये गये उस अख ने वाली के लिये स्वर्ग का मार्ग प्रकाशित कर दिया और उसे परमपद को पहुँचा दिया। इस प्रकार युद्धस्थल में गिरा हुआ इन्द्रपुत्र वाली ज्वाला रहित अग्नि के समान, पुण्यों का क्षय होने पर पुण्यलोक से इस पृथ्वी पर गिरे हुए राजा ययाति के समान तथा महाप्रलय के समय कालद्वारा पृथ्वी पर गिराये गये सूर्य के समान जान पड़ता था। उसके गले में सोने की माला शोभा दे रही थी। वह महेन्द्र के समान दुर्जय और भगवान् विष्णु के समान दुस्सह था। उसकी छाती चौड़ी, भुजाएँ बड़ी-बड़ी, मुख दीप्तिमान् और नेत्र कपिलवर्ण के थे। 

लक्ष्मण को साथ लिये श्रीराम ने वाली को इस अवस्था में देखा और वे उसके समीप गये। इस प्रकार ज्वाला रहित अग्नि की भाँति वहाँ गिरा हुआ वह वीर धीरे-धीरे देख रहा था। महापराक्रमी दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उस वीर का विशेष सम्मान करते हुए उसके पास गये। 

उन श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण को देखकर वाली धर्म और विनय से युक्त कठोर वाणी में बोला। अब उसमें तेज और प्राण स्वल्पमात्रा में ही रह गये थे। वह बाण से घायल होकर पृथ्वी पर पड़ा था और उसकी चेष्टा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही थी। उसने युद्ध में गर्वयुक्त पराक्रम प्रकट करने वाले गर्वीले श्रीराम से कठोर वाणी में इस प्रकार कहना आरम्भ किया। 

'रघुनन्दन! आप राजा दशरथ के सुविख्यात पुत्र हैं। आपका दर्शन सबको प्रिय है। मैं आपसे युद्ध करने नहीं आया था। मैं तो दूसरे के साथ युद्ध में उलझा हुआ था। उस दशा में आपने मेरा वध करके यहाँ कौन-सा गुण प्राप्त किया है। किस महान् यश का उपार्जन किया है? क्योंकि मैं युद्ध के लिये दूसरे पर रोष प्रकट कर रहा था, किंतु आपके कारण बीच में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ।' 

'इस भूतल पर सब प्राणी आपके यश का वर्णन करते हुए कहते हैं - श्रीरामचन्द्रजी कुलीन, सत्त्वगुणसम्पन्न, तेजस्वी, उत्तम व्रत का आचरण करने वाले, करुणा का अनुभव करने वाले, प्रजा के हितैषी, दयालु, महान् उत्साही, समयोचित कार्य एवं सदाचार के ज्ञाता और दृढ़प्रतिज्ञ हैं। राजन्! इन्द्रियनिग्रह, मन का संयम, क्षमा, धर्म, धैर्य, सत्य, पराक्रम तथा अपराधियों को दण्ड देना - ये राजाके गुण हैं। मैं आपमें इन सभी सद्गुणों का विश्वास करके आपके उत्तम कुल को यादकर तारा के मना करने पर भी सुग्रीव के साथ लड़ने आ गया।' 

जब तक मैंने आपको नहीं देखा था, तब तक मेरे मन में यही विचार उठता था कि दूसरे के साथ रोषपूर्वक जुझते हुए मुझको आप असावधान अवस्था में अपने बाण से बेधना उचित नहीं समझेंगे। परंतु आज मुझे मालूम हुआ कि आपकी बुद्धि मारी गयी है। आप धर्मध्वजी हैं। दिखावे के लिये धर्म का चोला पहने हुए हैं। वास्तव में अधर्मी हैं। आपका आचार-व्यवहार पापपूर्ण है। आप घास-फूस से ढके हुए कूप के समान धोखा देने वाले हैं।' 

'आपने साधु पुरुषों का-सा वेश धारण कर रखा है; परंतु हैं पापी। राख से ढकी हुई आग के समान आपका असली रूप साधु-वेष में छिप गया है। मैं नहीं जानता था कि आपने लोगों को छलने के लिये ही धर्म की आड़ ली है। जब मैं आपके राज्य या नगर में कोई उपद्रव नहीं कर रहा था तथा आपका भी तिरस्कार नहीं करता था, तब आपने मुझ निरपराध को क्यों मारा? मैं सदा फल-मूल का भोजन करने वाला और वन में ही विचरने वाला वानर हूँ। मैं यहाँ आपसे युद्ध नहीं करता था, दूसरे के साथ मेरी लड़ाई हो रही थी। फिर बिना अपराध के आपने मुझे क्यों मारा?' 

'राजन्! आप एक सम्माननीय नरेश के पुत्र हैं। विश्वास के योग्य हैं और देखने में भी प्रिय हैं। आपमें धर्म का साधनभूत चिह्न (जटा) वल्कल धारण आदि भी प्रत्यक्ष दिखायी देता है। क्षत्रियकुल में उत्पन्न शास्त्र का ज्ञाता, संशयरहित तथा धार्मिक वेश-भूषा से आच्छन्न होकर भी कौन मनुष्य ऐसा क्रूरतापूर्ण कर्म कर सकता है। महाराज! रघु के कुल में आपका प्रादुर्भाव हुआ है। आप धर्मात्मा के रूप में प्रसिद्ध हैं तो भी इतने अभव्य (क्रूर) निकले! यदि यही आपका असली रूप है तो फिर किसलिये ऊपर से भव्य (विनीत एवं दयालु) साधु पुरुष का-सा रूप धारण करके चारों ओर दौड़ते-फिरते हैं?' 

'राजन्! साम, दान, क्षमा, धर्म, सत्य, धृति, पराक्रम और अपराधियों को दण्ड देना – ये भूपालों के गुण हैं। नरेश्वर राम! हम फल-मूल खाने वाले वनचारी मृग हैं। यही हमारी प्रकृति है; किंतु आप तो पुरुष (मनुष्य) हैं (अत: हमारे और आप में वैर का कोई कारण नहीं है )। पृथ्वी, सोना और चाँदी - इन्हीं वस्तुओं के लिये राजाओं में परस्पर युद्ध होते हैं। ये ही तीन कलह के मूल कारण हैं। परंतु यहाँ वे भी नहीं हैं। इस दिशा में इस वन में या हमारे फलों में आपका क्या लोभ हो सकता है। 

'नीति और विनय, दण्ड और अनुग्रह - ये राजधर्म हैं, किंतु इनके उपयोग के भिन्न-भिन्न अवसर हैं (इनका अविवेकपूर्वक उपयोग करना उचित नहीं है)। राजाओं को स्वेच्छाचारी नहीं होना चाहिये। परंतु आप तो काम के गुलाम, क्रोधी और मर्यादा में स्थित न रहने वाले चञ्चल हैं। नय-विनय आदि जो राजाओं के धर्म हैं, उनके अवसर का विचार किये बिना ही किसी का कहीं भी प्रयोग कर देते हैं। जहाँ कहीं भी बाण चलाते-फिरते हैं।' 

‘आपका धर्म के विषय में आदर नहीं है और न अर्थसाधन में ही आपकी बुद्धि स्थिर है। नरेश्वर ! आप स्वेच्छाचारी हैं। इसलिये आपकी इन्द्रियाँ आपको कहीं भी खींच ले जाती हैं। काकुत्स्थ! मैं सर्वथा निरपराध था तो भी यहाँ मुझे बाण से मारने का घृणित कर्म करके सत्पुरुषों के बीच में आप क्या कहेंगे। राजा का वध करने वाला, ब्रह्म-हत्यारा, गोघाती, चोर, प्राणियों की हिंसा में तत्पर रहने वाला, नास्तिक और परिवेत्ता (बड़े भाई के अविवाहित रहते अपना विवाह करने वाला छोटा भाई) ये सब-के-सब नरकगामी होते हैं।' 

'चुगली खाने वाला, लोभी, मित्र- हत्यारा तथा गुरुपत्नीगामी – ये पापात्माओं के लोक में जाते हैं - इसमें संशय नहीं है। हम वानरों का चमड़ा भी तो सत्पुरुषों के धारण करने योग्य नहीं होता। हमारे रोम और हड्डियाँ भी वर्जित हैं (छूने योग्य नहीं हैं)। आप जैसे धर्माचारी पुरुषों के लिये मांस तो सदा ही अभक्ष्य है; फिर किस लोभ से आपने मुझ वानर को अपने बाणों का शिकार बनाया है ?' 

‘रघुनन्दन! त्रैवर्णिकों में जिनकी किसी कारण से मांसाहार (जैसे निन्दनीय कर्म) में प्रवृत्ति हो गयी है, उनके लिये भी पाँच नख वाले जीवों में से पाँच ही भक्षण के योग्य बताये गये हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- गेंडा, साही, गोह, खरहा और पाँचवाँ कछुआ। श्रीराम ! मनीषी पुरुष मेरे ( वानर के) चमड़े और हड्डी का स्पर्श नहीं करते हैं। वानर के मांस भी सभी के लिये अभक्ष्य होते हैं। इस तरह जिसका सब कुछ निषिद्ध है, ऐसा पाँच नख वाला मैं आज आपके हाथ से मारा गया हूँ। मेरी स्त्री तारा सर्वज्ञ है। उसने मुझे सत्य और हित की बात बतायी थी। किंतु मोहवश उसका उल्लङ्घन करके मैं काल के अधीन हो गया।' 

‘काकुत्स्थ! जैसे सुशीला युवती पापात्मा पति से सुरक्षित नहीं हो पाती, उसी प्रकार आप जैसे स्वामी को पाकर यह वसुधा सनाथ नहीं हो सकती। आप शठ (छिपे रहकर दूसरों का अप्रिय करने वाले), अपकारी, क्षुद्र और झूठे ही शान्तचित्त बने रहने वाले हैं। महात्मा राजा दशरथ ने आप-जैसे पापी को कैसे उत्पन्न किया। हाय! जिसने सदाचार का रस्सा तोड़ डाला है, सत्पुरुषों के धर्म एवं मर्यादा का उल्लङ्घन किया है तथा जिसने धर्मरूपी अङ्कुश की भी अवहेलना कर दी है, उस रामरूपी हाथी के द्वारा आज मैं मारा गया। ऐसा अशुभ, अनुचित और सत्पुरुषों द्वारा निन्दित कर्म करके आप श्रेष्ठ पुरुषों से मिलने पर उनके सामने क्या कहेंगे। 

'श्रीराम ! हम उदासीन प्राणियों पर आपने जो यह पराक्रम प्रकट किया है, ऐसा बल पराक्रम आप अपना अपकार करने वालों पर प्रकट कर रहे हों, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता। राजकुमार! यदि आप युद्धस्थल में मेरी दृष्टि के सामने आकर मेरे साथ युद्ध करते तो आज मेरे द्वारा मारे जाकर सूर्यपुत्र यम देवता का दर्शन करते होते। जैसे किसी सोये हुए पुरुष को साँप आकर डँस ले और वह मर जाय उसी प्रकार रणभूमि में मुझ दुर्जय वीर को आपने छिपे रहकर मारा है तथा ऐसा करके आप पाप के भागी हुए हैं।' 

'जिस उद्देश्य को लेकर सुग्रीव का प्रिय करने की कामना से आपने मेरा वध किया है, उसी उद्देश्य की सिद्धि के लिये यदि आपने पहले मुझसे ही कहा होता तो मैं मिथिलेशकुमारी जानकी को एक ही दिन में ढूँढकर आपके पास ला देता। आपकी पत्नी का अपहरण करने वाले दुरात्मा राक्षस रावण को मैं युद्ध में मारे बिना ही उसके गले में रस्सी बाँधकर पकड़ लाता और उसे आपके हवाले कर देता।'

‘जैसे मधु कैटभ द्वारा अपहृत हुई श्वेताश्वतरी श्रुति का भगवान् हयग्रीव ने उद्धार किया था, उसी प्रकार मैं आपके आदेश से मिथिलेशकुमारी सीता को यदि वे समुद्र के जल में या पाताल में रखी गयी होती तो भी वहाँ से ला देता। मेरे स्वर्गवासी हो जाने पर सुग्रीव जो यह राज्य प्राप्त करेंगे, वह तो उचित ही है। अनुचित इतना ही हुआ है कि आपने मुझे रणभूमि में अधर्मपूर्वक मारा है।' 

‘यह जगत् कभी-न-कभी काल के अधीन होता ही है। इसका ऐसा स्वभाव ही है। अतः भले ही मेरी मृत्यु हो जाय, इसके लिये मुझे खेद नहीं है। परंतु मेरे इस तरह मारे जाने का यदि आपने उचित उत्तर ढूँढ़ निकाला हो तो उसे अच्छी तरह सोच-विचार कर कहिये।' 

ऐसा कहकर महामनस्वी वानर राजकुमार वाली सूर्य के समान तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखकर चुप हो गया। उसका मुँह सूख गया था और बाण के आघात से उसको बड़ी पीड़ा हो रही थी। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-१७(17) समाप्त ! 

No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...