भाग-१६(16) वाली - वध के लिये श्रीराम का आश्वासन पाकर सुग्रीव की विकट गर्जना, सुग्रीव की गर्जना सुनकर वाली का युद्ध के लिये निकलना और तारा का उसे रोककर सुग्रीव और श्रीराम के साथ मैत्री कर लेने के लिये समझाना

 


वे सब लोग शीघ्रतापूर्वक वाली की किष्किन्धा पुरी में पहुँचकर एक गहन वन में वृक्षों की ओट में अपने-आपको छिपाकर खड़े हो गये। वन के प्रेमी विशाल ग्रीवा वाले सुग्रीव ने उस वन में चारों ओर दृष्टि दौड़ायी और अपने मन में अत्यन्त क्रोध का संचय किया। तदनन्तर अपने सहायकों से घिरे हुए उन्होंने अपने सिंहनाद से आकाश को फाड़ते हुए-से घोर गर्जना की और वाली को युद्ध के लिये ललकारा। उस समय सुग्रीव वायु के वेग के साथ गर्जते हुए महामेघ के समान जान पड़ते थे। अपनी अङ्गकान्ति और प्रताप के द्वारा प्रात:काल के सूर्य की भाँति प्रकाशित होते थे। उनकी चाल दर्पभरे सिंह के समान प्रतीत होती थी। 

कार्यकुशल श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखकर सुग्रीव ने कहा - भगवन् ! वाली की यह किष्किन्धा पुरी तपाये हुए सुवर्ण के द्वारा निर्मित नगर द्वार से सुशोभित है। इसमें सब ओर वानरों का जाल - सा बिछा हुआ है तथा यह ध्वजों और यन्त्रों से सम्पन्न है। हम सब लोग इस पुरी में आ पहुँचे हैं। वीर! आपने पहले वाली वध के लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसे अब शीघ्र सफल कीजिये। ठीक उसी तरह जैसे आया हुआ अनुकूल समय लता को फल - फूल से सम्पन्न कर देता है। 

सुग्रीव के ऐसा कहने पर शत्रुसूदन धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी ने फिर अपनी पूर्वोक्त बात को दुहराते हुए ही सुग्रीव से कहा - वीर! अब तो इस गजपुष्पी लता के द्वारा तुमने अपनी पहचान के लिये चिह्न धारण कर ही लिया है। लक्ष्मण ने इसे उखाड़कर तुम्हारे कण्ठ में पहना ही दिया है। तुम कण्ठ में धारण की हुई इस लता के द्वारा बड़ी शोभा पा रहे हो। यदि आकाश में यह विपरीत घटना हो कि सूर्यमण्डल नक्षत्र माला से घिर जाय तभी इस कण्ठ- लम्बिनी लता सुशोभित होने वाले तुम्हारी उस सूर्य से तुलना हो सकती है। 

‘वानरराज! आज मैं वाली से उत्पन्न हुए तुम्हारे भय और वैर दोनों को युद्धस्थल में एक ही बार बाण छोड़कर मिटा दूँगा। सुग्रीव! तुम मुझे अपने उस भ्राता रूपी शत्रु को दिखा तो दो। फिर वाली मारा जाकर वन के भीतर धूल में लोटता दिखायी देगा। यदि मेरी दृष्टि में पड़ जाने पर भी वह जीवित लौट जाय तो तुम मुझे दोषी समझना और तत्काल जी भरकर मेरी निन्दा करना।' 

'तुम्हारी आँखों के सामने मैंने अपने एक ही बाण से सात साल के वृक्ष विदीर्ण किये थे, मेरे उसी बल से आज समराङ्गण में (एक बाण से ही) तुम वाली को मारा गया समझो। बहुत समय से संकट झेलते रहने पर भी मैं कभी झूठ नहीं बोला हूँ। मेरे मन में धर्म का लोभ है। इसलिये किसी तरह मैं झूठ तो बोलूँगा ही नहीं। साथ ही अपनी प्रतिज्ञा को भी अवश्य सफल करूँगा। अत: तुम भय और घबराहट को अपने हृदय से निकाल दो।' 

'जैसे इन्द्र वर्षा करके उगे हुए धान के खेत को फल से सम्पन्न करते हैं, उसी तरह मैं भी बाण का प्रयोग करके वाली के वध द्वारा तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा । इसलिये सुग्रीव! तुम सुवर्ण मालाधारी वाली को बुलाने के लिये इस समय ऐसी गर्जना करो, जिससे तुम्हारा सामना करने के लिये वह वानर नगर से बाहर निकल आये।' 

‘वह अनेक युद्धों में विजय पाकर विजयश्री से सुशोभित हुआ है। सब पर विजय पाने की इच्छा रखता है और उसने कभी तुमसे हार नहीं खायी है। इसके अलावे युद्ध से उसका बड़ा प्रेम है, अत: वाली कहीं भी आसक्त न होकर नगर के बाहर अवश्य निकलेगा। क्योंकि अपने पराक्रम को जानने वाले वीर पुरुष, विशेषतः स्त्रियों के सामने, युद्ध के लिये शत्रुओं के तिरस्कार पूर्ण शब्द सुनकर कदापि सहन नहीं करते हैं।' 

श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर सुवर्ण के समान पिङ्गलवर्ण वाले सुग्रीव ने आकाश को विदीर्ण-सा करते हुए कठोर स्वर में बड़ी भयंकर गर्जना की। उस सिंहनाद से भयभीत हो बड़े-बड़े बैल शक्तिहीन हो राजा के दोष से परपुरुषों द्वारा पकड़ी जाने वाली कुलाङ्गनाओं के समान व्याकुलचित्त हो सब ओर भाग चले। मृग युद्धस्थल में अस्त्र-शस्त्रों की चोट खाकर भागे हुए घोड़ों के समान तीव्र गति से भागने लगे और पक्षी जिनके पुण्य नष्ट हो गये हैं, ऐसे ग्रहों के समान आकाश से पृथ्वी पर गिरने लगे। 

तदनन्तर जिनका सिंहनाद मेघ की गर्जना के समान गम्भीर था और शौर्य के द्वारा जिनका तेज बढ़ा हुआ था, वे सुविख्यात सूर्यकुमार सुग्रीव बड़ी उतावली के साथ बारंबार गर्जना करने लगे, मानो वायु के वेग से चञ्चल हुई उत्ताल तरङ्ग-मालाओं से सुशोभित सरिताओं का स्वामी समुद्र कोलाहल कर रहा हो। 

उस समय अमर्षशील वाली अपने अन्तः पुर में था। उसने अपने भाई महामना सुग्रीव का वह सिंहनाद वहीं से सुना। समस्त प्राणियों को कम्पित कर देने वाली उनकी वह गर्जना सुनकर उसका सारा मद सहसा उतर गया और उसे महान् क्रोध उत्पन्न हुआ। फिर तो सुवर्ण के समान पीले रंग वाले वाली का सारा शरीर क्रोध से तमतमा उठा। वह राहुग्रस्त सूर्य के समान तत्काल श्रीहीन दिखायी देने लगा। 

बाली की दाढ़ें विकराल थीं, नेत्र क्रोध के कारण प्रज्वलित अग्नि के समान उद्दीप्त हो रहे थे। वह उस तालाब के समान श्रीहीन दिखायी देता था, जिसमें कमलपुष्पों की शोभा तो नष्ट हो गयी हो और केवल मृणाल रह गये हों। वह दुःसह शब्द सुनकर वाली अपने पैरों की धमक से पृथ्वी को विदीर्ण-सी करता हुआ बड़े वेग से निकला।  

उस समय वाली की पत्नी तारा भयभीत हो घबरा उठी। उसने वाली को अपनी दोनों भुजाओं में भर लिया और स्नेह से सौहार्द का परिचय देते हुए परिणाम में हित करने वाली यह बात कही - वीर! मेरी अच्छी बात सुनिये और सहसा आये हुए नदी के वेग की भाँति इस बढ़े हुए क्रोध को त्याग दीजिये। जैसे प्रातः काल शय्या से उठा हुआ पुरुष रात को उपभोग में लायी गयी पुष्पमाला का त्याग कर देता है; उसी प्रकार इस क्रोध का परित्याग कीजिये। 

‘वानर वीर! कल प्रात:काल सुग्रीव के साथ युद्ध कीजियेगा ( इस समय रुक जाइये ) यद्यपि युद्ध में कोई शत्रु आपसे बढ़कर नहीं है और आप किसी से छोटे नहीं हैं। तथापि इस समय सहसा आपका घर से बाहर निकलना मुझे अच्छा नहीं लगता है, आपको रोकने का एक विशेष कारण भी है। उसे बताती हूँ, सुनिये। 

'सुग्रीव पहले भी यहाँ आये थे और क्रोधपूर्वक उन्होंने आपको युद्ध के लिये ललकारा था। उस समय आपने नगर से निकलकर उन्हें परास्त किया और वे आपकी मार खाकर सम्पूर्ण दिशाओं की ओर भागते हुए मतङ्ग वन में चले गये थे। इस प्रकार आपके द्वारा पराजित और विशेष पीड़ित होने पर भी वे पुनः यहाँ आकर आपको युद्ध के लिये ललकार रहे हैं। उनका यह पुनरागमन मेरे मन में शङ्का - सी उत्पन्न कर रहा है। इस समय गर्जते हुए सुग्रीव का दर्प और उद्योग जैसा दिखायी देता है तथा उनकी गर्जना में जो उत्तेजना जान पड़ती है, इसका कोई छोटा-मोटा कारण नहीं होना चाहिये।' 

‘मैं समझती हूँ सुग्रीव किसी प्रबल सहायक के बिना अबकी बार यहाँ नहीं आये हैं। किसी सबल सहायक को साथ लेकर ही आये हैं, जिसके बल पर ये इस तरह गरज रहे हैं। वानर सुग्रीव स्वभाव से ही कार्यकुशल और बुद्धिमान् हैं। वे किसी ऐसे पुरुष के साथ मैत्री नहीं करेंगे, जिसके बल और पराक्रम को अच्छी तरह परख न लिया हो। वीर! मैंने पहले ही कुमार अङ्गद के मुँह से यह बात सुन ली है। इसलिये आज मैं आपके हित की बात बताती हूँ।' 

‘एक दिन कुमार अङ्गद वन में गये थे। वहाँ गुप्तचरों ने उन्हें एक समाचार बताया, जो उन्होंने यहाँ आकर मुझसे भी कहा था। वह समाचार इस प्रकार है - अयोध्या नरेश के दो शूर वीर पुत्र, जिन्हें युद्ध में जीतना अत्यन्त कठिन है, जिनका जन्म इक्ष्वाकु कुल में हुआ है तथा जो श्रीराम और लक्ष्मण के नाम से प्रसिद्ध हैं, यहाँ वन में आये हुए हैं। वे दोनों दुर्जय वीर सुग्रीव का प्रिय करने के लिये उनके पास पहुँच गये हैं। उन दोनों में से जो आपके भाई के युद्ध- कर्म में सहायक बताये गये हैं, वे श्रीराम शत्रुसेना का संहार करने वाले तथा प्रलयकाल में प्रज्वलित हुई अग्नि के समान तेजस्वी हैं। वे साधु पुरुषों के आश्रयदाता कल्पवृक्ष हैं और संकट में पड़े हुए प्राणियों के लिये सबसे बड़ा सहारा हैं।' 

‘आर्त पुरुषों के आश्रय, यश के एकमात्र भाजन, ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न तथा पिता की आज्ञा में स्थित रहनेवाले हैं। जैसे गिरिराज हिमालय नाना धातुओं की खान है, उसी प्रकार श्रीराम उत्तम गुणों के बहुत बड़े भंडार हैं। अतः उन महात्मा राम के साथ आपका विरोध करना कदापि उचित नहीं है। क्योंकि वे युद्ध की कला में अपना सानी नहीं रखते हैं। उन पर विजय पाना अत्यन्त कठिन है।' 

'शूरवीर! मैं आपके गुणों में दोष देखना नहीं चाहती। अतः आपसे कुछ कहती हूँ । आपके लिये जो हितकर है, वही बता रही हूँ। आप उसे सुनिये और वैसा ही कीजिये। अच्छा यही होगा कि आप सुग्रीव का शीघ्र ही युवराज के पद पर अभिषेक कर दीजिये। वीर वानर राज ! सुग्रीव आपके छोटे भाई हैं, उनके साथ युद्ध न कीजिये। मैं आपके लिये यही उचित समझती हूँ कि आप वैरभाव को दूर हटाकर श्रीराम के साथ सौहार्द और सुग्रीव के साथ प्रेम का सम्बन्ध स्थापित कीजिये।' 

‘वानर सुग्रीव आपके छोटे भाई हैं। अत: आपका लाड़-प्यार पाने के योग्य हैं। वे ऋष्यमूक पर रहें या किष्किन्धा में -सर्वथा आपके बन्धु ही हैं। मैं इस भूतल पर उनके समान बन्धु और किसी को नहीं देखती हूँ। आप दान-मान आदि सत्कारों के द्वारा उन्हें अपना अत्यन्त अन्तरङ्ग बना लीजिये, जिससे वे इस वैरभाव को छोड़कर आपके पास रह सकें। पुष्ट ग्रीवावाले सुग्रीव आपके अत्यन्त प्रेमी बन्धु हैं, ऐसा मेरा मत है। इस समय भ्रातृ प्रेम का सहारा लेने के सिवा आपके लिये यहाँ दूसरी कोई गति नहीं है। यदि आपको मेरा प्रिय करना हो तथा आप मुझे अपनी हितकारिणी समझते हों तो मैं प्रेमपूर्वक याचना करती हूँ, आप मेरी यह नेक सलाह मान लीजिये।' 

‘स्वामिन्! आप प्रसन्न होइये। मैं आपके हित की बात कहती हूँ। आप इसे ध्यान देकर सुनिये। केवल रोष का ही अनुसरण न कीजिये। कोशल राजकुमार श्रीराम इन्द्र के समान तेजस्वी हैं। उनके साथ वैर बाँधना या युद्ध छेड़ना आपके लिये कदापि उचित नहीं है।' 

उस समय तारा ने वाली से उसके हित की ही बात कही थी और यह लाभदायक भी थी। किंतु उसकी बात उसे नहीं रुची। क्योंकि उसके विनाश का समय निकट था और वह काल के पाश में बँध चुका था। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-१६(16) समाप्त ! 

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