लक्ष्मण के बड़े भाई धर्मात्मा श्रीराम सुग्रीव को साथ लेकर पुनः ऋष्यमूक से उस किष्किन्धापुरी की ओर चले, जो वाली के पराक्रम से सुरक्षित थी। अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुष को उठाकर और युद्ध में सफलता दिखाने वाले सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणों को लेकर श्रीराम वहाँ से प्रस्थित हुए। महात्मा रघुनाथजी के आगे-आगे सुगठित ग्रीवा वाले सुग्रीव और महाबली लक्ष्मण चल रहे थे और उनके पीछे वीर हनुमान्, नल, पराक्रमी नील तथा वानरयूथपों के भी यूथपति महातेजस्वी तार व ऋक्षराज जाम्बवंतजी चल रहे थे।
वे सब लोग फूलों के भार से झुके हुए वृक्षों, स्वच्छ जलवाली समुद्रगामिनी नदियों, कन्दराओं, पर्वतों, शिला- विवरों, गुफाओं, मुख्य-मुख्य शिखरों और सुन्दर दिखायी देने वाली गहन गुफाओं को देखते हुए आगे बढ़ने लगे। उन्होंने मार्ग में ऐसे सजल सरोवरों को भी देखा, जो वैदूर्यमणि के समान रंग वाले, निर्मल जल तथा कम खिले हुए मुकुल युक्त कमलों से सुशोभित थे।
कारण्डव, सारस, हंस, वञ्जुल, जलमुर्ग, चक्रवाक तथा अन्य पक्षी उन सरोवरों में चहचहा रहे थे। उन सबकी प्रतिध्वनि वहाँ गूँज रही थी। स्थलों में सब ओर हरी-हरी कोमल घास के अङ्कुरों का आहार करने वाले वनचारी हिरण कहीं निर्भय होकर चरते थे और कहीं खड़े दिखायी देते थे ( इन सबको देखते हुए श्रीराम आदि किष्किन्धा की ओर जा रहे थे)।
जो सफेद दाँतोंसे सुशोभित थे, देखने में भयंकर थे, अकेले विचरते थे और किनारों को खोदकर नष्ट कर देने के कारण सरोवरों के शत्रु समझे जाते थे, ऐसे दो दाँतों वाले मदमत्त जङ्गली हाथी चलते-फिरते पर्वतों के समान जाते दिखायी देते थे। उन्होंने अपने दाँतों से पर्वत के तटप्रान्त को विदीर्ण कर दिया था। कहीं हाथी जैसे विशालकाय वानर दृष्टिगोचर होते थे, जो धरती की धूल से नहा उठे थे। इनके सिवा उस वन में और भी बहुत-से जंगली जीव-जन्तु तथा आकाशचारी पक्षी विचरते देखे जाते थे। इन सबको देखते हुए श्रीराम आदि सब लोग सुग्रीव के वशवर्ती हो तीव्र गति से आगे बढ़ने लगे।
उन यात्रा करने वाले लोगों में वहाँ रघुकुलनन्दन श्रीराम ने वृक्षसमूहों से सघन वन को देखकर सुग्रीव से पूछा - वानर राज! आकाश में मेघ की भाँति जो यह वृक्षों का समूह प्रकाशित हो रहा है, क्या है? यह इतना विस्तृत है कि मेघों की घटा के समान छा रहा है। इसके किनारे-किनारे केले के वृक्ष लगे हुए हैं, जिनसे वह सारा वृक्ष समूह घिर गया है। सखे! यह कौन-सा वन है, यह मैं जानना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मन में बड़ा कौतूहल है। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे द्वारा मेरे इस कौतूहल का निवारण हो।
महात्मा रघुनाथजी की यह बात सुनकर सुग्रीव ने चलते-चलते ही उस विशाल वन के विषय में बताना आरम्भ किया - रघुनन्दन ! यह एक विस्तृत आश्रम है, जो सबके श्रम का निवारण करने वाला है। यह उद्यानों और उपवनों से युक्त है। यहाँ स्वादिष्ट फल-मूल और जल सुलभ होते हैं। इस आश्रम में सप्तजन नाम से प्रसिद्ध सात ही मुनि रहते थे, जो कठोर व्रतके पालन में तत्पर थे। वे नीचे सिरकरके तपस्या करते थे। नियमपूर्वक रहकर जल में शयन करने वाले थे।
'सात दिन और सात रात व्यतीत करके वे केवल वायु का आहार करते थे तथा एक स्थान पर निश्चल भाव से रहते थे। इस प्रकार सात सौ वर्षों तक तपस्या करके वे सशरीर स्वर्गलोक को चले गये। उन्हीं के प्रभाव से सघन वृक्षों की चहारदीवारी से घिरा हुआ यह आश्रम इन्द्र सहित सम्पूर्ण देवताओं और असुरों के लिये भी अत्यन्त दुर्धर्ष बना हुआ है। पक्षी तथा दूसरे वनचर जीव इसे दूर से ही त्याग देते हैं। जो मोहवश इसके भीतर प्रवेश करते हैं, वे फिर कभी नहीं लौटते हैं।'
‘रघुनन्दन! यहाँ मधुर अक्षरवाली वाणीके साथ-साथ आभूषणों की झनकारें भी सुनी जाती हैं। वाद्य और गीत की मधुर ध्वनि भी कानों में पड़ती है और दिव्य सुगन्ध का भी अनुभव होता है। यहाँ आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियाँ भी प्रज्वलित होती हैं। यह कबूतर के अंगों की भाँति धूसर रंग वाला घना धूम उठता दिखायी देता है, जो वृक्षों की शिखाओं को आवेष्टित-सा कर रहा है।'
"जिनके शिखाओं पर होम-धूम छा रहे हैं, वे ये वृक्ष मेघसमूहों से आच्छादित हुए नीलम के पर्वतों की भाँति प्रकाशित हो रहे हैं। धर्मात्मा रघुनन्दन! आप मन को एकाग्र करके दोनों हाथ जोड़कर भाई लक्ष्मण के साथ उन मुनियों के उद्देश्य से प्रणाम कीजिये। श्रीराम! जो उन पवित्र अन्तःकरण वाले ऋषियों को प्रणाम करते हैं, उनके शरीर में किंचिन्मात्र भी अशुभ नहीं रह जाता है।'
तब भाई लक्ष्मण सहित श्रीराम ने हाथ जोड़कर उन महात्मा ऋषियों के उद्देश्य से प्रणाम किया। धर्मात्मा श्रीराम, उनके छोटे भाई लक्ष्मण, सुग्रीव तथा अन्य सभी वानर उन ऋषियों को प्रणाम करके प्रसन्नचित्त हो आगे बढ़े। उस सप्तजनाश्रम से दूर तक का मार्ग तय कर लेने के पश्चात् उन सबने वाली द्वारा सुरक्षित किष्किन्धापुरी को देखा।
तदनन्तर श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण, श्रीराम तथा वानर, जिनका उग्रतेज उदित हुआ था, हाथों में अस्त्र-शस्त्र लेकर इन्द्रकुमार वाली के पराक्रम से पालित किष्किन्धा पुरी में शत्रुवध के निमित्त पुनः आ पहुँचे।
इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का
