भाग-१४(14) श्रीराम के द्वारा सात साल वृक्षों का भेदन, श्रीराम की आज्ञा से सुग्रीव का किष्किन्धा में आकर वाली को ललकारना और युद्ध में उससे पराजित होकर मतंगवन में भाग जाना

 


सुग्रीव के सुन्दर ढंग से कहे हुए इस वचन को सुनकर महातेजस्वी श्रीराम ने उन्हें विश्वास दिलाने के लिये धनुष हाथ में लिया। दूसरों को मान देने वाले श्रीरघुनाथजी ने वह भयंकर धनुष और एक बाण लेकर धनुष की टंकार से सम्पूर्ण दिशाओं को गुँजाते हुए उस बाण को सालवृक्ष की ओर छोड़ दिया। उन बलवान् वीरशिरोमणि के द्वारा छोड़ा गया वह सुवर्णभूषित बाण उन सातों सालवृक्षों को एक ही साथ कर पर्वत तथा पृथ्वी के सातों तलों को छेदता हुआ पातालमें चला गया। 

इस प्रकार एक ही मुहूर्त में उन सबका भेदन करके वह महान् वेगशाली बाण पुन: वहाँ से निकलकर उनके तरकस में ही प्रविष्ट हो गया। श्रीराम के बाण के वेग से उन सातों सालवृक्षों को विदीर्ण हुआ देख वानरशिरोमणि सुग्रीव को बड़ा विस्मय हुआ।साथ ही उन्हें मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नता हुई। सुग्रीव ने हाथ जोड़कर धरती पर माथा टेक दिया और श्रीरघुनाथजी को साष्टाङ्ग प्रणाम किया। प्रणाम के लिये झुकते समय उनके कण्ठहारादि भूषण लटकते हुए दिखायी देते थे। 

श्रीराम के उस महान् कर्म से अत्यन्त प्रसन्न हो उन्होंने सामने खड़े हुए सम्पूर्ण अस्त्र-वेत्ताओं में श्रेष्ठ धर्मज्ञ, शूरवीर श्रीरामचन्द्रजी से इस प्रकार कहा - पुरुषप्रवर्! भगवन्! आप तो अपने बाणों से समराङ्गण में इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं का वध भी करने में समर्थ हैं। फिर वाली को मारना आपके लिये कौन बड़ी बात है ? काकुत्स्थ! जिन्होंने सात बड़े-बड़े सालवृक्ष, पर्वत और पृथ्वी को भी एक ही बाण से विदीर्ण कर डाला, उन्हीं आपके समक्ष युद्ध के मुहाने पर कौन ठहर सकता है। 

‘महेन्द्र और वरुण के समान पराक्रमी आपको सुहृद् के रूप में पाकर आज मेरा सारा शोक दूर हो गया। आज मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। ककुत्स्थकुलभूषण! मैं हाथ जोड़ता हूँ। आप आज ही मेरा प्रिय करनेके लिये उस वाली का, जो भाई के रूप में मेरा शत्रु है, वध कर डालिये।' 

सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजी को लक्ष्मण के समान प्रिय हो गये थे। उनकी बात सुनकर महाप्राज्ञ श्रीराम ने अपने उस प्रिय सुहृद को हृदय से लगा लिया और इस प्रकार उत्तर दिया – सुग्रीव! हमलोग शीघ्र ही इस स्थान से किष्किन्धा को चलते हैं। तुम आगे जाओ और जाकर व्यर्थ ही भाई कहलाने वाले वाली को युद्ध के लिये ललकारो। 

तदनन्तर वे सब लोग वाली की राजधानी किष्किन्धापुरी में गये और वहाँ गहन वन के भीतर वृक्षों की आड़ में अपने को छिपकर खड़े हो गये। सुग्रीव ने लँगोट से अपनी कमर खूब कस ली और बाली को बुलाने के लिये भयंकर गर्जना की। वेगपूर्वक किये हुए उस सिंहनाद से मानो वे आकाश को फाड़े डालते थे। भाई का सिंहनाद सुनकर महाबली वाली को बड़ा क्रोध हुआ। वह अमर्ष में भरकर अस्ताचल से नीचे जाने वाले सूर्य के समान बड़े वेग से घर से निकला। 

फिर तो वाली और सुग्रीव में बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया, मानो आकाश में बुध और मंगल इन दोनों ग्रहों में घोर संग्राम हो रहा हो। वे दोनों भाई क्रोध से मूर्च्छित हो एक-दूसरे पर वज्र और अशनि के समान तमाचों और घूँसों का प्रहार करने लगे। उसी समय श्रीरामचन्द्रजी ने धनुष हाथ में लिया और उन दोनों की ओर देखा। वे दोनों वीर अश्विनीकुमारों की भाँति परस्पर मिलते-जुलते दिखायी दिये। 

श्रीरामचन्द्रजी को यह पता न चला कि इनमें कौन सुग्रीव है और कौन वाली; इसलिये उन्होंने अपना वह प्राणान्तकारी बाण छोड़ने का विचार स्थगित कर दिया। इसी बीच में वाली ने सुग्रीव के पाँव उखाड़ दिये। वे अपने रक्षक श्रीरघुनाथजी को न देखकर ऋष्यमूक पर्वत की ओर भागे। वे बहुत थक गये थे। उनका सारा शरीर लहूलुहान और प्रहारों से जर्जर हो रहा था। इतने पर भी वाली ने क्रोधपूर्वक उनका पीछा किया। किंतु वे मतंगमुनि के महान् वन में घुस गये। 

सुग्रीव को उस वन में प्रविष्ट हुआ देख महाबली वाली शाप के भय से वहाँ नहीं गया और 'जाओ तुम बच गये' ऐसा कहकर वहाँ से लौट आया। इधर श्रीरघुनाथजी भी अपने भाई लक्ष्मण तथा श्रीहनुमानजी के साथ उसी समय वन में आ गये, जहाँ वानर सुग्रीव विद्यमान थे। 

लक्ष्मण सहित श्रीराम को आया देख सुग्रीव को बड़ी लज्जा हुई और वे पृथ्वी की ओर देखते हुए दीन वाणी में उनसे बोले – रघुनन्दन ! आपने अपना पराक्रम दिखाया और मुझे यह कहकर भेज दिया कि जाओ, वाली को युद्ध के लिये ललकारो, यह सब हो जाने पर आपने शत्रु से पिटवाया और स्वयं छिप गये। बताइये, इस समय आपने ऐसा क्यों किया? आपको उसी समय सच सच बता देना चाहिये था कि मैं वाली को नहीं मारूँगा। ऐसी दशा में मैं यहाँ से उसके पास जाता ही नहीं। 

महामना सुग्रीव जब दीन वाणी द्वारा इस प्रकार करुणा जनक बात कहने लगे, तब श्रीराम फिर उनसे बोले – तात सुग्रीव ! मेरी बात सुनो, क्रोध को अपने मन से निकाल दो। मैंने क्यों नहीं बाण चलाया, इसका कारण बतलाता हूँ। सुग्रीव! वेशभूषा, कद और चाल-ढाल में तुम और वाली दोनों एक-दूसरे से मिलते-जुलते हो। स्वर, कान्ति, दृष्टि, पराक्रम और बोलचाल के द्वारा भी मुझे तुम दोनों में कोई अन्तर नहीं दिखायी देता।  

'वानरश्रेष्ठ! तुम दोनों के रूप की इतनी समानता देखकर मैं मोह में पड़ गया - तुम्हें पहचान न सका; इसीलिये मैंने अपना महान् वेगशाली शत्रुसंहारक बाण नहीं छोड़ा। मेरा वह भयंकर बाण शत्रु के प्राण लेनेवाला था, इसलिये तुम दोनों की समानता से संदेह में पड़कर मैंने उस बाण को नहीं छोड़ा। सोचा, कहीं ऐसा न हो कि हम दोनों के मूल उद्देश्य का ही विनाश हो जाय।   

'वीर! वानरराज ! यदि अनजान में या जल्दबाजी के कारण मेरे बाण से तुम्हीं मारे जाते तो मेरी बालोचित चपलता और मूढ़ता ही सिद्ध होती। जिसको अभय दान दे दिया गया हो, उसका वध करने से बड़ा भारी पाप होता है; यह एक अद्भुत पातक है। इस समय मैं, लक्ष्मण और सुन्दरी सीता सब तुम्हारे अधीन हैं। इस वन में तुम्हीं हमलोगों के आश्रय हो; इसलिये वानरराज ! शङ्का न करो; पुनः चलकर युद्ध प्रारम्भ करो। तुम इसी मुहूर्त में वाली को मेरे एक ही बाण का निशाना बनकर धरतीपर लोटता देखोगे। वानरेश्वर! अपनी पहचान के लिये तुम कोई चिह्न धारण कर लो, जिससे द्वन्द्वयुद्ध में प्रवृत्त होने पर मैं तुम्हें पहचान सकूँ। 

सुग्रीव से ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण से बोले – लक्ष्मण ! यह उत्तम लक्षणों से युक्त गजपुष्पी लता फूल रही है। इसे उखाड़कर तुम महामना सुग्रीव के गले में पहना दो। 

यह आज्ञा पाकर लक्ष्मण ने पर्वत के किनारे उत्पन्न हुई फूलों से भरी वह गजपुष्पी लता उखाड़कर सुग्रीव के गले में डाल दिया। गले में पड़ी हुई उस लता से श्रीमान् सुग्रीव वकपंक्ति से अलंकृत संध्याकाल के मेघ की भाँति शोभा पाने लगे। श्रीराम के वचन से आश्वासन पाकर अपने सुन्दर शरीर से शोभा पाने वाले सुग्रीव श्रीरघुनाथजी के साथ फिर किष्किन्धापुरी में जा पहुँचे। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-१४(14) समाप्त ! 

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