भाग-१३(13) सुग्रीव के द्वारा वाली के पराक्रम का वर्णन - मतङ्ग मुनि का वाली को शाप देना, श्रीराम का दुन्दुभि के अस्थि समूह को दूर फेंकना और सुग्रीव का उनसे साल-भेदन के लिये आग्रह करना

 


श्रीरामचन्द्रजी का वचन हर्ष और पुरुषार्थ को बढ़ानेवाला था, उसे सुनकर सुग्रीव ने उसके प्रति अपना आदर प्रकट किया और श्रीरघुनाथजी की इस प्रकार प्रशंसा की - प्रभो! आपके बाण प्रज्वलित, तीक्ष्ण एवं मर्मभेदी हैं। यदि आप कुपित हो जायँ तो इनके द्वारा प्रलयकाल के सूर्य की भाँति समस्त लोकों को भस्म कर सकते हैं। इसमें संशय की बात नहीं है। परंतु वाली का जैसा पुरुषार्थ है, जो बल है और जैसा धैर्य है, वह सब एकचित्त होकर सुन लीजिये। उसके बाद जैसा उचित हो, कीजियेगा। 

'वाली सूर्योदय के पहले ही पश्चिम समुद्र से पूर्व समुद्र तक और दक्षिण सागर से उत्तर तक घूम आता है; फिर भी वह थकता नहीं है। पराक्रमी वाली पर्वतों की चोटियों पर चढ़कर बड़े-बड़े शिखरों को बलपूर्वक उठा लेता और ऊपर को उछालकर फिर उन्हें हाथों से थाम लेता है। वनों में नाना प्रकार के जो बहुत-से सुदृढ़ वृक्ष थे, उन्हें अपने बल को प्रकट करते हुए वाली ने वेगपूर्वक तोड़ डाला है।' 

'पहले की बात है यहाँ एक दुन्दुभि नाम का असुर रहता था, जो भैंसे के रूप में दिखायी देता था। वह ऊँचाई में कैलास पर्वत के समान जान पड़ता था। पराक्रमी दुन्दुभि अपने शरीर में एक हजार हाथियों का बल रखता था। बल के घमंड में भरा हुआ वह विशालकाय दुष्टात्मा दानव अपने को मिले हुए वरदान से मोहित हो सरिताओं के स्वामी समुद्र के पास गया। जिसमें उत्ताल तरङ्गे उठ रही थीं तथा जो रत्नों की निधि हैं, उस महान् जलराशि से परिपूर्ण समुद्र को लाँघकर -उसे भी न समझकर दुन्दुभि ने उसके अधिष्ठाता देवता से कहा - "मुझे अपने साथ युद्ध का अवसर दो।"  

'राजन्! उस समय महान् बलशाली धर्मात्मा समुद्र उस काल प्रेरित असुर से इस प्रकार बोला - “युद्धविशारद वीर! मैं तुम्हें युद्ध का अवसर देने -  तुम्हारे साथ युद्ध करने में असमर्थ हूँ। जो तुम्हें युद्ध प्रदान करेगा, उसका नाम बतलाता हूँ, सुनो विशाल वन में जो पर्वतों का राजा और भगवान् शंकर का श्वशुर है, तपस्वी जनों का सबसे बड़ा आश्रय और संसार में हिमवान् नाम से विख्यात है, जहाँ से जल के बड़े-बड़े स्रोत प्रकट हुए हैं। तथा जहाँ बहुत सी कन्दराएँ और झरने हैं, वह गिरिराज हिमालय ही तुम्हारे साथ युद्ध करने में समर्थ है। वह तुम्हें अनुपम प्रीति प्रदान कर सकता है।" 

'यह सुनकर असुरशिरोमणि दुन्दुभि समुद्र को डरा हुआ जान धनुष से छूटे हुए बाण की भाँति तुरंत हिमालय के वन में जा पहुँचा और उस पर्वत की गजराजों के समान विशाल श्वेत शिलाओं को बारंबार भूमि पर फेंकने और गर्जना करने लगा। तब श्वेत बादल के समान आकार धारण किये सौम्य स्वभाव वाले हिमवान् वहाँ प्रकट हुए। उनकी आकृति प्रसन्नता को बढ़ाने वाली थी।' 

'वे अपने ही शिखर पर खड़े होकर बोले - “धर्मवत्सल दुन्दुभे! तुम मुझे क्लेश न दो। मैं युद्धकर्म में कुशल नहीं हूँ। मैं तो केवल तपस्वी जनों का निवास स्थान हूँ।" 'बुद्धिमान् गिरिराज हिमाल यकी यह बात सुनकर दुन्दुभि के नेत्र क्रोध से लाल हो गये और वह इस प्रकार बोला - "यदि तुम युद्ध करने में असमर्थ हो अथवा मेरे भय से ही युद्ध की चेष्टा से विरत हो गये हो तो मुझे उस वीर का नाम बताओ, जो युद्ध की इच्छा रखने वाले मुझको अपने साथ युद्ध करने का अवसर दे।" 

‘उसकी यह बात सुनकर बातचीत में कुशल धर्मात्मा हिमवान ने श्रेष्ठ असुर से, जिसके लिये पहले किसी ने किसी प्रतिद्वन्द्वी योद्धा का नाम नहीं बताया था, क्रोधपूर्वक कहा – “महाप्राज्ञ दानवराज! वाली नाम से प्रसिद्ध एक परम तेजस्वी और प्रतापी वानर हैं, जो देवराज इन्द्र के पुत्र हैं और अनुपम शोभा से पूर्ण किष्किन्धा नामक पुरी में निवास करते हैं। वे बड़े बुद्धिमान् और युद्ध की कला में निपुण हैं। वे ही तुमसे जूझने में समर्थ हैं। जैसे इन्द्र ने नमुचि को युद्ध का अवसर दिया था, उसी प्रकार वाली तुम्हें द्वन्द्व युद्ध प्रदान कर सकते हैं। यदि तुम यहाँ युद्ध चाहते हो तो शीघ्र चले जाओ; क्योंकि वाली के लिये किसी शत्रु की ललकार को सह सकना बहुत कठिन है। वे युद्धकर्म में सदा शूरता प्रकट करनेवाले हैं।" 

‘हिमवान की बात सुनकर क्रोध से भरा हुआ दुन्दुभि तत्काल वाली की किष्किन्धा पुरी में जा पहुँचा। उसने भैंसे का-सा रूप धारण कर रखा था। उसके सींग बड़े तीखे थे। वह बड़ा भयंकर था और वर्षाकाल के आकाश में छाये हुए जल से भरे महान् मेघ के समान जान पड़ता था। वह महाबली दुन्दुभि किष्किन्धा पुरी के द्वार पर आकर भूमि को कँपाता हुआ जोर-जोर से गर्जना करने लगा, मानो दुन्दुभि का गम्भीर नाद हो रहा हो। वह आसपास के वृक्षों को तोड़ता, धरती को खुरों से खोदता और घमंड में आकर पुरी के दरवाजे को सींगों से खरोंचता हुआ युद्ध के लिये डट गया।' 

‘वाली उस समय अन्त: पुर में था। उस दानव की गर्जना सुनकर वह अमर्ष से भर गया और तारों से घिरे हुए चन्द्रमा की भाँति स्त्रियों से घिरा हुआ नगर के बाहर निकल आया। समस्त वनचारी वानरों के राजा वाली ने वहाँ सुस्पष्ट अक्षरों तथा पदों से युक्त परिमित वाणी में उस दुन्दुभि से कहा - “महाबली दुन्दुभे! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम इस नगर द्वार को रोककर क्यों गरज रहे हो? अपने प्राणों की रक्षा करो।" 

‘बुद्धिमान् वानराज वाली का यह वचन सुनकर दुन्दुभि की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। वह उससे इस प्रकार बोला - “वीर! तुम्हें स्त्रियों के समीप ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। मुझे युद्ध का अवसर दो, तब मैं तुम्हारा बल समझूंगा। अथवा वानर! मैं आज की रात में अपने क्रोध को रोके रहूँगा। तुम स्वेच्छानुसार काम भोग के लिये सूर्योदय तक समय मुझसे ले लो।" 

“वानरों को हृदय से लगाकर जिसे जो कुछ देना हो दे दो; तुम समस्त कपियों के राजा हो न! अपने सुहृदों से मिल लो, सलाह कर लो। किष्किन्धा पुरी को अच्छी तरह देख लो। अपने समान पुत्र आदि को इस नगरी के राज्य पर अभिषिक्त कर दो और स्त्रियों के साथ आज जीभरकर क्रीडा कर लो। इसके बाद मैं तुम्हारा घमंड चूर कर दूंगा। जो मधुपान से मत्त, प्रमत्त (असावधान), युद्ध से भगे हुए, अस्त्ररहित, दुर्बल, तुम्हारे-जैसे स्त्रियों से घिरे हुए तथा मद मोहित पुरुष का वध करता है, वह जगत में गर्भ-हत्यारा कहा जाता है।" 

‘यह सुनकर वाली मन्द-मन्द मुसकराकर उन तारा आदि सब स्त्रियों को दूर हटा उस असुरराज से क्रोधपूर्वक बोला - “यदि तुम युद्ध के लिये निर्भय होकर खड़े हो तो यह न समझो कि यह वाली मधु पीकर मतवाला हो गया है। मेरे इस मद को तुम युद्धस्थल में उत्साहवृद्धि के लिये वीरों द्वारा किया जाने वाला औषधविशेष का पान समझो।"  

'उससे ऐसा कहकर पिता इन्द्र की दी हुई विजयदायिनी सुवर्णमाला को गले में डालकर वाली कुपित हो युद्ध के लिये खड़ा हो गया। कपिश्रेष्ठ वाली ने पर्वताकार दुन्दुभि के दोनों सींग पकड़कर उस समय गर्जना करते हुए उसे बारंबार घुमाया। फिर बलपूर्वक उसे धरती पर दे मारा और बड़े जोर से सिंह्नाद किया। पृथ्वी पर गिराये जाते समय उसके दोनों नसों से खून की धाराएँ बहने लगीं। क्रोध के आवेश से युक्त हो एक-दूसरे को जीतने की इच्छावाले उन दोनों दुन्दुभि और वाली में घोर युद्ध होने लगा।' 

‘उस समय इन्द्र के तुल्य पराक्रमी वाली दुन्दुभि पर मुक्कों, लातों, घुटनों, शिलाओं तथा वृक्षों से प्रहार करने लगा। उस युद्धस्थल में परस्पर प्रहार करते हुए वानर और असुर दोनों योद्धाओं में से असुर की शक्ति तो घटने लगी और इन्द्रकुमार बाली का बल बढ़ने लगा। उन दोनों में वहाँ प्राणान्तकारी युद्ध छिड़ गया। उस समय वाली ने दुन्दुभि को उठाकर पृथ्वी पर दे मारा, साथ ही अपने शरीर से उसको दबा दिया, जिससे दुन्दुभि पिस गया। गिरते समय उसके शरीर के समस्त छिद्रों से बहुत-सा रक्त बहने लगा। वह महाबाहु असुर पृथ्वी पर गिरा और मर गया।' 

‘जब उसके प्राण निकल गये और चेतना लुप्त हो गयी, तब वेगवान् वाली ने उसे दोनों हाथों से उठाकर एक साधारण वेग से एक योजन दूर फेंक दिया। वेगपूर्वक फेंके गये उस असुर के मुख से निकली हुई रक्त की बहुत सी बूँदें हवा के साथ उड़कर मतंगमुनि के आश्रम में पड़ गयीं।' 

‘महाभाग! वहाँ पड़े हुए उन रक्त - बिन्दुओं को देखकर मतंगमुनि कुपित हो उठे और इस विचार में पड़ गये कि कौन है, जो यहाँ रक्त के छींटे डाल गया है? जिस दुष्टने सहसा मेरे शरीर से रक्त का स्पर्श करा दिया, यह दुरात्मा दुर्बुद्धि, अजितात्मा और मूर्ख कौन है?' 

'ऐसा कहकर मुनिवर मतंग ने बाहर निकलकर देखा तो उन्हें एक पर्वताकार भैंसा पृथ्वी पर प्राणहीन होकर पड़ा दिखायी दिया। उन्होंने अपने तपोबल से यह जान लिया कि यह एक वानर की करतूत है। अत: उस लाश को फेंकनेवाले वानर के प्रति उन्होंने बड़ा भारी शाप दिया – “जिसने रक्त के छींटे डालकर मेरे निवास स्थान इस वन को अपवित्र कर दिया है, वह आज से इस वन में प्रवेश न करे। यदि इसमें प्रवेश करेगा तो उसका वध हो जायगा। इस असुरके शरीर को इधर फेंककर जिसने इन वृक्षों को तोड़ डाला है, वह दुर्बुद्धि यदि मेरे आश्रम के चारों ओर पूरे एक योजनतक की भूमि में पैर रखेगा तो अवश्य ही अपने प्राणों से हाथ धो बैठेगा।" 

"उस वाली के जो कोई सचिव भी मेरे इस वन में रहते हों, उन्हें अब यहाँ का निवास त्याग देना चाहिये। वे मेरी आज्ञा सुनकर सुखपूर्वक यहाँ से चले जायँ । यदि वे रहेंगे तो उन्हें भी निश्चय ही शाप दे दूँगा। मैंने अपने इस वन की सदा पुत्र की भाँति रक्षा की है। जो इसके पत्र और अङ्कुर का विनाश तथा फल-मूल का अभाव करने के लिये यहाँ रहेंगे, वे अवश्य शाप के भागी होंगे। आज का दिन उन सबके आने-जाने या रहने की अन्तिम अवधि है – आज भर के लिये मैं उन सबको छुट्टी देता हूँ। कलसे जो कोई वानर यहाँ मेरी दृष्टि में पड़ जायगा, वह कई हजार वर्षों के लिये पत्थर हो जायगा।" 

'मुनि के इस वचन को सुनकर वे सभी वानर मतंगवन से निकल गये। उन्हें देखकर वाली ने पूछा - “मतंगवन में निवास करने वाले आप सभी वानर मेरे पास क्यों चले आये? वनवासियों की कुशल तो है न?” 

‘तब उन सभी वानरों ने सुवर्णमालाधारी वाली से अपने आने का सब कारण बताया तथा जो वाली को शाप हुआ था, उसे भी कह सुनाया। वानरों की कही हुई यह बात सुनकर वाली महर्षि मतंग के पास गया और हाथ जोड़कर क्षमा-याचना करने लगा। किंतु महर्षि ने उसका आदर नहीं किया। वे चुपचाप अपने आश्रम में चले गये। इधर वाली शाप प्राप्त होने से भयभीत हो बहुत ही व्याकुल हो गया।' 

‘नरेश्वर! तब से उस शाप के भय से डरा हुआ वाली इस महान् पर्वत ऋष्यमूक के स्थानों में न तो कभी प्रवेश करना चाहता है और न इस पर्वत को देखना ही चाहता है। श्रीराम! यहाँ उसका प्रवेश होना असम्भव है, यह जानकर मैं अपने मन्त्रियों के साथ इस महान् वन में विषाद- शून्य होकर विचरता हूँ।' 

'यह रहा दुन्दुभि की हड्डियों का ढेर, जो एक महान् पर्वतशिखर के समान जान पड़ता है । वाली ने अपने बल के घमंड में आकर दुन्दुभि के शरीर को इतनी दूर फेंका था। ये सात सालके विशाल एवं मोटे वृक्ष हैं, जो अनेक उत्तम शाखाओं से सुशोभित होते हैं। वाली इनमें से एक- एक को बलपूर्वक हिलाकर पत्रहीन कर सकता है। श्रीराम! यह मैंने वाली के अनुपम पराक्रम को प्रकाशित किया है। नरेश्वर ! आप उस वाली को समराङ्गण में कैसे मार सकेंगे।' 

सुग्रीव के ऐसा कहने पर लक्ष्मण को बड़ी हँसी आयी। वे हँसते हुए ही बोले -  कौन - सा काम कर देने पर तुम्हें विश्वास होगा कि श्रीरामचन्द्रजी वाली का वध कर सकेंगे।' 

तब सुग्रीव ने उनसे कहा - पूर्वकाल में वाली ने साल के इन सातों वृक्षों को एक-एक करके कई बार बींध डाला है। अत: श्रीरामचन्द्रजी भी यदि इनमें से किसी एक वृक्ष को एक ही बाण से छेद डालेंगे तो इनका पराक्रम देखकर मुझे वालीके मारे जाने का विश्वास हो जायगा। लक्ष्मण! यदि इस महिषरूप धारी दुन्दुभि की हड्डी को एक ही पैर से उठाकर बलपूर्वक दो सौ धनुष की दूरी पर फेंक सकें तो भी मैं यह मान लूँगा कि इनके हाथ से वाली का वध हो सकता है। 

जिनके नेत्रप्रान्त कुछ-कुछ लाल थे, उन श्रीराम से ऐसा कहकर सुग्रीव दो घड़ी तक कुछ सोचविचार में पड़े रहे। इसके बाद वे ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम से फिर बोले - वाली शूर है और स्वयं भी उसे अपने शौर्य पर अभिमान है। उसके बल और पुरुषार्थ विख्यात हैं। वह बलवान् वानर अब तक के युद्धों में कभी पराजित नहीं हुआ है। इसके ऐसे-ऐसे कर्म देखे जाते हैं, जो देवताओं के लिये दुष्कर हैं और जिनका चिन्तन करके भयभीत हो मैंने इस ऋष्यमूक पर्वत की शरण ली है। 

‘वानरराज वाली को जीतना दूसरों के लिये असम्भव है। उस पर आक्रमण अथवा उसका तिरस्कार भी नहीं किया जा सकता। वह शत्रु की ललकार को नहीं सह सकता। जब मैं उसके प्रभाव का चिन्तन करता हूँ, तब इस ऋष्यमूक पर्वत को एक क्षण के लिये भी छोड़ नहीं पाता हूँ। ये हनुमान् आदि मेरे श्रेष्ठ सचिव मुझमें अनुराग रखने वाले हैं। इनके साथ रहकर भी मैं इस विशाल वन में वाली से उद्विग्न और शङ्कित होकर ही विचरता हूँ।' 

‘मित्रवत्सल! आप मुझे परम स्पृहणीय श्रेष्ठ मित्र मिल गये हैं । पुरुषसिंह! आप मेरे लिये हिमालय के समान हैं और मैं आपका आश्रय ले चुका हूँ। (इसलिये अब मुझे निर्भय हो जाना चाहिये।) किंतु रघुनन्दन! मैं उस बलशाली दुष्ट भ्राता के बल पराक्रम को जानता हूँ और समरभूमि में आपका पराक्रम मैंने प्रत्यक्ष नहीं देखा है। प्रभो! अवश्य ही मैं वाली से आपकी तुलना नहीं करता हूँ। न तो आपको डराता हूँ और न आपका अपमान ही करता हूँ। वाली के भयानक कर्मों ने ही मेरे हृदय में कातरता उत्पन्न कर दी है।' 

‘रघुनन्दन! निश्चय ही आपकी वाणी मेरे लिये प्रमाणभूत है – विश्वसनीय है; क्योंकि आपका धैर्य और आपकी यह दिव्य आकृति आदि गुण राख से ढकी हुई आग के समान आपके उत्कृष्ट तेज को सूचित कर रहे हैं।' 

महात्मा सुग्रीव की यह बात सुनकर भगवान् श्रीराम पहले तो मुसकराये। फिर उस वानर की बात का उत्तर देते हुए उससे बोले - वानर! यदि तुम्हें इस समय पराक्रम के विषय में हम लोगों पर विश्वास नहीं होता तो युद्ध के समय हम तुम्हें उसका उत्तम विश्वास करा देंगे। 

ऐसा कहकर सुग्रीव को सान्त्वना देते हुए लक्ष्मण के बड़े भाई महाबाहु बलवान् श्रीरघुनाथजी ने खिलवाड़ में ही दुन्दुभि के शरीर को अपने पैर के अँगूठे से टाँग लिया और उस असुर के उस सूखे हुए कङ्काल को पैर के अँगूठे से ही दस योजन दूर फेंक दिया। 

उसके शरीको फेंका गया देख सुग्रीव ने लक्ष्मण और वानरों के सामने ही तपते हुए सूर्यके समान तेजस्वी वीर श्रीरामचन्द्रजी से पुन: यह अर्थ भरी बात कही - सखे! मेरा भाई वाली उस समय मदमत्त और युद्ध से थका हुआ था और दुन्दुभि का यह शरीर खून से भीगा हुआ, मांसयुक्त तथा नया था। इस दशा में उसने इस शरीर को पूर्वकाल में दूर फेंका था। परंतु रघुनन्दन ! इस समय यह मांसहीन होने के कारण तिनके के समान हलका हो गया है और आपने हर्ष एवं उत्साह से युक्त होकर इसे फेंका है। अत: श्रीराम ! इस लाश को फेंकने पर भी यह नहीं जाना जा सकता कि आपका बल अधिक है या उसका; क्योंकि वह गीला था और यह सूखा। यह इन दोनों अवस्थाओं में महान् अन्तर है। 

“तात! आपके और उसके बल में वही संशय अब तक बना रह गया। अब इस एक सालवृक्ष को विदीर्ण कर देने पर दोनों के बलाबल का स्पष्टीकरण हो जायगा। आपका यह धनुष हाथी की फैली हुई सूँड़ के समान विशाल है। आप इस पर प्रत्यञ्चा चढ़ाइये और इसे कान तक खींचकर सालवृक्ष को लक्ष्य करके एक विशाल बाण छोड़िये। इसमें संदेह नहीं कि आपका छोड़ा हुआ बाण इस सालवृक्ष को विदीर्ण कर देगा।' 

'राजन् ! अब विचार करने की आवश्यकता नहीं है। मैं अपनी शपथ दिलाकर कहता हूँ, आप मेरा यह प्रिय कार्य अवश्य कीजिये। जैसे सम्पूर्ण तेजों में सदा सूर्यदेव ही श्रेष्ठ हैं, जैसे बड़े - बड़े पर्वतों में गिरिराज हिमवान् श्रेष्ठ हैं और जैसे चौपायों में सिंह श्रेष्ठ है, उसी प्रकार पराक्रम के विषय में सब मनुष्यों में आप ही श्रेष्ठ हैं। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-१३(13) समाप्त ! 

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