सुग्रीव कहते हैं - तदनन्तर क्रोध से आविष्ट तथा विक्षुब्ध होकर आये हुए अपने बड़े भाई को उनके हित की कामना से मैं पुन: प्रसन्न करने की चेष्टा करने लगा। मैंने कहा - 'अनाथनन्दन! सौभाग्य की बात है कि आप सकुशल लौट आये और वह शत्रु आपके हाथ से मारा गया। मैं आपके बिना अनाथ हो रहा था। अब एक मात्र आप ही मेरे नाथ हैं। यह बहुत-सी तीलियों से युक्त तथा उदित हुए पूर्ण चन्द्रमा के समान श्वेत छत्र मैं आपके मस्तक पर लगाता और चंवर डुलाता हूँ। आप इन्हें स्वीकार करें।'
"वानरराज! मैं बहुत दु:खी होकर एक वर्ष तक उस बिल के दरवाजे पर खड़ा रहा। उसके बाद बिल के भीतर से खूनकी धारा निकली। द्वार पर वह रक्त देखकर मेरा हृदय शोक से उद्विग्न हो उठा और मेरी सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त व्याकुल हो गयीं। तब उस बिल के द्वार को एक पर्वत शिखर से ढककर मैं उस स्थान से हट गया और पुनः किष्किन्धा पुरी में चला आया।"
“यहाँ विषाद पूर्वक मुझे अकेला लौटा देख पुरवासियों और मन्त्रियों ने ही इस राज्य पर मेरा अभिषेक कर दिया। मैंने स्वेच्छा से इस राज्य को नहीं ग्रहण किया है। अत: अज्ञानवश होने वाले मेरे इस अपराध को आप क्षमा करें। आप ही यहाँ के सम्माननीय राजा हैं और मैं सदा आपका पूर्ववत् सेवक हूँ। आपके वियोग से ही राजा के पद पर मेरी यह नियुक्ति की गयी। मन्त्रियों, पुरवासियों तथा नगर सहित आपका यह सारा अकंटक राज्य मेरे पास धरोहर के रूप में रखा था। अब इसे मैं आपकी सेवा में लौटा रहा हूँ।"
“सौम्य! शत्रुसूदन! आप मुझ पर क्रोध न करें। 'राजन्! मैं इसके लिये मस्तक झुकाकर प्रार्थना करता हूँ और हाथ जोड़ता हूँ। मन्त्रियों तथा पुरवासियों ने मिलकर जबर्दस्ती मुझे इस राज्य पर बिठाया है। वह भी इसलिये कि राजा रहित राज्य देखकर कोई शत्रु इसे जीतने की इच्छा से आक्रमण न कर बैठे।"
‘मैंने ये सारी बातें बड़े प्रेम से कही थीं, किंतु उस वानर ने मुझे डाँटकर कहा - "तुझे धिक्कार है"। यों कहकर उसने मुझे और भी बहुत-सी कठोर बातें सुनायीं। तत्पश्चात् उसने प्रजाजनों और सम्मान्य मन्त्रियों को बुलाया तथा सुहृदों के बीच में मेरे प्रति अत्यन्त निन्द वचन कहा।
‘वह बोला - "आप लोगों को मालूम होगा कि एक दिन रात में मेरे साथ युद्ध करने की इच्छा से मायावी नामक महान् असुर यहाँ आया था। उसने क्रोध में भरकर पहले मुझे युद्ध के लिये ललकारा। उसकी वह ललकार सुनकर मैं राजभवन से निकल पड़ा। उस समय यह क्रूर स्वभाव वाला मेरा भाई भी तुरंत ही मेरे पीछे-पीछे आया।"
“यद्यपि वह असुर बड़ा बलवान् था तथापि मुझे एक दूसरे सहायक के साथ देखते ही भयभीत हो उस रात में भाग चला। हम दोनों भाइयों को आते देख वह बड़े वेग से दौड़ा और एक विशाल गुफा में घुस गया। उस अत्यन्त भयंकर विशाल गुफा में उस असुर को घुसा हुआ जानकर मैंने अपने इस क्रूरदर्शी भाई से कहा - "सुग्रीव! इस शत्रु को मारे बिना मैं यहाँ से किष्किन्धा पुरी को लौट चलने में असमर्थ हूँ; अत: जब तक मैं इस असुर को मारकर लौटता हूँ, तब तक तुम इस गुफा के दरवाजे पर रहकर मेरी प्रतीक्षा करो।"
“ऐसा कहकर और ‘यह तो यहाँ खड़ा है ही' ऐसा विश्वास करके मैं उस अत्यन्त दुर्गम गुफा के भीतर प्रविष्ट हुआ। भीतर जाकर मैं उस दानव की खोज करने लगा और इसी में मेरा वहाँ एक वर्ष का समय व्यतीत हो गया। इसके बाद मैंने उस भयंकर शत्रु को देखा। इतने दिनों तक उसके न मिलने से मेरे मन में कोई क्लेश या उदासीनता नहीं हुई थी। मैंने उसे उसके समस्त बन्धु बान्धवों सहित तत्काल काल के गाल में डाल दिया।"
“उसके मुख से और छाती से भी भूतल पर रक्त का ऐसा प्रवाह जारी हुआ, जिससे वह सारी दुर्गम गुफा भर गयी। इस तरह उस पराक्रमी शत्रु का सुख पूर्वक वध करके जब मैं लौटा, तब मुझे निकलने का कोई मार्ग ही नहीं दिखायी देता था; क्योंकि बिल का दरवाजा बंद कर दिया गया था। मैंने 'सुग्रीव! सुग्रीव! कहकर बारंबार पुकारा, किंतु कोई उत्तर नहीं मिला। इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ।"
"मैंने बारंबार लात मारकर किसी तरह उस पत्थर को पीछे की ओर ढकेला । इसके बाद गुफाद्वार से निकलकर यहाँ की राह पकड़े मैं इस नगर में लौटा हूँ। यह सुग्रीव ऐसा क्रूर और निर्दयी है कि इसने भ्रातृ-प्रेम को भुला दिया और सारा राज्य अपने हाथ में कर लेने के लिये मुझे उस गुफा के अंदर बंद कर दिया था।"
‘ऐसा कहकर वानर राज वाली ने निर्भयता पूर्वक मुझे घर से निकाल दिया। उस समय मेरे शरीर पर एक ही वस्त्र रह गया था। रघुनन्दन ! उसने मुझे घर से तो निकाल ही दिया, मेरी स्त्री को भी छीन लिया। उसके भय से मैं वनों और समुद्रों सहित सारी पृथ्वी पर मारा-मारा फिरता रहा । अन्ततोगत्वा मैं भार्याहरण के दु:ख से दुःखी हो इस श्रेष्ठ पर्वत ऋष्यमूक पर चला आया; क्योंकि एक विशेष कारणवश वाली के लिये इस स्थान पर आक्रमण करना बहुत कठिन है।'
'रघुनाथजी! यही वाली के साथ मेरे वैर पड़ने की विस्तृत कथा है। यह सब मैंने आपको सुना दी । देखिये, बिना अपराध के ही मुझे यह सब संकट भोगना पड़ता है। वीरवर्! आप सम्पूर्ण जगत का भय दूर करने वाले हैं। मुझ पर कृपा कीजिये और वाली का दमन करके मुझे उसके भय से बचाइये।'
सुग्रीव के ऐसा कहने पर धर्म के ज्ञाता परम तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने उनसे हँसते हुए-से यह धर्मयुक्त वचन कहना आरम्भ किया - मित्र! ये मेरे सूर्य के समान तेजस्वी तीखे बाण अमोघ हैं, जो दुराचारी वाली पर रोषपूर्वक पड़ेंगे। जब तक तुम्हारी भार्या का अपहरण करने वाले उस वानर को मैं अपने सामने नहीं देखता हूँ तब तक सदाचार को कलंकित करने वाला वह पापात्मा वाली जीवन धारण कर ले। मैं अपने ही अनुमान से समझता हूँ कि तुम शोक के समुद्र में डूबे हुए हो। मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा। तुम अपनी पत्नी तथा विशाल राज्य को भी अवश्य प्राप्त कर लोगे।
श्रीराम का यह वचन हर्ष और पुरुषार्थ को बढ़ाने वाला था। उसे सुनकर सुग्रीव को बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर वे बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात कहने लगे।
