भाग-११(11) सुग्रीव का श्रीरामचन्द्रजी को वाली के साथ अपने वैर होने का कारण बताना

 


सुग्रीव ने श्रीराम को वाली के साथ वैर होने का यथार्थ कारण बताना आरम्भ किया - रघुनन्दन! वाली मेरे बड़े भाई हैं। उनमें शत्रुओं का संहार करने की शक्ति है। मेरे पिता ऋक्षरजा उनको वीर मानते थे। वैर से पहले मेरे मन में भी उनके प्रति आदर का भाव था। पिता की मृत्यु के पश्चात् मन्त्रियों ने उन्हें ज्येष्ठ समझकर वानरों का राजा बनाया। वे सबको बड़े प्रिय थे, इसीलिये किष्किन्धा के राज्य पर प्रतिष्ठित किये गये थे। वे पिता-पितामहों के विशाल राज्य का शासन करने लगे और मैं हर समय विनीतभाव से दास की भाँति उनकी सेवा में रहने लगा। 

‘उन दिनों मायावी नामक एक तेजस्वी दानव रहता था, जो मय दानव का पुत्र (रावण की पत्नी मंदोदरी का भाई) और दुन्दुभि का बड़ा भाई था। उसके साथ वाली का स्त्री के कारण बहुत बड़ा वैर हो गया था। एक दिन आधी रात के समय जब सब लोग सो गये, मायावी किष्किन्धा पुरी के दरवाजे पर आया और क्रोध से भरकर गर्जने तथा वाली को युद्ध के लिये ललकारने लगा।' 

‘उस समय मेरे भाई सो रहे थे। उसका भैरवनाद सुनकर उनकी नींद खुल गयी। उनसे उस राक्षस की ललकार सही नहीं गयी; अत: वे तत्काल वेगपूर्वक घर से निकले। जब वे क्रोध करके उस श्रेष्ठ असुर को मारने के लिये निकले, उस समय मैंने तथा अन्त: पुर की स्त्रियों ने पैरों पड़कर उन्हें जाने से रोका। परंतु महाबली वाली हम सबको हटाकर निकल पड़े, तब मैं भी स्नेहवश वाली के साथ ही बाहर निकला।  

‘उस असुर ने मेरे भाई को देखा तथा कुछ दूर पर खड़े हुए मेरे ऊपर भी उसकी दृष्टि पड़ी; फिर तो वह भय से थर्रा उठा और बड़े जोर से भागा। उसके भयभीत होकर भागने पर हम दोनों भाइयों ने बड़ी तेजी के साथ उसका पीछा किया। उस समय उदित हुए चन्द्रमा ने हमारे मार्ग को भी प्रकाशित कर दिया था। आगे जाने पर धरती में एक बहुत बड़ा बिल था, जो घास-फूस से ढका हुआ था। उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन था। वह असुर बड़े वेग से उस बिल में जा घुसा। वहाँ पहुँचकर हम दोनों ठहर गये।' 

'शत्रु को बिल के अंदर घुसा देख वाली के क्रोध की सीमा न रही। उनकी सारी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो उठीं और वे मुझसे इस प्रकार बोले - "सुग्रीव! जब तक मैं इस बिल के भीतर प्रवेश करके युद्ध में शत्रु को मारता हूँ, तब तक तुम आज इसके दरवाजे पर सावधानी से खड़े रहो।" 

'यह बात सुनकर मैंने शत्रुओं को संताप देने वाले वाली से स्वयं भी साथ चलने के लिये प्रार्थना की, किंतु वे अपने चरणों की सौगन्ध दिलाकर अकेले ही बिल में घुसे। बिल के भीतर गये हुए उन्हें एक साल से अधिक समय बीत गया और बिल के दरवाजे पर खड़े-खड़े मेरा भी उतना ही समय निकल गया। जब इतने दिनों तक मुझे भाई का दर्शन नहीं हुआ, तब मैंने समझा कि मेरे भाई इस गुफा में ही कहीं खो गये। उस समय भ्रातृस्नेह के कारण मेरा हृदय व्याकुल हो उठा। मेरे मन में उनके मारे जाने की शङ्का होने लगी।' 

'तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् उस बिल से सहसा फेन सहित खून की धारा निकली। उसे देखकर मैं बहुत दु:खी हो गया। इतने ही में गरजते हुए असुरों की आवाज भी मेरे कानों में पड़ी। युद्ध में लगे हुए मेरे बड़े भाई भी गरजना कर रहे थे, किंतु उनकी आवाज मैं नहीं सुन सका। इन सब चिह्नों को देखकर बुद्धि द्वारा विचार करने पर मैं इस निश्चय पर पहुँचा कि मेरे बड़े भाई मारे गये। फिर तो उस गुफा के दरवाजे पर मैंने पर्वत के समान एक पत्थर की चट्टान रख दी और उसे बंद करके भाई को जलाञ्जलि दे शोक से व्याकुल हुआ मैं किष्किन्धा पुरी में लौट आया।' 

'सखे! यद्यपि मैं इस यथार्थ बात को छिपा रहा था, तथापि मन्त्रियों ने यत्न करके सुन लिया। तब उन सबने मिलकर मुझे राज्य पर अभिषिक्त कर दिया। रघुनन्दन ! मैं न्यायपूर्वक राज्य का संचालन करने लगा। इसी समय अपने शत्रुभूत उस दानव को मारकर वानर राज वाली घर लौटे। लौटने पर मुझे राज्य पर अभिषिक्त हुआ देख उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। मेरे मन्त्रियों को उन्होंने कैद कर लिया और उन्हें कठोर बातें सुनायीं। 

'रघुवीर ! यद्यपि मैं स्वयं भी उस पापी को कैद करने में समर्थ था तो भी भाई के प्रति गुरुभाव होने के कारण मेरी बुद्धि में ऐसा विचार

नहीं हुआ। इस प्रकार शत्रु का वध करके मेरे भाई ने उस समय नगर में प्रवेश किया। उन महात्मा का सम्मान करते हुए मैंने यथोचित रूप से उनके चरणों में मस्तक झुकाया तो भी उन्होंने प्रसन्नचित्त से मुझे आशीर्वाद नहीं दिया। प्रभो! मैंने भाई के सामने झुककर अपने मस्तक के मुकुट से उनके दोनों चरणों का स्पर्श किया तो भी क्रोध के कारण वाली मुझ पर प्रसन्न नहीं हुए।' 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-११(11) समाप्त ! 

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