भाग-१०(10) सुग्रीव का श्रीराम से अपना दु:ख निवेदन करना और श्रीराम का उन्हें आश्वासन देते हुए दोनों भाइयों में वैर होने का कारण पूछना

 


श्रीरामचन्द्रजी की उस बात से सुग्रीव को बड़ा संतोष हुआ। वे हर्ष से भरकर लक्ष्मण के बड़े भाई शूरवीर श्रीरामचन्द्रजी से इस प्रकार बोले – भगवन्! इसमें संदेह नहीं कि देवताओं की मेरे ऊपर बड़ी कृपा है - मैं सर्वथा उनके अनुग्रह का पात्र हूँ; क्योंकि आप-जैसे गुणवान् महापुरुष मेरे सखा हो गये। प्रभो! निष्पाप श्रीराम ! आप जैसे सहायक के सहयोग से तो देवताओं का राज्य भी अवश्य ही प्राप्त किया जा सकता है; फिर अपने खोये हुए राज्य को पाना कौन बड़ी बात है। 

‘रघुनन्दन! अब मैं अपने बन्धुओं और सुहृदों के विशेष सम्मान का पात्र हो गया; क्योंकि आज रघुवंश के राजकुमार आप अग्नि को साक्षी बनाकर मुझे मित्र के रूप में प्राप्त हुए हैं। मैं भी आपके योग्य मित्र हूँ। इसका ज्ञान आपको धीरे-धीरे हो जायगा। इस समय आपके सामने मैं अपने गुणों का वर्णन करने में असमर्थ हूँ। आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ श्रीराम ! आप जैसे पुण्यात्मा महात्माओं का प्रेम और धैर्य अधिकाधिक बढ़ता और अविचल होता है। अच्छे स्वभाव वाले मित्र अपने घर के सोने-चाँदी अथवा उत्तम आभूषणों को अपने अच्छे मित्रों के लिये अविभक्त ही मानते हैं - उन मित्रों का अपने धन पर अपने ही समान अधिकार समझते हैं।' 

'अतएव मित्र धनी हो या दरिद्र, सुखी हो या दुःखी अथवा निर्दोष हो या सदोष, वह मित्र के लिये सबसे बड़ा सहायक होता है। अनघ! साधुपुरुष अपने मित्र का अत्यन्त उत्कृष्ट प्रेम देख आवश्यकता पड़ने पर उसके लिये धन, सुख और देश का भी परित्याग कर देते हैं।' 

यह सुनकर लक्ष्मी (दिव्य कान्ति) से उपलक्षित श्रीरामचन्द्रजी ने इन्द्रतुल्य तेजस्वी बुद्धिमान् लक्ष्मण के सामने ही प्रिय वचन बोलने वाले सुग्रीव से कहा – सखे! तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है। 

तदनन्तर (दूसरे दिन) महाबली श्रीराम और लक्ष्मण को खड़ा देख सुग्रीव ने वन में चारों ओर अपनी चञ्चल दृष्टि दौड़ायी। उस समय वानरराज ने पास ही एक साल का वृक्ष देखा, जिसमें थोड़े से ही सुन्दर पुष्प लगे हुए थे; परंतु उसमें पत्रों की बहुलता थी। उस वृक्ष पर मँडराते हुए भौरे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसकी एक डाली को जिसमें अधिक पत्ते थे और जो पुष्पों से सुशोभित थी, सुग्रीव ने तोड़ डाला और उसे श्रीराम के लिये बिछाकर वे स्वयं भी उनके साथ ही उस पर बैठ गये। 

उन दोनों को आसन पर विराजमान देख हनुमानजी ने भी साल की एक डाल तोड़ डाली और उस पर विनयशील लक्ष्मण को बैठाया। उस श्रेष्ठ पर्वत पर, जहाँ सब ओर साल के पुष्प बिखरे हुए थे, सुखपूर्वक बैठे हुए श्रीराम शान्त समुद्र के समान प्रसन्न दिखायी देते थे। उन्हें देखकर अत्यन्त हर्ष से भरे हुए सुग्रीव ने श्रीराम से स्निग्ध एवं सुन्दर वाणी में वार्तालाप आरम्भ किया। 

उस समय आनन्दातिरेक से उनकी वाणी लड़खड़ा जाती थी - अक्षरों का स्पष्ट उच्चारण नहीं हो पाता था। 

‘प्रभो! मेरे भाई ने मुझे घर से निकालकर मेरी स्त्री को भी छीन लिया है। मैं उसी के भय से अत्यन्त पीड़ित एवं दु:खी होकर इस पर्वतश्रेष्ठ ऋष्यमूक पर विचरता रहता हूँ। मुझे बराबर उसका त्रास बना रहता है। मैं भय में डूबा रहकर भ्रान्तचित्त हो इस वन में भटकता फिरता हूँ। रघुनन्दन! मेरे भाई बाली ने मुझे घर से निकालने के बाद भी मेरे साथ वैर बाँध रखा है। प्रभो! आप समस्त लोकों को अभय देनेवाले हैं। मैं वाली के भय से दुःखी और अनाथ हूँ, अत: आपको मुझ पर भी कृपा करनी चाहिये।' 

सुग्रीव के ऐसा कहने पर तेजस्वी, धर्मज्ञ एवं धर्मवत्सल भगवान् श्रीराम ने उन्हें हँसते हुए-से इस प्रकार उत्तर दिया - सखे! उपकार ही मित्रता का फल है और अपकार शत्रुता का लक्षण है; अत: मैं आज ही तुम्हारी स्त्री का अपहरण करने वाले उस वाली का वध करूँगा। महाभाग! मेरे इन बाणों का तेज प्रचण्ड है। सुवर्णभूषित ये शर कार्तिकेय की उत्पत्ति के स्थानभूत शरों के वन में उत्पन्न हुए हैं। (इसलिये अभेद्य हैं )। ये कंक पक्षी के परों से युक्त हैं और इन्द्र के वज्र की भाँति अमोघ हैं। इनकी गाँठें सुन्दर और अग्रभाग तीखे हैं। ये रोष में भरे भुजङ्गोंकी भाँति भयंकर हैं। इन बाणों से तुम अपने वाली नामक शत्रु को, जो भाई होकर भी तुम्हारी बुराई कर रहा है, विदीर्ण हुए पर्वत की भाँति मरकर पृथ्वी पर पड़ा देखोगे। 

श्रीरघुनाथजी की यह बात सुनकर वानर सेनापति सुग्रीव को अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई और वे उन्हें बारंबार साधुवाद देते हुए बोले – श्रीराम! मैं शोकसे पीड़ित हूँ और आप शोकाकुल प्राणियों की परमगति हैं। मित्र समझकर मैं आपसे अपना दु:ख निवेदन करता हूँ। मैंने आपके हाथ में हाथ देकर अग्निदेव के सामने आपको अपना मित्र बनाया है। इसलिये आप मुझे अपने प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं। यह बात मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ। आप मेरे मित्र हैं, इसलिये आप पर पूर्ण विश्वास करके मैं अपने भीतर का दु:ख, जो सदा मेरे मन को व्याकुल किये रहता है, आपको बता रहा हूँ। 

इतनी बात कहते-कहते सुग्रीव के नेत्रों में आँसू भर आये। उनकी वाणी अश्रुगद्गद हो गयी। इसलिये वे उच्च स्वर से बोलने में समर्थ न हो सके। तत्पश्चात् सुग्रीव ने सहसा बढ़े हुए नदी के वेग के समान उमड़े हुए आँसुओं के वेग को श्रीराम के समीप धैर्यपूवर्क रोका। 

आँसुओं को रोककर अपने दोनों सुन्दर नेत्रों को पोंछने के पश्चात् तेजस्वी सुग्रीव पुनः लंबी साँस खींचकर श्रीरघुनाथजी से बोले – श्रीराम ! पहले की बात है, बलिष्ठ वाली ने कटुवचन सुनाकर बलपूर्वक मेरा तिरस्कार किया और अपने राज्य (युवराज पद) से नीचे उतार दिया। इतना ही नहीं, मेरी स्त्री को भी, जो मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है; उसने छीन लिया और जितने मेरे सुहृद् थे, उन सबको कैद में डाल दिया। रघुनन्दन! इसके बाद भी वह दुरात्मा वाली मेरे विनाश के लिये यत्न करता रहता है। उसके भेजे हुए बहुत-से वानरों का मैं वध कर चुका हूँ। 

'रघुनाथजी! आपको भी देखकर मेरे मन में ऐसा ही संदेह हुआ था, इसीलिये डर जाने के कारण मैं पहले आपके पास न आ सका; क्योंकि भय का अवसर आने पर प्राय: सभी डर जाते हैं। केवल ये हनुमान् आदि वानर ही मेरे सहायक हैं; अतएव महान् संकट में पड़कर भी मैं अब तक प्राण धारण करता हूँ। इन लोगों का मुझ पर स्नेह है, अत: ये सभी वानर सब ओर से सदा मेरी रक्षा करते रहते हैं। जहाँ जाना होता है। वहाँ साथ-साथ जाते हैं और जब कहीं मैं ठहर जाता हूँ वहाँ ये नित्य मेरे साथ रहते हैं।' 

‘रघुनन्दन! यह मैंने संक्षेप से अपनी हालत बतलायी है। आपके सामने विस्तारपूर्वक कहने से क्या लाभ? वाली मेरा ज्येष्ठ भाई है, फिर भी इस समय मेरा शत्रु हो गया है। उसका पराक्रम सर्वत्र विख्यात है। (यद्यपि भाईका नाश भी दुःखका ही कारण है, तथापि ) इस समय जो मेरा दुःख है, वह उसका नाश होने पर ही मिट सकता है। मेरा सुख और जीवन उसके विनाश पर ही निर्भर है। श्रीराम ! यही मेरे शोक के नाश का उपाय है। मैंने शोक से पीड़ित होने के कारण आपसे यह बात निवेदन की है; क्योंकि मित्र दुःख में हो या सुखमें, वह अपने मित्र की सदा ही सहायता करता है।' 

यह सुनकर श्रीराम ने सुग्रीव से कहा – तुम दोनों भाइयों में वैर पड़ने का क्या कारण है, यह मैं ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ। वानरराज! तुम लोगों की शत्रुता का कारण सुनकर तुम दोनों की प्रबलता और निर्बलता का निश्चय करके फिर तत्काल ही तुम्हें सुखी बनाने वाला उपाय करूँगा। जैसे वर्षाकाल में नदी आदि का वेग बहुत बढ़ जाता है, उसी प्रकार तुम्हारे अपमानित होने की बात सुनकर मेरा प्रबल रोष बढ़ता जा रहा है और मेरे हृदय को कम्पित किये देता है। मेरे धनुष चढ़ाने के पहले ही तुम अपनी सब बातें प्रसन्नता पूर्वक कह डालो; क्योंकि ज्यों ही मैंने बाण छोड़ा, तुम्हारा शत्रु तत्काल काल के गाल में चला जायगा। 

महात्मा श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर सुग्रीव को अपने चारों वानरों के साथ अपार हर्ष हुआ। तदनन्तर सुग्रीव के मुख पर प्रसन्नता छा गयी और उन्होंने श्रीराम को वाली के साथ वैर होने का यथार्थ कारण बताना आरम्भ किया। 

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-१०(10) समाप्त ! 

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