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भाग - ६१(61) श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा सीता की खोज, सीता के बिखरे हुए फूल, आभूषणों के कण और युद्ध के चिह्न देखकर श्रीराम का देवता आदि सहित समस्त त्रिलोकी पर रोष प्रकट करना

भाग-६२(62) लक्ष्मण का श्रीराम को समझा-बुझाकर शान्त करना

भाग-६३(63) श्रीराम और लक्ष्मण की पक्षिराज जटायु से भेंट तथा श्रीराम का उन्हें गले से लगाकर रोना, जटायु का प्राण त्याग और श्रीराम द्वारा उनका दाह संस्कार

भाग-६४(64) लक्ष्मण का अयोमुखी को दण्ड देना तथा श्रीराम और लक्ष्मण का कबन्ध के बाहुबन्ध में पड़कर चिन्तित होना 

भाग-६५(65) श्रीराम और लक्ष्मण का परस्पर विचार करके कबन्ध की दोनों भुजाओं को काट डालना, कबन्ध की आत्मकथा, अपने शरीर का दाह हो जाने पर उसका श्रीराम को सीता के अन्वेषण में सहायता देने का आश्वासन

भाग-६६(66) श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा चिता की आग में कबन्ध का दाह तथा उसका दिव्य रूप में प्रकट होकर उन्हें सुग्रीव से मित्रता करने के लिये कहना

भाग-६७(67) दिव्य रूप धारी कबन्ध का श्रीराम और लक्ष्मण को ऋष्यमूक और पम्पासरोवर का मार्ग बताना तथा मतङ्गमुनि के वन एवं आश्रम का परिचय देकर प्रस्थान करना

भाग-६८(68) श्रीराम और लक्ष्मण का शबरी के आश्रम पर जाना, उसका सत्कार ग्रहण करना, श्रीराम द्वारा नवधा भक्ति का उपदेश, शबरी का अपने शरीर की आहुति दे दिव्यधाम को प्रस्थान करना

भाग-६९(69) श्रीराम और लक्ष्मण की बातचीत तथा उन दोनों भाइयों का पम्पासरोवर के तट पर जाना

॥ अरण्यकाण्ड समाप्त ॥



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