अपने तेज से प्रकाशित होने वाली शबरी के दिव्यलोक में चले जाने पर भाई लक्ष्मण सहित धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी ने उन महात्मा महर्षियों के प्रभाव का चिन्तन किया।
चिन्तन करके अपने हित में संलग्न रहने वाले एकाग्रचित्त लक्ष्मण से श्रीराम ने इस प्रकार कहा – सौम्य! मैंने उन पुण्यात्मा महर्षियों का यह पवित्र आश्रम देखा। यहाँ बहुत-सी आश्चर्यजनक बातें हैं। हिरण और बाघ एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं। नाना प्रकार के पक्षी इस आश्रम का सेवन करते हैं। लक्ष्मण! यहाँ जो सातों समुद्रों के जल से भरे हुए तीर्थ हैं, उनमें हमने विधिपूर्वक स्नान तथा पितरों का तर्पण किये हैं। इससे हमारा सारा अशुभ नष्ट हो गया और अब हमारे कल्याण का समय उपस्थित हुआ है। सुमित्राकुमार! इससे इस समय मेरे मन में अधिक प्रसन्नता हो रही है।
‘नरश्रेष्ठ! अब मेरे हृदय में कोई शुभ संकल्प उठने वाला है। इसलिये आओ, अब हम दोनों परम सुन्दर पम्पासरोवर के तट पर चलें। वहाँ से थोड़ी ही दूर पर वह ऋष्यमूक पर्वत शोभा पाता है, जिस पर सूर्यपुत्र धर्मात्मा सुग्रीव निवास करते हैं। वाली के भय से सदा डरे रहने के कारण वे चार वानरों के साथ उस पर्वत पर रहते हैं। मैं वानर श्रेष्ठ सुग्रीव से मिलने के लिये उतावला हो रहा हूँ; क्योंकि सीता के अन्वेषण का कार्य उन्हीं के अधीन है।'
इस प्रकार की बात कहते हुए वीर श्रीराम से सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने यों कहा - भैया ! हम दोनों को शीघ्र ही वहाँ चलना चाहिये। मेरा मन भी चलने के लिये उतावला हो रहा है।
तदनन्तर प्रजापालक भगवान् श्रीराम लक्ष्मण के साथ उस आश्रम से निकलकर सब ओर फूलों से लदे हुए नाना प्रकार के वृक्षों की शोभा निहारते हुए पम्पा सरोवर के तट पर आये। वह विशाल वन टिट्टिभों, मोरों, कठफोड़वों, तोतों तथा अन्य बहुत-से पक्षियों के कलरवों से गूंज रहा था। श्रीराम के मन में सीताजी से मिलने की तीव्र लालसा जाग उठी थी, इससे संतप्त हो वे नाना प्रकार के वृक्षों और भाँति-भाँति के सरोवरों की शोभा देखते हुए उस उत्तम जलाशय के पास गये।
पम्पानाम से प्रसिद्ध वह सरोवर पीने योग्य स्वच्छ जल बहाने वाला था। श्रीराम दूर देश से चलकर उसके तट पर आये। आकर उन्होंने मतंग सरस नामक कुण्ड में स्नान किया। वे दोनों रघुवंशी वीर वहाँ शान्त और एकाग्रचित्त होकर पहुँचे थे। सीता के शोक से व्याकुल हुए दशरथनन्दन श्रीराम ने उस रमणीय पुष्करिणी पम्पा में प्रवेश किया, जो कमलों से व्याप्त थी। उसके तट पर तिलक, अशोक, नागकेसर, वकुल तथा लिसोड़े के वृक्ष उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। भाँति-भाँति के रमणीय उपवनों से वह घिरी हुई थी। उसका जल कमलपुष्पों से आच्छादित था और स्फटिक मणि के समान स्वच्छ दिखायी देता था।
जल के नीचे स्वच्छ वालुका फैली हुई थी। मत्स्य और कच्छप उसमें भरे हुए थे। तटवर्ती वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे। सब ओर लताओं द्वारा आवेष्टित होने के कारण वह सखियों से संयुक्त-सी प्रतीत होती थी। किन्नर, नाग, गन्धर्व, यक्ष और राक्षस उसका सेवन करते थे। भाँति-भाँति के वृक्ष और लताओं से व्याप्त हुई पम्पा शीतल जल की सुन्दर निधि प्रतीत होती थी। अरुण कमलों से वह ताम्रवर्ण की, कुमुद-कुसुमों के समूह से शुक्लवर्ण की तथा नील कमलों के समुदाय से नीलवर्ण की दिखायी देने के कारण बहुरंगे कालीन के समान शोभा पाती थी।
उस पुष्करिणी में अरविन्द और उत्पल खिले थे। पद्म और सौगन्धिक जाति के पुष्प शोभा पाते थे। मौर लगी हुई अमराइयों से वह घिरी हुई थी तथा मयूरों के केकानाद वहाँ गूँज रहे थे। सुमित्राकुमार लक्ष्मण सहित श्रीराम ने जब उस मनोहर पम्पा को देखा, तब उनके हृदय में सीता की वियोग- व्यथा उद्दीप्त हो उठी, अत: वे तेजस्वी दशरथनन्दन श्रीराम वहाँ विलाप करने लगे।
प्रभु विरही की तरह विषाद करते हुए अनेकों कथाएँ और संवाद कहते हैं - हे लक्ष्मण! जरा वन की शोभा तो देखो। इसे देखकर किसका मन क्षुब्ध नहीं होगा? पक्षी और पशुओं के समूह सभी स्त्री सहित हैं। मानो वे मेरी निंदा कर रहे हैं। हमें देखकर (जब डर के मारे) हिरनों के झुंड भागने लगते हैं, तब हिरनियाँ उनसे कहती हैं- तुमको भय नहीं है। तुम तो साधारण हिरनों से पैदा हुए हो, अतः तुम आनंद करो। ये तो सोने का हिरण खोजने आए हैं।
'हाथी हथिनियों को साथ लगा लेते हैं। वे मानो मुझे शिक्षा देते हैं (कि स्त्री को कभी अकेली नहीं छोड़ना चाहिए)। भलीभाँति चिंतन किए हुए शास्त्र को भी बार-बार देखते रहना चाहिए। अच्छी तरह सेवा किए हुए भी राजा को वश में नहीं समझना चाहिए और स्त्री को चाहे हृदय में ही क्यों न रखा जाए, परन्तु युवती स्त्री, शास्त्र और राजा किसी के वश में नहीं रहते।'
'हे तात! इस सुंदर वसंत को तो देखो। प्रिया के बिना मुझको यह भय उत्पन्न कर रहा है। मुझे विरह से व्याकुल, बलहीन और बिलकुल अकेला जानकर कामदेव ने वन, भौंरों और पक्षियों को साथ लेकर मुझ पर धावा बोल दिया। परन्तु जब उसका दूत यह देख गया कि मैं भाई के साथ हूँ (अकेला नहीं हूँ), तब उसकी बात सुनकर कामदेव ने मानो सेना को रोककर डेरा डाल दिया है।'
'अनेकों वृक्ष नाना प्रकार से फूले हुए हैं। मानो अलग-अलग बाना (वर्दी) धारण किए हुए बहुत से तीरंदाज हों। कहीं-कहीं सुंदर वृक्ष शोभा दे रहे हैं। मानो योद्धा लोग अलग-अलग होकर छावनी डाले हों। अनेकों वृक्ष नाना प्रकार से फूले हुए हैं। मानो अलग-अलग बाना (वर्दी) धारण किए हुए बहुत से तीरंदाज हों। कहीं-कहीं सुंदर वृक्ष शोभा दे रहे हैं। मानो योद्धा लोग अलग-अलग होकर छावनी डाले हों।'
'कोयलें कूज रही हैं, वही मानो मतवाले हाथी (चिग्घाड़ रहे) हैं। ढेक और महोख पक्षी मानो ऊँट और खच्चर हैं। मोर, चकोर, तोते, कबूतर और हंस मानो सब सुंदर ताजी (अरबी) घोड़े हैं। तीतर और बटेर पैदल सिपाहियों के झुंड हैं। कामदेव की सेना का वर्णन नहीं हो सकता। पर्वतों की शिलाएँ रथ और जल के झरने नगाड़े हैं। पपीहे भाट हैं, जो गुणसमूह (विरुदावली) का वर्णन करते हैं। भौंरों की गुंजार भेरी और शहनाई है। शीतल, मंद और सुगंधित हवा मानो दूत का काम लेकर आई है। इस प्रकार चतुरंगिणी सेना साथ लिए कामदेव मानो सबको चुनौती देता हुआ विचर रहा है।'
'हे लक्ष्मण! कामदेव की इस सेना को देखकर जो धीर बने रहते हैं, जगत् में उन्हीं की (वीरों में) प्रतिष्ठा होती है। इस कामदेव के एक स्त्री का बड़ा भारी बल है। उससे जो बच जाए, वही श्रेष्ठ योद्धा है। हे तात! काम, क्रोध और लोभ- ये तीन अत्यंत दुष्ट हैं। ये विज्ञान के धाम मुनियों के भी मनों को पलभर में क्षुब्ध कर देते हैं। लोभ को इच्छा और दम्भ का बल है, काम को केवल स्त्री का बल है और क्रोध को कठोर वचनों का बाल है, श्रेष्ठ मुनि विचार कर ऐसा कहते हैं।'
(शिवजी कहते हैं - हे पार्वती! श्री रामचंद्रजी गुणातीत (तीनों गुणों से परे), चराचर जगत् के स्वामी और सबके अंतर की जानने वाले हैं। (उपर्युक्त बातें कहकर) उन्होंने कामी लोगों की दीनता (बेबसी) दिखलाई है और धीर (विवेकी) पुरुषों के मन में वैराग्य को दृढ़ किया है। क्रोध, काम, लोभ, मद और माया- ये सभी श्री रामजी की दया से छूट जाते हैं। वह नट (नटराज भगवान्) जिस पर प्रसन्न होता है, वह मनुष्य इंद्रजाल (माया) में नहीं भूलता। हे उमा! मैं तुम्हें अपना अनुभव कहता हूँ- हरि का भजन ही सत्य है, यह सारा जगत् तो स्वप्न (की भाँति झूठा) है।)
तिलक, बिजौरा, वट, लोध, खिले हुए करवीर, पुष्पित नागकेसर, मालती, कुन्द, झाड़ी, भंडीर (बरगद), वञ्जुल, अशोक, छितवन, कतक, माधवी लता तथा अन्य नाना प्रकार के वृक्षों से सुशोभित हुई पम्पा भाँति-भाँति की वस्त्रभूषाओं से सजी हुई युवती के समान जान पड़ती थी। उसी के तट पर विविध धातुओं से मण्डित पूर्वोक्त ऋष्यमूक नाम से विख्यात पर्वत सुशोभित था। उसके ऊपर फूलों से भरे हुए विचित्र वृक्ष शोभा दे रहे थे।
ऋक्षरजा नामक महात्मा वानर के पुत्र कपिश्रेष्ठ महापराक्रमी सुग्रीव वहीं निवास करते थे।
उस समय सत्यपराक्रमी श्रीराम ने पुनः लक्ष्मण से कहा – नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ! तुम वानरराज सुग्रीव के पास चलो, मैं सीता बिना कैसे जीवित रह सकता हूँ।
ऐसा कहकर सीता के दर्शन की कामना से पीड़ित तथा उनके प्रति अनन्य अनुराग रखने वाले श्रीराम उस महान् शोक को प्रकट करते हुए उस मनोरम पुष्करिणी पम्पा में उतरे। वन की शोभा देखते हुए क्रमश: वहाँ जाकर लक्ष्मण सहित श्रीराम ने पम्पा को देखा। उसके समीपवर्ती कानन बड़े सुन्दर और दर्शनीय थे। अनेक प्रकार के झुंड के झुंड पक्षी वहाँ सब ओर भरे हुए थे। भाई सहित श्रीरघुनाथजी ने पम्पा के जल में प्रवेश किया।
(जो लोग रावण के शत्रु श्री रामजी का पवित्र यश गावेंगे और सुनेंगे, वे वैराग्य, जप और योग के बिना ही श्री रामजी की दृढ़ भक्ति पावेंगे। युवती स्त्रियों का शरीर दीपक की लौ के समान है, हे मन! तू उसका पतिंगा न बन। काम और मद को छोड़कर श्री रामचंद्रजी का भजन कर और सदा सत्संग कर)
इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का
