इस प्रकार माता की निन्दा करके भरत उस समय महान् रोषावेश से भर गये और फिर कठोर वाणी में कहने लगे - दृष्टतापूर्ण बर्ताव करने वाली क्रूरहृदया कैकेयी! तू राज्य से भ्रष्ट हो जा। धर्म ने तेरा परित्याग कर दिया है, अत: अब तू मरे हुए महाराज के लिये रोना मत, (क्योंकि तू पत्नीधर्म से गिर चुकी है) अथवा मुझे मरा हुआ समझकर तू जन्मभर पुत्र के लिये रोया कर। श्रीराम ने अथवा अत्यन्त धर्मात्मा महाराज (पिताजी) ने तेरा क्या बिगाड़ा था, जिससे एक साथ ही उन्हें तुम्हारे कारण वनवास और मृत्यु का कष्ट भोगना पड़ा?
'कैकेयी! तूने इस कुल का विनाश करने के कारण भ्रूणहत्या का पाप अपने सिर पर लिया है, इसलिये तू नरक में जा और पिताजी का लोक तुझे न मिले। तूने इस घोर कर्म के द्वारा समस्त लोकों के प्रिय श्रीराम को देशनिकाला देकर जो ऐसा बड़ा पाप किया है, उसने मेरे लिये भी भय उपस्थित कर दिया है। तेरे कारण मेरे पिता की मृत्यु हुई, श्रीराम को वन का आश्रय लेना पड़ा और मुझे भी तूने इस जीव जगत में अपयश का भागी बना दिया।'
‘राज्य के लोभ में पड़कर क्रूरतापूर्ण कर्म करने वाली दुराचारिणी पतिघातिनि! तू माता के रूप में मेरी शत्रु है। तुझे मुझसे बात नहीं करनी चाहिये। कौशल्या, सुमित्रा तथा जो अन्य मेरी माताएँ हैं, वे सब तुझ कुलकलङ्किनी के कारण महान् दुःख में पड़ गयी हैं। तू बुद्धिमान् धर्मराज अश्वपति की कन्या नहीं है। तू उनके कुल में कोई राक्षसी पैदा हो गयी है, जो पिता के वंश का विध्वंस करनेवाली है।'
'तूने सदा सत्य में तत्पर रहनेवाले धर्मात्मा वीर श्रीराम को जो वन में भेज दिया और तेरे कारण जो मेरे पिता स्वर्गवासी हो गये, इन सब कुकृत्यों द्वारा तूने प्रधान रूप से जिस पाप का अर्जन किया है, वह पाप मुझमें आकर अपना फल दिखा रहा है; इसलिये मैं पितृहीन हो गया, अपने दो भाइयों से बिछुड़ गया और समस्त जगत के लोगों के लिये अप्रिय बन गया। पापपूर्ण विचार रखने वाली नरकगामिनी कैकेयी! धर्मपरायणा माता कौशल्या को पति और पुत्र से वञ्चित करके अब तू किस लोक में जायगी?'
‘क्रूरहृदये! कौशल्या पुत्र श्रीराम मेरे बड़े भाई और पिता के तुल्य हैं। वे जितेन्द्रिय और बन्धुओं के आश्रयदाता हैं। क्या तू उन्हें इस रूप में नहीं जानती है ? पुत्र माता के अङ्ग-प्रत्यङ्ग और हृदय से उत्पन्न होता है, इसलिये वह माता को अधिक प्रिय होता है। अन्य भाई-बन्धु केवल प्रिय ही होते हैं (किंतु पुत्र प्रियतर होता है)।'
‘एक समय की बात है कि धर्म को जानने वाली देव- सम्मानित सुरभि (कामधेनु ) ने पृथ्वी पर अपने दो पुत्रों को देखा, जो हल जोतते जोतते अचेत हो गये थे। मध्याह्न का समय होने तक लगातार हल जोतने से वे बहुत थक गये थे। पृथ्वी पर अपने उन दोनों पुत्रों को ऐसी दुर्दशा में पड़ा देख सुरभि पुत्रशोक से रोने लगी। उसके नेत्रों में आँसू उमड़ आये। उसी समय महात्मा देवराज इन्द्र सुरभि के नीचे से होकर कहीं जा रहे थे। उनके शरीर पर कामधेनु के दो बूँद सुगन्धित आँसू गिर पड़े। जब इन्द्र ने ऊपर दृष्टि डाली, तब देखा - आकाश में सुरभि खड़ी हैं और अत्यन्त दु:खी हो दीनभाव से रो रही हैं।
'यशस्विनी सुरभि को शोक से संतप्त हुई देख वज्रधारी देवराज इन्द्र उद्विग्न हो उठे और हाथ जोड़कर बोले - सबका हित चाहने वाली देवी ! हम लोगों पर कहीं से कोई महान् भय तो नहीं उपस्थित हुआ है? बताओ, किस कारण से तुम्हें यह शोक प्राप्त हुआ है?'
‘बुद्धिमान् देवराज इन्द्र के इस प्रकार पूछने पर बोलने में चतुर और धीरस्वभाववाली सुरभि ने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया - देवेश्वर! आप शान्त हो। तुम लोगों पर कहीं से कोई भय नहीं है। मैं तो अपने इन दोनों पुत्रों को विषम अवस्था (घोर सङ्कट) में मग्न हुआ देख शोक कर रही हूँ। ये दोनों बैल अत्यन्त दुर्बल और दु:खी हैं, सूर्य की किरणों से बहुत तप गये हैं और ऊपर से वह दुष्ट किसान इन्हें पीट रहा है। मेरे शरीर से इनकी उत्पत्ति हुई है। ये दोनों भार से पीड़ित और दु:खी हैं, इसीलिये इन्हें देखकर मैं शोक संतप्त हो रही हूँ; क्योंकि पुत्र के समान प्रिय दूसरा कोई नहीं है।'
‘जिनके सहस्रों पुत्रों से यह सारा जगत् भरा हुआ है, उन्हीं कामधेनु को इस तरह रोती देख इन्द्र ने यह माना कि पुत्र से बढ़कर और कोई नहीं है। देवेश्वर इन्द्र ने अपने शरीर पर उस पवित्र गन्ध वाले अश्रुपात को देखकर देवी सुरभि को इस जगत में सबसे श्रेष्ठ माना। जिनका चरित्र समस्त प्राणियों के लिये समान रूप से हितकर और अनुपम है, जो अभीष्ट दानरूप ऐश्वर्यशक्ति से सम्पन्न, सत्यरूप प्रधान गुण से युक्त तथा लोकरक्षा की कामना से कार्य में प्रवृत्त होने वाली हैं और जिनके सहस्रों पुत्र हैं, वे कामधेनु भी जब अपने दो पुत्रों के लिये उनके स्वाभाविक चेष्टा में रत होने पर भी कष्ट पाने के कारण शोक करती हैं तब जिनके एक ही पुत्र है, वे माता कौशल्या श्रीराम के बिना कैसे जीवित रहेंगी ?'
'इकलौते बेटे वाली इन सती-साध्वी कौशल्या का तूने उनके पुत्र से बिछोह करा दिया है, इसलिये तू सदा ही इस लोक और परलोक में भी दुःख ही पायेगी। मैं तो यह राज्य लौटाकर भाई की पूजा करूँगा और यह सारा अन्त्येष्टि संस्कार आदि करके पिता का भी पूर्णरूप से पूजन करूँगा तथा नि:संदेह मैं वही कर्म करूँगा, जो (तेरे दिये हुए कलङ्क को मिटाने वाला और) मेरे यश को बढ़ानेवाला हो।'
‘महाबली महाबाहु कोसलनरेश श्रीराम को यहाँ लौटा लाकर मैं स्वयं ही मुनिजन सेवित वन में प्रवेश करूँगा। पापपूर्ण संकल्प करने वाली पापिनि! पुरवासी मनुष्य आँसू बहाते हुए अवरुद्धकण्ठ हो मुझे देखें और मैं तेरे किये हुए इस पाप का बोझ ढोता रहूँ — यह मुझसे नहीं हो सकता। अब तू जलती आग में प्रवेश कर जा, या स्वयं दण्डकारण्य में चली जा अथवा गले में रस्सी बाँधकर प्राण दे दे, इसके सिवा तेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है। सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी जब अयोध्या की भूमि पर पदार्पण करेंगे, तभी मेरा कलङ्क दूर होगा और तभी मैं कृतकृत्य होऊँगा।'
यह कहकर भरत वन में तोमर और अंकुश द्वारा पीड़ित किये गये हाथी की भाँति मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और क्रोध में भरकर फुफकारते हुए साँप की भाँति लम्बी साँस खींचने लगे। शत्रुओं को तपाने वाले राजकुमार भरत उत्सव समाप्त होने पर नीचे गिराये गये शची पति इन्द्र के ध्वज की भाँति उस समय पृथ्वी पर पड़े थे, उनके नेत्र क्रोध से लाल हो गये थे, वस्त्र ढीले पड़ गये थे और सारे आभूषण टूटकर बिखर गये थे।
इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-६८(68) समाप्त !

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