भाग-६७(67) दिव्य रूप धारी कबन्ध का श्रीराम और लक्ष्मण को ऋष्यमूक और पम्पासरोवर का मार्ग बताना तथा मतङ्गमुनि के वन एवं आश्रम का परिचय देकर प्रस्थान करना

 


श्रीराम को सीता की खोज का उपाय दिखाकर अर्थवेत्ता कबन्ध ने उनसे पुन: यह प्रयोजन युक्त बात कही - श्रीराम! यहाँ से पश्चिम दिशा का आश्रय लेकर जहाँ ये फूलों से भरे हुए मनोरम वृक्ष शोभा पा रहे हैं, यही आपके जाने लायक सुखद मार्ग है। जामुन, प्रियाल (चिरौंजी ), कटहल, बड़, पाकड़, तेंदू, पीपल, कनेर, आम तथा अन्य वृक्ष, धव, नागकेसर, तिलक, नक्तमाल, नील, अशोक, कदम्ब, खिले हुए करवीर, भिलावा, अशोक, लाल चन्दन तथा मन्दार - ये वृक्ष मार्ग में पड़ेंगे। आप दोनों भाई इनकी डालियों को बलपूर्वक भूमि पर झुकाकर अथवा इन वृक्षों पर चढ़कर इनके अमृत तुल्य मधुर फलों का आहार करते हुए यात्रा कीजियेगा। 

'काकुत्स्थ! खिले हुए वृक्षों से सुशोभित उस वन को लाँघकर आप लोग एक दूसरे वन में प्रवेश कीजियेगा, जो नन्दनवन के समान मनोहर है। उस वन के वृक्ष उत्तर कुरुवर्ष के वृक्षों की भाँति मधु की धारा बहाने वाले हैं तथा उनमें सभी ऋतुओं में सदा फल लगे रहते हैं। चैत्ररथ वन की भाँति उस मनोहर कानन में सभी ऋतुएँ निवास करती हैं। वहाँ के वृक्ष बड़ी-बड़ी शाखा धारण करने वाले तथा फलों के भार से झुके हुए हैं।' 

‘वे वहाँ सब ओर मेघों और पर्वतों के समान शोभा पाते हैं। लक्ष्मण उन वृक्षों पर चढ़कर अथवा सुखपूर्वक उन्हें पृथ्वी पर झुकाकर उनके अमृत तुल्य मधुर फल आपको देंगे। इस प्रकार सुन्दर पर्वतों पर भ्रमण करते हुए आप दोनों भाई एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर तथा एक वन से दूसरे वन में पहुँचेंगे और इस तरह अनेक पर्वतों तथा वनों को लाँघते हुए आप दोनों वीर पम्पा नामक पुष्करिणी के तट पर पहुँच जायेंगे।' 

‘श्रीराम! वहाँ कंकड़ का नाम नहीं है। उसके तट पर पैर फिसलने लायक कीचड़ आदि नहीं है। उसके घाट की भूमि सब ओर से बराबर है - ऊँची नीची या ऊबड़-खाबड़ नहीं है। उस पुष्करिणी में सेवार का सर्वथा अभाव है। उसके भीतर की भूमि वालुका पूर्ण है। कमल और उत्पल उस सरोवर की शोभा बढ़ाते हैं।' 

‘रघुनन्दन! वहाँ पम्पा के जल में विचरने वाले हंस, कारण्डव, क्रौञ्च और कुरर सदा मधुर स्वर में कूजते रहते हैं। वे मनुष्यों को देखकर उद्विग्न नहीं होते हैं। क्योंकि किसी मनुष्य के द्वारा किसी पक्षी का वध भी हो सकता है, ऐसे भय का उन्हें अनुभव नहीं है। ये सभी पक्षी बड़े सुन्दर हैं। बाणों के अग्रभाग से जिनके छिलके छुड़ा दिये गये हैं, अतएव जिनमें एक भी काँटा नहीं रह गया है, जो घी के लोदे के समान चिकने तथा आर्द्र हैं - सूखे नहीं हैं, जिन्हें लोहमय बाणों के अग्रभाग में गूँथकर आग में सेका और पकाया गया है, ऐसे फल-मूल के ढेर वहाँ भक्ष्य पदार्थ के रूप में उपलब्ध होंगे।' 

'आपके प्रति भक्तिभाव से सम्पन्न लक्ष्मण आपको वे भक्ष्य पदार्थ अर्पित करेंगे। आप दोनों भाई उन पदार्थों को लेकर उस सरोवर के मोटे-मोटे सुप्रसिद्ध जलचर पक्षियों तथा श्रेष्ठ रोहित (रोहू), वक्रतुण्ड और नलमीन आदि मत्स्यों को थोड़ा-थोड़ा करके खिलाइयेगा (इससे आपका मनोरञ्जन होगा)। जिस समय आप पम्पासरोवर की पुष्पराशि के समीप मछलियों को भोजन कराने की क्रीड़ा में अत्यन्त संलग्न होंगे, उस समय लक्ष्मण उस सरोवर का कमल की गन्ध से सुवासित, कल्याणकारी, सुखद, शीतल, रोगनाशक, क्लेशहारी तथा चाँदी और स्फटिकमणि के समान स्वच्छ जल कमल के पत्ते में निकालकर लायेंगे और आपको पिलायेंगे।' 

'श्रीराम ! सायंकाल में आपके साथ विचरते हुए लक्ष्मण आपको उन मोटे-मोटे वनचारी वानरों का दर्शन करायेंगे, जो पर्वतों की गुफाओं में सोते और रहते हैं। नरश्रेष्ठ! वे वानर पानी पीने के लोभ से पम्पा के तट पर आकर साँड़ों के समान गर्जते हैं। उनके शरीर मोटे और रंग पीले होते हैं। आप उन सबको वहाँ देखेंगे। श्रीराम! सायंकाल में चलते समय आप बड़ी-बड़ी शाखावाले, पुष्पधारी वृक्षों तथा पम्पा के शीतल जल का दर्शन करके अपना शोक त्याग देंगे।' 

‘रघुनन्दन! वहाँ फूलों से भरे हुए तिलक और नक्तमाल के वृक्ष शोभा पाते हैं तथा जल के भीतर उत्पल और कमल फूले हुए दिखायी देते हैं। रघुनन्दन ! कोई भी मनुष्य वहाँ उन फूलों को उतारकर धारण नहीं करता है। (क्योंकि वहाँ तक किसी की पहुँच ही नहीं हो पाती है। पम्पासरोवर के फूल न तो मुरझाते हैं और न झरते ही हैं। कहते हैं, वहाँ पहले मतंग मुनि के शिष्य ऋषिगण निवास करते थे, जिनका चित्त सदा एकाग्र एवं शान्त रहता था। वे अपने गुरु मतंग मुनि के लिये जब जंगली फल- मूल ले आते और उनके भार से थक जाते, तब उनके शरीर से पृथ्वी पर पसीनों की जो बूँदें गिरती थीं, वे ही उन मुनियों की तपस्या के प्रभाव से तत्काल फूल के रूप में परिणत हो जाती थीं।' 

राघव! पसीनों की बूँदों से उत्पन्न होने के कारण वे फूल नष्ट नहीं होते हैं। वे सब-के-सब ऋषि तो अब चले गये; किंतु उनकी सेवा में रहने वाली तपस्विनी शबरी आज भी वहाँ दिखायी देती है। काकुत्स्थ! शबरी चिरजीवनी होकर सदा धर्म के अनुष्ठान में लगी रहती है। श्रीराम ! आप समस्त प्राणियों के लिये नित्य वन्दनीय और देवता के तुल्य हैं। आपका दर्शन करके शबरी स्वर्गलोक (साकेतधाम ) को चली जायगी।'

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! तदनन्तर आप पम्पा के पश्चिम तट पर जाकर एक अनुपम आश्रम देखेंगे, (सर्वसाधारण की पहुँच के बाहर होने के कारण) गुप्त है। उस आश्रम पर तथा उस वन में मतंग मुनि के प्रभाव से हाथी कभी आक्रमण नहीं कर सकते। रघुनन्दन! वहाँ का जंगल मतंगवन के नाम से प्रसिद्ध है। उस नन्दनतुल्य मनोहर और देववन के समान सुन्दर वन में नाना प्रकार के पक्षी भरे रहते हैं। श्रीराम ! आप वहाँ बड़ी प्रसन्नता के साथ सानन्द विचरण करेंगे।' 

‘पम्पासरोवर के पूर्वभाग में ऋष्यमूक पर्वत है, जहाँ के वृक्ष फूलों से सुशोभित दिखायी देते हैं। उसके ऊपर चढ़ने में बड़ी कठिनाई होती है, क्योंकि वह छोटे-छोटे सर्पों अथवा हाथियों के बच्चों द्वारा सब ओर से सुरक्षित है। ऋष्यमूक पर्वत उदार (अभीष्ट फल को देनेवाला) है। पूर्वकाल में साक्षात् ब्रह्माजी ने उसका निर्माण किया और उसे औदार्य आदि गुणों से सम्पन्न बनाया। 

'श्रीराम ! उस पर्वत के शिखर पर सोया हुआ पुरुष सपने में जिस सम्पत्ति को पाता है उसे जागने पर भी प्राप्त कर लेता है। जो पापकर्मी तथा विषम बर्ताव करने वाला पुरुष उस पर्वत पर चढ़ता है, उसे इस पर्वतशिखर पर ही सो जाने पर राक्षस लोग उठाकर उसके ऊपर प्रहार करते हैं। श्रीराम ! मतंग मुनि के आश्रम के आस-पास के वन में रहने और पम्पासरोवर में क्रीडा करने वाले छोटे-छोटे हाथियों के चिग्घाड़ने का महान् शब्द उस पर्वत पर भी सुनायी देता है।' 

'जिनके गण्डस्थलों पर कुछ लाल रंग की मद की धाराएँ बहती हैं, वे वेगशाली और मेघ के समान काले बड़े-बड़े गजराज झुंड के झुंड एक साथ होकर दूसरी जाति वाले हाथियों से पृथक् हो वहाँ विचरते रहते हैं। वन में विचरने वाले वे हाथी जब पम्पासरोवर का निर्मल, मनोहर, सुन्दर, छूने में अत्यन्त सुखद तथा सब प्रकार की सुगन्ध से सुवासित जल पीकर लौटते हैं, तब उन वनों में प्रवेश करते हैं।' 

‘रघुनन्दन! वहाँ रीछों, बाघों और नील कोमल कान्तिवाले मनुष्यों को देखकर भागने वाले तथा दौड़ लगाने में किसी से पराजित न होने वाले मृगों को देखकर आप अपना सारा शोक भूल जायँगे। श्रीराम! उस पर्वत के ऊपर एक बहुत बड़ी गुफा शोभा पाती है, जिसका द्वार पत्थर से ढका है। उसके भीतर प्रवेश करने में बड़ा कष्ट होता है। उस गुफा के पूर्वद्वार पर शीतल जल से भरा हुआ एक बहुत बड़ा कुण्ड है। उसके आस-पास बहुत-से फल और मूल सुलभ हैं तथा वह रमणीय ह्रद नाना प्रकार के वृक्षों से व्याप्त है। धर्मात्मा सुग्रीव वानरों के साथ उसी गुफा में निवास करते हैं। वे कभी-कभी उस पर्वत के शिखर पर भी रहते हैं।' 

इस प्रकार श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयों को सब बातें बताकर सूर्य के समान तेजस्वी और पराक्रमी कबन्ध दिव्य पुष्पों की माला धारण किये आकाश में प्रकाशित होने लगा। 

उस समय वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ से प्रस्थान करने के लिये उद्यत हो आकाश में खड़े हुए महाभाग कबन्ध से उसके निकट खड़े होकर बोले - 'अब तुम परम धाम को जाओ।' 

कबन्ध ने भी उन दोनों भाइयों से कहा - 'आपलोग भी अपने कार्य की सिद्धि के लिये यात्रा करें।' ऐसा कहकर परम प्रसन्न हुए उन दोनों बन्धुओं से आज्ञा ले कबन्ध ने तत्काल प्रस्थान किया। 

कबन्ध अपने पहले रूप को पाकर अद्भुत शोभा से सम्पन्न हो गया। उसका सारा शरीर सूर्य तुल्य प्रभा से प्रकाशित हो उठा। वह राम की ओर देखकर उन्हें पम्पासरोवर का मार्ग दिखाता हुआ आकाश में ही स्थित होकर बोला - 'आप सुग्रीव के साथ मित्रता अवश्य करें।' 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-६७(67) समाप्त ! 

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