भाग-६४(64) दूतों का भरत को वशिष्ठजी का संदेश सुनाना, भरत का नाना से आज्ञा तथा उपहार की वस्तुएँ पाकर शत्रुघ्न के साथ अयोध्या की ओर प्रस्थान करना।


इस प्रकार भरत जब अपने मित्रों को स्वप्न का वृत्तान्त बता रहे थे, उसी समय थके हुए वाहनों वाले वे रमणीय राजगृहपुर में प्रविष्ट हुए, जिसकी खाई को लाँघने का कष्ट शत्रुओं के लिये असह्य था। दूत उस नगर में आकर वे दूत केकयदेश के राजा और राजकुमार से मिले तथा उन दोनों ने भी उनका सत्कार किया। फिर वे भावी राजा भरत के चरणों का स्पर्श करके उनसे इस प्रकार बोले - कुमार! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियों ने आपसे कुशल - मङ्गल कहा है। अब आप यहाँ से शीघ्र चलिये। अयोध्या में आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है। 

‘विशाल नेत्रों वाले राजकुमार ! ये बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण आप स्वयं भी ग्रहण कीजिये और अपने मामा को भी दीजिये। राजकुमार! यहाँ जो बहुमूल्य सामग्री लायी गयी है, इसमें बीस करोड़ की लागत का सामान आपके नाना केकेय नरेश के लिये है और पूरे दस करोड़ की लागत का सामान आपके मामा के लिये है।' 

वे सारी वस्तुएँ लेकर मामा आदि सुहृदों में अनुराग रखने वाले भरत ने उन्हें भेंट कर दीं। तत्पश्चात् इच्छानुसार वस्तुएँ देकर दूतों का सत्कार करने के अनन्तर उनसे इस प्रकार कहा - मेरे पिता महाराज दशरथ सकुशल तो हैं न? महात्मा श्रीराम और लक्ष्मण नीरोग तो हैं न? धर्म को जानने और धर्म की ही चर्चा करने वाली बुद्धिमान् श्रीराम की माता धर्मपरायणा आर्या माता कौशल्या को तो कोई रोग या कष्ट नहीं है? क्या वीर लक्ष्मण और शत्रुघ्न की जननी मेरी मझली माता धर्मज्ञा सुमित्रा स्वस्थ और सुखी हैं? जो सदा अपना ही स्वार्थ सिद्ध करना चाहती और अपने को बड़ी बुद्धिमती समझती है, उस उग्र स्वभाव वाली कोपशीला मेरी माता कैकेयी को तो कोई कष्ट नहीं है? उसने क्या कहा है? 

महात्मा भरत के इस प्रकार पूछने पर उस समय दूतों ने विनयपूर्वक उनसे यह बात कही - पुरुषसिंह! आपको जिनका कुशल- मङ्गल अभिप्रेत है, वे सकुशल हैं। हाथ में कमल लिये रहने वाली लक्ष्मी (शोभा) आपका वरण कर रही है। अब यात्रा के लिये शीघ्र ही आपका रथ जुतकर तैयार हो जाना चाहिये। 

उन दूतों के ऐसा कहने पर भरत ने उनसे कहा – अच्छा मैं महाराज से पूछता हूँ कि दूत मुझसे शीघ्र अयोध्या चलने के लिये कह रहे हैं। आपकी क्या आज्ञा है? 

दूतों से ऐसा कहकर राजकुमार भरत उनसे प्रेरित हो नाना के पास जाकर बोले - राजन्! मैं दूतों के कहने से इस समय पिताजी के पास जा रहा हूँ। पुन: जब आप मुझे याद करेंगे, यहाँ आ जाऊँगा। 

भरत के ऐसा कहने पर नाना केकयनरेश ने उस समय उन रघुकुलभूषण भरत का मस्तक सूँघकर यह शुभ वचन कहा - तात! जाओ, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। तुम्हें पाकर कैकेयी उत्तम संतान वाली हो गयी। शत्रुओं को संताप देनेवाले वीर! तुम अपनी माता और पिता से यहाँ का कुशल- समाचार कहना। तात! अपने पुरोहितजी से तथा अन्य जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हों, उनसे भी मेरा कुशल- मङ्गल कहना। उन महाधनुर्धर दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण से भी यहाँ का कुशल- समाचार सुना देना। 

ऐसा कहकर केकयनरेश ने भरत का सत्कार करके उन्हें बहुत-से उत्तम हाथी, विचित्र कालीन, मृगचर्म और बहुत सा धन दिये। जो अन्त:पुर में पाल-पोसकर बड़े किये गये थे, बल और पराक्रम में बाघों के समान थे, जिनकी दाढ़ें बड़ी-बड़ी और काया विशाल थी, ऐसे बहुत-से कुत्ते भी केकयनरेश ने भरत को भेंट में दिये। दो हजार सोने की मोहरें और सोलह सौ घोड़े भी दिये। इस प्रकार केकयनरेश ने केकयीकुमार भरत को सत्कारपूर्वक बहुत सा धन दिया। 

उस समय केकयनरेश अश्वपति ने अपने अभीष्ट, विश्वासपात्र और गुणवान् मन्त्रियों को भरत के साथ जाने के लिये शीघ्र आज्ञा दी। भरत के मामा ने उन्हें उपहार में दिये जाने वाले फल के रूप में इरावान् पर्वत और इन्द्रशिर नामक स्थान के आस-पास उत्पन्न होने वाले बहुत से सुन्दर-सुन्दर हाथी तथा तेज चलने वाले सुशिक्षित खच्चर दिये। उस समय जाने की जल्दी होने के कारण केकयीपुत्र भरत ने केकयराज के दिये हुए उस धन का अभिनन्दन नहीं किया। 

उस अवसर पर उनके हृदय में बड़ी भारी चिन्ता हो रही थी। इसके दो कारण थे, एक तो दूत वहाँ से चलने की जल्दी मचा रहे थे, दूसरे उन्हें दुःस्वप्न का दर्शन भी हुआ था। 

वे यात्रा तैयारी के लिये पहले अपने आवास स्थान पर गये। फिर वहाँ से निकलकर मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों से भरे हुए परम उत्तम राजमार्ग पर गये। उस समय भरतजी के पास बहुत बड़ी सम्पत्ति जुट गयी थी। सड़क को पार करके श्रीमान् भरत ने राजभवन के परम उत्तम अन्तःपुर का दर्शन किया और उसमें वे बेरोक-टोक घुस गये। 

वहाँ नाना, नानी, मामा युधाजित् और मामी से विदा ले शत्रुघ्नसहित रथ पर सवार हो भरत ने यात्रा आरम्भ की। गोलाकार पहिये वाले सौ से भी अधिक रथों में ऊँट, बैल, घोड़े और खच्चर जोतकर सेवकों ने जाते हुए भरत का अनुसरण किया। शत्रुहीन महामना भरत अपनी और मामा की सेना से सुरक्षित हो शत्रुघ्न को अपने साथ रथ पर लेकर नाना, अपने ही समान माननीय मन्त्रियों के साथ मामा के घर से चले; मानो कोई सिद्ध पुरुष इन्द्रलोक से किसी अन्य स्थान के लिये प्रस्थित हुआ हो। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-६४(64) समाप्त !

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