भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सब वस्तुओं का सार ग्रहण करने वाले हैं। अवस्था में बड़े होने पर भी उन्होंने लक्ष्मण के कहे हुए अत्यन्त सारगर्भित उत्तम वचनों को सुनकर उन्हें स्वीकार किया।
तदनन्तर महाबाहु श्रीराम ने अपने बढ़े हुए रोष को रोका और उस विचित्र धनुष को उतारकर लक्ष्मण से कहा - वत्स! अब हम लोग क्या करें? कहाँ जायँ ? लक्ष्मण ! किस उपाय से हमें सीता का पता लगे ? यहाँ इसका विचार करो।
तब लक्ष्मण ने इस प्रकार संताप पीड़ित हुए श्रीराम से 'कहा - भैया! आपको इस जनस्थान में ही भाभी सीता की खोज करनी चाहिये। नाना प्रकार के वृक्ष और लताओं से युक्त यह सघन वन अनेक राक्षसों से भरा हुआ है। इसमें पर्वत के ऊपर बहुत- से दुर्गम स्थान, फटे हुए पत्थर और कन्दराएँ हैं। वहाँ भाँति-भाँति की भयंकर गुफाएँ हैं, जो नाना प्रकार के मृगगणों से भरी रहती हैं। यहाँ के पर्वत पर किन्नरों के आवास स्थान और गन्धर्वो के भवन भी हैं। मेरे साथ चलकर आप उन सभी स्थानों में एकाग्रचित्त हो भाभी की खोज करें। जैसे पर्वत वायु के वेग से कम्पित नहीं होते हैं, उसी प्रकार आप-जैसे बुद्धिमान् महात्मा नरश्रेष्ठ आपत्तियों में विचलित नहीं होते हैं।
उनके ऐसा कहने पर लक्ष्मण सहित श्रीरामचन्द्रजी रोषपूर्वक अपने धनुष पर क्षुर नामक भयंकर बाण चढ़ाये वहाँ सारे वन में विचरण करने लगे। थोड़ी ही दूर आगे जाने पर उन्हें पर्वतशिखर के समान विशाल शरीर वाले पक्षिराज महाभाग जटायु दिखायी पड़े जो खून से लथपथ हो पृथ्वी पर पड़े थे।
पर्वत शिखर के समान प्रतीत होने वाले उन गृध्रराज को देखकर श्रीराम लक्ष्मण से बोले – लक्ष्मण ! यह गृध्र के रूप में अवश्य ही कोई राक्षस जान पड़ता है, जो इस वन में घूमता रहता है। नि:संदेह इसी ने विदेहराजकुमारी सीता को खा लिया होगा। विशाललोचना सीता को खाकर यह यहाँ सुखपूर्वक बैठा हुआ है। मैं प्रज्वलित अग्रभाग वाले तथा सीधे जाने वाले अपने भयंकर बाणों से इसका वध करूँगा।
ऐसा कहकर क्रोध में भरे हुए श्रीराम धनुष पर बाण चढ़ाये समुद्रपर्यन्त पृथ्वी को कम्पित करते हुए उसे देखने के लिये आगे बढ़े।
इसी समय पक्षी जटायु अपने मुँह से फेनयुक्त रक्त वमन करते हुए अत्यन्त दीन - वाणी में दशरथनन्दन श्रीराम से बोले – आयुष्मन्! इस महान् वन में तुम जिसे ओषधि के समान ढूँढ रहे हो, उस देवी सीता को तथा मेरे इन प्राणों को भी रावण ने हर लिया। रघुनन्दन! तुम्हारे और लक्ष्मण के न रहने पर महाबली रावण आया और देवी सीता को हरकर ले जाने लगा। उस समय मेरी दृष्टि सीता पर पड़ी। प्रभो! ज्यों ही मेरी दृष्टि पड़ी, मैं सीता की सहायता के लिये दौड़ पड़ा। रावण के साथ मेरा युद्ध हुआ। मैंने उस युद्ध में रावण के रथ और छत्र आदि सभी साधन नष्ट कर दिये और वह भी घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।
‘श्रीराम! यह रहा उसका टूटा हुआ धनुष, ये हैं उसके खण्डित हुए बाण और यह है उसका युद्धोपयोगी रथ, जो युद्ध में मेरे द्वारा तोड़ डाला गया है । जब मैं युद्ध करते-करते थक गया, तब रावण ने तलवार से मेरे दोनों पंख काट डाले और वह विदेहकुमारी सीता को लेकर आकाश में उड़ गया। मैं उस राक्षस के हाथ से पहले ही मार डाला गया हूँ, अब तुम मुझे न मारो।'
सीता से सम्बन्ध रखने वाली यह प्रिय वार्ता सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने अपना महान् धनुष फेंक दिया और गृध्रराज जटायु को गले से लगाकर वे शोक से विवश हो पृथ्वी पर गिर पड़े और लक्ष्मण के साथ ही रोने लगे। अत्यन्त धीर होने पर भी श्रीराम ने उस समय दूने दुःख का अनुभव किया।
असहाय हो एकमात्र ऊर्ध्वश्वास की संकटपूर्ण अवस्था में पड़कर बारंबार लंबी साँस खींचते हुए जटायु की ओर देखकर श्रीराम को बड़ा दुःख हुआ।
उन्होंने सुमित्राकुमार से कहा - लक्ष्मण ! मेरा राज्य छिन गया, मुझे वनवास मिला (पिताजी की मृत्यु हुई), सीता का अपहरण हुआ और ये मेरे परम सहायक पक्षिराज भी मर गये। ऐसा जो मेरा यह दुर्भाग्य है, यह तो अग्नि को भी जलाकर भस्म कर सकता है। यदि आज मैं भरे हुए महासागर को तैरने लगूँ तो मेरे दुर्भाग्य की आँच से वह सरिताओं का स्वामी समुद्र भी निश्चय ही सूख जायगा। इस चराचर जगत में मुझसे बढ़कर भाग्यहीन दूसरा कोई नहीं है, जिस अभाग्य के कारण मुझे इस विपत्ति के बड़े भारी जाल में फँसना पड़ा है। ये महाबली गृध्रराज जटायु मेरे पिताजी के मित्र थे, किंतु आज मेरे दुर्भाग्यवश मारे जाकर इस समय पृथ्वी पर पड़े हैं।
इस प्रकार बहुत सी बातें कहकर लक्ष्मण सहित श्रीरघुनाथजी ने जटायु के शरीर पर हाथ फेरा और पिता के प्रति जैसा स्नेह होना चाहिये, वैसा ही उनके प्रति प्रदर्शित किया। पंख कट जाने के कारण गृध्रराज जटायु लहू-लुहान हो रहे थे।
उसी अवस्था में उन्हें गले से लगाकर श्रीरघुनाथजी ने पूछा - तात! मेरी प्राणों के समान प्रिया मिथिलेशकुमारी सीता कहाँ चली गयी?'
इतनी ही बात मुँह से निकालकर वे पृथ्वी पर गिर पड़े।
भयंकर राक्षस रावण ने जिसे पृथ्वी पर मार गिराया था, उस गृध्रराज जटायु की ओर दृष्टि डालकर भगवान् श्रीराम मित्रोचित गुण से सम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मण से बोले - भाई! यह पक्षी अवश्य मेरा ही कार्य सिद्ध करने के लिये प्रयत्नशील था, किंतु उस राक्षस के द्वारा युद्ध में मारा गया। यह मेरे ही लिये अपने प्राणों का परित्याग कर रहा है। लक्ष्मण! इस शरीर के भीतर इसके प्राणों को बड़ी वेदना हो रही है, इसीलिये इसकी आवाज बंद होती जा रही है तथा यह अत्यन्त व्याकुल होकर देख रहा है।
लक्ष्मण से ऐसा कहकर श्रीराम उस पक्षी से बोले – हे महात्मा जटायो ! यदि आप पुनः बोल सकते हों तो आपका भला हो, बताइये, सीता की क्या अवस्था है? और आपका वध किस प्रकार हुआ ? जिस अपराध को देखकर रावण ने मेरी प्रिय भार्या का अपहरण किया है, वह अपराध क्या है? और मैंने उसे कब किया? किस निमित्त को लेकर रावण ने आर्या सीता का हरण किया है? पक्षिप्रवर! सीता का चन्द्रमा के समान मनोहर मुख कैसा हो गया था? तथा उस समय सीता ने क्या- क्या बातें कही थीं? तात! उस राक्षस का बल पराक्रम तथा रूप कैसा है? वह क्या काम करता है? और उसका घर कहाँ है? मैं जो कुछ पूछ रहा हूँ, वह सब बताइये।
इस तरह अनाथ की भाँति विलाप करते हुए श्रीराम की ओर देखकर धर्मात्मा जटायु ने लड़खड़ाती जबान से यों कहना आरम्भ किया - रघुनन्दन! दुरात्मा राक्षसराज रावण ने विपुल माया का आश्रय ले आँधी-पानी की सृष्टि करके (घबराहट की अवस्था में) सीता का हरण किया था। तात! जब मैं उससे लड़ता- लड़ता थक गया, उस अवस्था में मेरे दोनों पंख काटकर वह निशाचर विदेहनन्दिनी सीता को साथ लिये यहाँ से दक्षिण दिशा की ओर गया था।
‘रघुनन्दन! अब मेरे प्राणों की गति बंद हो रही है, दृष्टि घूम रही है और समस्त वृक्ष मुझे सुनहरे रंग के दिखायी देते हैं। ऐसा जान पड़ता है कि उन वृक्षों पर खश के केश जमे हुए हैं। रावण सीता को जिस मुहूर्त में ले गया है, उसमें खोया हुआ धन शीघ्र ही उसके स्वामी को मिल जाता है। काकुत्स्थ! वह 'विन्द' नामक मुहूर्त था, किंतु उस राक्षस को इसका पता नहीं था। जैसे मछली मौत के लिये ही बंसी पकड़ लेती है, उसी प्रकार वह भी सीता को ले जाकर शीघ्र ही नष्ट हो जायगा। अत: अब तुम जनकनन्दिनी के लिये अपने मन में खेद न करो। संग्राम के मुहाने पर उस निशाचर का वध करके तुम शीघ्र ही पुनः विदेहराजकुमारी के साथ विहार करोगे।'
गृध्रराज जटायु यद्यपि मर रहे थे तो भी उनके मन पर मोह या भ्रम नहीं छाया था (उनके होश - हवास ठीक थे)। वे श्रीरामचन्द्रजी को उनकी बात का उत्तर दे ही रहे थे कि उनके मुख से मांसयुक्त रुधिर निकलने लगा।
वे बोले – रावण विश्रवा का पुत्र और कुबेर का सगा भाई है। इतना कहकर उन पक्षिराज ने श्रीराम नाम का उच्चारण करते हुए दुर्लभ प्राणों का परित्याग कर दिया।
श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़े कह रहे थे, 'कहिये, कहिये, कुछ और कहिये !' किंतु उस समय गृध्रराज के प्राण उनका शरीर छोड़कर आकाश में चले गये। उन्होंने अपना मस्तक भूमि पर डाल दिया, दोनों पैर फैला दिये और अपने शरीर को भी पृथ्वी पर ही डालते हुए वे धराशायी हो गये। गृधराज जटायु की आँखें लाल दिखायी देती थीं।
प्राण निकल जाने से वे पर्वत के समान अविचल हो गये। उन्हें इस अवस्था में देखकर बहुत-से दुःखों से दुःखी हुए श्रीरामचन्द्रजी ने सुमित्राकुमार से कहा - लक्ष्मण! राक्षसों के निवासस्थान इस दण्डकारण्य में बहुत वर्षों तक सुखपूर्वक रहकर इन पक्षिराज ने यहीं अपने शरीर का त्याग किया है। इनकी अवस्था बहुत वर्षों की थी। इन्होंने सुदीर्घ काल तक अपना अभ्युदय देखा है; किंतु आज इस वृद्धावस्था में उस राक्षस के द्वारा मारे जाकर ये पृथ्वी पर सो रहे हैं; क्योंकि काल का उल्लङ्घन करना सबके ही लिये कठिन है।
‘लक्ष्मण! देखो, ये जटायु मेरे बड़े उपकारी थे, किंतु आज मारे गये। सीता की रक्षा के लिये युद्ध में प्रवृत्त होने पर अत्यन्त बलवान् रावण के हाथ से इनका वध हुआ है। बाप-दादों के द्वारा प्राप्त हुए गीधों के विशाल राज्य का त्याग करके इन पक्षिराज ने मेरे ही लिये अपने प्राणों की आहुति दी है। शूर, शरणागत रक्षक, धर्मपरायण श्रेष्ठ पुरुष सभी जगह देखे जाते हैं। पशु-पक्षी की योनियों में भी उनका अभाव नहीं है। सौम्य! शत्रुओं को संताप देने वाले लक्ष्मण ! इस समय मुझे सीता के हरण का उतना दुःख नहीं है, जितना कि मेरे लिये प्राण त्याग करने वाले जटायु की मृत्यु से हो रहा है।'
'महायशस्वी श्रीमान् राजा दशरथ जैसे मेरे माननीय और पूज्य थे, वैसे ही ये पक्षिराज जटायु भी हैं। सुमित्रानन्दन! तुम सूखे काष्ठ ले आओ, मैं मथकर आग निकालूँगा और मेरे लिये मृत्यु को प्राप्त हुए इन गृधराज का दाह संस्कार करूँगा। सुमित्राकुमार! उस भयंकर राक्षस के द्वारा मारे गये इन पक्षिराज को मैं चिता पर चढ़ाऊँगा और इनका दाह- संस्कार करूँगा।
फिर वे जटायु को सम्बोधित करके बोले – महान् बलशाली गृध्रराज ! यज्ञ करने वाले, अग्निहोत्री, युद्ध में पीठ न दिखाने वाले और भूमिदान करने वाले पुरुषों को जिस गति की - जिन उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है, मेरी आज्ञा से उन्हीं सर्वोत्तम लोकों में तुम भी जाओ। मेरे द्वारा दाह-संस्कार किये जाने पर तुम्हारी सद्गति हो।
ऐसा कहकर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने दुःखित हो पक्षिराज के शरीर को चिता पर रखा और उसमें आग लगाकर अपने बन्धु की भाँति उनका दाह संस्कार किया। तदनन्तर लक्ष्मण सहित पराक्रमी श्रीराम वन में जाकर मोटे-मोटे महारोही (कन्दमूल विशेष) काट लाये और उन्हें जटायु के लिये अर्पित करने के उद्देश्य से उन्होंने पृथ्वी पर कुश बिछाये। महायशस्वी श्रीराम ने रोही के गूदे निकालकर उनका पिण्ड बनाया और उन सुन्दर हरित कुशाओं पर जटायु को पिण्डदान किया।
ब्राह्मण लोग परलोक वासी मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति कराने के उद्देश्य से जिन पितृसम्बन्धी मन्त्रों का जप आवश्यक बतलाते हैं, उन सबका भगवान् श्रीराम ने जप किया। तदनन्तर उन दोनों राजकुमारों ने गोदावरी नदी के तट पर जाकर उन गृध्रराज के लिये जलाञ्जलि दी। रघुकुल के उन दोनों महापुरुषों ने गोदावरी में नहाकर शास्त्रीय विधि से उन गृध्रराज के लिये उस समय जलाञ्जलि का दान किया।
महर्षि तुल्य श्रीराम के द्वारा दाह संस्कार होने के कारण गृध्रराज जटायु को आत्मा का कल्याण करने वाली परम पवित्र गति प्राप्त हुई। उन्होंने रणभूमि में अत्यन्त दुष्कर और यशोवर्धक पराक्रम प्रकट किया था। परंतु अन्त में रावण ने उन्हें मार गिराया। तर्पण करने के पश्चात् वे दोनों भाई पक्षिराज जटायु में पितृ तुल्य सुस्थिरभाव रखकर सीता की खोज के कार्य में मन लगा देवेश्वर विष्णु और इन्द्र की भाँति वन में आगे बढ़े।
