बुझी हुई आग, जलहीन समुद्र तथा प्रभाहीन सूर्य की भाँति शोभाहीन हुए दिवङ्गत राजा का शव देखकर कौशल्या के नेत्रों में आँसू भर आये। वे अनेक प्रकार से शोकाकुल होकर राजा के मस्तक को गोद में ले कैकेयी से इस प्रकार बोलीं - दुराचारिणी क्रूर कैकेयी! ले, तेरी कामना सफल हुई। अब राजा को भी त्यागकर एकाग्रचित्त हो अपना अकण्टक राज्य भोग। राम मुझे छोड़कर वन में चले गये और मेरे स्वामी स्वर्ग सिधारे। अब मैं दुर्गम मार्ग में साथियों से बिछुड़कर असहाय हुई अबला की भाँति जीवित नहीं रह सकती।
'नारीधर्म को त्याग देने वाली कैकेयी के सिवा संसार में दूसरी कौन ऐसी स्त्री होगी जो अपने लिये आराध्य देवस्वरूप पति का परित्याग करके जीना चाहेगी? जैसे कोई धनका लोभी दूसरों को विष खिला देता है और उससे होने वाले हत्या के दोषों पर ध्यान नहीं देता, उसी प्रकार इस कैकेयी ने कुब्जा के कारण रघुवंशियों के इस कुल का नाश कर डाला। कैकेयी ने महाराज को अयोग्य कार्य में लगाकर उनके द्वारा पत्नी सहित श्रीराम को वनवास दिलवा दिया। यह समाचार जब राजा जनक सुनेंगे, तब मेरे ही समान उनको भी बड़ा कष्ट होगा।'
‘मैं अनाथ और विधवा हो गयी – यह बात मेरे धर्मात्मा पुत्र कमलनयन श्रीराम को नहीं मालूम है। वे तो यहाँ से जीते-जी अदृश्य हो गये हैं। पति-सेवारूप मनोहर तप करनेवाली विदेहराजकुमारी सीता दुःख भोगने के योग्य नहीं है। वह वन में दु:ख का अनुभव करके उद्विग्र हो उठेगी। रात के समय भयानक शब्द करने वाले पशु-पक्षियोंकी बोली सुनकर भयभीत हो सीता श्रीराम की ही शरण लेगी उन्हीं की गोद में जाकर छिपेगी।'
'जो बूढ़े हो गये हैं, कन्याएँमात्र ही जिनकी संतति हैं, वे राजा जनक भी सीता की ही बारम्बार चिन्ता करते हुए शोक में डूबकर अवश्य ही अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे। मैं भी आज ही मृत्यु का वरण करूंगी। एक पतिव्रता की भाँति पति के शरीर का आलिङ्गन करके चिता की आग में प्रवेश कर जाऊँगी।'
पति के शरीर को हृदय से लगाकर अत्यन्त दु:ख से आर्त हो करुण विलाप करती हुई तपस्विनी कौशल्या को राजकाज देखने वाले मन्त्रियों ने दूसरी स्त्रियों द्वारा वहाँ से हटवा दिया। फिर उन्होंने महाराज के शरीर को तेल से भरे हुए कड़ाहे में रखकर वशिष्ठ आदि की आज्ञा के अनुसार शव की रक्षा आदि अन्य सब राजकीय कार्यों की सँभाल आरम्भ कर दी।
वे सर्वज्ञ मन्त्री पुत्र के बिना राजा का दाह संस्कार न कर सके, इसलिये उनके शव की रक्षा करने लगे। जब मन्त्रियों ने राजा के शव को तेल के कड़ाहे में सुलाया, तब यह जानकर सारी रानियाँ 'हाय ! ये महाराज परलोकवासी हो गये' ऐसा कहती हुई पुन: विलाप करने लगीं। उनके मुख पर नेत्रों से आँसुओं के झरने झर रहे थे। वे अपनी भुजाओं को ऊपर उठाकर दीनभाव से रोने और शोक संतप्त हो दयनीय विलाप करने लगीं।
वे बोलीं - 'हा महाराज ! हम सत्यप्रतिज्ञ एवं सदा प्रिय बोलने वाले अपने पुत्र श्रीराम से तो बिछुड़ी ही थीं, अब आप भी क्यों हमारा परित्याग कर रहे हैं ? श्रीराम से बिछुड़कर हम सब विधवाएँ इस दुष्ट विचार वाली सौत कैकेयी के समीप कैसे रहेंगी? जो हमारे और आपके भी रक्षक और प्रभु थे, वे मनस्वी श्रीरामचन्द्र राजलक्ष्मी को छोड़कर वन चले गये।
‘वीरवर श्रीराम और आपके भी न रहने से हमारे ऊपर बड़ा भारी संकट आ गया, जिससे हम मोहित हो रही हैं। अब सौत कैकेयी के द्वारा तिरस्कृत हो हम यहाँ कैसे रह सकेंगी? जिसने राजा का तथा सीता सहित श्रीराम और महाबली लक्ष्मण का भी परित्याग कर दिया, वह दूसरे किसका त्याग नहीं करेगी?'
रघुकुलनरेश दशरथ की वे सुन्दरी रानियाँ महान् शोक से ग्रस्त हो आँसू बहाती हुई नाना प्रकार की चेष्टाएँ और विलाप कर रही थीं। उनका आनन्द लुट गया था। महामना राजा दशरथ से हीन हुई वह अयोध्यापुरी नक्षत्रहीन रात्रि और पतिविहीना नारी की भाँति श्रीहीन हो गयी थी। नगर के सभी मनुष्य आँसू बहा रहे थे। कुलवती स्त्रियाँ हाहाकार कर रही थीं। चौराहे तथा घरों के द्वार सूने दिखायी देते थे। वहाँ झाड़-बुहार, लीपने पोतने तथा बलि अर्पण करने आदि की क्रियाएँ नहीं होती थीं। इस प्रकार वह पुरी पहले की भाँति शोभा नहीं पाती थी।
राजा दशरथ शोक वश स्वर्ग सिधारे और उनकी रानियाँ शोक से ही भूतल पर लोटती रहीं। इस शोक में ही सहसा सूर्य की किरणों का प्रचार बंद हो गया और सूर्यदेव अस्त हो गये। तत्पश्चात् अन्धकार का प्रचार करती हुई रात्रि उपस्थित हुई। वहाँ पधारे हुए सुहृदों ने किसी भी पुत्र के बिना राजा का दाह संस्कार होना नहीं पसंद किया। अब राजा का दर्शन अचिन्त्य हो गया, यह सोचते हुए उन सबने उस तेलपूर्ण कड़ाहे में उनके शव को सुरक्षित रख दिया।
सूर्य के बिना प्रभाहीन आकाश तथा नक्षत्रों के बिना शोभाहीन रात्रि की भाँति अयोध्यापुरी महात्मा राजा दशरथ से रहित हो श्रीहीन प्रतीत होती थी। उसकी सड़कों और चौराहों पर आँसुओं से अवरुद्ध कण्ठवाले मनुष्यों की भीड़ एकत्र हो गयी थी। झुंड के झुंड स्त्री और पुरुष एक साथ खड़े होकर भरत माता कैकेयी की निन्दा करने लगे। उस समय महाराज की मृत्यु से अयोध्यापुरी में रहनेवाले सभी लोग शोकाकुल हो रहे थे। कोई भी शान्ति नहीं पाता था।

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