इस प्रकार आठ महाबली भयंकर राक्षसों को जनस्थान में जाने की आज्ञा दे रावण ने विपरीत बुद्धि के कारण अपने को कृतकृत्य माना। वह विदेहकुमारी सीता का स्मरण करके काम - बाणों से अत्यन्त पीड़ित हो रहा था; अत: उन्हें देखने के लिये उसने बड़ी उतावली के साथ अपने रमणीय अन्त: पुर में प्रवेश किया। उस भवन में प्रवेश करके राक्षसों के राजा रावण ने देखा कि सीता राक्षसियों के बीच में बैठकर दुःख में डूबी हुई हैं। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही है और वे शोक के दुस्सह भार से अत्यन्त पीड़ित एवं दीन हो वायु के वेग से आक्रान्त हो समुद्र में डूबती हुई नौका के समान जान पड़ती हैं।
मृगों के यूथ से बिछुड़कर कुत्तों से घिरी हुई अकेली हिरणी के समान दिखायी देती हैं। शोकवश दीन और विवश हो नीचे मुँह किये बैठी हुई सीता के पास पहुँचकर राक्षसों के राजा निशाचर रावण ने उन्हें जबर्दस्ती अपने देवगृह के समान सुन्दर भवन का दर्शन कराया। वह ऊँचे-ऊँचे महलों और सातमंजिले मकानों से भरा हुआ था। उसमें सहस्रों स्त्रियाँ निवास करती थीं। झुंड -के- झुंड नाना जाति के पक्षी वहाँ कलरव करते थे। नाना प्रकार के रत्न उस अन्तःपुर की शोभा बढ़ाते थे।
उसमें बहुत-से मनोहर खंभे लगे थे, जो हाथी दाँत, पक्के सोने, स्फटिकमणि, चाँदी, हीरा और वैदूर्यमणि (नीलम ) से जटित होने के कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे। उस महल में दिव्य दुन्दुभियों का मधुर घोष होता रहता था। उस अन्तः :पुर को तपाये हुए सुवर्ण के आभूषणों से सजाया गया था। रावण सीता को साथ लेकर सोने की बनी हुई विचित्र सीढ़ी पर चढ़ा। वहाँ हाथी दाँत और चाँदी की बनी हुई खिड़कियाँ थीं, जो बड़ी सुहावनी दिखायी देती थीं। सोने की जालियों से ढकी हुई प्रासादमालाएँ भी दृष्टिगोचर होती थीं।
उस महल में जो भूभाग (फर्श) थे, वे सुर्खी-चूना के पक्के बनाये गये थे और उनमें मणियाँ जड़ी गयी थीं, जिनसे वे सब-के-सब विचित्र दिखायी देते थे। दशग्रीव ने अपने महल की वे सारी वस्तुएँ मैथिली को दिखायीं। रावण ने बहुत-सी बावड़ियाँ और भाँति-भाँति के फूलों से आच्छादित बहुत-सी पोखरियाँ भी सीता को दिखायीं। सीता वह सब देखकर शोक में डूब गयीं।
वहु पापात्मा निशाचर विदेहनन्दिनी सीता को अपना सारा सुन्दर भवन दिखाकर उन्हें लुभाने की इच्छा से इस प्रकार बोला – सीते! मेरे अधीन बत्तीस करोड़ राक्षस हैं। यह संख्या बुढ़े और बालक निशाचरों को छोड़कर बतायी गयी है। भयंकर कर्म करने वाले इन सभी राक्षसों का मैं ही स्वामी हूँ। अकेले मेरी सेवा में एक हजार राक्षस रहते हैं। विशाललोचने! मेरा यह सारा राज्य और जीवन तुम पर ही अवलम्बित है (अथवा यह सब कुछ तुम्हारे चरणों में समर्पित है)। तुम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो।
‘सीते! मेरा अन्त:पुर मेरी बहुत-सी सुन्दरी भार्याओं से भरा हुआ है, तुम उन सबकी स्वामिनी बनो - प्रिये ! मेरी भार्या बन जाओ। मेरे इस हितकर वचन को मान लो - इसे पसंद करो; इससे विपरीत विचार को मन में लाने से तुम्हें क्या लाभ होगा? मुझे अङ्गीकार करो। मैं पीड़ित हूँ, मुझ पर कृपा करो। समुद्रसे घिरी हुई इस लङ्का के राज्य का विस्तार सौ योजन है। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी इसे ध्वस्त नहीं कर सकते।'
'देवताओं, यक्ष, गन्धर्वों तथा ऋषियों में भी मैं किसी को ऐसा नहीं देखता, जो पराक्रम में मेरी समानता कर सके। राम तो राज्य से भ्रष्ट, दीन, तपस्वी, पैदल चलने वाले और मनुष्य होने के कारण अल्प तेज वाले हैं, उन्हें लेकर क्या करोगी? सीते! मुझको ही अपनाओ! मैं तुम्हारे योग्य पति हूँ। भीरु ! जवानी सदा रहने वाली नहीं है, अतः यहाँ रहकर मेरे साथ रमण करो।'
'वरानने! सीते! अब तुम राम के दर्शन का विचार छोड़ दो। इस राम में इतनी शक्ति कहाँ है कि यहाँ तक आने का मनोरथ भी कर सके। आकाश में महान् वेग से बहने वाली वायु को रस्सियों में नहीं बाँधा जा सकता अथवा प्रज्वलित अग्नि की निर्मल ज्वालाओं को हाथों से नहीं पकड़ा जा सकता। शोभने! मैं तीनों लोकों में किसी ऐसे वीर को नहीं देखता, जो मेरी भुजाओं से सुरक्षित तुमको पराक्रम करके यहाँ से ले जा सके।'
‘लङ्का के इस विशाल राज्य का तुम्हीं पालन करो। मुझ जैसे राक्षस, देवता तथा सम्पूर्ण चराचर जगत् तुम्हारे सेवक बनकर रहेंगे। स्नान के जल से आर्द्र (अथवा लङ्का के राज्य पर अपना अभिषेक कराकर उसके जल से आर्द्र ) होकर संतुष्ट हो तुम अपने-आपको क्रीड़ा विनोद में लगाओ। तुम्हारा पहले का जो दुष्कर्म था, वह वनवास का कष्ट देकर समाप्त हो गया। अब जो तुम्हारा पुण्यकर्म शेष है, उसका फल यहाँ भोगो।'
'मिथिलेशकुमारी! तुम मेरे साथ यहाँ रहकर सब प्रकार के पुष्पहार, दिव्य गन्ध और श्रेष्ठ आभूषण आदि का सेवन करो। सुन्दर कटिप्रदेश वाली सुन्दरी ! वह सूर्य के समान प्रकाशित होने वाला पुष्पक विमान मेरे भाई कुबेर का था। उसे मैंने बलपूर्वक जीता है। यह अत्यन्त रमणीय, विशाल तथा मन के समान वेग से चलनेवाला है। सीते! तुम उसके ऊपर मेरे साथ बैठकर सुखपूर्वक विहार करो। वरारोहे सुमुखि! तुम्हारा यह कमल के समान सुन्दर निर्मल और मनोहर दिखायी देने वाला मुख शोक से पीड़ित होने के कारण शोभा नहीं पा रहा है।'
जब रावण ऐसी बातें कहने लगा, तब परम सुन्दरी सीता देवी चन्द्रमा के समान मनोहर अपने मुख को आँचल से ढककर धीरे-धीरे आँसू बहाने लगीं। सीता शोक से अस्वस्थ-सी हो रही थीं, चिन्ता से उनकी कान्ति नष्ट - सी हो गयी थी और वे भगवान् राम का ध्यान करने लगी थीं।
उस अवस्था में उनसे वह वीर निशाचर रावण इस प्रकार बोला – विदेहनन्दिनि! अपने पति के त्याग और परपुरुष के अङ्गीकार से जो धर्मलोप की आशङ्का होती है, उसके कारण तुम्हें यहाँ लज्जा नहीं होनी चाहिये, इस तरह की लाज व्यर्थ है। देवी! तुम्हारे साथ जो मेरा स्नेह सम्बन्ध होगा, यह आर्ष धर्मशास्त्रों द्वारा समर्थित है। तुम्हारे इन कोमल एवं चिकने चरणों पर मैं अपने ये दसों मस्तक रख रहा हूँ। अब शीघ्र मुझ पर कृपा करो। मैं सदा तुम्हारे अधीन रहने वाला दास हूँ। मैंने कामाग्नि से संतप्त होकर ये बातें कही हैं। ये शून्य (निष्फल) न हों, ऐसी कृपा करो; क्योंकि रावण किसी स्त्री को सिर झुकाकर प्रणाम नहीं करता, (केवल) तुम्हारे सामने इसका मस्तक झुका है।
मिथिलेशकुमारी जानकी से ऐसा कहकर काल के वशीभूत हुआ रावण मन-ही-मन मानने लगा कि 'यह अब मेरे अधीन हो गयी।'
(ऐसा कहकर रावण देवी सीता को धोखा देना चाहता है। वास्तव में ऐसे पापपूर्ण कृत्यों का समर्थन धर्मशास्त्रों में कहीं नहीं है। कुमारी कन्या का बलपूर्वक अपहरण शास्त्रों में राक्षसविवाह कहा गया है; किंतु वह भी निन्द्य ही माना गया है, यहाँ तो वह भी नहीं है। विवाहिता सती साध्वी का अपहरण घोर पाप माना गया है। इसी पाप से सोने की लङ्का मिट्टी में मिल गयी और रावण दल-बल-कुल- परिवार सहित नष्ट हो गया।)
इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का
