रावण के द्वारा हरी जाती हुई विदेहनन्दिनी सीता को उस समय कोई भी अपना सहायक नहीं दिखायी देता था। मार्ग में उन्होंने एक पर्वत के शिखर पर पाँच श्रेष्ठ वानरों को बैठे देखा। तब सुन्दर अङ्गोंवाली विशाललोचना भामिनी सीता ने यह सोचकर कि शायद ये भगवान् श्रीराम को कुछ समाचार कह सकें, अपने सुनहरे रंग की रेशमी चादर उतारी और उसमें वस्त्र और आभूषण रखकर उसे उनके बीच में फेंक दिया।
रावण बड़ी घबराहट में था, इसलिये सीता के इस कार्य को वह न जान सका। वे भूरी आँखों वाले श्रेष्ठ वानर उस समय उच्च स्वर से विलाप करती हुई विशाल-लोचना सीता की ओर एकटक नेत्रों से देखने लगे। राक्षसराज रावण पम्पासरोवर को लाँघकर रोती हुई मैथिली सीता को साथ लिये लङ्कापुरी की ओर चल दिया। निशाचर रावण बड़े हर्ष में भरकर सीता के रूप में अपनी मृत्यु को ही हरकर लिये जा रहा था। उसने वैदेही के रूप में तीखे दाढ़वाली महाविषैली नागिन को ही अपने विमान में बैठा रखा था।
वह धनुष से छूटे हुए बाण की तरह तीव्र गति से चलकर आकाशमार्ग से अनेकानेक वनों, नदियों, पर्वतों और सरोवरों को तुरंत लाँघ गया। उसने तिमि नामक मत्स्यों और नागों के निवासस्थान एवं वरुण के अक्षय गृह समुद्र को भी, जो समस्त नदियों का आश्रय है, पार कर लिया। विदेहनन्दिनी जगतमाता जानकी का अपहरण होते समय वरुणालय समुद्र को बड़ी घबराहट हुई। उससे उसकी उठती हुई लहरें शान्त हो गयीं। उसके भीतर रहने वाली मछलियों और बड़े-बड़े सर्पों की गति रुक गयी।
उस समय आकाश में विचरने वाले चारण यों बोले - 'अब दशग्रीव रावण का यह अन्तकाल निकट आ पहुँचा है' तथा सिद्धों ने भी यही बात दुहरायी। सीता छटपटा रही थीं। रावण ने अपनी साकार मृत्यु की भाँति उन्हें विमान में लेकर लङ्कापुरी में प्रवेश किया। वहाँ पृथक्-पृथक् विशाल राजमार्ग बने हुए थे। पुरी के द्वार पर बहुत से राक्षस इधर-उधर फैले हुए थे तथा उस नगरी का विस्तार बहुत बड़ा था। उसमें जाकर रावण ने अपने अन्त: पुर में प्रवेश किया।
कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सीता शोक और मोह में डूबी हुई थीं। रावण ने उन्हें अन्त: पुर में रख दिया, मानो मयासुर ने मूर्तिमती आसुरी माया को वहाँ स्थापित कर दिया हो। (रामायण तिलक नामक व्याख्या के विद्वान् लेखक ने यह बताया है कि यहाँ जो सीता की माया से उपमा दी गयी है, उसके द्वारा यह अभिप्राय व्यक्त किया गया है कि मायामयी सीता ही लङ्का में आयी थीं; मुख्य सीता तो अग्रि में प्रविष्ट हो चुकी थीं। इसीलिये रावण इन्हें ला सका। मायारूपिणी होने के कारण ही रावण को इनके स्वरूप का ज्ञान न हो सका।)
इसके बाद दशग्रीव ने भयंकर आकारवाली पिशाचिनों को बुलाकर कहा - तुम सब सावधानी के साथ सीताकी रक्षा करो। कोई भी स्त्री या पुरुष मेरी आज्ञा के बिना सीता को देखने या इनसे मिलने न पाये। उन्हें मोती, मणि, सुवर्ण, वस्त्र और आभूषण आदि जिस-जिस वस्तु की इच्छा हो, वह तुरंत दी जाय; इसके लिये मेरी खुली आज्ञा है। तुम लोगों में से जो कोई भी जानकर या बिना जाने विदेहकुमारी सीता से कोई अप्रिय बात कहेगी, मैं समझूंगा, उसे अपना जीवन प्यारा नहीं है।
राक्षसियों को वैसी आज्ञा देकर प्रतापी राक्षसराज 'अब आगे क्या करना चाहिये' यह सोचता हुआ अन्तःपुर से बाहर निकला और कच्चे मांस का आहार करने वाले आठ महापराक्रमी राक्षसों से तत्काल मिला।
उनसे मिलकर ब्रह्माजी के वरदान से मोहित हुए महापराक्रमी रावण ने उसके बल और वीर्य की प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा - वीरो! तुम लोग नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र साथ लेकर शीघ्र ही जनस्थान को, जहाँ पहले खर रहता था, जाओ। वह स्थान इस समय उजाड़ पड़ा है। वहाँ के सभी राक्षस मार डाले गये हैं। उस सूने जनस्थान में तुम लोग अपने ही बल- पौरुष का भरोसा करके भय को दूर हटाकर रहो।
‘मैंने वहाँ बहुत बड़ी सेना के साथ महापराक्रमी खर और दूषण को बसा रखा था, किंतु वे सब-के-सब युद्ध में राम के बाणों से मारे गये। इससे मेरे मन में अपूर्व क्रोध जाग उठा है और वह धैर्य की सीमा से ऊपर उठकर बढ़ने लगा है; इसीलिये राम के साथ मेरा बड़ा भारी और भयंकर वैर ठन गया है। मैं अपने महान् शत्रु से उस वैर का बदला लेना चाहता हूँ। उस शत्रु को संग्राम में मारे बिना मैं चैन से सो नहीं सकूँगा।'
‘राम ने खर और दूषण का वध किया है, अतः मैं भी इस समय उन्हें मारकर जब बदला चुका लूँगा, तभी मुझे शान्ति मिलेगी। जैसे निर्धन मनुष्य धन पाकर संतुष्ट होता है, उसी प्रकार मैं राम का वध करके शान्ति पा सकूँगा। जनस्थान में रहकर तुम लोग रामचन्द्र का समाचार जानो और वे कब क्या कर रहे हैं, इसका ठीक-ठीक पता लगाते रहो और जो कुछ मालूम हो, उसकी सूचना मेरे पास भेज दिया करो। तुम सभी निशाचर सावधानी के साथ वहाँ जाना और राम के वधके लिये सदा प्रयत्न करते रहना। मुझे अनेक बार युद्ध के मुहाने पर तुम लोगों के बल का परिचय मिल चुका है; इसीलिये इस जनस्थान में मैंने तुम्हीं लोगों को रखने का निश्चय किया है।'
रावण की यह महान् प्रयोजन से भरी हुई प्रिय बातें सुनकर वे आठों राक्षस उसे प्रणाम करके अदृश्य हो एक साथ ही लङ्का को छोड़कर जनस्थान की ओर प्रस्थित हो गये। तदनन्तर मिथिलेशकुमारी सीता को पाकर उन्हें राक्षसियों की देख-रेख में सौंपकर रावण को बड़ा हर्ष हुआ। श्रीराम के साथ भारी वैर ठानकर वह राक्षस मोहवश आनन्द मानने लगा।
