भाग-३४(34) सीता, राम और लक्ष्मण का दशरथ की परिक्रमा करके रथ में बैठकर वन की ओर प्रस्थान, पुरवासियों तथा रानियों सहित महाराज दशरथ की शोकाकुल अवस्था


तदनन्तर राम, लक्ष्मण और सीता ने हाथ जोड़कर दीनभाव से राजा दशरथ के चरणों का स्पर्श करके उनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा की। उनसे विदा लेकर सीता सहित धर्मज्ञ रघुनाथजी ने माता का कष्ट देखकर शोक से व्याकुल हो उनके चरणों में प्रणाम किया। श्रीराम के बाद लक्ष्मण ने भी पहले माता कौशल्या को प्रणाम किया, फिर अपनी माता सुमित्रा के भी दोनों पैर पकड़े। 

अपने पुत्र महाबाहु लक्ष्मण को प्रणाम करते देख उनका हित चाहने वाली माता सुमित्रा ने पुत्र का मस्तक सूँघकर कहा - वत्स! तुम अपने सुहृद् श्रीराम के परम अनुरागी हो, इसलिये मैं तुम्हें वनवास के लिये विदा करती हूँ। अपने बड़े भाई के वन में इधर-उधर जाते समय तुम उनकी सेवा में कभी प्रमाद (आलस) न करना। ये संकट में हों या समृद्धि में, ये ही तुम्हारी परम गति हैं। निष्पाप लक्ष्मण ! संसार में सत्पुरुषों का यही धर्म है कि सर्वदा अपने बड़े भाई की आज्ञा के अधीन रहें। दान देना, यज्ञ में दीक्षा ग्रहण करना और युद्ध में शरीर त्यागना - यही इस कुल का उचित एवं सनातन आचार है। 

अपने पुत्र लक्ष्मण से ऐसा कहकर सुमित्रा ने वनवास के लिये निश्चित विचार रखने वाले सर्वप्रिय श्रीरामचन्द्रजी से कहा - पुत्र ! जाओ, जाओ तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो। 

इसके बाद वे लक्ष्मण से फिर बोलीं - बेटा! तुम श्रीराम को ही अपने पिता महाराज दशरथ समझो, जनकनन्दिनी सीता को ही अपनी माता सुमित्रा मानो और वन को ही अयोध्या जानो। अब सुखपूर्वक यहाँ से प्रस्थान करो। 

इसके बाद जैसे मातलि इन्द्र से कोई बात कहते हैं, उसी प्रकार विनय के ज्ञाता सुमन्त्र ने ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम से विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा - महायशस्वी राजकुमार श्रीराम ! आपका कल्याण हो। आप इस रथ पर बैठिये। आप मुझसे जहाँ कहेंगे, वहीं मैं शीघ्र आपको पहुँचा दूंगा। आपको जिन चौदह वर्षों तक वन में रहना है, उनकी गणना आज से ही आरम्भ हो जानी चाहिये; क्योंकि देवी कैकेयी ने आज ही आपको वन में जाने के लिये प्रेरित किया है। 

तब सुन्दरी सीता अपने अङ्गों में उत्तम अलंकार धारण करके प्रसन्न चित्त से उस सूर्य के समान तेजस्वी रथ पर आरूढ़ हुईं। पति के साथ जाने वाली सीता के लिये उनके श्वशुर ने वनवास की वर्ष संख्या गिनकर उसके अनुसार ही वस्त्र और आभूषण दिये थे। इसी प्रकार महाराज ने दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण के लिये जो बहुत-से अस्त्र-शस्त्र और कवच प्रदान किये थे, उन्हें रथ के पिछले भाग में रखकर उन्होंने चमड़े से मढ़ी हुई पिटारी और खन्ती या कुदारी भी उसीपर रख दी। इसके बाद दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उस अग्नि के समान दीप्तिमान् सुवर्णभूषित रथ पर शीघ्र ही आरूढ़ हो गये। 

जिनमें सीता की संख्या तीसरी थी, उन श्रीराम आदि को रथ पर आरूढ़ हुआ देख सारथि सुमन्त्र ने रथ को आगे बढ़ाया। उसमें जुते हुए वायु के समान वेगशाली उत्तम घोड़ों को हाँका। जब श्रीरामचन्द्रजी सुदीर्घकाल के लिये महान् वन की ओर जाने लगे, उस समय समस्त पुरवासियों, सैनिकों तथा दर्शकरूप में आये हुए बाहरी लोगों को भी मूर्च्छा आ गयी। उस समय सारी अयोध्या में महान् कोलाहल मच गया। सब लोग व्याकुल होकर घबरा उठे। मतवाले हाथी श्रीराम के वियोग से कुपित हो उठे और इधर-उधर भागते हुए घोड़ों के हिनहिनाने एवं उनके आभूषणों के खनखनाने की आवाज सब ओर गूंजने लगी। 

अयोध्यापुरी के आबाल वृद्ध सब लोग अत्यन्त पीड़ित होकर श्रीराम के ही पीछे दौड़े, मानो धूप से पीड़ित हुए प्राणी पानी की ओर भागे जाते हों। उनमें से कुछ लोग रथ के पीछे और अगल-बगल में लटक गये। सभी श्रीराम के लिये उत्कण्ठित थे और सबके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही थी। वे सब-के-सब उच्चस्वर से कहने लगे – सुमंत्रजी! घोड़ों की लगाम खींचो। रथ को धीरे-धीरे ले चलो। हम श्रीराम का मुख देखेंगे; क्योंकि अब इस मुख का दर्शन हमलोगों के लिये दुर्लभ हो जायेगा। निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजी की माता का हृदय लोहे का बना हुआ है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। तभी तो देवकुमार के समान तेजस्वी पुत्र के वन की ओर जाते समय फट नहीं जाता है। 

'विदेहनन्दिनी सीता कृतार्थ हो गयीं; क्योंकि वे पतिव्रतधर्म में तत्पर रहकर छाया की भाँति पति के पीछे-पीछे चली जा रही हैं। वे श्रीराम का साथ उसी प्रकार नहीं छोड़ती हैं, जैसे सूर्य की प्रभा मेरुपर्वत का त्याग नहीं करती है। अहो लक्ष्मण! तुम भी कृतार्थ हो गये; क्योंकि तुम सदा प्रिय वचन बोलने वाले अपने देवतुल्य भाई की वन में सेवा करोगे। तुम्हारी यह बुद्धि विशाल है। तुम्हारा यह महान् अभ्युदय है और तुम्हारे लिये यह स्वर्ग का मार्ग मिल गया है; क्योंकि तुम श्रीराम का अनुसरण कर रहे हो।' 

ऐसी बातें कहते हुए वे पुरवासी मनुष्य उमड़े हुए आँसुओं का वेग न सह सके। वे लोग सबके प्रेमपात्र इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी के पीछे-पीछे चले जा रहे थे। उसी समय दयनीय दशा को प्राप्त हुई अपनी स्त्रियों से घिरे हुए राजा दशरथ अत्यन्त दीन होकर 'मैं अपने प्यारे पुत्र श्रीरामको देखूँगा' ऐसा कहते हुए महल से बाहर निकल आये। 

उन्होंने अपने आगे रोती हुई स्त्रियों का महान् आर्तनाद सुना। वह वैसा ही जान पड़ता था, जैसे बड़े हाथी यूथपति के बाँध लिये जाने पर हथिनियों का चीत्कार सुनायी देता है। उस समय श्रीराम के पिता ककुत्स्थवंशी श्रीमान् राजा दशरथ उसी तरह खिन्न जान पड़ते थे, जैसे पर्व के समय राहु से ग्रस्त होने पर पूर्ण चन्द्रमा श्रीहीन प्रतीत होते हैं। 

यह देख अचिन्त्यस्वरूप दशरथनन्दन श्रीमान् भगवान् राम ने सुमन्त्र को प्रेरित करते हुए कहा- आप रथ को तेजी से चलाइये। 

एक ओर श्रीरामचन्द्रजी सारथि से रथ हाँकने के लिये कहते थे और दूसरी ओर सारा जनसमुदाय उन्हें ठहर जाने के लिये कहता था। इस प्रकार दुविधा में पड़कर सारथि सुमन्त्र उस मार्ग पर दोनों में से कुछ न कर सके न तो रथ को आगे बढ़ा सके और न सर्वथा रोक ही सके। 

महाबाहु श्रीराम के नगर से निकलते समय पुरवासियों के नेत्रों से गिरे हुए आँसुओं द्वारा भीगकर धरती की उड़ती हुई धूल शान्त हो गयी। श्रीरामचन्द्रजी के प्रस्थान करते समय सारा नगर अत्यन्त पीड़ित हो गया। सब रोने और आँसू बहाने लगे तथा सभी हाहाकार करते-करते अचेत से हो गये। नारियों के नेत्रों से उसी तरह खेदजनित अश्रु झर रहे थे, जैसे मछलियों के उछलने से हिले हुए कमलों द्वारा जलकणों की वर्षा होने लगती है। 

श्रीमान् राजा दशरथ सारी अयोध्यापुरी के लोगों को एक-सा व्याकुलचित्त देखकर अत्यन्त दु:ख के कारण जड़ से कटे हुए वृक्ष की भाँति भूमि पर गिर पड़े। उस समय राजा को अत्यन्त दु:ख में मग्न हो कष्ट पाते देख श्रीराम के पीछे जाते हुए मनुष्यों का पुनः महान् कोलाहल प्रकट हुआ। अन्तःपुर की रानियों के सहित राजा दशरथ को उच्चस्वर से विलाप करते देख कोई 'हा राम !' कहकर और कोई 'हा राममाता!' की पुकार मचाकर करुणक्रन्दन करने लगे। 

उस समय श्रीरामचन्द्रजी ने पीछे घूमकर देखा तो उन्हें विषादग्रस्त तथा भ्रान्तचित्त पिता राजा दशरथ और दुःख में डूबी हुई माता कौशल्या दोनों ही मार्ग पर अपने पीछे आते हुए दिखायी दिये। जैसे रस्सी में बँधा हुआ घोड़े का बच्चा अपनी मां को नहीं देख पाता, उसी प्रकार धर्म के बन्धन में बँधे हुए श्रीरामचन्द्रजी अपनी माता की ओर स्पष्टरूप से न देख सके। जो सवारी पर चलने योग्य, दुःख भोगने के अयोग्य और सुख भोगने के ही योग्य थे, उन माता-पिता को पैदल ही अपने पीछे-पीछे आते देख श्रीरामचन्द्रजी ने सारथि को शीघ्र रथ हाँकने के लिये प्रेरित किया। 

जैसे अंकुश से पीड़ित किया हुआ गजराज उस कष्ट को नहीं सहन कर पाता है, उसी प्रकार पुरुषसिंह श्रीराम के लिये माता-पिता को इस दुःखद अवस्था में देखना असह्य हो गया। जैसे बँधे हुए बछड़े वाली सवत्सा गौ शाम को घर की ओर लौटते समय बछड़े स्नेह से दौड़ी चली आती है, उसी प्रकार श्रीराम की माता कौशल्या उनकी ओर दौड़ी आ रही थीं। 

'हा राम ! हा राम ! हा सीते! हा लक्ष्मण !' की रट लगाती और रोती हुई कौशल्या उस रथ के पीछे दौड़ रही थीं। श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के लिये नेत्रों से आँसू बहा रही थीं एवं इधर-उधर नाचती - चक्कर लगाती सी डोल रही थीं। इस अवस्था में माता कौशल्या को श्रीरामचन्द्रजी ने बारंबार देखा। 

राजा दशरथ चिल्लाकर कहते थे – 'सुमन्त्र ! ठहरो ।' किंतु श्रीरामचन्द्रजी कहते थे - 'आगे बढ़िये, शीघ्र आगे बढ़िये।' उन दो प्रकार के आदेशों में पड़े हुए बेचारे सुमन्त्र का मन उस समय दो पहियों के बीच में फँसे हुए मनुष्य का - सा हो रहा था। 

उस समय श्रीराम ने सुमन्त्र से कहा - यहाँ अधिक विलम्ब करना मेरे और पिताजी के लिये दुःख ही नहीं, महान् दु:ख का कारण होगा; इसलिये रथ आगे बढ़ाइये। लौटने पर महाराज उलाहना दें तो कह दीजियेगा, मैंने आपकी बात नहीं सुनी। 

अन्त में श्रीराम के ही आदेश का पालन करते हुए सारथि ने पीछे से आने वाले लोगों से जाने की आज्ञा ली और स्वत: चलते हुए घोड़ों को भी तीव्रगति से चलने के लिये हाँका। राजा दशरथ के साथ आने वाले लोग मन-ही-मन श्रीराम की परिक्रमा करके शरीर मात्र से लौटे (मन से नहीं लौटे); क्योंकि वह उनके रथ की अपेक्षा भी तीव्रगामी था। दूसरे मनुष्यों का समुदाय शीघ्रगामी मन और शरीर दोनों से ही नहीं लौटा (वे सब लोग श्रीरामके पीछे-पीछे दौड़े चले गये)। 

इधर मन्त्रियों ने महाराज दशरथ से कहा - राजन् ! जिसके लिये यह इच्छा की जाये कि वह पुन: शीघ्र लौट आये, उसके पीछे दूर तक नहीं जाना चाहिये। 

सर्वगुणसम्पन्न राजा दशरथ का शरीर पसीने से भीग रहा था। वे विषाद के मूर्तिमान् स्वरूप जान पड़ते थे। अपने मन्त्रियों की उपर्युक्त बात सुनकर वे वहीं खड़े हो गये और रानियों सहित अत्यन्त दीनभाव से पुत्र की ओर देखने लगे। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-३४(34) समाप्त !

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