शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण, सीता तथा उन ब्राह्मणों के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम की ओर चले। वे दूरतक का मार्ग तय करके अगाध जल से भरी हुई बहुत सी नदियों को पार करते हुए जब आगे गये, तब उन्हें महान् मेरुगिरि के समान एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत दिखायी दिया, जो बड़ा ही निर्मल था। वहाँ से आगे बढ़कर वे दोनों इक्ष्वाकुकुल के श्रेष्ठ वीर रघुवंशी बन्धु सीता के साथ नाना प्रकार के वृक्षों से भरे हुए एक वन में पहुँचे।
उस घोर वन में प्रविष्ट हो श्रीरघुनाथजी ने एकान्त स्थान में एक आश्रम देखा, जहाँ के वृक्ष प्रचुर फल- हुए थे। इधर-उधर टॅगे हुए चीर वस्त्रों के समुदाय उस आश्रम की शोभा बढ़ाते थे। फूलों से लदे वहाँ आन्तरिक मल की शुद्धि के लिये पद्मासन धारण किये सुतीक्ष्ण मुनि ध्यानमग्न होकर बैठे थे।
श्रीराम ने उन तपोधन मुनि के पास विधिवत् जाकर उनसे इस प्रकार कहा - सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ महर्षे! भगवन्! मैं राम हूँ और यहाँ आपका दर्शन करने के लिये आया हूँ, अत: आप मुझसे बात कीजिये।
धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भगवान् श्रीराम का दर्शन करके धीर महर्षि सुतीक्ष्ण ने अपनी दोनों भुजाओं से उनका आलिङ्गन किया और इस प्रकार कहा –
‘सत्यवादियों में श्रेष्ठ रघुकुलभूषण श्रीराम ! आपका स्वागत है। इस समय आपके पदार्पण करने से यह आश्रम सनाथ हो गया। महायशस्वी वीर! मैं आपकी ही प्रतीक्षा में था, इसीलिये अब तक इस पृथ्वी पर अपने शरीर को त्यागकर मैं यहाँ से देवलोक (ब्रह्मधाम) में नहीं गया।
‘मैंने सुना था कि आप राज्य से भ्रष्ट हो चित्रकूट पर्वत पर आकर रहते हैं। काकुत्स्थ ! यहाँ सौ यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले देवराज इन्द्र आये थे। वे महान् देवता देवेश्वर इन्द्रदेव मेरे पास आकर कह रहे थे कि 'तुमने अपने पुण्यकर्म के द्वारा समस्त शुभ लोकों पर विजय पायी है।' उनके कथनानुसार मैंने तपस्या से जिन देवर्षि सेवित लोकों पर अधिकार प्राप्त किया है, उन लोकों में आप सीता और लक्ष्मण के साथ विहार करें। मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ वे सारे लोक आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ।'
जैसे इन्द्र ब्रह्माजी से बात करते हैं, उसी प्रकार मनस्वी श्रीराम ने उन उग्र तपस्या वाले तेजस्वी एवं सत्यवादी महर्षि को इस प्रकार उत्तर दिया - महामुने! वे लोक तो मैं स्वयं ही आपको प्राप्त कराऊँगा, इस समय तो मेरी यह इच्छा है कि आप बतावें कि मैं इस वन में अपने ठहरने के लिये कहाँ कुटिया बनाऊँ? आप समस्त प्राणियों के हित में तत्पर तथा इहलोक और परलोक की सभी बातों के ज्ञान में निपुण हैं, यह बात मुझसे गौतमगोत्रीय महात्मा शरभङ्ग ने कही थी।
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर उन लोकविख्यात महर्षि ने बड़े हर्ष के साथ मधुर वाणी में कहा - श्रीराम! यही आश्रम सब प्रकार से गुणवान् (सुविधाजनक ) है, अत: आप यहीं सुखपूर्वक निवास कीजिये। यहाँ ऋषियों का समुदाय सदा आता-जाता रहता है और फल - मूल भी सर्वदा सुलभ होते हैं। इस आश्रम पर बड़े-बड़े मृगों के झुंड आते और अपने रूप, कान्ति एवं गति से मन को लुभाकर किसी को कष्ट दिये
बिना ही यहाँ से लौट जाते हैं। उन्हें यहाँ किसी से कोई भय नहीं प्राप्त होता है। इस आश्रम में मृगों के उपद्रव के सिवा और कोई दोष नहीं है, यह आप निश्चित रूप से जान लें।
महर्षि का यह वचन सुनकर लक्ष्मण के बड़े भाई धीर-वीर भगवान् श्रीराम ने हाथ में धनुष-बाण लेकर कहा - महाभाग ! यहाँ आये हुए उन उपद्रवकारी मृगसमूहों को यदि मैं झुकी हुई गाँठ और तीखी धारवाले बाणसे मार डालूँ तो इसमें आपका अपमान होगा। यदि ऐसा हुआ तो इससे बढ़कर कष्ट की बात मेरे लिये और क्या हो सकती है? इसलिये मैं इस आश्रम में अधिक समय नहीं निवास करना चाहता।
मुनि से ऐसा कहकर मौन हो श्रीरामचन्द्रजी संध्योपासना करने चले गये। सायंकाल की संध्योपासना करके श्रीराम ने सीता और लक्ष्मण के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के उस रमणीय आश्रम में निवास किया। संध्या का समय बीतने पर रात हुई देख महात्मा सुतीक्ष्ण ने स्वयं ही तपस्वी-जनों के सेवन करने योग्य शुभ अन्न ले आकर उन दोनों पुरुषशिरोमणि बन्धुओं को बड़े सत्कार के साथ अर्पित किया।
सुतीक्ष्ण के द्वारा भलीभाँति पूजित हो लक्ष्मण सहित श्रीराम उनके आश्रम में ही रात बिताकर प्रात: काल जाग उठे। सीता सहित श्रीराम और लक्ष्मण ने ठीक समय से उठकर कमल की सुगन्ध से सुवासित परम शीतल जल के द्वारा स्नान किया। तदनन्तर उन तीनों ने ही मिलकर विधिपूर्वक अग्नि और देवताओं की प्रातः कालिक पूजा की।
इसके बाद तपस्वीजनों के आश्रयभूत वन में उदित हुए सूर्यदेव का दर्शन करके वे तीनों निष्पाप पथिक सुतीक्ष्ण मुनि के पास गये और यह मधुर वचन बोले - भगवन्! आपने पूजनीय होकर भी हम लोगों की पूजा की है। हम आपके आश्रम में बड़े सुख से रहे हैं। अब हम यहाँ से जायँगे, इसके लिये आपकी आज्ञा चाहते हैं। ये मुनि हमें चलने के लिये जल्दी मचा रहे हैं। हम लोग दण्डकारण्य में निवास करने वाले पुण्यात्मा ऋषियों के सम्पूर्ण आश्रममण्डल का दर्शन करने के लिये उतावले हो रहे हैं।
'अत: हमारी इच्छा है कि आप धूमरहित अग्नि के समान तेजस्वी, तपस्या द्वारा इन्द्रियों को वश में रखने वाले तथा नित्य-धर्मपरायण इन श्रेष्ठ महर्षियों के साथ यहाँ से जाने के लिये हमें आज्ञा दें। जैसे अन्याय से आयी हुई सम्पत्ति को पाकर किसी नीच कुल के मनुष्य में असह्य उग्रता आ जाती है, उसी प्रकार यह सूर्यदेव जब तक असह्य ताप देने वाले होकर प्रचण्ड तेज से प्रकाशित न होने लगें, उसके पहले ही हम यहाँ से चल देना चाहते हैं।'
ऐसा कहकर लक्ष्मण और सीतासहित श्रीराम ने मुनि के चरणों की वन्दना की। अपने चरणों का स्पर्श करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण को उठाकर मुनिवर सुतीक्ष्ण ने कसकर हृदय से लगा लिया और बड़े स्नेह से इस प्रकार कहा - श्रीराम! आप छाया की भाँति अनुसरण करने वाली इस धर्मपत्नी सीता तथा सुमित्राकुमार लक्ष्मण के साथ यात्रा कीजिये। आपका मार्ग विघ्न-बाधाओं से रहित परम मङ्गलमय हो। वीर! तपस्या से शुद्ध अन्तःकरण वाले दण्डकारण्यवासी इन तपस्वी मुनियों के रमणीय आश्रमों का दर्शन कीजिये।
‘इस यात्रा में आप प्रचुर फल- मूलों से युक्त तथा फूलों से सुशोभित अनेक वन देखेंगे; वहाँ उत्तम मृगों के झुंड विचरते होंगे और पक्षी शान्तभाव से रहते होंगे। आपको बहुत-से ऐसे तालाब और सरोवर दिखायी देंगे, जिनमें प्रफुल्ल कमलों के समूह शोभा दे रहे होंगे। उनमें स्वच्छ जल भरे होंगे तथा कारण्डव आदि जलपक्षी सब ओर फैल रहे होंगे। नेत्रों को रमणीय प्रतीत होने वाले पहाड़ी झरनों और मोरों की मीठी बोली से गूँजती हुई सुरम्य वनस्थलियों को भी आप देखेंगे। श्रीराम! जाइये, वत्स सुमित्राकुमार! तुम भी जाओ। दण्डकारण्य के आश्रमों का दर्शन करके आपलोगों को फिर इसी आश्रम में आ जाना चाहिये।'
उनके ऐसा कहने पर लक्ष्मण सहित श्रीराम ने 'बहुत अच्छा' कहकर मुनि की परिक्रमा की और वहाँ से प्रस्थान करने की तैयारी की। तदनन्तर विशाल नेत्रों वाली सीता ने उन दोनों भाइयों के हाथ में दो परम सुन्दर तूणीर, धनुष और चमचमाते हुए खड्ग प्रदान किये। उन सुन्दर तूणीरों को पीठ पर बाँधकर टंकारते हुए धनुषों को हाथ में ले वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण आश्रम से बाहर निकले। वे दोनों रघुवंशी वीर बड़े ही रूपवान् थे, उन्होंने खड्ग और धनुष धारण करके महर्षि की आज्ञा ले सीता के साथ शीघ्र ही वहाँ से प्रस्थान किया।

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