भाग-९(9) कैकेयी का राजा को प्रतिज्ञाबद्ध करके उन्हें पहले के दिये हुए दो वरों का स्मरण दिलाकर भरत के लिये अभिषेक और राम के लिये चौदह वर्षों का वनवास माँगना

 


भूपाल दशरथ कामदेव के बाणों से पीड़ित तथा कामवेग के वशीभूत हो उसी का अनुसरण कर रहे थे। उनसे कैकेयी ने यह कठोर वचन कहा - देव! न तो किसी ने मेरा अपकार किया है और न किसी के द्वारा मैं अपमानित या निन्दित ही हुई हूँ। मेरा कोई एक अभिप्राय (मनोरथ) है और मैं आपके द्वारा उसकी पूर्ति चाहती हूँ। यदि आप उसे पूर्ण करना चाहते हों तो प्रतिज्ञा कीजिये। इसके बाद मैं अपना वास्तविक अभिप्राय आपसे कहूँगी। 

महाराज दशरथ काम के अधीन हो रहे थे। वे कैकेयी की बात सुनकर किंचित् मुस्कराये और पृथ्वी पर पड़ी हुई उस देवी के केशों को हाथ से पकड़कर उसके सिर को अपनी गोद में रखकर उससे इस प्रकार बोले – अपने सौभाग्य पर गर्व करने वाली कैकेयी ! क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि नरश्रेष्ठ श्रीराम के अतिरिक्त दूसरा कोई ऐसा मनुष्य नहीं है, जो मुझे तुमसे अधिक प्रिय हो। जो प्राणों के द्वारा भी आराधनीय हैं और जिन्हें जीतना किसी के लिये भी असम्भव है, उन प्रमुख वीर महात्मा श्रीराम की शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारी कामना पूर्ण होगी; अत: तुम्हारे मन की जो इच्छा हो उसे बताओ।  

'कैकेयी! जिन्हें दो घड़ी भी न देखने पर निश्चय ही मैं जीवित नहीं रह सकता, उन श्रीराम की शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम जो कहोगी, उसे पूर्ण करूंगा। केकयनन्दिनि! अपने तथा अपने दूसरे पुत्रों को निछावर करके भी मैं जिन नरश्रेष्ठ श्रीराम का वरण करने को उद्यत हूँ, उन्हीं की शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारी कही हुई बात पूरी करूंगा।' 

‘भद्रे! केकयराजकुमारी! मेरा यह हृदय भी तुम्हारे वचनों की पूर्ति के लिये तत्पर है। ऐसा सोचकर तुम अपनी इच्छा व्यक्त करके इस दुःख से मेरा उद्धार करो। श्रीराम सबको अधिक प्रिय हैं - इस बात पर दृष्टिपात करके तुम्हें जो अच्छा जान पड़े, वह कहो। अपने बल को देखते हुए भी तुम्हें मुझ पर शङ्का नहीं करनी चाहिये। मैं अपने सत्कर्मों की शपथ खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य सिद्ध करूंगा।' 

रानी कैकेयी का मन स्वार्थ की सिद्धि में ही लगा हुआ था। उसके हृदय में भरत के प्रति पक्षपात था और राजा को अपने वश में देखकर हर्ष हो रहा था; अतः यह सोचकर कि अब मेरे लिये अपना मतलब साधने का अवसर आ गया है, वह राजा से ऐसी बात बोली, जिसे मुँह से निकालना शत्रु के लिये भी कठिन है। 

राजा के उस शपथयुक्त वचन से उसको बड़ा हर्ष हुआ था। उसने अपने उस अभिप्राय को जो पास आये हुए यमराज के समान अत्यन्त भयंकर था, इन शब्दों में व्यक्त किया - राजन्! आप जिस तरह क्रमश: शपथ खाकर मुझे वर देने को उद्यत हुए हैं, उसे इन्द्र आदि तैंतीस देवता सुन लें। चन्द्रमा, सूर्य, आकाश, ग्रह, रात, दिन, दिशा, जगत्, यह पृथ्वी, गन्धर्व, राक्षस, रात में विचरने वाले प्राणी, घरों में रहनेवाले गृहदेवता तथा इनके अतिरिक्त भी जितने प्राणी हों, वे सब आपके कथन को जान लें आपकी बातों के साक्षी बनें। सब देवता सुनें! महातेजस्वी, सत्यप्रतिज्ञ, धर्म के ज्ञाता, सत्यवादी तथा शुद्ध आचार-विचार वाले ये महाराज मुझे वर दे रहे हैं। 

इस प्रकार काम मोहित होकर वर देने को उद्यत हुए महाधनुर्धर राजा दशरथ को अपनी मुट्ठी में करके देवी कैकेयी ने पहले उनकी प्रशंसा की; फिर इस प्रकार कहा - राजन्! उस पुरानी बात को स्मरण कीजिये, जब देवासुर संग्राम हो रहा था। वहाँ शत्रु ने आपको घायल करके गिरा दिया था, केवल प्राण नहीं लिये थे। देव! उस युद्धस्थल में सारी रात जागकर अनेक प्रकार के प्रयत्न करके जो मैंने आपके जीवन की रक्षा की थी उससे संतुष्ट होकर आपने मुझे दो वर दिये थे। देव! पृथ्वीपाल रघुनन्दन ! आपके दिये हुए वे दोनों वर मैंने धरोहर के रूप में आपके ही पास रख दिये थे। आज इस समय उन्हीं की मैं खोज करती हूँ। इस प्रकार धर्मत: प्रतिज्ञा करके यदि आप मेरे उन वरों को नहीं देंगे तो मैं अपने को आपके द्वारा अपमानित हुई समझकर आज ही प्राणों का परित्याग कर दूँगी। 

जैसे मृग बहेलिये की वाणीमात्र से अपने ही विनाश के लिये उसके जाल में फँस जाता है, उसी प्रकार कैकेयी के वशीभूत हुए राजा दशरथ उस समय पूर्वकाल के वरदान - वाक्य का स्मरण कराने मात्र से अपने ही विनाश के लिये प्रतिज्ञा के बन्धन में बँध गये और उससे इस प्रकार बोले - तू हँसकर (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी मनचाही बात माँग ले और अपने मनोहर अंगों को आभूषणों से सजा। मौका-बेमौका तो मन में विचार कर देख। हे प्रिये! जल्दी इस बुरे वेष को त्याग दे। 

यह सुनकर और मन में रामजी की बड़ी सौंगंध को विचारकर मंदबुद्धि कैकेयी हँसती हुई उठी और गहने पहनने लगी, मानो कोई भीलनी मृग को देखकर फंदा तैयार कर रही हो! 

अपने जी में कैकेयी को सुहृद् जानकर राजा दशरथजी प्रेम से पुलकित होकर कोमल और सुंदर वाणी से फिर बोले- हे भामिनि! तेरा मनचीता हो गया। नगर में घर-घर आनंद के बधावे बज रहे हैं। मैं कल ही राम को युवराज पद दे रहा हूँ, इसलिए हे सुनयनी! तू मंगल साज सज। 

यह सुनते ही उसका कठोर हृदय दलक उठा (फटने लगा)। मानो पका हुआ बालतोड़ (फोड़ा) छू गया हो। ऐसी भारी पीड़ा को भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोर की स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती (जिसमें उसका भेद न खुल जाए)। राजा उसकी कपट-चतुराई को नहीं लख रहे हैं, क्योंकि वह करोड़ों कुटिलों की शिरोमणि गुरु मंथरा की पढ़ाई हुई है। 

यद्यपि राजा नीति में निपुण हैं, परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है। फिर वह कपटयुक्त प्रेम बढ़ाकर (ऊपर से प्रेम दिखाकर) नेत्र और मुँह मोड़कर हँसती हुई बोली - हे प्रियतम! आप माँग-माँग तो कहा करते हैं, पर देते-लेते कभी कुछ भी नहीं। आपने दो वरदान देने को कहा था, उनके भी मिलने में संदेह है। 

राजा ने हँसकर कहा कि अब मैं तुम्हारा मर्म (मतलब) समझा। मान करना तुम्हें परम प्रिय है। तुमने उन वरों को थाती (धरोहर) रखकर फिर कभी माँगा ही नहीं और मेरा भूलने का स्वभाव होने से मुझे भी वह प्रसंग याद नहीं रहा। मुझे झूठ-मूठ दोष मत दो। चाहे दो के बदले चार माँग लो। रघुकुल में सदा से यह रीति चली आई है कि प्राण भले ही चले जाएँ, पर वचन नहीं जाता। 

तदनन्तर कैकेयी ने काम मोहित होकर वर देने के लिये उद्यत हुए राजा से इस प्रकार कहा – देव ! पृथ्वीनाथ ! उन दिनों आपने जो दो वर देने की प्रतिज्ञा की थी, उन्हें अब मुझे देना चाहिये। उन दोनों वरों को मैं अभी बताऊँगी - आप मेरी बात सुनिये - यह जो श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी की गयी है, इसी अभिषेक सामग्री द्वारा मेरे पुत्र भरत का अभिषेक किया जाये। देव! आपने उस समय देवासुर संग्राम में प्रसन्न होकर मेरे लिये जो दूसरा वर दिया था, उसे प्राप्त करने का यह समय भी अभी आया है। 

'धीर स्वभाव वाले श्रीराम तपस्वी के वेश में वल्कुल तथा मृगचर्म धारण करके चौदह वर्षों तक दण्डकारण्य में जाकर रहें। भरत को आज निष्कण्टक युवराज पद प्राप्त हो जाये। यही मेरी सर्वश्रेष्ठ कामना है। मैं आपसे पहले का दिया हुआ वर ही माँगती हूँ। आप ऐसी व्यवस्था करें, जिससे मैं आज ही श्रीराम को वन की ओर जाते देखूँ। आप राजाओं के राजा हैं, अतः सत्यप्रतिज्ञ बनिये और उस सत्य के द्वारा अपने कुल, शील तथा जन्म की रक्षा कीजिये। तपस्वी पुरुष कहते हैं कि सत्य बोलना सबसे श्रेष्ठ धर्म है। वह परलोक में निवास होने पर मनुष्यों के लिये परम कल्याणकारी होता है।' 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-९(9) समाप्त !

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