भाग-८(8) वानप्रस्थ मुनियों का राक्षसों के अत्याचार से अपनी रक्षा के लिये श्रीरामचन्द्रजी से प्रार्थना करना और श्रीराम का उन्हें आश्वासन देना

 


शरभङ्ग मुनि के ब्रह्मलोक चले जाने पर प्रज्वलित तेज वाले ककुत्स्थवंशी श्रीरामचन्द्रजी के पास बहुत-से मुनियों के समुदाय पधारे। उनमें १ वैखानस, २ वालखिल्य, ३ सम्प्रक्षाल, ४ मरीचिप, ५ बहुसंख्यक अश्मकुट्ट, ६ पत्राहार, ७ दन्तोलूखली, ८ उन्मज्जक, ९ गात्रशय्य, १० अशय्य, ११ अनवकाशिक, १२ सलिलाहार, १३ वायुभक्ष, १४ आकाशनिलय, १५ स्थण्डिलशायी, १६ ऊर्ध्ववासी, १७ दान्त, १८ आर्द्रपटवासा, १९ सजप, २० तपोनिष्ठ और २१ पञ्चाग्निसेवी (अर्थात १. ऋषियों का एक समुदाय जो ब्रह्माजी के नख से उत्पन्न हुआ है, २. ब्रह्माजी के बाल (रोम) से प्रकट हुए महर्षियों का समूह, ३. जो भोजन के बाद अपने बर्तन धो-पोंछकर रख देते हैं, दूसरे समय के लिये कुछ नहीं बचाते, ४. सूर्य अथवा चन्द्रमा की किरणों का पान करके रहनेवाले,  ५. कच्चे अन्न को पत्थर से कूटकर खानेवाले, ६. पत्तों का आहार करनेवाले, ७. दाँतों से ही ऊखल का काम लेनेवाले, ८. कण्ठ तक पानी में डूबकर तपस्या करने वाले, ९. शरीर से ही शय्या का काम लेनेवाले अर्थात् बिना बिछीने के ही भुजा पर सिर रख कर सोनेवाले, १०. शय्या के साधनों से रहित, ११. निरन्तर सत्कर्म में लगे रहने के कारण कभी अवकाश न पानेवाले, १२. जल पीकर रहनेवाले, १३. हवा पीकर जीवन निर्वाह करनेवाले, १४. खुले मैदान में रहनेवाले, १५. वेदी पर सोनेवाले, १६. पर्वतशिखर आदि ऊँचे स्थानों में निवास करने वाले, १७. मन और इन्द्रियों को वश में रखनेवाले, १८. सदा भीगे कपड़े पहननेवाले, १९. निरन्तर जप करनेवाले, २०. तपस्या अथवा परमात्मतत्त्व के विचार में स्थित रहनेवाले, और २१. गर्मी के मौसम में ऊपर से सूर्य का और चारों ओर से अग्रि का ताप सहन करनेवाले ) - इन सभी श्रेणियों के तपस्वी मुनि थे। 

वे सभी तपस्वी ब्रह्मतेज से सम्पन्न थे और सुदृढ़ योग के अभ्यास से उन सबका चित्त एकाग्र हो गया था। वे सब- के-सब शरभङ्ग मुनि के आश्रम पर श्रीरामचन्द्रजी के समीप आये। 

धर्मात्माओं में श्रेष्ठ परम धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी के पास आकर वे धर्म के ज्ञाता समागत ऋषि समुदाय उनसे बोले - रघुनन्दन ! आप इस इक्ष्वाकु वंश के साथ ही समस्त भूमण्डल के भी स्वामी, संरक्षक एवं प्रधान महारथी वीर हैं। जैसे इन्द्र देवताओं के रक्षक हैं, उसी प्रकार आप मनुष्यलोक की रक्षा करनेवाले हैं। आप अपने यश और पराक्रम से तीनों लोकों में विख्यात हैं। आपमें पिता की आज्ञा के पालन का व्रत, सत्य भाषण तथा सम्पूर्ण धर्म विद्यमान हैं। 

'नाथ! आप महात्मा, धर्मज्ञ और धर्मवत्सल हैं। हम आपके पास प्रार्थी होकर आये हैं; इसीलिये ये स्वार्थ की बात निवेदन करना चाहते हैं। आपको इसके लिये हमें क्षमा करना चाहिये। स्वामिन्! जो राजा प्रजा से उसकी आय का छठा भाग कर के रूप में ले ले और पुत्र की भाँति प्रजा की रक्षा न करे, उसे महान् अधर्म का भागी होना पड़ता है। श्रीराम! जो भूपाल प्रजा की रक्षा के कार्य में संलग्न हो अपने राज्य में निवास करने वाले सब लोगों को प्राणों के समान अथवा प्राणों से भी अधिक प्रिय पुत्रों के समान समझकर सदा सावधानी के साथ उनकी रक्षा करता है, वह बहुत वर्षों तक स्थिर रहनेवाली अक्षय कीर्ति पाता है और अन्त में ब्रह्मलोक में जाकर वहाँ भी विशेष सम्मान का भागी होता है।' 

'राजा राज्य में मुनि फल- मूल का आहार करके जिस उत्तम धर्म का अनुष्ठान करता है, उसका चौथा भाग धर्म के अनुसार प्रजा की रक्षा करने वाले उस राजा को प्राप्त हो जाता है। श्रीराम! इस वन में रहने वाला वानप्रस्थ महात्माओं का यह महान् समुदाय, जिसमें ब्राह्मणों की ही संख्या अधिक है तथा जिसके रक्षक आप ही हैं, राक्षसों के द्वारा अनाथ की तरह मारा जा रहा है। इस मुनि समुदाय का बहुत अधिक मात्रा में संहार हो रहा है।' 

‘आइये, देखिये, ये भयंकर राक्षसों द्वारा बारम्बार अनेक प्रकार से मारे गये बहुसंख्यक पवित्रात्मा मुनियों के शरीर (शव या कंकाल ) दिखायी देते हैं। पम्पा सरोवर और उसके निकट बहने वाली तुङ्गभद्रा नदी के तट पर जिनका निवास है, जो मन्दाकिनी के किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूट पर्वत के किनारे अपना निवासस्थान बना लिया है, उन सभी ऋषि महर्षियों का राक्षसों द्वारा महान् संहार किया जा रहा है।' 

‘इन भयानक कर्म करने वाले राक्षसों ने इस वन में तपस्वी मुनियों का जो ऐसा भयंकर विनाशकाण्ड मचा रखा है, वह हम लोगों से सहा नहीं जाता है। अत: इन राक्षसों से बचने के लिये शरण लेने के उद्देश्य से हम आपके पास आये हैं। श्रीराम! आप शरणागतवत्सल हैं, अत: इन निशाचरों से मारे जाते हुए हम मुनियों की रक्षा कीजिये। वीर राजकुमार ! इस भूमण्डल में हमें आपसे बढ़कर दूसरा कोई सहारा नहीं दिखायी देता। आप इन राक्षसों से हम सबको बचाइये।' 

तपस्या में लगे रहने वाले उन तपस्वी मुनियों की ये बातें सुनकर ककुत्स्थकुलभूषण धर्मात्मा श्रीराम ने उन सबसे कहा - मुनिवरो! आप लोग मुझसे इस प्रकार प्रार्थना न करें। मैं तो तपस्वी महात्माओं का आज्ञापालक हूँ। मुझे केवल अपने ही कार्य से वन में तो प्रवेश करना ही है (इसके साथ ही आप लोगों की सेवा का सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हो जायगा।) राक्षसों के द्वारा जो आपको यह कष्ट पहुँच रहा है, इसे दूर करने के लिये ही मैं पिता के आदेश का पालन करता हुआ इस वन में आया हूँ। आप लोगों के प्रयोजन की सिद्धि के लिये मैं दैवात् यहाँ आ पहुँचा हूँ। आपकी सेवा का अवसर मिलने से मेरे लिये यह वनवास महान् फलदायक होगा। तपोधनो! मैं तपस्वी मुनियों से शत्रुता रखने वाले उन राक्षसों का युद्ध में संहार करना चाहता हूँ। आप सब महर्षि भाई सहित मेरा पराक्रम देखें। 

इस प्रकार उन तपोधनों को वर देकर धर्म में मन लगाने वाले तथा श्रेष्ठ दान देने वाले वीर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण तथा तपस्वी महात्माओं के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के पास गये। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-८(8) समाप्त !

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